Sunday, 26 April 2015

पैसा तो फोर्ड फाउंडेशन से गुजरात की मोदी सरकार भी ले चुकी है @विकास बहुगुणा

जब नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार को लगता है कि फोर्ड फाउंडेशन की गतिविधियां देश के खिलाफ हैं तो उन्हीं की गुजरात सरकार ने इस संस्था से पैसा क्यों लिया?
गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर नरेंद्र मोदी सरकार की भंवें फिर तन गई है. मोदी सरकार ने अमेरिका स्थित फोर्ड फाउंडेशन को अपनी निगरानी सूची में डाल दिया है. गृह मंत्रालय की मंजूरी के बिना अब कोई एनजीओ फोर्ड फाउंडेशन से अनुदान नहीं ले सकता.+
ताजा घटनाक्रम में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भारतीय रिजर्व बैंक को एक चिट्ठी लिखी है. इसमें उसने संस्था से सभी बैंकों को यह निर्देश देने को कहा है कि वे फोर्ड फाउंडेशन से किसी एनजीओ के खाते में आने वाले फंड की जानकारी पहले गृह मंत्रालय को दें. इसके बाद वह फैसला करेगा कि पैसा उस खाते में जाए या नहीं. सरकारी संस्थाओं को फोर्ड फाउंडेशन से अनुदान लेने से पहले आर्थिक मामलों के मंत्रालय से इसकी मंजूरी लेनी होगी.+
फोर्ड फाउंडेशन की वेबसाइट बताती है कि गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेजर्ट इकॉलॉजी (गीर) को 2007 में एक लाख 77 हजार डॉलर यानी आज के हिसाब से एक करोड़ रु से भी ज्यादा का चंदा मंजूर हुआ था
विदेशों से अनुदान पाने वाले गैरसरकारी संगठनों के प्रति भाजपानीत सरकार की अप्रसन्नता कोई नई बात नहीं है. कुछ समय पहले एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यायपालिका को फाइव स्टार एक्टिविज्म से सावधान रहने की नसीहत दी थी. इसका संकेत यह निकाला गया था कि मोदी गैरसरकारी संगठनों द्वारा अदालतों में लगाई जाने वाली जनहित याचिकाओं के चलते अलग-अलग परियोजनाओं में लगने वाले अड़ंगे से नाराज हैं. उनके इस बयान के कुछ दिन बात ही ग्रीनपीस के खिलाफ कार्रवाई हो गई थी. कुछ दिन पहले ही गृह मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्था ग्रीनपीस का भारत में पंजीकरण 180 दिनों के लिए निलंबित कर दिया. विदेश से आने वाले पैसे की जानकारी छिपाने और विकास के ख़िलाफ़ अभियान चलाने का दोषी ठहराते हुए सरकार ने उसके सात बैंक खातों पर रोक भी लगा दी थी.+
बीते साल भाजपा ने कई बार आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल को यह कहते हुए घेरा था कि उनके एनजीओ को फोर्ड फाउंडेशन से पैसा मिलता है. फरवरी 2014 में दिल्ली भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ हर्षवर्धन का बयान आया था कि जनलोकपाल औऱ स्वराज की बात करने वाले केजरीवाल ने सीआईए की सहयोगी फोर्ड फाउंडेशन की सहायता ली है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य में विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल का कहना था कि केजरीवाल को मैग्सेसे पुरस्कार दिया गया और यह पुरस्कार फोर्ड फाउंडेशन द्वारा उन लोगों को देने की कोशिश होती है जो अमेरिका के हित में कार्य कर सकें. उन्हीं दिनों भाजपा की रैलियों में केजरीवाल को सीआईए एजेंट बताते हुए पर्चे भी बंटे थे. इनमें कहा गया था कि अमेरिका के नरेंद्र मोदी से सौहार्दपूर्ण संबंध नहीं हैं इसलिए वह फोर्ड फाउंडेशन के जरिये केजरीवाल की मदद करके मोदी को रोकना चाहता है.+
फरवरी 2014 में दिल्ली भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ हर्षवर्धन का बयान आया था कि जनलोकपाल औऱ स्वराज की बात करने वाले केजरीवाल ने सीआईए की सहयोगी फोर्ड फाउंडेशन की सहायता ली है.
