Saturday, 25 July 2015

अंग्रेजों के जुल्म से पिछड़े भारतीय @विश्वनाथ पांडेय

ब्रिटिश गुलामी के बारे में हमारे यहां तर्क दिया जाता है कि रेलवे, डाक सेवा तथा सेना आदि की शुरुआत अंग्रेजों के कारण ही हुई। जबकि इससे उलट कुछ महीने पहले कांग्रेस नेता शशि थरूर ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के मंच पर हुई बहस में यह बात मजबूती से रखी कि इंग्लैंड का विकास बहुत हद तक भारत को गर्त में धकेलने और लूटी गई संपत्ति के कारण था। इस बारे में दादाभाई नौरोजी ने 1856 में पॉवर्टी इन इंडिया पुस्तक में एक व्याख्या प्रस्तुत की थी।

21 मार्च 1916 को इंडियन लेजिस्लेटिव काउंसिल में सर इब्राहिम रहमतुल्ला ने प्रस्ताव रखा था कि उद्योगों के विकास के साथ वित्तीय स्वशासन और खास तौर पर आयात-निर्यात तथा उत्पादन शुल्कों आदि की व्यवस्था पर एक समिति विचार करे। वाणिज्य सदस्य सर विलियम क्लार्क ने कहा था कि इस पर प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विचार होगा। उनका यह भी कहना था कि भारत सरकार की ओर से प्रथम औद्योगिक कमीशन का गठन भारतीय आत्मनिर्भता पर विचार के लिए किया जाएगा। काउंसिल के सदस्य पंडित मदन मोहन मालवीय को भी टी एच हॉलैंड की अध्यक्षता में गठित आठ सदस्यीय समिति का एक सदस्य नियुक्त किया गया। कमीशन के आधिकारिक विचार के समानांतर मालवीय जी ने एक लंबा असहमति नोट पेश किया था।

मालवीय जी ने प्रो. वेबर, रानाडे आदि को उद्धृत करते हुए बताया कि रोम में भारत की बनी हुई वस्तुओं की बहुत खपत थी। इतिहासकार प्लिनी की शिकायत थी कि भारत निर्यात के जरिये काफी संपत्ति अर्जित कर लेता है। दो हजार वर्ष पहले भारत में उच्च कोटि की सूत की कताई और बुनाई होती थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के आने से पहले भारत व्यवसाय एवं कृषि प्रधान देश था। भारत की व्यावसायिक क्षमता के कारण ही यूरोपीय व्यापारियों ने भारत से व्यापार शुरू किया था। मरे के अनुसार भारतीय वस्त्रों की गुणवता उत्तम थी। लॉर्ड क्लाइव ने मुर्शिदाबाद के बारे में बताया कि 1757 में इसकी घनी आबादी लंदन जैसी थी तथा उसकी समृद्धि आश्चर्यचकित करती थी।

पर ईस्ट इंडिया कंपनी की जड़ जमने के बाद निर्यात में कमी आने लगी। वर्ष 1820 तक ढाका के मलमल तथा सूती माल का निर्यात पूरी तरह बैठ गया था। भारतीय रूई निर्यातकों को इंग्लैंड में चुंगी अदा करनी पड़ती थी। जबकी भारत में ब्रिटिश माल या तो बिना चुंगी दिए या मामूली चुंगी देकर आते थे। मशीनी करघों और भाप के इंजन से चलने वाली मशीनों के कारण अंग्रेजी माल भारत में प्रचुर मात्रा में आने लगा। अनाप-शनाप टैक्स के कारण निर्यात नष्ट हो गया और भारत खेतिहर देश बन गया।

ब्रुक्स एडम्स की पुस्तक द लॉ ऑफ सिविलाइजेशन ऐंड डिके में कहा गया है कि जब क्लाइव भारत आए थे, तब इंग्लैंड पर 7.45 करोड़ पाउंड का कर्ज था। भारत की लूट-खसोट से वह कर्ज से उबर पाया। इस लूट-खसोट के कारण 1800 से 1900 तक भारत में 31 अकाल पड़े, जबकि 1854 से 1901 के बीच करीब पौने तीन करोड़ लोगों की मौत हुई।

मालवीय जी ने तब कहा था, भारतीय उद्योगों के मामले में भारत का हित ही हमारा पहला, दूसरा और तीसरा ध्येय होना चाहिए। पहला ध्येय यह कि यहां के कच्चे माल को उपयोग में लाना चाहिए, दूसरा यह कि उद्योग-धंधे खोलने चाहिए और तीसरा ध्येय यह कि इनका लाभ देश में ही रहना चाहिए। यदि इस भाव से प्रेरित होकर भारतीय औद्योगिक उन्नति के साधनों को काम में लाया जाएगा, तभी देश समृद्धिशाली होगा।

-काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विशेष कार्याधिकारी

Wednesday, 22 July 2015

हिंदू कोड बिल के लिए नेहरू के संघर्ष की कहानी @फ्रेंकलिन निगम

16 सितंबर 1951 का दिन था. दिल्ली में एक मुद्दे पर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ नारे लगाए जा रहे थे. कट्टरवादी हिंदू की एक भीड़ नेहरू से गद्दी छोड़ देने की मांग कर रही थी.

आजाद भारत में सबसे बड़े नेता और पहले प्रधानमंत्री नेहरू के खिलाफ विरोध की आवाज बुलंद थी. नेहरू के खिलाफ उठे आंदोलन का नेतृत्व अखिल भारतीय राम राज्य परिषद के संस्थापक स्वामी करपात्री महाराज कर रहे थे. स्वामी करपात्री के अनुसार हिंदू कोड बिल हिन्दु रीति-रिवाजों, परंपराओं और धर्मशास्त्रों के विरुद्ध था.

जब भारत आजाद हुआ तब हिंदू समाज में पुरुष और महिलाओं को तलाक का अधिकार नहीं था, हिंदू पुरूषों को एक से ज्यादा शादी करने की आजादी थी लेकिन विधवाएं दोबारा शादी नहीं कर सकती थी. विधवाओं को संपत्ति से भी वंचित रखा गया था. नेहरू समाज की इन रुढ़िवादी परंपराओं को बदल देना चाहते थे. नेहरू जिस सामाजिक बदलाव की हिमायत कर रहे थे हिंदू समाज उसका विरोध कर रहा था. फरवरी 1949 को संसद भवन में नेहरू ने कहा, ‘इस कानून को हम इतनी अहमियत देते हैं कि हमारी सरकार बिना इसे पास कराए सत्ता में रह ही नहीं सकती.’

