Tuesday, 24 March 2015

लोहिया की विलक्षण विरासत

आज किसानों के दीर्घकालिक हित और भारी उद्योगों के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे के विकास के बीच एक जबर्दस्त द्वंद्व छिड़ा हुआ है। इस समय एक ही बिल को सत्तापक्ष किसानों के लिए लाभकारी और विपक्ष किसानों के लिए विनाशकारी बताने में जुटा हुआ है। ऐसे में डॉ. राममनोहर लोहिया बेहद याद आ रहे हैं जिन्होंने गांधीवादी नीतियों, अर्थ और श्रम के परस्पर संबंधों, किसानों एवं मजदूरों के मिले-जुले हितों तथा भारतीय समाज और विश्व भर में विषमता के सभी कारणों को ध्वस्त करने के लिए आजीवन संघर्ष किया। 23 मार्च को उनकी जयंती पर एक बार फिर पूरे देश ने उनके आदशरें को याद किया। संसद से सड़क तक लोहिया ने न जाने कितनी बहसें चलाई। वह लगातार कोशिश करते रहे कि लोकतंत्र और समाजवाद सिर्फ किताबों, नारों और कानूनों तक सीमित न रहे, बल्कि स्वाधीन नागरिकों के आचरण में भी दिखे। स्वाधीनता एक आचरण भी है, संयम भी, मर्यादा भी और दूसरे की स्वाधीनता की रक्षा भी। इस बात को अपने व्यवहार और विचार से हर स्तर पर चरितार्थ करने वाले वह एक विलक्षण संस्कृति-चिंतक राजनेता और जमीनी कार्यकर्ता, दोनों थे।

डॉ लोहिया मानते रहे कि किसानों की जमीन की कीमत पर कोई भी विकास स्वीकार नहीं है। विकराल मशीनों और भारी उद्योग-धंधों के लिए असिंचित और खेती के लिए अनुपयोगी जमीन का ही इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि जिस जमीन से एक किसान की कई पीढि़यों का भरण-पोषण होता रहा है उससे उसे बेदखल करके हम न सिर्फ खाद्यान्नों की उपलब्धता को कम करते हैं, बल्कि उसके स्वावलंबन, स्वाभिमान और स्वाधीनता पर संकट पैदा करके एक गंभीर सांस्कृतिक क्षति की ओर अग्रसर होते हैं। आज पक्ष-विपक्ष के हो-हल्ले और फौरी विचार-विमर्श, आरोप-प्रत्यारोप के बीच डॉ. लोहिया की तरह का सुविचारित गंभीर स्वर कहीं सुनाई नहीं दे रहा है। बहस को कानूनी शब्दों और लाभ-लोभ के गणित के परे स्वाधीनता, उत्पादकता, जमीनी हकीकत और लगातार गहरे हो रहे सांस्कृतिक संकट की तरफ कोई भी नहीं ले जाना चाहता है। सरकार कह रही है कि पिछली सरकार ने जो बिल पास किया था, वह किसान-विरोधी था, जबकि यह सारा देश जानता है कि उस बिल को पारित कराने के लिए तत्कालीन विपक्ष ने जो अब सत्ता पक्ष है, लगभग एक सौ संशोधन करवाने के बाद उसे किसानों के हित में बनवाने का श्रेय खुद लिया था। लेकिन सत्ता में आने के बाद अपने ही किए कराए का ऐसा तमाशा बनाया जा रहा है जिसका उदाहरण खोजना मुश्किल है। इन परिस्थितियों में जब कोई साध्वी, कोई पूर्व न्यायाधीश महात्मा गांधी जैसी शख्सियत को 'अंग्रेजों का एजेंट' कहकर सिर्फ एक बेतुकी सनसनी फैलाकर चर्चा में बने रहना चाहता है तो समूची बहस की दिशा बदलने का खतरा खड़ा हो जाता है कि हम किस-किस बात पर जनता को, राजनीति को, मीडिया को केंद्रित करने की कोशिश करें।

स्वाधीन भारत में जो दो मुद्दे-लोकतंत्र और समानता सबसे अहम थे वे आज पूरे परिदृश्य से गायब हैं। विकास के हल्लाबोल एजेंडे ने समानता की अवधारणा को विमर्श के बाहर कर दिया है। डॉ. राममनोहर लोहिया ने सिर्फ धन और धरती की समानता की बात नहीं की थी, बल्कि जिस सप्त क्रांति का आह्वान किया था उसमें पहली थी नर-नारी की समानता, दूसरी चमड़ी के रंग के आधार पर राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता का विरोध, तीसरी संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा की खिलाफत और पिछड़ों को विशेष अवसर, चौथी परदेशी गुलामी की खिलाफत और स्वतंत्रता, पांचवीं निजी पूंजी की विषमता का विरोध और आर्थिक समानता तथा योजना द्वारा पैदावार बढ़ाना, छठा निजी जीवन में अन्यायपूर्ण हस्तक्षेप का विरोध और लोकतांत्रिक पद्धति, सातवां अस्त्र-शस्त्र का विरोध तथा सत्याग्रह। ये गंभीर विचार से निकले ऐसे सूत्र हैं जो पूरी दुनिया को बदलकर मनुष्य की दिमागी गुलामी को तोड़ सकते हैं। आज हम जिस भंवर में फंसते जा रहे हैं उसमें इन महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

डॉ. लोहिया ने कहा था कि यह सातों क्रांतियां एक साथ संसार में चल रही हैं। अपने देश में भी उनको एक साथ चलाने की कोशिश करनी चाहिए। उनकी सोच थी कि दुनिया में जहां कहीं भी दुख और गरीबी, पराधीनता और पीड़ा हो वह हमारी सभ्यताओं के लिए शर्म का विषय होना चाहिए। नई दुनिया के निर्माण का सपना देखते हुए उन्होंने अपने सांस्कृतिक धरोहरों के महत्व को पहचाना था, नदियों की सफाई, हिमालय बचाओ, तिब्बत की मुक्ति, गोवा मुक्ति संग्राम, भाषा-नीति, रामायण मेला, भारत विभाजन की त्रासदी, अर्थशास्त्र मा‌र्क्स के आगे, इतिहास और नियति आदि पर वह एक साथ सोच और बोल सकते थे।