लेकिन गुजरात में खुद भाजपा की सरकार उसी फोर्ड फाउंडेशन से पैसा ले चुकी है. फोर्ड फाउंडेशन की वेबसाइट बताती है कि 2002 में गुजरात इकॉलॉजिकल एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन (गीर) को एक लाख 22 हजार डॉलर (आज के करीब 73 लाख रुपये) का चंदा मिला था. इस संस्थान के चेयरमैन खुद गुजरात के मुख्यमंत्री होते हैं जो उस समय नरेंद्र मोदी ही थे. यही नहीं, उसी साल गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च को भी फोर्ड फाउंडेशन से एक लाख 97 हजार 759 डॉलर (करीब एक करोड़ 20 लाख रुपये) मिले थे. इस संस्था का वित्तीय सलाहकार गुजरात सरकार का शिक्षा विभाग है. इसके अलावा भी फोर्ड फाउंडेशन ने गुजरात में ऐसी कई संस्थाओं को करोड़ों रु का अनुदान दिया है जो राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के साथ मिलकर या उनके सहयोग से काम कर रही हैं. इनमें गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेजर्ट इकॉलॉजी (गाइड) शामिल है जिसे 2007 में फोर्ड फाउंडेशन की वेबसाइट के मुताबिक करीब एक लाख 77 हजार डॉलर का अनुदान मिला. गाइड की वेबसाइट बताती है कि यह एक ट्रस्ट है जिसके बोर्ड ऑफ गवनर्स में गुजरात के पूर्व मुख्य सचिव सहित राज्य के तमाम भूतपूर्व और वर्तमान अधिकारी शामिल हैं.+
जब भाजपा और नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार को यह लगता है कि फोर्ड फाउंडेशन की गतिविधियां देश के हितों के खिलाफ हैं तो खुद भाजपा और मोदी की ही गुजरात सरकार ने इस संस्था से पैसा क्यों लिया? इसके जवाब में भाजपा या केंद्र सरकार कह सकती है कि एनजीओ पैसा लेकर देश में अस्थिरता फैलाने की कोशिश करते हैं जबकि कोई राज्य सरकार ऐसा नहीं करेगी. लेकिन यह सवाल तो फिर भी रहता ही है कि जिस पर आप देशविरोधी गतिविधियां चलाने का संदेह करते हैं उसी से पैसा कैसे ले सकते हैं?+
1999 में ब्रिटिश पत्रकार फ्रैंसिस स्टोनर सॉन्डर्स ने अपनी बहुचर्चित किताब ‘हू पेड द पाइपर? सीआईए एंड द कल्चरल कोल्ड वार’ में लिखा था कि फोर्ड फाउंडेशन के जरिए सीआईए दूसरे देशों में अपने लोगों को धन मुहैया करवाती है
अगर फोर्ड फाउंडेशन की बात करें तो इसकी स्थापना चर्चित अमेरिकी आटोमोबाइल कंपनी फोर्ड के मुखिया हेनरी फोर्ड और उनके बेटे एडसेल फोर्ड ने 1936 में की थी. गरीबी उन्मूलन और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रोत्साहन जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे संगठनों को वित्तीय मदद देने वाली यह फाउंडेशन दुनिया में सबसे ज्यादा रसूख वाली संस्थाओं में से एक है. न्यूयॉर्क में अपने मुख्यालय और पूरी दुनिया में फैले दस केंद्रों के जरिये यह हर साल सैकड़ों करोड़ डॉलर का अनुदान देती है. भारत में यह 1952 से सक्रिय रही है. अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक भारत, नेपाल और श्रीलंका में 2006 से 2014 के बीच इस संस्था ने करीब 546 अनुदान दिए जिनका कुल आंकड़ा करीब 840 करोड़ रु बैठता है.+
फोर्ड फाउंडेशन के लिए विवाद कोई नई बात नहीं है. कई बार इस पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से जुड़े होने के आरोप लग चुके हैं. 1999 में ब्रिटिश पत्रकार फ्रैंसिस स्टोनर सॉन्डर्स की एक किताब बहुत चर्चित रही थी. ‘हू पेड द पाइपर? सीआईए एंड द कल्चरल कोल्ड वार’ नाम की इस किताब में कहा गया था कि फोर्ड फाउंडेशन के जरिए सीआईए दूसरे देशों में अपने लोगों को धन मुहैया करवाती है.+
2001 में न्यूयॉर्क की बिंगहैंपटन यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर जेम्स पेट्रास ने एक लेख लिखा था. द फोर्ड फाउंडेशन एंड द सीआईए शीर्षक वाले इस लेख में उन्होंने लिखा था कि अपने उद्देश्यों को साधने हेतु मोटा पैसा भेजने के लिए सीआईए उन संस्थाओं का इस्तेमाल करती है जो सामाजिक कार्य में लगी हैं. भारत की खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ के अपर सचिव रहे बी रमन ने भी कुछ समय पहले कहा था कि सीआईए जैसी विदेशी खुफिया एजेंसियां एनजीओ के जरिए अपने काम को अंजाम देती हैं. उनके मुताबिक सीआईए के लिए किसी भी देश में अपने अनुकूल माहौल बनाने के लिए उस देश में पहले से काम कर रहे एनजीओ का इस्तेमाल करना ज्यादा आसान होता है. अगर कोई एनजीओ उसके हिसाब का नहीं है तो वह नया एनजीओ भी बनवा देती है.