तत्कालिन कानून मंत्री डॉक्टर बीआर अंबेडकर हिंदू कोड बिल के पक्ष में नेहरू का साथ दे रहे थे. 1948 में ये बिल संविधान सभा में पहली बार पेश किया गया. लेकिन अंबेडकर के तमाम तर्क और नेहरू के समर्थन के बावजूद हिंदू कोड बिल का जबरदस्त विरोध हुआ. कानून मंत्री अंबेडकर ने 5 फरवरी 1951 को हिन्दू कोड बिल को संसद में दोबारा पेश किया. तब भारत का संविधान भी बनकर तैयार था. लेकिन संसद के सदस्यों को जनता ने नहीं चुना था. इन सदस्यों को बहुसंख्यक हिंदू समाज में बदलाव और पुराने रीति-रिवाजों को बदलने का निर्णय करना था. संसद में तीन दिन तक बहस चली. हिंदू कोड बिल के विरोधियों का सबसे बड़ा तर्क था कि संसद के सदस्य जनता के चुने हुए नहीं है इसलिए इतने बड़े विधेयक को पास करने का नैतिक अधिकार नहीं है. दूसरा तर्क था कि सिर्फ हिंदुओं के लिए कानून क्यों लाया जाए बहुविवाह की परंपरा तो दूसरे धर्मों में भी है. इस कानून को सभी पर लागू किया जाना चाहिए.

मार्च 1949 से ऑल इंडिया एंटी हिंदू कोड बिल कमेटी सक्रिय थी. करपात्री महाराज के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक, हिंदू महासभा और दूसरे हिंदूवादी संगठन हिंदू कोड बिल का विरोध कर रहे थे. इसलिए जब इस बिल को संसद में चर्चा के लिए लाया गया तब हिंदूवादी संगठनों ने इसके खिलाफ देश भर में प्रदर्शन शुरू कर दिए.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अकेले दिल्ली में दर्जनों विरोध-रैलियां आयोजित कीं. महिलाओं को पिता की संपत्ति में हिस्सा दिए जाने, तलाक का अधिकार दिए जाने और स्त्रियों को समानता का अधिकार दिए जाने जैसे प्रावधानों की वजह से हिंदू कोड बिल के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के कोने-कोने में प्रदर्शन किए.

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भी इस बिल को लाए जाने के खिलाफ थे. राजेंद्र प्रसाद ने बिल के विरोध में कई पत्र नेहरू को लिखे. 1950 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी नेहरू को चेताया कि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय पर इस तरह का कानून जबरदस्ती थोपा नहीं जाना चाहिए और वो राष्ट्रपति के अधिकारों का इस्तेमाल कर कानून को मंजूरी न देने के विकल्प पर विचार कर सकते हैं.
कांग्रेस नेताओं और राष्ट्रपति के विरोध से नेहरू विचलित नहीं हुए और अपनी जिंद पर अड़े रहे. आखिरकार नेहरू और डॉक्टर अंबेडकर ने 17 सितंबर 1951 को चर्चा के लिए इस बिल को सदन के पटल पर रखा. संसद में विरोध और बहस को देखते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने हिंदू कोड बिल को चार हिस्सों में बांटने का एलान कर दिया. डॉक्टर अंबेडकर नेहरू के इस प्रस्ताव के खिलाफ थे. अंबेडकर ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर नेहरू का साथ छोड़ दिया.

दूसरी तरफ हिंदू कोड बिल के विरोध को देखते हुए नेहरू को ऐहसास हो गया था कि बिना जनादेश के इस कानून को पास कराना आसान नहीं होगा. इसी वजह से उन्होंने चुनाव तक इस बिल को टालने का मन बना लिया.

1951-52 में भारत के पहले आम चुनाव होने वाले थे. नेहरू के लिए यह काफी अहम थे. इलाहाबाद की फूलपुर सीट से नेहरू लोकसभा का पहला चुनाव लड़ रहे थे. इन चुनावों में हिंदू कोड बिल सबसे बड़ा मुद्दा था. नेहरू के खिलाफ संन्यासी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी चुनाव लड़ रहे थे. हिंदू कोड बिल के समर्थन में जनसंघ और हिंदू महासभा जैसे दलों ने अपना उम्मीदवार खड़ा करने के बजाय प्रभुदत्त ब्रह्मचारी को समर्थन दिया. देशभर में वोट डाले गए और नतीजे घोषित हुए. प्रभुदत्त ब्रह्मचारी अपनी जमानत भी नही बचा पाए थे और नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत हासिल की. नेहरू का साथ छोड़ चुके डॉक्टर अंबेडकर भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव हार चुके थे.

देश के पहले लोकसभा चुनाव के बाद नेहरू ने हिंदू कोड बिल को कई हिस्सों में तोड़ दिया. जिसके बाद 1955 में हिंदू मैरिज एक्ट बनाया गया. जिसके तहत तलाक को कानूनी दर्जा, अलग-अलग जातियों के स्त्री-पुरूष को एक-दूसरे से विवाह का अधिकार और एक बार में एक से ज्यादा शादी को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया. इसके अलावा 1956 में ही हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू दत्तक ग्रहण और पोषण अधिनियम और हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम लागू हुए. ये सभी कानून महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा देने के लिए लाए गये थे. इसके तहत पहली बार महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिया गया. लड़कियों को गोद लेने पर जोर दिया गया. यह कानून हिंदुओं के अलावा सिखों, बौद्ध और जैन धर्म पर लागू होता है.

नेहरू के इस कदम का भी संसद के बाहर और अंदर जबरदस्त विरोध हुआ लेकिन बहुमत की सरकार होने की वजह से नेहरू इन विधेयकों को पास कराने में कामयाब रहे. आज हिंदू समाज महिलाओं को लेकर जितना लोकतांत्रिक और उदार नजर आता है उसके पीछे ये कानून ही है जिन्हें बनवाने में नेहरू ने मुख्य भूमिका अदा की थी.

के. कामराज की कृपा से बने थे लाल बहादुर शास्त्री पीएम! @फ्रेंकलिन निगम

वर्ष 1964 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का देहांत हुआ तो देशभर में मातम के साथ एक ही सवाल पूछा जा रहा था कि नेहरू के बाद कौन प्रधानमंत्री पद पर बैठेगा. कौन नेहरू की विरासत को संभालेगा?