उनका मानना था कि लोकतंत्र और समाजवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ओंकार शरद ने ठीक ही लिखा है कि लोहिया गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के अखंड समर्थक थे, लेकिन गांधीवाद को वह अधूरा दर्शन मानते थे। वह समाजवादी थे, लेकिन मा‌र्क्स को एकांगी मानते थे, वह राष्ट्रवादी थे लेकिन विश्व सरकार का सपना देखते थे, वह आधुनिकतम आधुनिक थे, लेकिन आधुनिक सभ्यता को बदलने का प्रयत्‍‌न करते रहते थे, वह विद्रोही तथा क्रांतिकारी थे, लेकिन शांति और अहिंसा के अनूठे उपासक थे। डॉ. लोहिया किसी बड़े पद पर नहीं रहे लेकिन उनका कद इतना बड़ा था कि वह देश के बुद्धिजीवियों के दिमाग को अनवरत सोचने और रचने की खुराक देते रहे। मरते हुए डॉ. लोहिया ने कहा-और लोगों की संपत्तियां उनके वारिस संभालते हैं, जो मेरे विचारों को संभालकर आगे बढ़ाएंगे वे मेरे वारिस होंगे। डॉ. लोहिया ने कोई घर नहीं बनाया, आश्रम भी नहीं, कुटी भी नहीं सारा देश उनका घर था, उनके पार्टी के दफ्तर ही उनके आश्रम थे और देश के सारे गरीबों की झोपड़ी उनकी कुटी थी। उन्होंने अपना जन्मदिन कभी नहीं मनाया और मनाने वाले को ताकीद करते रहे कि यह दिन मेरे जन्म के कारण महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों की फांसी के कारण शहादत दिवस के रूप में महत्वपूर्ण है। उनका वारिस होना कितना जरूरी है पर कितना कठिन भी-यह सोचकर उदास होना लाजिमी है।
[लेखक प्रो. चितरंजन मिश्र, हिंदी विवि में प्रतिकुलपति हैं]