जम्मू-कश्मीरः समस्या पुरानी है और हल भी @संजय दुबे

कश्मीर समस्या के समाधान के कई पहलू हैं और सभी से एकसाथ निपटना संभव नहीं है. कुछ हमारे हाथ में हैं भी नहीं. मगर जो हैं उन पर तो शुरुआत की ही जा सकती है. हो सकता है उस दिशा में बढ़ने पर आगे और रास्ते खुलने लगें.
किसी भी देश के लिए, जो लोकतंत्र भी हो, दो बातें महत्वपूर्ण हैं. पहली, वह अपनी अखंडता के साथ समझौता नहीं कर सकता. दूसरी, वह अपने लोगों की आकांक्षाओं, पीड़ा और नाराजगी को अनदेखा नहीं कर सकता. एक लंबे समय तक तो बिलकुल भी नहीं. अब जम्मू-कश्मीर की आज की और आज तक की सभी समस्यायों को इन्हीं दो सिद्धांतों के दायरे में देखने की जरूरत है. अगर स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो उन कश्मीरियों को जो आज भारत से अलग होने की मांग पर अड़े हैं, यह समझना है कि भारत से खुद को अलग करने की मांग का कोई नतीजा हो ही नहीं सकता. दूसरी ओर व्यवस्था और धारा 370 खत्म करने की जिद पर अड़े लोगों को इन कश्मीरी लोगों की पीड़ा और नाराजगी को दूर करने के लिए ईमानदारी से संविधान के दायरे में हर सामान्य-असामान्य तरीके से जो संभव हो करना होगा.+
जिस तरह से हिंदी के पैरोकारों की राजभाषा बनाने की उतावली और बेसिरपैर कोशिशों ने उसे हमेशा के लिए देश में अंग्रेजी की पुछल्ली भाषा बनाकर छोड़ दिया है कुछ-कुछ वही कश्मीर के मामले में भी हुआ.
1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय का अनुरोध न केवल वहां के राजा ने बल्कि कश्मीर में लोकतंत्र की स्थापना के लिए आंदोलन चला रहे वहां के सबसे बड़े और प्रभावशाली संगठन के मुखिया शेख अब्दुल्ला ने भी किया था. पाकिस्तान ने भी कश्मीर पर हमला इसीलिए बोला था. उसे पता था कि जो एक साल का ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ उसने किया है उसके खत्म हो जाने के बाद भी कश्मीर उसके हाथ नहीं आने वाला क्योंकि वहां का ज्यादातर जनमानस भारत के साथ विलय का पक्षधर था. इसीलिए नेहरू जी ने भी अपनी तरफ से ही पाकिस्तानी सेना के कश्मीर से खदेड़े जाने के बाद जनमत संग्रह की बात कही थी. उनका कहना था कि वे कश्मीर की मजबूरी का फायदा उठाकर नहीं बल्कि उसकी जनता की रजामंदी से ही उसे अपने साथ रखने के पक्षधर हैं. वे संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के मुताबिक 1956 तक भी जनमत संग्रह कराने के लिए तैयार थे बशर्ते पाकिस्तान पहले अपने कब्जे वाले कश्मीर से हट जाए. 1956 में जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा ने भारत के साथ विलय का अनुमोदन कर दिया. इसके बाद मामले को अब और उलझने से बचाने के लिए भारत ने इसे ही पूरे जम्मू-कश्मीर की भावनाओं का प्रतिबिंब मान लिया.+
तो फिर कभी इस कदर भारत के पक्ष में होने वाला कश्मीर की जनता का मानस आज इस तरह भारत विरोधी क्यों दिखाई दे़ रहा है? दरअसल, ऐसा होने के पीछे भी ‘बाहरी ताकतों’ से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं. जिस तरह से हिंदी के पैरोकारों की राजभाषा बनाने की उतावली और बेसिरपैर कोशिशों ने हिंदी को हमेशा के लिए देश में अंग्रेजी की पुछल्ली भाषा बनाकर छोड़ दिया है कुछ-कुछ वैसा ही कश्मीर के मामले में भी हुआ. धारा 370 हटाने और कश्मीर के भारत में संपूर्ण विलय के लिए जम्मू प्रजा परिषद और जनसंघ द्वारा चलाए आंदोलनों और जल्दबाजी में सरकारों की कश्मीर के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव लाने की कोशिशों ने सारे मसले को बिगाड़कर रख दिया. इससे घाटी में अलगाववादी और संप्रदायवादी ताकतों को सर उठाने में मदद मिली.+
देना-करना पहले बड़े को चाहिए, छोटे का भरोसा बढ़ता है. और इस भरोसे से ही स्थायी हल की तरफ जाने का रास्ता निकल सकता है.
इन ताकतों की ताकत को ज्यादा और भारत की धर्मनिरपेक्षता की ताकत को कम आंककर शेख अब्दुल्ला के सुर भी बदलने लगे. 1953 में अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के बाद से कश्मीर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अकर्मण्यता और सरकारों और राष्ट्रपति शासनों के आने-जाने के भीषण दुश्चक्र में फंसा रहा. चूंकि पाकिस्तान भी कश्मीर की मूल समस्या का एक स्थायी हिस्सा रहा है, इसलिए सेना की लगातार उपस्थिति ने भी मानवाधिकारों के हनन आदि की समस्याओं को जन्म देकर इसमें नए आयाम जोड़ दिए.+
तो अब क्या किया जा सकता है? कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कोई एक बटन तो है नहीं. इसके कई पहलू हैं और सभी से एकसाथ निपटना संभव नहीं है. कुछ हमारे हाथ में हैं भी नहीं. मगर जो हैं उन पर तो शुरुआत की ही जा सकती है. हो सकता है उस दिशा में बढ़ने पर आगे और रास्ते खुलने लगें. तो जो किया जाना चाहिए वह है स्वायत्तता की दबी फाइल को झाड़-फूंककर बाहर निकालना और वादी में सेना की उपस्थिति स्थायी है इस भावना को खत्म करना.+
हालांकि एक ऐसी पार्टी के लिए जो हमेशा धारा 370 खत्म करने की वकालत करती रही हो और राष्ट्वाद जिसके लिए हवा पानी जैसा रहा हो ऐसा करना आसान नहीं है. लेकिन इसके सिवा कोई और चारा भी तो नहीं है. इसके बाद वहां आम कानून-व्यवस्था के लिए साधारण पुलिस बल को सक्षम बनाने की जरूरत है. जिस तरह की कोशिशें कई बार चोट खाने के बाद भी एनडीए की ही पिछली सरकार ने पाकिस्तान से संबंध सुधारने के लिए की थीं. उतने ही साहसी और मानवीय कुछ प्रयास कश्मीर के लिए वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार को भी करने की जरूरत है. देना-करना पहले बड़े को चाहिए, छोटे का भरोसा बढ़ता है. और इस भरोसे से ही स्थायी हल की तरफ जाने का रास्ता निकल सकता है.

जारवा आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ना उनके वजूद के लिए खतरा है और उन्हें उनके हाल पर छोड़ना भी @पवन वर्मा

Wednesday, 22 April 2015

ये हैं भारत को सम्मान दिलाने वाली फिल्में @सुप्रिया सोगले

बॉलीवुड की दुनिया और उसके सितारों की चमक दमक हमेशा सुर्ख़ियों में रहती है, जबकि क्षेत्रीय फिल्में इस मामले में पिछड़ जाती हैं.
लेकिन इन फिल्मों में कई ऐसे फिल्में हैं जिन्होंने देश से बाहर भारत का सम्मान बढ़ाया है.

1. आशा जओर माझे

बंगाली फ़िल्मों के नवीन निर्देशक आदित्य विक्रम सेनगुप्ता की ये फ़िल्म दो आम लोगों की कहानी हैं जिनके रास्ते मंदी के महौल में जुड़ते है.
फ़िल्म को राष्ट्रीय पुस्कार से नवाज़ा गया है. लेकिन ये फ़िल्म दुनिया के लगभग 45 फ़िल्म उत्सवों में जा कर तारीफ़ें और पुरस्कार बटोर चुकी है. इनमें शामिल है वेनिस अंतराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह, अबु धाबी फ़िल्म फेस्टिवल, मराकेश अंतरष्ट्रीय फ़िल्म समारोह और बीएफ़आई लंदन फ़िल्म फेस्टिवल.
फ़िल्म के निर्देशक आदित्य विक्रम का कहना है कि "बंगाली सिनेमा ने हमेशा से ही अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख़ास जगह बनाई है पर उस महान बंगाली सिनेमा का पतन हो गया है. अब कई नए फ़िल्मकार नई कहानियाँ लेकर आ रहे हैं पर उन्हें सही मायनोंं में अच्छे निर्माता की ज़रूरत है जो नई कहानियों का जोख़िम उठा सके."