सवाल अहम था. पंडित नेहरू के देहांत के 2 घंटे बाद ही गुलजारी लाल नंदा को केयरटेकर प्रधानमंत्री तो बना दिया गया. लेकिन प्रधानमंत्री के दावेदारी को लेकर ड्रामा शुरू हो चुका था. कांग्रेस पार्टी के सामने प्रधानमंत्री पद के लिए कई बड़े नाम थे और कई दावेदार भी. किसी एक को कैसे चुना जाए इसका फैसला करना मुश्किल था.

उन दिनों के. कामराज कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे. कामराज कांग्रेस के अंदर एक बड़ा नाम था. नेहरू के देहांत से एक साल पहले कामराज ने मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था और उनके इस्तीफे के बाद 6 केन्द्रीय मंत्री और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी कुर्सी छोड़नी पड़ी. मकसद था पार्टी को मजबूत करना. पद छोड कर पार्टी में काम करने की इस योजना को ही कामराज प्लान कहा गया. 27 मई 1964 के बाद कामराज के सामने कांग्रेस पार्टी के अंदर नेहरू का उत्तराधिकारी चुनने की चुनौती थी.

नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बनने का सपना कई बड़े नेता देख रहे थे. कांग्रेस नेता मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनने की लालसा लिए अपने आप को सबसे बड़ा दावेदार मान रहे थे. केयरटेकर प्रधानमत्री गुलजारीलाल नंदा भी वरिष्ठता के आधार पर प्रधानमंत्री बनना चाहते थे. लेकिन कामराज और उनके सिंडीकेट ग्रुप के सदस्य लाल बहादुर शास्त्री को इस पद के लिए सही उम्मीदवार मान रहे थे.

दूसरी तरफ मोरारजी चाहते थे कि वोटिंग के जरिए नए नेता का चुनाव किया जाए. जबकि लाल बहादुर शास्त्री और कामराज का मानना था कि वोटिंग से कांग्रेस की छवि खराब हो सकती है.

इसलिए शास्त्री ने पत्रकार कुलदीप नैयर के जरिए मोरारजी के पास संदेश भिजवाया कि जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी में से किसी एक का चुनाव कर लिया जाना चाहिए.

मोरारजी देसाई ने पत्रकार कुलदीप नैयर से कहा कि इंदिरा एक छोटी-सी छोकरी है और जेपी भ्रमित आदमी. इसलिए वे इन दोनों नामों का समर्थन नहीं करेंगे. मोरारजी ने कुलदीप नैयर से साफ कह दिया कि वोटिंग से बचने का एक ही तरीका है कि पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री पद का एकमात्र उम्मीदवार मान ले. कामराज और उनका ग्रुप मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनते देखना नहीं चाहता थे.

कांग्रेस पार्टी के अंदर प्रधानमंत्री पद को लेकर ड्रामा बढ़ता ही जा रहा था. देश की बागडोर किसे दी जाए ये फैसला अब कामराज को करना था. साल 1963 के सितंबर महीने में कामराज ने तिरुपति में सिंडिकेट गैर हिंदी भाषी राज्यों के कई कांग्रेसी नेताओं के साथ अगले प्रधानमंत्री के नाम पर चर्चा की. इस चर्चा में सिंडिकेट संजीव रेड्डी, निजालिंगप्पा, एस के पाटिल और अतुल्य घोष भी शामिल हुए. इस बैठक में मोरारजी देसाई, लालबहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, इंदिरा गांधी और जगजीवन राम के नामों पर भी गौर किया गया. लेकिन पंडित नेहरू का उत्तराधिकारी कौन होगा इस पर फैसला नहीं हो पाया.

पंडित नेहरू के देहांत के तीन दिन बाद देश का भविष्य तय करने के लिये कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य कामराज के घर पर इकट्टा हुये. पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो भी इस बैठक में शामिल थे. मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो, मोरारजी देसाई के समर्थक थे और कामराज के विरोधी भी. मोराजी देसाई और उनके समर्थक चाहते थे कि प्रधानमंत्री चुनने का काम संसदीय दल करे ना कि पार्टी. लेकिन कामराज ने कांग्रेस वर्किग कमेटी का वर्चस्व कायम रखा . और नेताओं की राय जानने के साथ-साथ कांग्रेस में आम राय बनाने की जिम्मेदारी भी खुद अपने उपर ले ली. अगले तीन दिन तक देश भर के कांग्रेसी नेताओं से मिलकर कामराज आमराय बनाने में जुटे रहे.

आखिरकार 1 जून 1964 की रात कामराज ने मोरारजी देसाई से उनके घर पर जाकर मुलाकात की और कांग्रेसी नेताओं की आमराय के बारे में मोरारजी को बता दिया. कामराज की बात सुनकर मोरारजी खफा भी हुए लेकिन थोड़ी ना-नुकर के बाद मोरारजी ने कांग्रेस पार्टी के बहुमत की राय को मान लिया. कामराज ने मोरारजी से मुलाकात के बाद कांग्रेस पार्टी की राय का एलान कर दिया. कांग्रेस के नए नेता और प्रधानमंत्री के पद के लिए लाल बहादुर शास्त्री नाम तय कर लिया गया.

लाल बहादुर शास्त्री को औपचारिक रुप से 2 जून 1964 को कांग्रेस संसदीय दल ने अपना नेता और देश का प्रधानमंत्री चुन लिया. कामराज ने अपीन शातिर राजनीति से मोरारजी देसाई को किनारे कर लाल बहादुर शास्त्री को अगला प्रधानमंत्री बनवा दिया था. लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री के पद पर 18 महीने तक रहे. अपने इस छोटे से कार्यकाल में शास्त्री ने भारत के आर्थिक संकट और पाकिस्तान से युद्ध जैसे हालात का सामना किया और देश को जय जवान, जय किसान का अमर नारा दिया.