आखिर क्या हैं मसरत के इरादे? @शुजात बुखारी

जम्मू-कश्मीर में नई सरकार बनने के बाद से तकरीबन रोज ही कोई न कोई घटना ऐसी घट रही है, जो राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में जगह पा रही है। कठुआ और सांबा सेक्टरों में हुए आतंकी हमलों के बाद अब मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने साफ शब्दों में पाकिस्तान को आगाह कर दिया है कि वह जम्मू-कश्मीर में सीमापार आतंकवाद को बढ़ावा देने से बाज आए। अलगाववादी मसरत आलम को रिहा किए जाने के बाद से ही मुफ्ती 'आतंकवाद" पर 'नर्म रुख" अख्तियार किए जाने को लेकर आलोचना के शिकार बने हुए थे और स्थिति यह बन गई थी कि भाजपा-पीडीपी गठबंधन की जुम्मा-जुम्मा चार दिन पुरानी सरकार के गिरने का खतरा मंडराने लगा था।
मसरत आलम का नाम इस दौरान लगातार सुर्खियों में बना रहा। मसरत को रिहा किए जाने तक देश को उसके बारे में लगभग कुछ नहीं पता था और आज भी उसको लेकर मीडिया में पुख्ता सूचनाएं बाहर नहीं आ पाई हैं। टीवी चैनलों पर जिस तरह की बहसें चल रही थीं, उससे ऐसा लग रहा था मानो वह अजमल कसाब जैसा कोई फिदायीन आतंकवादी हो। जबकि हकीकत यह है कि मसरत आलम एक लंबे समय से जम्मू-कश्मीर की स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहा है और उसे बुजुर्ग अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता रहा है।
यह सच है कि मसरत ने पहले अमरनाथ यात्रा विवाद और फिर वर्ष 2010 में कश्मीर में निर्मित हुई तनावपूर्ण परिस्थितियों के दौरान भारत-विरोधी और सरकार-विरोधी आंदोलनों का नेतृत्व किया था। यह तथ्य भी लगातार दोहराया जाता रहा है कि मसरत की अगुआई में वर्ष 2010 में हुए आंदोलन में पुलिस फायरिंग में 120 कश्मीरियों की मौत हो गई थी। लेकिन इसके बावजूद अगर मुफ्ती सरकार ने मसरत को रिहा करने का फैसला लिया तो उसका तात्कालिक कारण आतंकवादियों के प्रति उनके द्वारा नर्म रुख अख्तियार करना नहीं, बल्कि यह था कि कानूनी आधार पर मसरत को जेल में बंद रखना सरकार के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया था। मसरत श्रीनगर के एक खाते-पीते घर में जन्मा है और उसने मिशनरी स्कूल में तालीम पाई है। निश्चित ही, उसकी राजनीतिक विचारधारा कट्टरपंथी और भारत-विरोधी है। वह मुस्लिम लीग का सह-संस्थापक भी है। 90 के दशक में वह कुख्यात सशस्त्र संगठन हिजबुल्ला का भी सदस्य रह चुका है। लेकिन इससे पहले कि उसे बंदूक उठाने का मौका मिल पाता, उसे गिरफ्तार कर लिया गया और दो साल की सजा के बाद उसे छोड़ दिया गया।
वर्ष 1993 में रिहाई के बाद उसने चरमपंथ के बजाय अलगाववादी राजनीति की राह पर चलने का फैसला किया। दस साल की सक्रिय राजनीति के बाद उसने कश्मीर में अपनी स्थिति मजबूत बना ली। वर्ष 2002 में चरमपंथियों द्वारा अब्दुल गनी लोन की हत्या कर देने के बाद जब विधानसभा चुनावों में लोन के बेटे और पीपुल्स कांफ्रेंस के नेता सज्जाद लोन ने कथित रूप से फर्जी प्रत्याशियों को मैदान में उतारा तो मसरत ने इसकी पुरजोर मुखालफत की। इसी के साथ गिलानी के साथ उसकी नजदीकियां बढ़ीं।
लिहाजा, जहां यह साफ है कि मसरत एक कट्टरपंथी भारत-विरोधी अलगाववादी है, वहीं यह भी साफ कर लेना चाहिए कि वह कसाब की तरह फिदायीन आतंकवादी नहीं है। उसने अपना सियासी कद राजनीतिक संगठन-कौशल और प्रभावी भाषण-कला के माध्यम से बढ़ाया है। उमर अब्दुल्ला सरकार की आंखों की वह किरकिरी बन गया था। यही कारण था कि 2010 के प्रदर्शनों के दौरान जब कश्मीर में कामकाज महीनों तक लगभग ठप हो गया था, तो अब्दुल्ला सरकार ने उस पर 10 लाख रुपए के ईनाम की घोषणा की थी। मीडिया में मसरत को अमन-चैन के दुश्मन की तरह चित्रित किया जाता है, लेकिन अजीब बात है कि इस नकारात्मक प्रचार से उसे ही फायदा हुआ है और रिहाई के बाद से घाटी में उसका कद कहीं बढ़ गया है। वह तो मोदी और मुफ्ती दोनों ने ही अपने दिमाग को ठंडा रखा, वरना मसरत की रिहाई के बाद नई-नवेली सरकार के गिरने तक की नौबत आ गई थी।
लेकिन अब जब मसरत रिहा हो चुका है और खुलेआम घूम रहा है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि अलगाववादी खेमे में क्या चल रहा है। पहला सवाल तो यही है कि क्या मसरत फिर से कश्मीर को आंदोलित करने की कोशिश करेगा? यदि वह ऐसा करता है तो कौन उसका साथ देगा और उसके अहम मुद्दे क्या होंगे? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या वह हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े के प्रमुख के रूप में गिलानी की जगह लेगा? गिलानी की ही तरह मसरत भी कश्मीर समस्या के निपटारे के लिए एक ठोस रवैया अपनाए जाने की वकालत करता है और हुर्रियत के उदारवादी धड़े को वह 'विश्वासघाती" बताने से भी नहीं चूकता। एक कारण यह भी है कि गिलानी के नेतृत्व वाले तहरीके-हुर्रियत में आज ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जो गिलानी की जगह ले सके। मोहम्मद अशरफ सहरी जरूर है, लेकिन उसे एक 'फायरब्रांड" नेता नहीं माना जाता! अलबत्ता अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि वर्ष 2010 में गिलानी द्वारा शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील किए जाने के बाद मसरत द्वारा उसकी आलोचना करने के बाद से ही गिलानी मसरत से नाराज बना हुआ है।
हवाओं के रुख को भांपते हुए मसरत ने फिर से गिलानी से मधुर संबंध बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि महत्वाकांक्षी मसरत गिलानी के करीब आकर उसका राजनीतिक उत्तराधिकारी बनना चाहता है। जो भी हो, आने वाले चंद महीने अलगाववादियों के लिए कश्मीर की राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए बेहद जरूरी हैं और हो सकता है, अलगाववादियों की यह जरूरत ही मसरत को एक बड़ा सियासी मुकाम दिलवा दे।
(लेखक श्रीनगर और जम्मू से प्रकाशित होने वाले दैनिक 'राइजिंग कश्मीर" के संपादक हैं।
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Monday, 23 March 2015

जिसने एक टापू को बनाया सिंगापुर

सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली कुआन यू
अपने नज़रिये और क्रूर व्यावहारिकता से ली कुआन यू ने सिंगापुर को बदला. उनके नेतृत्व में प्राकृतिक संसाधनों से वंचित यह छोटा सा द्वीप आर्थिक रूप से एक सफल देश बना.
ली ने सिंगापुर निवासियों की ऊर्जा को सफलतापूर्वक आर्थिक प्रगति की ओर मोड़ा. इसे एक आर्थिक चमत्कार भी कहा जाता है जिसमें निजी और सरकारी पूंजीवाद का मिश्रण था.
सिंगापुर को समृद्ध, आधुनिक और भ्रष्टाचार मुक्त बनाने का श्रेय ली को दिया जाता है लेकिन कई लोग मानवाधिकारों पर उनके रिकॉर्ड को चिंताजनक मानते हैं.
ली कुआन का जन्म 16 सितंबर 1923 को सिंगापुर में हुआ. वह चीनी अप्रवासियों की तीसरी पीढ़ी के बेटे थे.

तालीम

ली कुआन यू ने सिंगापुर में बड़े पैमाने पर सुधारों की शुरूआत की
उनकी परवरिश पर ब्रिटिश प्रभाव रहा. उनके दादा उन्हें हैरी ली कहते थे. बचपन में उन्हें इसी नाम से जाना जाता था.
ली की तालीम सिंगापुर के एक अंग्रेज़ी स्कूल में हुई पर उनकी शिक्षा 1942 में शुरू हुए जापानी क़ब्ज़े के कारण प्रभावित हुई.
अगले तीन साल उन्होंने ब्लैक मार्केट में काम किया और अपनी उम्दा अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करते हुए जापानी प्रचार विभाग में भी काम किया.
युद्ध समाप्त होने के बाद वह थोड़े समय के लिए लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स गए और फिर केम्ब्रिज, जहां उन्होंने क़ानून की पढ़ाई की.
1969 में बीबीसी के एक कार्यक्रम में भाग लेते ली कुआन यू
इंग्लैंड में अपने समय के दौरान, ली बीबीसी होम सेवा के मुरीद बन गए, जिसे बाद में बदल कर रेडियो 4 कर दिया गया.
उन्होंने ग्रामीण डेवोन संसदीय सीट पर चुनाव लड़ रहे विश्वविद्यालय के अपने मित्र के लिए चुनाव प्रचार भी किया.
अपने छात्र जीवन से ही समर्पित समाजवादी रहे ली सिंगापुर लौट कर एक प्रमुख ट्रेड यूनियन वकील बन गए.