2. किल्ला

निर्देशक अविनाश अरुण की मराठी फ़िल्म 'किल्ला' एक 11 साल के लड़के की कहानी है जो पिता की मौत के बाद ज़िंदगी में बदलाव से जूझ रहा है.
'किल्ला' ने बर्लिन फ़िल्म फेस्टिवल में "जनरेशन के प्लस सेक्शन" में बेस्ट फ़िल्म का ख़िताब जीता. इसने राष्ट्रीय पुरस्कारों में सवश्रेष्ठ मराठी फ़िल्म का ख़िताब भी जीता है
इस फ़िल्म के निर्देशक अविनाश अरुण कहते हैं "ऐसी फ़िल्म की सफलता का श्रेय मराठी फ़िल्मी दर्शकों को देना चाहूंगा जो ऐसे सिनेमा में दिलचस्पी रखते हैं और नए फ़िल्मकारों को साहस देता है कि वो ऐसी अलग फिल्में बनाएं."

3. क़िस्सा

पंजाबी फिल्म 'क़िस्सा' एक सिख की कहानी है जो 1947 में बंटवारे के समय पंजाब आ जाता है. अपनी चौथी बेटी कंवर को वो बेटे की तरह बड़ा करता है जो ट्रक ड्राइवर बनती है लेकिन उलझनें तब बढ़ जाती हैं जब कंवर एक लड़की से शादी करती है.
'क़िस्सा' फ़िल्म ने टोरंटो फ़िल्म फेस्टिवल में तारीफ़ें बटोरी और अवॉर्ड भी जीता. इस फ़िल्म ने कई फ़िल्म फेस्टिवल का भ्रमण किया जिसमे शामिल है रॉटरडैम अंतराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह, साउ पाउलो अंतराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह और वेसोल एशियन फ़िल्म समारोह.

4. श्वास

2004 में बनी ये फिल्म एक ऐसे लड़के की कहानी थी जो आँखों के कैंसर से जूझ रहा था.
सच्ची घटना पर आधारित ये फ़िल्म 2004 के ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म कि केटेगरी में छठे पायदान पर रही.
श्वास फ़िल्म को उस साल नेशनल अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया. श्वास को मराठी सिनेमा के सबसे बड़े मोड़ के तौर पर देखा जाता है

ऐसा अप्रैल जब भारत में कहीं गर्मी नहीं पड़ी और चेन्नई सर्द मौसम से जम गया @पवन वर्मा