तेज गेंदबाजी है भारतीय क्रिकेट की असली ताकत @रामचंद्र गुहा

भारत हमेशा से महान फिरकी गेंदबाजों का गढ़ रहा है। पहले वीनू मांकड़ और सुभाष गुप्‍ते, फिर बेदी, चंद्रशेखर और प्रसन्ना, और फिर आया ‌अनिल कुंबले का दौर। मगर हमेशा से ऐसा नहीं था। 1932 के जून महीने में लार्ड्स की एक दोपहर में जब हमने पहला टेस्ट मैच खेला, तो टीम की गेंदबाजी की कमान तेज गेंदबाज मोहम्मद निसार और स्विंग के मास्टर कहे जाने वाले एल अमर सिंह के हाथों में थी। और उनका साथ दे रहे थे, मध्यम गति के गेंदबाज जहांगीर खान और सी के नायडू। 1930 के दशक में भारत में अच्छे स्पिन गेंदबाजों का अकाल था। पटियाला के महाराजा से, जो न सिर्फ अच्छे बैट्समैन थे, बल्कि क्रिकेट को काफी बढ़ावा भी देते थे, इसकी वजह पूछी गई, तो उनका जवाब था कि भारतीयों को खुद का मखौल उड़वाना बिल्कुल पसंद नहीं होता, और अमूमन उनकी सोच होती है कि फिरकी पर छक्का मारना आसान होता है, जबकि तेज या मध्यम तेज गेंदबाजों पर छक्का उड़ाना मुश्किल। इसीलिए वे धीमी गेंदों का अभ्यास ही नहीं करते।

पटियाला के महाराजा निसार और अमर सिंह का कहर झेल चुके थे। फिर जितने भी सिख युवाओं को वह जानते थे, वे सभी अपनी दिलेर परंपरा को बढ़ाने वाले उदीयमान तेज गेंदबाज थे। मगर जल्दी ही हालात बदलने लगे। 1937-38 में बाएं हाथ के फिरकी गेंदबाज वीनू मांकड़ पहली बार भारत की तरफ से खेले। भारत ने वह अन‌ाधिकारिक मैच लॉर्ड टेनीसन की टीम के खिलाफ खेला था। उसके पंद्रह वर्ष बाद मांकड़ ने मद्रास में इंग्लैंड के खिलाफ बारह विकेट चटकाते हुए भारत को पहली आधिकारिक टेस्ट जीत का स्वाद चखाया। 1940 से 70 के दशक तक भारत के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों में सभी फिरकी थे। हालांकि इस दौरान नई गेंद से शुरुआती विकेट चटकाने का जिम्मा संभालने वाले दत्तू फड़कर, रमाकांत देसाई, आर सुरेंद्र नाथ और करसन घावरी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। मगर मैचों को जिताने का सेहरा धीमे गेंदबाजों के सिर ही बंधता था। फिर चाहे वे मांकड़, गुप्ते और गुलाम अहमद हों, या बोर्डे और दुर्रानी, या बेदी, प्रसन्ना, चंद्रशेखर और वेंकट। महान ऑलराउंडर कपिल देव निखंज के उदय से चीजें बदलनी शुरू हुईं। अपनी आत्मकथा में कपिल उल्लेख करते हैं कि एक मशहूर कोच ने कैसे उनको हतोत्साहित करते हुए कहा था कि भारत में कोई तेज गेंदबाज पैदा ही नहीं हो सकता। उसके ठीक पचास वर्ष पहले पटियाला के महाराजा की सोच थी कि कोई भारतीय फिरकी गेंदबाज बनने की नहीं सोचता। मगर यही वह समय था, जब परंपरागत सोच उलटने लगी थी। कपिल को सलाम कि उन्होंने कोच की अनसुनी की, और इसी वजह से कपिल की गेंदबाजी की यादें अंतिम समय तक मेरे जेहन में सजी रहेंगी।

उनका सहज रन-अप, उछलकर गेंदबाजी करने की मुद्रा, स्लिप की ओर जाती उनकी आउट स्विंग (दाएं हाथ के बल्लेबाज के बल्ले का बाहरी कोना छूते हुए) गेंदे, धीमी गति से अंदर की ओर आने वाली उनकी शातिर गेंदे, जिन्होंने कई बल्लेबाजों को पगबाधा किया-ये यादें कभी भुलाई नहीं जा सकतीं। कपिल ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में, और तेज गेंदबाजों को मदद न देने वाली भारत की पिचों पर भी टेस्ट मैचों में भारत को जीत दिलवाई। कुछ अक्‍खड़-सा बोलने वाले हरियाणा के इस खिलाड़ी के बाद भारत की तेज गेंदबाजी की बागडोर संभाली दक्षिण के एक शर्मीले इंजीनियरिंग विद्यार्थी ने। यह थे जवागल श्रीनाथ। देश में तेज गेंदबाजी को लेकर कपिल ने जो जमीन तैयार की थी, उसकी बदौलत युवा श्रीनाथ को हतोत्साहित करने का किसी में साहस नहीं था।

उनके कोच की बस यही सलाह थी कि अगर तेज गेंद फेंकना चाहते हो, तो शाकाहारी बने रहने से काम नहीं चलेगा। कपिल के उलट श्रीनाथ की गेंदे दाएं हत्था बल्लेबाज के अंदर की ओर (इनस्विंग) आती थीं। हालांकि बाद में उन्होंने बाहर जाती गेंदे (आउटस्विंग) फेंकना भी शुरू किया। बावजूद इसके कि उनका रन-अप छोटा था, उनकी गेंदों में इतनी तेजी और उछाल था कि अपने पहले ऑस्ट्रेलिया दौरे में उन्होंने महान बल्लेबाज एलन बॉर्डर को खासा तंग किया। ‌फिर तो चाहे ब्रायन लारा हों या इंग्लैंड के ओपनर (पारी की शुरुआत करने वाले) बल्लेबाज माइकल अर्थटन, सभी उनसे परेशान रहे। जैसे कपिल के कैरियर के अंत में श्रीनाथ्‍ा टीम में आए, वैसे ही, श्रीनाथ के कैरियर के अंतिम दौर में उनका साथ्‍ा देने उतरे बाएं हाथ से तेज गेंदबाजी करने वाले वड़ोदरा के जहीर खान। कैरियर के शुरुआती दौर में जहीर विशुद्ध तेज गेंदबाज थे, मगर लगातार चोटों ने उन्हें अपनी गत‌ि और शैली बदलने पर मजबूर कर दिया।

अक्तूबर, 2009 में सेंचुरियन में भारत और पाकिस्‍तान के मैच के दौरान मैं पवेलियन में मौजूद था। चोटिल होने की वजह से जहीर भी पास ही बैठे थे। एकाएक जहीर उठे और निकास के दरवाजे की ओर बढ़े। मैंने मुड़कर देखा कि वह बाएं हाथ के महानतम तेज गेंदबाज वसीम अकरम के साथ बैठे थे। दरअसल जहीर ऐसे खिलाड़ी हैं, जो सीखने को हरदम तैयार रहते हैं। वसीम की सलाहों और खुद की गलतियों से सीखते हुए जहीर ने खुद को मांजते हुए वह गेंद ईजाद की, जो उनकी सामान्य गेंदों की तुलना में तेज होती है। इसके अलावा उन्हें विकेट की दूसरी ओर से (राउंड द विकेट) गेंदबाजी करना, और रिवर्स स्विंग की कला भी सीखी। कपिल और श्रीनाथ की तरह उन्होंने भी दुनिया के दिग्गज बल्लेबाजों की रातों की नींद उड़ाई।