प्रधानमंत्री बनने का सफ़र

1954 में उन्होंने पीपुल्स एक्शन पार्टी (पीएपी) की स्थापना की और इसके पहले महासचिव बने. अगले 40 सालों में अधिकतर समय वह इस पद पर बने रहे.
1959 में पीएपी के चुनाव जीतने के बाद खुश ली कुआन यू
पीएपी ने 1959 के चुनावों में बहुमत हासिल किया और सिंगापुर पूरी तरह से अंग्रेज़ों के नियंत्रण से निकल कर स्वशासित राज्य बन गया.
1963 में ली ने सिंगापुर का विलय मलेशिया के साथ किया, पर यह अधिक वक़्त नहीं चल पाया.
वैचारिक रस्साकशी और जातीय समूहों के बीच हिंसक संघर्ष के बाद सिंगापुर संघ से निकलकर स्वतंत्र देश बन गया.
यह ली के लिए एक मुश्किल क़दम था जिनके लिए मलेशिया से संधि सिंगापुर के औपनिवेशिक अतीत से दूर फेंकने की एक कोशिश थी. उन्होंने इसे एक ख़राब दौर बताया.
1958 में एक अभियान के दौरान ली कुआन यू
मलेशिया के साथ व्यावसायिक और सैन्य संबंध बनाए रखे गए लेकिन ब्रिटेन को सिंगापुर में अपना सैन्य आधार बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया ताकि सिंगापुर और मलेशिया की संयुक्त सुरक्षा की जा सके.
ली ने देश में सुधारों के लिए एक बड़ा ख़ाका तैयार किया ताकि सिंगापुर को "गन्दगी और दुर्दशा के कुंए" से निकाल कर आधुनिक प्रगति की ओर ले जाया जाए.

कड़ा नियंत्रण

ऐसा करने के लिए उन्हें देश के सभी मुद्दों पर कड़ा नियंत्रण बनाया जिससे सिंगापुर विश्व के सबसे नियंत्रित समाजों में से एक बना.
अपने नेता को याद करते सिंगापुर के निवासी
ली ने अपने आलोचकों में से कुछ को बिना सुनवाई के हिरासत में भेजा, मीडिया और विदेशी प्रकाशनों पर प्रतिबंध लगाया और कई पत्रकारों को भी गिरफ़्तार किया.
वह कहा करते थे, "प्रेस की स्वतंत्रता, समाचार मीडिया की स्वतंत्रता को सिंगापुर की अखंडता की आवश्यकताओं के सम्मुख झुकना ही होगा."
उन्होंने अपने क़दमों को यह कह कर उचित ठहराया कि ये अख़बार विदेशी हितों का पोषण करते हैं.
ली का मानना था कि एक विकासशील देश को अपनी कुछ स्वतंत्रता का बलिदान करना पड़ता है.

दमनकारी उपाय

कम्यूनिज़्म-विरोध का विकल्प कम्यूनिज़्म था, और पश्चिम के उदार लोकतंत्र के सिद्धांत को लागू नहीं किया जा सकता था.
1976 में ली कुआन यू को सुनने के लिए जमा हुई भीड़
हालांकि, कुछ आलोचकों को कहना था कि सभी संसदीय सीट जीतने से उन्हें कोई आशंका नहीं होने चाहिए थी और वह दमनकारी उपायों के इस्तेमाल करने से बच सकते थे.
एक समर्पित कम्यूनिज़्म-विरोधी के तौर पर उन पर आरोप लगाया गया कि राजनीति में वह कम्युनिस्ट शैली अपना रहे हैं. हालांकि अन्य कम्यूनिस्ट देशों की तुलना में सिंगापुर के लोगों को उनके शासन से आर्थिक रूप से लाभ हुआ.
1960 से 1980 तक सिंगापुर की प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद में 15 गुना की वृद्धि हुई.

भ्रष्टाचार का ख़ात्मा

ली ने अरब देशों से घिरे इसराइल के मॉडल को माना. उनका कहना था कि इसराइल की तरह, हमें भी छलांग लगाकर क्षेत्र के अन्य देशों को पीछे छोड़ना है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करना है.
चीन की यात्रा के दौरान ली कुआन यू
वह चीन के साथ अच्छे संबंधों के महत्व को समझते थे. चीनी नेता देंग जियाओपिंग के साथ अपनी दोस्ती से उन्हें मदद मिली.
देंग ने 1978 में सिंगापुर का दौरा किया और ली की आर्थिक नीतियों की प्रशंसा की, ली भी देंग के द्वारा चीन में किए गए सुधारों से प्रभावित हुए थे.
सिंगापुर में फैले भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए ली ने नए उपाय किए और रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए कम लागत के आवास और औद्योगीकरण के कार्यक्रम की शुरूआत की.
उन्होंने सिंगापुर की बहु-संस्कृतिवाद के आधार पर एक अलग पहचान बनाने की कोशिश की. इसके लिए उन्होंने विभिन्न जातीय समूहों को एक साथ जोड़ा.