अप्रैल, 2015 में उस प्राकृतिक आपदा को 200 साल पूरे हुए हैं जिसकी वजह से तब चेन्नई का तापमान शून्य से नीचे पहुंच गया और जिसने भारत सहित पूरी दुनिया के सामाजिक-आर्थिक तानेबाने पर असर डाला था.
सवाल : बिना किसी से पूछे आपको कैसे पता चलेगा कि आप चेन्नई में हैं?; जवाब : यदि किसी जगह कोल्ड वॉटर और नॉर्मल वॉटर लिखा दिखे लेकिन दोनों नलकों से गर्म पानी निकले तो समझ जाइए कि आप चेन्नई में हैं. यह सवाल-जवाब तमिलनाडु की राजधानी के बारे में खूब चर्चित मजाक है. वैसे इस मजाक को छोड़ दें तो भी इस शहर में कम से कम एक साल बिताने वाले लोगों का यहां के मौसम से जुड़ा यही अनुभव है. अब ऐसे में कोई आपसे कहे कि चेन्नई एक बार शीतलहर का भी सामना कर चुका है तो आप इसपर यकीन करेंगे? कर सकते हैं लेकिन यह मानकर कि वह पृथ्वी के निर्माण के आसपास की बात रही होगी. लेकिन ऐसा नहीं है. चेन्नई में शीतलहर की बात आधुनिक इतिहास की घटना है जिसे इस अप्रैल में दो सौ साल पूरे हो रहे हैं.+
कई इतिहासकार न सिर्फ जलवायु परिवर्तन बल्कि दूसरे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के लिए भी तम्बोरा ज्वालामुखी विस्फोट को जिम्मेदार मानते हैं
ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल, 1815 के आखिरी हफ्ते में दिन के समय चेन्नई का तापमान 10-11 डिग्री से ऊपर नहीं जा पा रहा था और रात में यह माइनस 2-3 डिग्री सेल्शियस तक पहुंच जाता था. उस समय मौसम में अचानक आए इस बदलाव के पीछे जो घटना जिम्मेदार थी उसने इस शहर तो क्या पूरी दुनिया के मौसम पर असर डाला था. दरअसल यह इंडोनेशिया के सुम्बावा में ज्वालामुखी फटने का नतीजा था. इसे भी आधुनिक इतिहास में ज्वालामुखी विस्फोट की सबसे बड़ी घटना माना जाता है.+
तंबोरा नाम का यह ज्वालामुखी इस घटना के एक हजार साल पहले से सुप्त अवस्था में पड़ा था. यहां के निवासियों को उस समय तक यह जानकारी नहीं थी कि वे जिस पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं वह एक ज्वालामुखी का तराई क्षेत्र है. यहां तब इंग्लैंड का राज चलता था. ब्रिटिश राज के दस्तावेज बताते हैं कि ज्वालामुखी फटने के तीन साल पहले से इस क्षेत्र में रह-रहकर भूकंप के झटके आ रहे थे और आखिर में पांच अप्रैल को ज्वालामुखी में विस्फोट हो गया.+
सल्फर के कणों से बने एयरोसेल की खास बात होती है कि यह सूर्य की गर्मी को जमीन पर नहीं पहुंचने देता. इससे भारत के तटीय इलाके में तापमान कम होने लगा. इसका असर सबसे पहले और सबसे ज्यादा चेन्नई में देखा गया
इस ज्वालामुखी में पहला विस्फोट और लावा बहने की प्रक्रिया सिर्फ दो घंटे चली. यह क्षेत्र अगले पांच दिन तक शांत रहा. 10 अप्रैल को इसमें दोबारा विस्फोट हुआ और कहा जाता है कि कुछ ही घंटों में यहां रहने वाली 12 हजार की आबादी काल के गाल में समा गई. उस समय इंडोनिशिया के जावा प्रांत के गवर्नर रहे थॉमस स्टेमफोर्ड रैफलिस ने इस घटना से जुड़े दस्तावेज अपने देश भेजे थे. इनके मुताबिक विस्फोट के बाद ज्वालामुखी से  अगले तीन चार दिनों तक किलोमीटरों लंबी आग की लपटें निकलती रहीं और इससे निकली राख ने पूरे क्षेत्र को ढंक लिया. कुछ दिनों के बाद यह धुंध छंटी तब तक सुम्बावा में तकरीबन एक लाख लोग मारे जा चुके थे.+
तम्बोरा ज्वालामुखी की तराई से आज भी नरकंकाल बरामद होते हैं
तम्बोरा ज्वालामुखी की तराई से आज भी नरकंकाल बरामद होते हैं
तंबोरा में जुलाई महीने तक रह-रहकर विस्फोट होते रहे. राख का निकलना भी बंद नहीं हुआ. ज्वालामुखी की राख में सल्फर के कण बहुतायत में पाए जाते हैं. कहा जाता है तम्बोरा में विस्फोट के समय निकले सल्फर की हजारों वर्ग किमी क्षेत्रफल की एक परत धरती के वायुमंडल में 10 से 13 किमी के बीच छा गई थी. सल्फर के कणों से तैयार यह धुंध या एयरोसेल कुछ ही दिनों में बंगाल की खाड़ी के ऊपर आ गया. एयरोसेल की खास बात होती है कि यह सूर्य की गर्मी को जमीन पर नहीं पहुंचने देता. इससे भारत के तटीय इलाके में तापमान कम होने लगा. इसका असर सबसे पहले और सबसे ज्यादा चेन्नई में देखा गया. 20 अप्रैल आते-आते यहां भीषण ठंड पड़ने लगी. कुछ दस्तावेजों के मुताबिक 25-30 अप्रैल के बीच एक दो बार ऐसा भी हुआ कि तापमान शून्य से नीचे पहुंच गया. हालांकि यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं रही क्योंकि हवा के बहाव के साथ एयरोसेल की परत अरब सागर की तरफ निकल गई.+
इसका असर यूरोप से लेकर अमेरिका तक में हुआ. इस दौरान वहां फसलें तबाह हो गईं और अकाल जैसी स्थिति निर्मित हो गई थी.
तम्बोरा की वजह से एयरोसेल का बनना और उससे मौसम में ठंडक सिर्फ दक्षिण भारत में ही दर्ज नहीं की गई. इसका असर यूरोप से लेकर अमेरिका तक में हुआ. इस दौरान वहां फसलें तबाह हो गईं और अकाल जैसी स्थिति निर्मित हो गई थी. भारत में इसका एक असर यह रहा कि उस साल गर्मी का मौसम आया ही नहीं. मॉनसून काफी लेट हो गया. लेकिन यहां साल के अंत में इतनी बारिश हुई कि पूर्वी भारत में हैजा फैल गया. इस बीमारी ने देश में हजारों लोगों की जान ली.+
इस ज्वालामुखी विस्फोट का इतना असर था कि अगले साल यानी 1816 में भी दुनिया के किसी हिस्से में तीखी गर्मी नहीं पड़ी. इस घटना से हर देश प्रभावित हुआ. कई इतिहासकार न सिर्फ जलवायु परिवर्तन बल्कि दुनिया भर में आए दूसरे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के लिए भी तम्बोरा ज्वालामुखी विस्फोट को जिम्मेदार मानते हैं. जैसे चीन के युन्नान प्रांत में इसके बाद तीन सालों तक सूखा पड़ा और बाद में वहां के किसान मजबूर होकर अफीम की खेती करने लगे. जो बाद में म्यांमार और दूसरे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों तक पहुंच गई. चीन में तो इसकी खेती नियंत्रित है लेकिन दूसरी जगहों पर यह बड़ा अवैध कारोबार है. पूरे विश्व में ऐसे ही कई परिवर्तनों के लिए तंम्बोरा विस्फोट को जिम्मेदार माना जाता है.

Tuesday, 21 April 2015

ईरान को प्रोत्साहन की जरूरत @फरीद ज़कारिया

ईरान के साथ चल रही सौदेबाजी के केंद्र में सीधा-सा सवाल है : क्या ईरान तर्कपूर्ण ढंग से बातचीत करेगा? परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान से समझौते के आलोचकों का उत्तर क्या होगा, यह कहने की जरूरत नहीं है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू प्राय: कहते रहे हैं कि ईरानी तेवर तो सर्वनाश लाने वाले ही हैं। उन्होंने कई बार चेतावनी दी है कि आप ईरानियों की तर्कसंगतता पर कोई बाजी नहीं लगा सकते। सीनेटर लिंडसे ग्राहम कहते हैं, ‘मुझे तो वे सनकी लगते हैं।’ इजरायल के रक्षा मंत्री मोशे यालोन ने हाल ही में अपने मत की पुष्टि की कि ईरानी नेताओं का अंदाज मसीहाई है और वे विनाशक बातें ही करते हैं। और इसके बाद भी ये ही आलोचक जिस नीति को प्राथमिकता देते हैं, वह ईरान के तर्कसंगत व्यवहार की उम्मीद पर ही आधारित है। वे जोर देकर कहते हैं कि छह महाशक्तियों और ईरान के बीच जो समझौता हुआ है, उसका विकल्प युद्ध नहीं है, बल्कि दबाव बढ़ाकर तेहरान से और रियायतें झटकना है। इस प्रकार सनकी मुल्लाओं का यह समूह, जब कुछ और प्रतिबंधों का सामना करेगा, तो फिर ठंडे दिमाग से जोड़-घटाव लगाएगा कि किसमें कितना फायदा-नुकसान है और फिर दबाव के आगे उम्मीद के मुताबिक झुक जाएगा।