2011 का विश्व कप जीतने में उनकी अहम भूमिका थी। उन्होंने न सिर्फ किफायती गेंदबाजी की, बल्कि पूरे टूर्नामेंट के दौरान मौकों पर विकेट भी चटकाए। मगर अब जब कि इंग्लैंड दौरे के लिए उन्हें टीम में जगह नहीं दी गई है, मुझे लगता है कि उनका कैरियर लगभग खत्म है। हालांकि सर्वश्रेष्ठ ग्यारह खिलाड़ियों वाली सर्वकालिक भारतीय टीम में कपिल के साथ गेंदबाजी की बागडोर संभालने में श्रीनाथ के साथ उनकी दावेदारी भी मजबूत है। मोहम्मद निसार कहते थे, 'एक मुंह पर दूंगा, फिर स्टंप उखाड़ दूंगा।' हालांकि भारत में उनके बाद हुए तेज गेंदबाजों ने बाउंसर और यॉर्कर गेंदों पर विकेट जरूर लिए, मगर उनका ज्यादा जोर स्विंग और बॉल की गति में चतुराई दिखाने पर ही रहा। फिर भी यह स्वीकारने में मुझे संकोच नहीं कि बावजूद ‌इसके मुझे धीमी गेंदबाजी ज्यादा भाती है, फिर भी मैं कपिल, श्रीनाथ और जहीर का शुक्रगुजार हूं, जिनकी बदौलत वर्षों तक मुझे मनोरंजन के पल ‌मिलते रहे।

खुफिया इतिहासकार क्रिस्टोफर एंड्रयू और वासिली मित्रोखिन @बलबीर पुंज

खुफिया इतिहासकार क्रिस्टोफर एंड्रयू और वासिली मित्रोखिन के संयुक्त प्रयास से दुनिया भर के देशों में केजीबी द्वारा चलाए गए खुफिया अभियानों का खुलासा 2005 में प्रकाशित पुस्तक-मित्रोखिन आर्काइव में किया गया था। बाद में इसका दूसरा खंड भी प्रकाशित हुआ। वासिली मित्रोखिन केजीबी के अभिलेखागार में वरिष्ठ संग्राहक थे। 1972 से 1984 के बीच प्राय: प्रतिदिन केजीबी के अत्यंत गोपनीय दस्तावेजों को वह अपने साथ चोरी-छिपे बाहर लाते रहे। सेवानिवृत्तिके बाद उन्होंने ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी एसआइएस से डील कर दस्तावेजों के बदले में लंदन में शरण ले ली। शीत युद्ध के दौरान केजीबी की सक्रियता भारत में सर्वाधिक थी। स्टालिन भारत को ब्रिटिश साम्राज्यवाद का पिट्ठू समझते थे। स्टालिन ने गांधीजी को स्वतंत्रता सेनानी के भेस में लोगों से विश्वासघात करने वाला बताया था। वह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के भी मुखर आलोचक थे। स्टालिन के विरोधी रवैये के बावजूद पंडित नेहरू का अटूट विश्वास था कि सोवियत क्रांति ने मानवता की बड़ी सेवा की है। किंतु कटु सत्य यह है कि 1950 के प्रारंभिक वषरें तक इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी के लिए मास्को से जो भी आदेश-निर्देश आता था उसमें नेहरू सरकार को यथाशीघ्र उखाड़ फेंकने की बात होती थी।

एक ओर पंडित नेहरू आश्वस्त थे, वहीं मित्रोखिन के अनुसार मास्को स्थित भारतीय दूतावास में केजीबी के गुप्तचरों की पैठ बढ़ती ही जा रही थी। सुरा और सुंदरियों के मायाजाल में दूतावासकर्मी केजीबी के मोहरे बन रहे थे। मास्को ने नेहरू के विश्वासपात्र सलाहकार और विचारधारा से कम्युनिस्ट कृष्ण मेनन को प्रोत्साहित करना शुरू किया, जो साल 1957 में देश के रक्षा मंत्री बने। कृष्ण मेनन के दौर में ही देश के रक्षा उपकरणों की खरीद नीति पश्चिम से हटकर सोवियत संघ पर केंद्रित हुई। अक्टूबर, 1962 में चीन के हाथों भारत को शर्मनाक पराजय का मुंह देखना पड़ा। नेहरू और कम्युनिस्ट मेनन चीन की विस्तारवादी कुटिलता के मूकदर्शक बने रहे। मेनन ने खुफिया सूचनाओं के बावजूद सेना को साधनविहीन रखा। भारी दबाव में नेहरू को मेनन को हटाना पड़ा। सोवियत संघ ने मेनन को दोबारा बहाल करने के लिए उनके पक्ष में प्रचार अभियान छेड़ा। अखबार वालों को धन देकर मेनन की तारीफ में लेख प्रकाशित कराए गए। मित्रोखिन के अनुसार भारत के दस बड़े प्रकाशन समूह केजीबी के पेरोल पर थे, जो केजीबी के हितों के अनुकूल लेख प्रकाशित करते थे। जनवरी, 1966 में लालबहादुर शास्त्री की ताशकंद में रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। कांग्रेस ने नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री के लिए आगे किया, जिसे केजीबी ने 'वानो' का छद्म नाम दिया था। केजीबी को विश्वास था कि 'वानो' को अपनी शतरें पर काम करने के लिए तैयार कर लेगा। नवंबर, 1969 में कांग्रेस दोफाड़ हुई और कांग्रेस अस्तित्व में आई। मित्रोखिन लिखते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अब 'दरबार संस्कृति' पैदा होने लगी। पार्टी का एक धड़ा मानता था कि इंदिरा गांधी देश को सोवियत संघ के हाथों बेचने पर आमादा हैं और मास्को और सोवियत दूतावास के बीच संपर्क सूत्र के रूप में अपने मुख्य सचिव परमेश्वर नारायण हकसर का उपयोग कर रही हैं।