शारीरिक दंड

जार्ज बुश के साथ ली कुआन यू
ली शारीरिक दंड के समर्थक थे. स्कूल में वह ख़ुद इस तरह के दंड पा चुके थे.
वर्षों बाद इसे याद करते हुए वह कहते थे, "मैं एक कुर्सी पर झुका और मार खाई. मैं पतलून पहने था."
उन्होंने कहा, "मुझे कभी समझ नहीं आया कि पश्चिमी शिक्षाविद शारीरिक दंड के इतना ख़िलाफ़ क्यों है. मुझे और मेरे साथी छात्रों को इससे कोई नुक़सान नहीं पहुंचा."
जब ली ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा, शारीरिक दंड सिंगापुर की न्यायिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुका था और 40 से अधिक अपराधों के लिए दिया जा रहा था.

नियंत्रण आबादी पर भी

दुकान पर सजी हुई हैं ली कुआन यू की लिखी किताबें
ली ने सिंगापुर की बढ़ती आबादी को रोकने का भी प्रयास किया. उन्होंने परिवार नियोजन अभियान शुरू किया और दो से अधिक बच्चे पैदा करने वालों पर कर लगाया.
बाद में उन्होंने ग्रेजुएट महिलाओं को परिवार नियोजन के क़ानून में छूट देकर विवाह के लिए प्रेरित किया. यह क़ानून कम पढ़ी लिखी महिलाओं पर लागू रहा.
सिंगापुर के लोगों को विनम्र होना सिखाया गया. उन्हें कम आवाज़ करना, शौचालय में फ्लश करना और च्यूइंंग गम नहीं चबाना सिखाया गया. वहाँ दीवार पर कोई चित्र नहीं बनाए गए क्योंकि सरकार ने ऐसा करने से मना किया.
अपने नेता को याद करते हुए
ली ने एक बार बीबीसी को बताया कि सिंगापुर को कभी नियंत्रित राज्य की तरह जाना जाता था लेकिन इसका नतीजा है कि हम आज बेहतर व्यवहार जानते हैं और 30 साल पहले की तुलना में एक अधिक अनुकूल जगह में रहते हैं.
जनवरी 1985 में, उन्होंने युवाओं को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया और अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के बावजूद उनकी पार्टी ने चुनावों में बड़ी जीत दर्ज की.

बदले में मैंने क्या मिला?

समर्थकों के बीच में
सात बार चुनाव जीतने के बाद जब ली ने जब 1990 में पद छोड़ा, तो वह विश्व के सबसे लंबे समय तक सेवारत प्रधानमंत्री थे.
वह राजनीति में हमेशा सक्रिय रहे और उन्होंने सिंगापुर के लोगों को मंदारिन चीनी और अंग्रेज़ी में बात करने के लिए प्रेरित करने वाले अभियान में बढ़चढ़कर भाग लिया.
उनके कार्यकाल में सिंगापुर एक विकासशील देश से आगे बढ़कर एशिया की अग्रणी औद्योगिक शक्ति बना.
ली कुआन यू को याद करते समर्थक
लेकिन कई लोगों का मानना है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की क़ीमत पर सिंगापुर का विकास किया गया. वे मानते हैं कि ली उन मीडिया संगठनों पर मुक़दमा कर देते थे जो उनसे सहमत नहीं होते थे.
लेकिन ली अपने फ़ैसलों पर क़ायम रहे. 2011 में हुए उन्होंने कहा था, "मुझे चीज़ों को ठीक करने के लिए कुछ तीखे और कड़े क़दम उठाने पड़े. हो सकता है कि कुछ लोग इससे सहमत न हों लेकिन बहुत कुछ दांव पर लगा था और मैं चाहता था कि हम सफल हों."
"आख़िर मुझे क्या मिला? एक सफल सिंगापुर. बदले में मैंने क्या दिया? मेरा जीवन."

Saturday, 21 March 2015

हिंद महासागर में ‘मोदी माला’ @पुष्परंजन

मोदी के लिए यह अच्छा मौका है, जब अमेरिका समेत पश्चिमी ताकतें वहां पर भारत को मजबूत स्थिति में देखना चाहती हैं. लेकिन उससे पहले मछुआरों को लेकर जो बाधा पैदा हुई है, उसका रास्ता निकालना जरूरी है.
 
‘दक्षिण अफ्रीका का द्वार’ कहे जानेवाले सेशेल्स में मोदी जी के बड़े-बड़े बैनर लगे हैं. मोदी जी की 11 मार्च की यात्रा पर सेशेल्स में भारत के उच्चायुक्त संजय पांडा की टिप्प्पणी थी, ‘प्रधानमंत्री की यात्रा संक्षिप्त, किंतु मौलिक है.’ 115 द्वीपों के इस देश में भारत, सैन्य समुद्री सुरक्षा और अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग करने जा रहा है, जिसे लेकर चीन समेत कई पश्चिमी देशों के कान खड़े हैं.
 
दिएगोगार्सिया से 600 मील दूर, हिंद महासागर की गोद में बसा यह देश 1976 में ब्रिटेन से आजाद हुआ. सेशेल्स में भारत की दिलचस्पी कई वजहों से है. मॉरीशस के बाद सेशेल्स, हिंद महासागर का सबसे बड़ा ‘टैक्स हेवेन’ है, जो काले धन और हवाला के कारोबार से जुड़ा हुआ है. दूसरा, भारत को यदि अपनी समुद्री सीमाएं महफूज रखनी है, तो उसकी शुरुआत सेशेल्स से करनी होगी.
सेशेल्स दूसरा तटवर्ती देश है, जहां भारत ने जून 1986 में तख्तापलट रोकने में मदद की थी.
 
उसके दो साल बाद 1988 में मालदीव में सत्तापलट के प्रयास को भारत सरकार ने विफल किया था. जून 1986 में सेशेल्स के तत्कालीन राष्ट्रपति रेने ने अपने रक्षामंत्री ओग्ल्विी बलरुइस की साजिशों को विफल करने के लिए नयी दिल्ली से मदद मांगी थी. तब राजीव गांधी ने तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल आरएच़ तहलियानी को इस ऑपरेशन की जिम्मेवारी दी थी, जिसका कोड नाम था ‘फ्लॉवर्स आर ब्लूमिंग’.
 