वास्तविकता तो यह है कि केनेथ पोलाक ने अपनी किताब, ‘अनथिंकेबल: ईरान, बम और अमेरिकी रणनीति’ में बड़ी ही सावधानी से कई दशकों में अपनाई ईरानी विदेश नीति की समीक्षा की है। उन्होंने यह बताया है कि ईरान की नीति न सिर्फ तर्कपूर्ण है, बल्कि दूरदर्शितापूर्ण भी है। जब उसे कोई अवसर नजर आया है, तो वह आगे बढ़ा है और खतरा देखकर उसने कदम पीछे भी खींचे हैं। उन्होंने इजरायली सेना के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ को उद्‌धृत किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरानी सत्ता कट्‌टरपंथी तो है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि तर्क से उसका कोई वास्ता नहीं है। तर्कपूर्ण का मतलब यह है कि ईरानी सत्ता बढ़ना चाहती है। फलना-फूलना चाहती है। इसकी कसौटी पर वह लाभ-हानि का हिसाब लगाती है और उसके अनुरूप कार्रवाई करती है। अपने फैसले लेती है। किंतु यहां एक वृहद सवाल पूछना औचित्यपूर्ण होगा : क्या ईरान समझबूझ भरा व्यवहार कर रहा है? तेहरान की जो भी गतिविधियां हैं, उसे इसकी भू-राजनीतिक स्थितियों के संदर्भ में समझा जा सकता है। पिछले दिनों टाइम वाॅर्नर से सार्वजनिक चर्चा में अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने टिप्पणी की कि समझौता-वार्ताओं की कुंजी यह है कि आप खुद को प्रतिद्वंद्वी की स्थिति में रखें और उससे मिले दृष्टिकोण से दुनिया को देखें। मध्य-पूर्व के मानचित्र को देखें। शिया ईरान चारों तरफ शत्रुता रखने वाले सुन्नी देशों से घिरा हुआ है। सऊदी अरब उसका कट्‌टर शत्रु है। हर तरह के अस्त्र-शस्त्र के जखीरे के साथ शिया विरोध में अंधा (2014 में सऊदी अरब विश्व में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक रहा है)। इराक और सीरिया में ईरान बड़े पैमाने पर सुन्नी विद्रोह का सामना कर रहा है, जिसमें विद्रोही शियाओं के कत्लेआम पर तुले हुए हैं। इन सारी स्थितियों को परमाणु आयाम से जोड़कर देखिए। ईरान के आसपास परमाणु हथियार वाले कई देश हैं- पाकिस्तान, भारत, रूस, चीन और इजरायल। इसके अलावा ईरान को दुनिया की महाशक्तियों की ओर से तीन दशकों से ज्यादा समय से सक्रिय विरोध का सामना करना पड़ा है। इस्लामी क्रांति के तुरंत बाद जब इराक ने ईरान पर हमला किया था, तो अमेरिका ने बड़ी फुर्ती से सद्‌दाम हुसैन का समर्थन कर दिया था, जबकि सद्‌दाम ने तब ईरानियों के खिलाफ रासायनिक हथियारों तक का इस्तेमाल किया था। सेमूर हर्ष ने द न्यूयॉर्कर के लिए अपनी व्यापक रिपोर्टों में विस्तार से बताया था कि किस तरह अमेरिका ने ईरान में मौजूद ऐसे गुटों को दबे-छिपे समर्थन दिया था, जो न सिर्फ ईरानी सत्ता को उलटना चाहते थे, बल्कि देश को तोड़ना भी चाहते थे। इनमें से कुछ गुट जैसे मुजाहिदीन-ए-खलक और जुंदाल्लाह को कुछ लोगों ने बहुत ही खतरनाक आतंकी गुट करार दिया है। 2001 में शुरू हुए दशक में तेहरान को इसकी पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर 2 लाख अमेरिकी सेना को तैनात होते देखना पड़ा। बुश प्रशासन तो खुलेतौर पर ईरान में ‘सत्ता बदलने की जरूरत’ की बात करता था। ईरान को तो उसने दुनिया के ‘दुष्ट देशों की धुरी’ ही करार दे दिया था। यहां मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि इनमें से कोई भी नीतियां बदली जानी चाहिए थी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति जटिल व कठोर मामला है। किंतु इन वास्तविकताओं के चलते ईरान ने अब तक जिस तरह का व्यवहार किया है, उससे किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए? उसने ऐसा परमाणु उद्योग विकसित करना चाहा, जो परमाणु हथियारों का रास्ता खोल सकता है, तो इसे भी उसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यदि किसी धर्मनिरपेक्ष और अत्यधिक तर्क आधारित देश के सामने इस तरह के विभिन्न खतरे होते तो क्या वह कुछ अलग तरह से व्यवहार करता?

वर्ष 1963 में जॉन एफ कैनेडी ने पूर्वानुमान व्यक्त किया था कि एक दशक के भीतर परमाणु हथियारों से लैस 15 से 25 नए देश सामने आ जाएंगे। उन्होंने यह बयान इस आधार पर दिया था कि परमाणु टेक्नोलॉजी ऐसी चीज थी, जो कोई भी ऐसा देश विकसित कर सकता था, जिसके पास गंभीर औद्योगिक व वैज्ञानिक आधार हो (यही कारण है कि 1970 के दशक में भारत और पाकिस्तान परमाणु देश बन गए)।

केनेडी की भविष्यवाणी इसलिए सही नहीं हुई, क्योंकि अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने परमाणु आकांक्षा रखने वाले देशों को न सिर्फ प्रतिबंधों व कार्रवाइयों का डर दिखाया, बल्कि कई बार प्रलोभन व फायदे भी दिए ताकि वे इससे दूर रहें (यहां तक कि लीबियाई तानाशाह गद्‌दाफी ने अपना परमाणु कार्यक्रम बरसों तक धमकियों के बाद नहीं, बल्कि तब छोड़ा जब उन्हें कुछ फायदा पहुंचाया गया)। लाउसाने फ्रेमवर्क इसी तरह ईरान के साथ संतुलन कायम करना चाहता है। इसके मुताबिक नातनांज के अलावा ईरान में कोई परमाणु ठिकाना नहीं होगा। फर्दो को परमाणु ठिकाने से बदलकर परमाणु व भौतिक शोध केंद्र में बदल दिया जाएगा। इराक के भारी पानी के संयंत्र को इस तरह बदल दिया जाएगा कि वह हथियार श्रेणी का प्लूटोनियम बनाने लायक नहीं रहेगा। बदले में ईरान को प्रतिबंधों से भारी राहत दी जाएगी। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खमेनेई सौदेबाजी को स्वीकार कर ही लेंगे, जैसा कि हाल के ट्वीट में उन्होंने हमें याद दिलाया है, लेकिन यह प्रस्ताव उन्हें तर्कपूर्ण ढंग से नुकसान-फायदे का आकलन करने पर मजबूर करता है। साथ ही परिणामों के लिए भी खबरदार करता है।
> ईरानी सत्ता को अतार्किक माना जाता है। कहा जाता है कि उसका व्यवहार तर्कपूर्ण नहीं होता और परमाणु विनाश का स्वागत करने में भी उसे कोई हिचक नहीं होगी, लेकिन इतिहास बताता है कि फायदा हो तो ईरानी नेता तार्किक रवैया भी अपना लेते हैं।