1970 के दशक के प्रारंभ में ही भारत के सत्ता अधिष्ठान में केजीबी का पूरा दबदबा कायम हो चुका था। ओलेग कालूजिन जो बाद में काउंटर इंटेलिजेंस का मुखिया बना, तत्कालीन भारत को याद करते हुए कहता है कि तब सरकार, खुफिया विभाग, रक्षा, विदेश मंत्रालय और पुलिस में उसके सैकड़ों विश्वस्त संपर्क सूत्र काम कर रहे थे। एक मंत्री ने 50,000 डॉलर के बदले में अहम जानकारी देने का वादा किया था। कालूजिन के अनुसार ऐसा लगता था कि पूरा देश बिकने को तैयार है। उसके मुताबिक स्वयं इंदिरा गांधी के यहां नियमित रूप से नोटों से भरे सूटकेस भेजे जाते थे। केजीबी पर विश्वास का यह नतीजा था कि इंदिरा भारत में होने वाली किसी भी गड़बड़ी के लिए सीआइए को कसूरवार बताती थीं। इस मानसिकता के विरोध में पीलू मोदी 'मैं सीआइए एजेंट हूं' की तख्ती लगाकर संसद पहुंचे थे।

प्रथम विश्वयुद्ध हमारा वीर पर्व नहीं @मृणाल पाण्डे

यह एक अजीब संयोग ही था कि जिस समय दुनिया परेडों, भाषणों और स्मृति स्तंभों की मार्फत पहले विश्वयुद्ध की शतवार्षिकी धूमधाम से मनाने की फिराक में है, उसी समय गृहयुद्ध की आग में जलते यूक्रेन के विद्रोहियों ने गलती से इलाके के ऊपर से गुजर रहे मलेशियाई एयरलाइंस के एक यात्री विमान  को सेना का विमान समझकर उसे मिसाइल से मार गिराया। कुछ ही मिनटों में 298 मासूम जानें मिट गईं।

दरअसल, तकरीबन सौ सालों से हम युद्धों को रूमानी चश्मों से किताबों की मार्फत ही पढ़ते आए हैं। उनके शहीदों, ख्यातनाम कमांडरों और जीत का सेहरा बांधे कूटनीतिज्ञों की सराहना करते हुए हम अक्सर भूल जाते हैं कि हर युद्ध की असली शक्ल अमानवीय, अमर्यादित और विनाशकारी ही होती है। उनको छेड़ने वाले चाहे जिस भी वैचारिकता, आत्म-मुग्धता और देशप्रेम के नाम पर अपने सैनिक मोहरों को कूटनीति की बिसात पर उतारते हों, जैसे-जैसे युद्ध रंग पकड़ते हैं स्थिति हाथ से बाहर जाने लगती है।

विश्वयुद्ध हों कि स्थानीय सीमाओं के आर-पार छेड़ी गई इलाकाई लड़ाइयां अथवा भीतरी गृहयुद्ध, युद्धोन्माद के क्षणों में तमाम शिष्टताभरे मुखौटे हट जाते हैं और युयुत्सु लड़ाकों के भीतर छिपा खून का प्यासा पशु बाहर निकलकर सामने खड़े हर अच्छे बुरे, बच्चे बूढ़े, महिला और पुरुष पर टूट पड़ता है। गलती से युद्ध क्षेत्र की घटनाओं के दौरान मारे गए मासूमों के लिए एक शिष्ट और निरापद मुहावरा ईजाद कर लिया गया है: कोलैटरल डैमेज। नाहक किंतु अपरिहार्य नुकसान! निश्चय ही 298 यात्रियों को मौत के घाट उतारने वाले किसी धरतीपकड़ कमांडर का यह फैसला भी विद्रोही सेनाओं के इतिहास में एक कोलैटरल डैमेज का आंकड़ा बनकर रह जाएगा। 

विश्वयुद्ध के लगभग पूरी तरह विदेशी इतिहासवेत्ताओं द्वारा लिखे गए इतिहास से लैस भारतीय मूल के लोगों की एक ग्लोबल संस्था, ‘गोपियो’ (ग्लोबल ऑर्गनाइजेशन फॉर पीपल अॉफ इंडियन ओरिजिन) को इस बात पर खेद भरा विस्मय है कि पहले विश्वयुद्ध में करीब चौदह लाख भारतीय सैनिकों ने फ्रांस की धरती पर जाकर जर्मनी की सेनाओं से इतना जमकर मोर्चा लिया था कि 1915 में सिर्फ नूवी शैपेल के  मोर्चे पर 15 हजार भारतीय सैनिक मारे गए। फिर भी उन सब पर हमारा राज समाज मौन क्यों रहा? विश्वयुद्ध में भारतीयों की भागीदारी और उसके शहीदों की याद ताजा करने के लिए उनकी अपनी यह योजना है कि भारतीय स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को उनके स्मरण दिवस के रूप में मनाया जाए। ताकि उस वीरता और बलिदान पर देश को नाज हो। अनिवासी भारतीयों के बीच देशभक्ति और भारतीय इतिहास तथा परंपरा की एक थिरायी हुई पुरातनपंथी रूमानी रुझान ही हमको अक्सर देखने को मिलता है।

और इस समझ के तहत असुविधाओं के बीच भी लोकतांत्रिकता को थामे हुए आज के भारत में जी रहे नागरिक उनको अपनी तुलना में हर मोर्चे पर कुछ ज्यादा ही अगर-मगर भरी विकृत समझ वाले नजर आते हैं। सच तो यह है कि अनिवासी भारतीयों का अतीत ही भारत के साथ है। वर्तमान में वे बिना भारत में बसे ही, गजब के देशभक्त और परंपरावादी बने रहना चाहते हैं, किंतु भारत की दैनिक जद्‌दोजहद और बदलते विश्व रंगमंच पर ताजा अनुभवों और औपनिवेशिक युग की कचोटभरी यादों के तहत लिए न्यायपरक फैसलों से वे तटस्थ दूरी रखना पसंद करते हैं। 

सच तो यह है कि जब पहले विश्वयुद्ध की आग बड़ी तेज़ी से यूरोप के मित्र राष्ट्रों को जलाने लगी तो उनकी बंदूकों के कुंदों ने अपने उपनिवेशों के वासियों के दरवाज़े खटखटाए और बिना राय लिए आनन-फानन में सुदूर बर्फीले इलाकों में लड़ने को बिना समुचित कपड़ों या हथियारों के, वे डेढ़ लाख भारतीय सैनिक मशीनचालित खिलौनों की तरह पठा दिए गए थे। उनकी विवशता या परदेस में जाकर मरने की कड़वी स्मृतियां हमारे पास नहीं हैं। हैं तो ‘उसने कहा था’ सरीखी चंद मार्मिक कहानियां जो उन परदेसी देहाती सैनिकों के अंतिम त्रासद क्षणों की करुण गवाही देती हैं,‘वजीरा सिंह, पानी पिला.... अबकी हाड में आम फलेंगे तो तुम दोनों चाचा-भतीजे बैठ के खूब खाना...।’