हिंद महासागर में भारतीय नौसेना का यह पहला अभियान था, जिसमें नेवल शिप ‘आइएनएस विंध्यागिरी’ को डायरेक्टर नेवल इंटेलीजेंस और डायरेक्टर नेवल ऑपरेशंस की निगरानी में पूरा किया गया था. यह दिलचस्प है कि भारतीय नौसेना के जिस ऐतिहासिक जहाज ‘आइएनएस विंघ्यागिरी’ से 1986 में सेशेल्स की रेने सरकार को बचाया जा सका, वह 30 जनवरी, 2011 को मुंबई बंदरगाह पर साइप्रस के एक जहाज से टकरा कर समुद्र में गर्क हो गया.
 
खैर! राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते, जिस सागर कूटनीति (मेरीटाइम डिप्लोमेसी) की शुरुआत हुई थी, उसे 2003 में अटल जी के समय ‘सागर माला’ के नाम से गति देने की चेष्टा हुई. लेकिन शशक रफ्तार वाली समुद्री सुरक्षा कूटनीति कब शुतुरमुर्ग के सिर की तरह बालू में घुस गयी, पता ही नहीं चला. इस बीच सेशेल्स, जिबोटी, सूडान, मेडागास्कर, मोंबासा, बुरकिना फासो और मॉरीशस अंतरराष्ट्रीय खुफियागीरी के केंद्र बनते चले गये.
 
दिसंबर 2011 में सेशेल्स में अमेरिका का एक ड्रोन विमान एमक्यू-9 दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इसके बाद पता चला कि 2009 से ही अमेरिका ने सेशेल्स में अपना नौसैनिक अड्डा बना रखा है. अस्सी के दशक में अमेरिका, सेशेल्स के अलडाब्रा आइलैंड पर अपना अड्डा बना चुका था, ताकि उसके बी-52 युद्धक विमान ‘हार्न ऑफ अफ्रीका को लक्ष्य कर उड़ानें भर सकें. सेशेल्स के माहे द्वीप से भी अमेरिका सोवियत गतिविधियों पर निगरानी रखता था.
 
अमेरिका के बाद चीन की सर्वाधिक दिलचस्पी सेशेल्स में रही है. 2007 में राष्ट्रपति हू जिंताओ की यात्रा के बाद चीन सेशेल्स में दो वाइ-12 विमान, निगरानी के वास्ते तैनात कर चुका है. सेशेल्स के सैकड़ों सैनिकों को चीन ने प्रशिक्षित किये हैं. सवाल है कि क्या सेशेल्स में अमेरिका, चीन को ‘काउंटर’ करने के वास्ते भारत की मजबूत उपस्थिति चाहता है? कारण जो हो, पर यह अच्छी बात है कि 2003 में अटल जी ने समुद्री सुरक्षा के लिए ‘सागर माला’ का जो ख्वाब देखा था, लंबे अंतराल के बाद उसे पूरा करने के लिए मोदी जी निकल पड़े हैं. हिंद महासागर के जिस क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी ‘सागर माला अभियान’ पर निकले हैं, वहां दूसरे कारणों से भी भारत को अपने प्रभामंडल का विस्तार जरूरी है.
 
मात्र नब्बे हजार की आबादी वाला सेशेल्स अफ्रीका का सबसे अमीर देश है. यहां प्रति व्यक्ति सालाना आय पच्चीस हजार डॉलर से अधिक है. न तो इस देश में खनिज है, न उद्योग. पर्यटन से अधिक, यहां पैसे की खेती होती है. काले पैसे जमा करनेवालों के लिए सेशेल्स एक ‘टैक्स हेवेन’ है. स्वयं राष्ट्रपति जेम्स अलेक्स माइकल्स की ब्रिटिश वजिर्न आइलैंड में ‘सोलेइल ओवरसीज होल्डिंग लिमिटेड’ नामक कंपनी में करोड़ों डॉलर के शेयर हैं. 2004 से माइकल्स सेशेल्स के शासन प्रमुख हैं.
 
सेशेल्स के राष्ट्रपति माइकल्स मोदी से भी मजबूत स्थिति में हैं. वहां की संसद ‘नेशनल असेंबली’ की 32 में से 31 सीटों पर राष्ट्रपति माइकल्स के सांसद जीत कर आये हैं. ऐसे मजबूत राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री मोदी यह उम्मीद करें कि सेशेल्स में काले धन जमा करने और हवाला के कारोबार में सक्रिय भारतीयों का पता मिल जायेगा, तो इसे हम भ्रम की स्थिति ही कहेंगे.
1948 से भारत-मॉरीशस के बीच कूटनीतिक संबंध हैं. मॉरीशस, भारत के लिए प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश का बहुत बड़ा स्नेत है. मारीशस कालेधन, हवाला और अपतटीय (ऑफ शोर) बैंकिंग का ऐसा मार्ग है, जहां से अरबों डॉलर भारत में खपते रहे हैं.
 
2011 में 55.2 अरब डॉलर का निवेश मॉरीशस ने भारत में किया था. दिसंबर 2014 में खबर आयी कि भारत पहली बार मॉरीशस के कोस्ट गार्ड के लिए दो गश्ती नौकाएं तैयार कर रहा है. ऐसे ही दो ओपीवी (ऑफ शोर पेट्रोल व्हीकल) गोवा के शिपयार्ड में श्रीलंका के लिए भी निर्मित किये जा रहे हैं. ‘इंडियन ऑयल’, मारीशस में अपने ऑपरेशन को काफी आगे बढ़ा चुका है. ऐसी शुरुआत की सराहना की जानी चाहिए. मारीशस में उभयपक्षीय सहयोग के कई आयाम प्रधानमंत्री मोदी और उनके समकक्ष अनिरुद्ध जगन्नाथ से मुलाकात के बाद खुलेंगे.
 