> यह देश चारों तरफ शत्रुता रखने वाले सुन्नी देशों से घिरा है। खाड़ी के पास इसका कट्‌टर शत्रु सऊदी अरब है, जो गत वर्ष हथियारों का आयात करने वाला सबसे बड़ा देश था। फिर वह शियाओं के सफाए पर तुला हुआ है।

> पूर्व में परमाणु हसरतें रखने वाले देशों को दबाव व धमकियों से ही नहीं, उन्हें फायदा पहुंचाकर भी काबू में किया गया। दशकों की धमकियों के बाद लीबिया के गद्‌दाफी ने तभी परमाणु कार्यक्रम बंद किया, जब उन्हें फायदा पहुंचाया गया

Monday, 20 April 2015

हाशिमपुरा हत्याकांड : एक फैसला जिसे ऐसा नहीं होना था! @प्रियम वर्मा

यदि कोर्ट में दिए गए बयानों और हाशिमपुरा हत्याकांड से जुड़े कुछ ही दस्तावेजों की गिरहें खोलें तो हर स्तर पर बरती गईं ऐसी लापरवाहियों का पता चलता है जो न की गई होतीं तो हाशिमपुरा का फैसला कुछ और ही आया होता.
कानून की किताब में गोल्डन जस्टिस की परिभाषा दर्ज है. इसके अनुसार भले ही हजार गुनाहगार छूट जाएं, लेकिन किसी भी निर्दोष को सजा न मिले. यह स्थिति तब बनती है जब मामला संदेहास्पद होता है. ऐसा ही कुछ मेरठ के हाशिमपुरा में 22 मई 1987 को हुए गोलीकांड के मुकदमे में भी हुआ. इस गोलीकांड में 42 लोग मारे गए थे. इस घटना के 27 साल बाद आए फैसले में दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने पीएसी के 16 जवानों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. इस मामले में कुल 19 पुलिसकर्मी आरोपी थे, जिनमे से तीन की मौत हो चुकी है.+
अब सवाल यह उठता है कि इस मामले में क्या स्थिति वाकई इतनी संदेहास्पद थी कि नतीजे पर पहुंचना असंभव था? क्या वाकई कोर्ट में मौजूद सबूत फैसला सुनाने के लिए नाकाफी थे? और अगर स्थिति संदेहास्पद थी भी तो ऐसी क्यों थी? क्या अभियोजन पक्ष ने केस के सारे पहलुओं पर ठीक से ध्यान दिया और उन्हें अदालत के सामने रखा? क्या मामले की जांच ठीक से की गई? और अगर ऐसा नहीं किया गया तो अदालत ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया?+
जब एफआईआर में घटना दोपहर दो बजे से दर्ज कराई गई और रात आठ बजे तक उसमें एक-एक मिनट का हिसाब दिया गया है तो गवाही में सिर्फ अंधेरा होने का हवाला देकर न पहचानने की बात कैसे कही गई?
यदि कोर्ट में दिए गए बयानों और इस मामले से जुड़े कुछ ही दस्तावेजों की गिरहें खोली जाएं तो इस मामले में हर स्तर पर बरती गई ऐसी लापरवाहियों का पता चलता है जो न की गई होतीं तो हाशिमपुरा का फैसला शायद कुछ और ही आया होता.+

आरोपियों को न पहचानने का तर्क

शुरुआत करते हैं गवाहों के बयानों से क्योंकि यह फैसला मुख्यतः इन्हीं के आधार पर हुआ. हाशिमपुरा हत्याकांड के पांच चश्मदीद गवाह थे – जुल्फिकार नासिर, मोहम्मद नईम, बाबूदीन, मुजीबुर्रहमान और मोहम्मद उस्मान. इन सभी ने बयान दिया कि जिस वक्त यह घटना घटी उस वक्त इतना अंधेरा था कि वे किसी को नहीं पहचान सके. ऐसे में सवाल उठता है कि जब एफआईआर में घटना दोपहर दो बजे से दर्ज कराई गई और रात आठ बजे तक उसमें एक-एक मिनट का हिसाब दिया गया है तो गवाही में सिर्फ अंधेरा होने का हवाला देकर न पहचानने की बात कैसे कही गई? तथ्यों के अनुसार दोपहर दो बजे के बाद छह घंटे तक पीएसी के जवान इन गवाहों के साथ थे तो फिर गवाहों ने उन्हें पहचाना क्यों नहीं? और अगर नहीं पहचाना तो उनकी इस बात में छिपे विरोधाभास पर जिन्हें ध्यान देना चाहिए था, उन्होंने ध्यान क्यों नहीं दिया?+

आधी रात को ट्रक क्यों धोया गया

हाशिमपुरा दंगे के वक्त आरोपी सुरेन्द्रपाल सिंह 41 वीं बटालियन के कमांडेट थे. घटना के वक्त गाजियाबाद के एसपी वीएन राय थे, जिनका बयान दर्ज है कि ‘रात साढ़े दस बजे के करीब मेरे पास सूचना आई कि पीएसी के जवानों ने कुछ लोगों को मारा है. मैंने तुरन्त डीएम जैदी साहब को सूचना दी. हम और डीएम साहब बाकनपुर पहुंचे जहां पर 41 वीं बटालियन रुकी हुई थी. वहां पर पता चला कि कुछ देर पहले ही कमांडेट सुरेन्द्रपाल सिंह आया हुआ था और उसने ट्रक की धुलाई कराई थी. मेंटीनेंस डिपार्टमेंट में जाकर देखा तो सारा फर्श गीला पड़ा था.’ ऐसे में सवाल उठता है कि रात को ग्यारह से बारह बजे के करीब ट्रक को धोने का क्या कारण था? आखिर आधी रात को ट्रक की धुलाई करने की ऐसी क्या जरूरत पड़ी? और आखिर मेरठ में पोस्टेड सुरेंद्रपाल सिंह की बटालियन बाकनपुर में क्या कर रही थी?+
आखिर आधी रात को ट्रक की धुलाई करने की ऐसी क्या जरूरत पड़ी? और आखिर मेरठ में पोस्टेड सुरेंद्रपाल सिंह की बटालियन बाकनपुर में क्या कर रही थी?