इन दो-दो विश्व युद्धों का उन्माद थमा तब तक अविभाजित भारत दंगों की आग से घिर चुका था। सीमा के आर-पार नदियों, पहाड़ों, खेत-खलिहानों का बेदिमाग बंटवारा करने वाले 1947 के उस जातीय युद्ध के आयातित जरासीम तब से अब तक इस उपमहाद्वीप से चिपके बैठे हैं। 15 अगस्त, 1947 को इस देश ने अपनी असली नियति से साक्षात्कार का फैसला लिया। यह तय किया कि किसी विदेशी शासन के कहने पर हम कागज की नाव की तरह किसी तूफानी समंदर में नहीं उतरेंगे। हमारी इज्जत अब सैनिक मोर्चों से नहीं, हमारी राजनयिक ताकत से मापी जाएगी।

हमारे विपरीत पाकिस्तान ने अतीत के प्रेतों के बीच जीना चाहा, जिनकी मदद से वे सीमा पार युद्ध छेड़ सकें। हाल आपके हमारे सामने है। हमको यह उम्मीद छोड़ देनी चाहिए कि विदेशों में बसे भारतीयों के बीच हमारी छवि उजली बनी रहे। कोई नया राष्ट्रीय पर्व मनाने या विश्वमंच पर पक्षधरता तय करने को लेकर भी हमको अपने अनुभव के उजास में अपने देसी हित स्वार्थों के तहत वैसे ही फैसले करने चाहिए जैसे कि कोई समझदार पूंजीपति अपनी पूंजी को लेकर करता है। पहले विश्वयुद्ध कोे भारतीय वीर पर्व बनाकर पेश करना सिर्फ इसलिए पाखंड नहीं कि उसका आयोजन अनिवासी भारतीय कर रहे हैं। वह इसलिए भी पाखंड है कि 24 घंटे सातों दिन चलने वाली खबरों और सोशल मीडिया के युग में युद्ध में कोई रूमान नहीं बचा है। मनुष्य की जमीनी भागीदारी उससे गायब हो चुकी है। उसकी जगह नई तकनीकी क्षमता के विजुअलों ने ले ली है। यह दृश्यावली छायाग्राहिणी राक्षसी की मुस्तैदी से जमीन से 10 किमी ऊपर उड़ते जहाजों को पल में मार गिराना ही नहीं दिखाती उसके बाद कई-कई किलोमीटर तक जा छिटके उन मानव अवयवों और सामान को भी दिखाती जाती है जो अब राख हो चुके हैं।

आज से चालीसेक बरस पहले तलक हम, ‘ऐ मेरे देश के लोगो’ जैसा गाना सुनकर भावुक हो सकते थे। आज के ताजा विजुअल्स से ‘जब तक थी सांस लड़े वो फिर हंस के लाश बिछा दी...’ जैसी कविता की पंक्तियां निरर्थक साबित हो गई हैं। तब जिन बड़े विश्व नेताओं को पुरोहित बनाकर देशों का बंटवारा किया गया, युद्ध के मंदिर में उनकी जो मूरतें स्थापित की गईं, वह आजादी के बाद लड़े गए युद्धों, छाया युद्धों, नस्लीय दंगों और घातक आतंकी हमलों के जमीनी अनुभवों से कब की भग्न हो गई हैं। विश्व युद्ध की शती के नाम पर विवशता और अन्याय से भरे औपनिवेशिक इतिहास के किसी अंश की पूजा का तामझाम भरा उपक्रम तो तलाक के बाद शादी की सालगिरह मनाना सरीखा ही होगा।

हम युद्ध से मिले सबक कब सीखेंगे? @केविन रैफर्टी

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी ने हाल ही में सिगफ्रीड ससून के सारे लेखन की डिजिटल प्रतियां उपलब्ध कराई हैं। ससून प्रथम विश्वयुद्ध के वीरता पुरस्कारों से अलंकृत योद्धा थे और युद्ध-पिपासु राजनेताओं के लापरवाह रवैये के तीखे आलोचक थे। ससून का लेखन पढ़ना आज प्रासंगिक है। न सिर्फ इसलिए कि उन्होंने रणभूमि की यंत्रणाओं का रेखाचित्रों सहित ब्योरा दिया है बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने अपने ‘सोल्जर्स डिक्लेरेशन’ में राजनेताओं द्वारा युद्ध का दुरुपयोग करने का तीखा विरोध किया है। 
ठीक 100 साल पहले प्रथम महायुद्ध की पहली गोली इस मकसद से चलाई गई थी कि यह सारे युद्धों को समाप्त करने के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध होगा। हालांकि, सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि 100 साल बाद भी दुनिया के सारे देशों में उसी संकुचित उग्र राष्ट्रवादी मानसिकता वाले लापरवाह राजनेता मौजूद हैं, जिनकी ससून ने सख्त आलोचना की है।

ससून के लिखे में 100 साल बाद भी खंदकों के कीचड़ की गंध महसूस की जा सकती है। उन्होंने जुलाई 1916 में सोम में लड़े गए प्रथम विश्वयुद्ध के पहले दिन का वर्णन ‘सनलिट पिक्चर ऑफ हेल’ (सूरज की रोशनी से आलोकित नर्क) शीर्षक से किया है। यह तो भयंकर बारिश, कीचड़, मस्टर्ड गैस और भीषण ठंड के बीच लड़ी गई लड़ाई के पहले की बात है। जर्मनी को छोटा, लेकिन जबर्दस्त झटका देने के लिए शुरू किया गया पहला विश्वयुद्ध चार साल तक खिंचता चला गया, जिसमें लगभग एक करोड़ सैनिक और 70 लाख आम नागरिक मारे गए। कुल मिलाकर 7 करोड़ लोगों ने युद्ध में भाग लिया, जिनमें ज्यादातर यूरोपीय थे, जिनमें 10 लाख भारतीय थे, जो अपने ब्रिटिश शासकों के लिए लड़ रहे थे। इनके अलावा युद्ध में देर से उतरने वाले अमेरिकी और जापानी भी थे। यूरोप में सबसे ज्यादा विनाश हुआ पर यह युद्ध अफ्रीका, एिशया और प्रशांत क्षेत्र तक फैल गया था।