प्रधानमंत्री मोदी श्रीलंका पहुंच पायें, उससे पहले कोलकाता से अमेरिकी कूटनीतिक नील क्रोमाश ने बयान दिया कि श्रीलंका में लोकतंत्र की बहाली और युद्ध के दौरान मानवाधिकार हनन के आरोपों को सुलझाने में अमेरिका मदद करेगा. इस बयान का निहितार्थ यही है कि  अमेरिका और भारत साङो रूप से इस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक तैयारी में लग गये हैं. श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना इन दिनों लंदन में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून से बातचीत में व्यस्त हैं. बातचीत के केंद्र में श्रीलंकाई तमिलों की समस्या है.
 
श्रीलंका में चीन इस समय बैकफुट पर है. मोदी के लिए यह अच्छा मौका है, जब अमेरिका समेत पश्चिमी ताकतें वहां पर भारत को मजबूत स्थिति में देखना चाहती हैं. लेकिन उससे पहले मछुआरों को लेकर जो बाधा पैदा हुई है, उसका रास्ता निकालना जरूरी है. श्रीलंकाई सीमा वाली ‘मन्नार की खाड़ी’ और भारतीय क्षेत्र ‘पाक स्ट्रैट’ में समुद्र मंथन से जो ‘अमृत’ प्राप्त होगा, शायद उसका लाभ तमिलनाडु चुनाव में मोदी की पार्टी को प्राप्त हो!

Friday, 20 March 2015

फील्डिंग में सर्वश्रेष्ठ है यह टीम @रामचंद्र गुहा

क उम्र के बाद व्यक्ति पिछले हफ्ते या महीने की बातें भी याद नहीं रख पाता। मगर जवानी की यादें हमेशा ताजा रहती हैं। ये पंक्तियां लिखते समय मुझे याद आता है कि 1974 के दिल्ली टेस्ट में बिशन सिंह बेदी की गेंद पर एल्विन कालीचरण ने किस तरह ऑन ड्राइव लगाने की कोशिश की थी। लेकिन गेंद जैसे ही उनके बल्ले का किनारा लेते हुए खतरनाक ढंग से ऑफ साइड में हवा में उछली, मैंने गेंदबाज की चीख सुनी, 'बृजेश'​! बेदी की चीख में विकेट लेने की उनकी तड़प को मैंने भी महसूस किया। उस वक्त मैं फिरोज शाह कोटला के आम आदमी स्टैंड के शीर्ष पर बैठा था। 1974 की उस भारतीय टीम में पांच ऐसे खिलाड़ी थे, जो भरोसेमंद ढंग से गेंद को कैच कर सकते थे। इनमें से चार बल्लेबाज के इर्द-गिर्द थे। फारूक इंजीनियर स्टंप के पीछे थे, वेंकटराघवन स्लिप पर, जबकि सोलकर और आबिद अली लेग साइड में मुस्तैद थे। दूसरी ओर आउटफील्ड के शेष सात खिलाड़ियों में से छह क्रिकेटर तो बेहतरीन थे, मगर फील्डिंग के मामले में फिसड्डी थे। यही वजह थी कि जब कैच पकड़ने की बात आई, तो बेदी की जुबान पर बृजेश पटेल का नाम आया।

उस पारी का एक और वाकया इतना ही दिलचस्प था। वेस्ट इंडीज के तेज-तर्रार ऑलराउंडर कीथ बॉयस स्वीप शॉट के जरिये प्रसन्ना की गेंदों पर लगातार प्रहार कर रहे थे। अंततः गेंदबाज ने स्‍क्वॉयर लेग पर बृजेश पटेल को तैनात किया। दरअसल, प्रसन्ना और पटेल एक ही राज्य की ओर से खेलते थे। यही वजह थी कि पटेल की भरोसेमंद फील्डिंग से बेदी की तुलना में प्रसन्ना ज्यादा अच्छी तरह वाकिफ थे। फिर क्या था, बॉयस गेंद की फ्लाइट से चकमा खा गए, और गेंद बल्ले का किनारा लेते हुए पटेल के हाथ में समा गई। 1974 की भारतीय क्रिकेट टीम की खासियत यह थी कि फील्डिंग करने की क्षमता के मामले में उसके खिलाड़ियों के बीच बड़ा फर्क मौजूद था। अपने दाईं या बाईं ओर हवा में कलाबाजी दिखाते हुए कैच पकड़ना, गेंद को बाउंड्री से तेजी से विकेटकीपर के दस्तानों में पहुंचाना, जैसी कुछ ऐसी कलाएं थीं, जिनके लिए कम से कम भारतीय खिलाड़ी तो मशहूर नहीं थे। हालांकि इस मामले में कुछ अपवाद भी थे।

1930 के दशक में हमारी टीम में एक खिलाड़ी था, लाल सिंह। उनका जन्म मलयेशिया में हुआ था, और वह कवर पर बेहतरीन फील्डिंग करते थे। 1950 के दशक में पॉली उमरीगर को स्लिप या शॉर्टलेग पर काफी भरोसमंद फील्डर माना जाता था। उनके जूनियर साथी मंसूर अली खान पटौदी काफी फुर्तीले थे, और उनकी थ्रोइंग आर्म जबर्दस्त थी। 1970 के दशक की भारतीय क्रिकेट टीम में नजदीकी कैच लेने के मामले में कुछ बेहतरीन खिलाड़ी थे। इनमें से एकनाथ सोलकर को क्रिकेट के इतिहास में शॉर्टलेग का महानतम फील्डर माना जा सकता है। वह बगैर हेलमेट और पैड (शिन गार्ड) के शॉर्टलेग पर मुस्तैद रहते थे। 1980 के दशक में कपिल देव बेहतरीन आउटफील्डर थे। वह स्लिप में भी अच्छी फील्डिंग करते थे। 1990 के दशक में हमारे पास अजहरुद्दीन थे। कप्तान उन्हें कहीं भी खड़ा क्यों न कर दे, वह हर जगह गजब की फील्डिंग करते थे।