मोहकम सिंह था ट्रक ड्राइवर

हाशिमपुरा केस में पीएसी के जवान रामचन्द्र गिरी की पेशी हुई. जब हाशिमपुरा कांड हुआ उस समय रामचन्द्र गिरी पीएसी में ही थे और उनका काम था पीएसी के जवानों को गाड़ियां उपलब्ध कराना. कोर्ट में रामचन्द्र गिरी ने बताया कि ‘ट्रक नंबर यूआरयू 1493 को पहले इफ्तकार अहमद नाम का ड्राइवर लेकर गाजियाबाद से निकला. बीच में पीएसी के जवानों से इफ्तकार अहमद का झगड़ा हो गया और इफ्तकार ट्रक लेकर वापस गाजियाबाद चला आया. फिर वहां से मोहकम सिंह को वही ट्रक लेकर भेजा गया.’ इससे यह साफ़ है कि मोहकम सिंह ही पूरे समय ट्रक में था. ऐसे में उसके जरिये आरोपित जवानों की पहचान से संबंधित जांच-पड़ताल क्यों नहीं की गई.+
(बाएं से) जुल्फिकार, उस्मान, आरिफ, मुजीबुर्रहमान और बाबूदीन
(बाएं से) जुल्फिकार, उस्मान, आरिफ, मुजीबुर्रहमान और बाबूदीन

एक जवान को गोली क्यों लगी थी?

कोर्ट में एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज की उस समय की रिपोर्ट के अनुसार लीलाधर नाम का पीएसी का एक जवान शाम के बाद इलाज के लिए अस्पताल आया था. रिपोर्ट के अनुसार उसकी आंख में गोली लगी थी. ऐसे में सवाल उठता है कि हाशिमपुरा में ऐसा क्या हुआ था कि उसकी आंख में गोली लगी. हालांकि लीलाधर ने बाद में बयान दिया कि दंगे के समय उसे चोट लगी थी. लेकिन यदि वह पहले ही चोटिल था तो वह शाम तक ड्यूटी पर क्या कर रहा था? और यदि उसे दंगे में चोट लगी थी तो इस घटना की कोई भी एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई गई.+
इससे यह साफ़ है कि मोहकम सिंह ही पूरे समय ट्रक में था. ऐसे में उसके जरिये आरोपित जवानों की पहचान से संबंधित जांच-पड़ताल क्यों नहीं की गई.

ट्रक में मिले खून की छींटें

हाशिमपुरा दंगे की पडताल के दौरान ट्रक की भी जांच की गई. इसमें यूआरयू 1493 नंबर के ट्रक से दो साल बाद भी जांच अधिकारियों को खून के छींटे मिले. जब लैब में इनकी जांच की गई तो पता चला कि यह खून इंसानों का निकला. इस दौरान यह भी सामने आया कि इस ट्रक की वेल्डिंग भी कराई गई. ऐसे में सवाल उठता है – जोकि अदालत और जांच अधिकारियों के मन में भी उठना चाहिए था – कि क्या छुपाने के लिए सिर्फ यूआरयू 1493 नंबर के उस ट्रक की ही वेल्डिंग कराई गई जिस पर खून के छींटे भी थे. इस मामले की जांच और सुनवाई के दौरान कई तथ्यों से यह बात स्थापित हुई थी कि यूआरयू 1493 नंबर के इस ट्रक का इस्तेमाल घटना के दौरान किया गया था. जांच में यह भी सामने आ चुका था कि घटना के वक्त मोहकम सिंह ही इस ट्रक को चला रहा था. ऐसे में क्या जांचकर्ताओं और कोर्ट के लिए यह पता लगाना वाकई नामुमकिन था कि घटना के दौरान इस ट्रक में सवार वे कौन लोग थे जिन्होंने इस भीषण नरसंहार को अंजाम दिया.+
ऐसे तमाम बिंदुओं पर गौर करें तो यह साफ़ पता चलता है कि इस मामले में दोषियों को सजा देने की नियत शुरुआत से ही नहीं थी. जांचकर्ताओं पर अपने ही साथियों की जांच की जिम्मेदारी थी. वह भी एक सांप्रदायिक हिंसा के मामले में. ऐसे मामलों में अक्सर यही देखने को मिलता है कि पुलिस वाले भी तमाम शहर के माहौल की तरह सांप्रदायिक होने से नहीं बच पाते. ऐसे में जांचकर्ताओं ने कई साल बाद जब जांच की औपचारिकता पूरी की तो यह मामला अभियोजन के पास पहुंचा. आम तौर पर अभियोजन पक्ष का काम कोर्ट में पुलिस की पैरवी करने का होता है. लेकिन इस मामले में तो दोषी भी पुलिसकर्मी ही थे. ऊपर से जांच भी बेहद कमजोर थी. इसलिए अभियोजन की दोषी को सजा दिलाने की इच्छाशक्ति को टूटते हुए भी इस मामले में कई बार देखा जा सकता है. इस सबके बाद न्यायालय के पास करने को ज्यादा कुछ नहीं था. हां, न्यायालय यदि चाहता तो मामले की नए सिरे से जांच के आदेश जरूर दिए जा सकते थे. लेकिन 28 साल बाद हुए फैसले में शायद तब 28 ही साल और लग गए होते. शायद इसीलिए ऐसा कुछ नहीं हुआ. इसके बाद जब एक-एक कर गवाह मुकरने लगे तो नतीजा वही हुआ जो हमारे सामने है. सभी आरोोपित यह बयान देते हुए बरी हो गए कि ’28 साल बाद आखिर न्याय हो ही गया.