ब्रिटेन में तो पहले महायुद्ध की याद में होने वाले कार्यक्रमों पर गार्डियन अखबार ने कहा, ‘ग्रेट वॉर डायरियां, कविताएं, नाटक यहां तक कि फैशन शो ..यह तो ऐसा हो गया, मान लो हिंसा का कोई मनोरंजन शो हो।’ एक तरफ यह है तो दूसरी तरफ भारत व जापान जैसे देशों में इस महायुद्ध को पूरी तरह भुला दिया गया। युद्ध और शांति पर बहस व चर्चा आज भी लाभदायक ही सिद्ध होगी। इस युद्ध में 11 लाख  भारतीय सैनिकों ने भाग लिया था और 10 हजार से ज्यादा भारतीय नर्सों ने घायल सैनिकों की तीमारदारी की थी।  मिस्र और मैसापोटामिया (मौजूदा इराक के  अलावा सीरिया व अन्य देशों के हिस्सों से मिलकर बना भू-भाग) की लड़ाइयों में बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक मारे गए थे। 

पर इस सब का अर्थ क्या है? जो मारे गए थे उनके नाम स्मारकों पर मौजूद हैं पर उन्हें कोई पहचान पाए तो वे सौभाग्यशाली होंगे। उनके साथ लड़ने वाले जो सैनिक जीवित बचे थे, अब तो उनकी भी मौत हो गई है। हैरी पैच महायुद्ध लड़ने वाले अंतिम ब्रिटिश सैनिक थे, जो 111 साल की उम्र में 2009 में दुनिया से विदा हुए। उन्होंने कहा था, ‘महायुद्ध तो मानव जाति का सोच-समझकर किया गया नरसंहार ही था। यह युद्ध एक जिंदगी कुर्बान करने लायक भी नहीं था।’

इस युद्ध ने ऑस्ट्रो-हंगेरियन, जर्मन, ओटोमान और जार साम्राज्यों को खत्म कर दिया और ब्रिटिश साम्राज्य बहुत कमजोर हो गया। मगर इसी युद्ध में दूसरे महायुद्ध के बीज भी बो दिए गए। इससे महामंदी आई और साम्यवाद, फासीवाद और नाजीवाद का उदय हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन को ‘लीग ऑफ नेशन्स ’ की स्थापना के प्रयासों के लिए नोबेल पुरस्कार मिला, लेकिन कांग्रेस में इसके विरोध के कारण खुद अमेरिका इसका सदस्य नहीं बन सका।

उसी युद्ध के नतीजों को मध्य पूर्व आज भी भुगत रहा है। बालफोर डिक्लेरेशन में यहूिदयों के लिए अलग देश का वादा किया गया था, पर वह पूरा नहीं हो सका। ब्रिटेन और फ्रांस ने अरब राष्ट्रवाद की मांगें मानने की बजाय ओटोमान साम्राज्य को काटकर अपने हिसाब से ऐसे देश बना दिए, जिन्हें वे नियंत्रण में भले नहीं रख पाएं, पर प्रभावित जरूर कर सकें। 

1945 से ही हमें बार-बार यह सबक मिला है कि शांति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से समृद्धि आती है, जबकि युद्ध से बदहाली ही आती है। इसके बाद भी वैश्विक शांति बहुत नाजुक मामला ही है, क्योंकि नेतृत्व कर रहे हैं बहुत सारे लोग इतिहास से मिले सबक सीखने को तैयार नहीं हैं। यूरोप में पुराना राष्ट्रवाद फिर सिर उठा रहा है। पूर्वी यूरोप में व्लादिमीर पुतिन व पश्चिम एक-दूसरे से लड़ने की मुद्रा में हैं। पुतिन के प्लान बी में तो शायद पूर्वी यूरोप में रूसी आक्रमण शामिल है। अमेरिका में रिब्लिकन बहुमत वाली कांग्रेस मानवता के सामने खड़ी विशाल समस्याओं के समाधान पर राष्ट्रपति बराक ओबामा को सोचने भी नहीं देती। संयुक्त राष्ट्र में इटली के तानाशाह बेिनटो मुसोलिनी की  ‘लीग ऑफ नेशन्स’ को लेकर इस शिकायत की गूंज सुनाई देती है कि जब बड़े देशों के हित प्रभावित होते हैं तो वे लीग ऑफ नेशन्स के प्रावधानों का सम्मान नहीं करते, लेकिन कोई दूसरा कुछ करे तो शोर मचा देते हैं।  एशिया में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे सहित कई टिप्पणीकार 1914 के यूरोप व 2014 के एशिया के बीच खतरनाक सतही तुलना में लगे हैं। चीन, जापान और कोरिया भूतकाल से सबक लेने की बजाय पुराने जख्मों को ही सहला रहे हैं। क्या ही अच्छा हो यदि ओबामा और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग हिरोशिमा व नागासाकी जाकर जापान के दर्द को महसूस कर सकें। इसी प्रकार अबे भी नानजिंग में जाकर चीन के खिलाफ युद्ध लड़ने वाले योद्धाओं के स्मारक पर जाकर खेद जता दें कि उन्हें चीनी जनता द्वारा भुगती गई तकलीफों पर दुख है। 

इसकी बजाय संकुचित सोच के चलते जापान इस मुद्‌दे पर चीन को भड़काता रहता है जबकि चीन खतरनाक आक्रामकता के साथ राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रहा है। चीन व जापान के बीच खासतौर पर खतरा है कि कहीं दुर्घटनावश या गलतफहमी से युद्ध की पहली गोली न चल जाए। पिछले दिनों दोनों के बीच छद्‌म हवाई युद्ध में ऐसे मौके आए थे जब दोनों के विमान हवाई क्षेत्र पर अपना दावा जताते हुए गश्त में लगे हुए थे। अफगानिस्तान में आतंकियों के अत्याचारों अौर पाकिस्तान में कट्‌टरपंथियों के उपद्रव को छोड़ दें तो दक्षिण एशिया व इससे लगा क्षेत्र जरूर शांत नजर आता है। भारत के प्रधानमंत्री ने अपने शपथ समारोह में पड़ोसी देशों के प्रमुखों को आमंत्रित कर और ब्रिक्स में नई पहल का संकेत दिया है। संभव है वे जब जापान जाएंगे तो अबे को अपने नए दोस्त चीन के जिनपिंग से जोड़ने में शांति स्थापित करने के अपने कौशल का उपयोग करें।