वैसे अगर पटौदी और अजहर जैसे अपवादों को छोड़ दें, तो भारतीय टीम अपनी लचर फील्डिंग के लिए जानी गई है। भारतीय क्रिकेट के लिए सही बात यह है कि अगर आप बल्लेबाजी या गेंदबाजी जानते हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप गेंद रोकने या कैच पकड़ने में कितने काबिल हैं। हमारे कुछ बेहतरीन बल्लेबाज और तकरीबन सारे शीर्ष गेंदबाज अनफिट और ज्यादा वजन वाले थे। इन खिलाड़ियों को स्लिप पर खड़ा नहीं किया जा सकता था। इसलिए इन्हें मिड ऑन्‍ा या मिड ऑफ पर खड़ा कर बाउंड्री तक गेंद के पीछे दौड़ते देखना ज्यादा सुरक्षित विकल्प था।

अतीत में कुछेक फील्डर जरूर ऐसे रहे हैं, जिन्हें स्वाभाविक एथलीट कहा जा सकता था। मजे की बात तो यह है कि भारतीय क्रिकेटरों को अपने फील्डिंग कौशल में निखार लाने की जरूरत भी कभी महसूस नहीं हुई। ऐसा लगता था, मानो कुछ खिलाड़ियों को बेहतर फील्डर होने का वरदान मिला था, तो कुछ को नहीं। हां, यह जरूर तय था कि अच्छी या बुरी फील्डिंग के चलते किसी खिलाड़ी की न तो टीम में जगह पक्की होती थी, और न ही उसे टीम से बाहर का रास्ता दिखलाया जाता था। टीम में अंदर/बाहर जाने की कसौटी बल्लेबाज के रन और गेंदबाज के विकेट होते थे। बृजेश पटेल गजब के फील्डर होने के बावजूद टीम में नियमित जगह नहीं बना सके, क्योंकि बतौर बल्लेबाज उनका प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा था।

लेकिन अब चीजें बदल रही हैं। तेज दौड़ना, हवा में कलाबाजी खाते हुए गेंद को बाउंड्री के पार जाने से रोकना, स्लिप पर नीची रहती कैचों को लपकना, आउटफील्ड में फिसलते हुए गेंद को रोकना, कम या ज्यादा दूरी से गेंद को थ्रो करते हुए स्टंप उड़ा देना जैसे कौशलों को ऑस्ट्रेलिया या दक्षिण अफ्रीका में हमेशा सराहना मिली है। अब भारत में भी इन्हें प्रशंसा मिलने लगी है। इस मामले में 2013 का जोहांसबर्ग टेस्ट मैच टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। 458 रन का पीछा करने में दक्षिण अफ्रीकी टीम नाकामयाब रही, क्योंकि उनके दो सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों स्मिथ और डू प्लेसिस को अजिंक्य रहाणे की उत्कृष्ट फील्डिंग के चलते रन आउट होना पड़ा। उस वक्त मैंने ट्वीट किया था, 'मुंबई के एक बल्लेबाज ने भारत को बचा लिया-अपनी फील्डिंग की बदौलत।' बल्लेबाजी के मामले में रहाणे बेशक मर्चेंट, मांजरेकर, गावस्कर या तेंदुलकर की लीग के बल्लेबाज न बन पाएं। मगर फील्डिंग के मामले में ये सारे महान खिलाड़ी रहाणे की बराबरी नहीं कर सकते।

पहले जब भी कभी भारत कोई टेस्ट सीरीज या वनडे टूर्नामेंट जीतता था, तो उसमें हमारी फील्डिंग की भूमिका कम ही होती थी। 2011 की विश्व विजेता टीम में फील्डिंग के मामले में भारत के चार खिलाड़ी काफी कमजोर थे, 'तेंदुलकर और सहवाग' तथा 'जहीर खान व मुनफ पटेल'। मगर न तो प्रशंसकों और न चयनकर्ताओं ने ही इस पर ध्यान दिया। इनमें से पहली जोड़ी जब तक रन बनाती रही, और दूसरी जोड़ी विकेट लेती रही, तब तक इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था, कि वे फील्डर कैसे हैं।

2015 के विश्व कप का नॉकआउट चरण शुरू होने वाला है। विजेता की भविष्यवाणी करना तो अभी जल्दबाजी है। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि फील्डिंग के मामले में वर्तमान भारतीय टीम अब तक की सर्वश्रेष्ठ टीम है। चार खिलाड़ी-कोहली, जडेजा, रहाणे और रैना, बेहतरीन फील्डर हैं। बाकी खिलाड़ी भी तेज दौड़ने, सटीक थ्रो और कैच लपकने में माहिर हैं। स्पिनर्स की बात करें, तो अश्विन और जडेजा की तुलना प्रसन्ना और बेदी से तो नहीं की जा सकती, मगर एक मामले में वर्तमान स्पिनर्स खुशकिस्मत हैं कि गेंद जब हवा में हो, तो उन्हें किसी एक खिलाड़ी का नाम लेकर चीखने की जरूरत नहीं होती। कैच पकड़ने के लिए वे अपने किसी भी साथी पर भरोसा कर सकते हैं। 

गांधी के कारखाने का एक सैनिक @कुमार प्रशांत

चौबीस दिसंबर, 1924 को गुजरात के वलसाड में जन्मे नारायण देसाई की मृत्यु रविवार को गुजरात में ही, सूरत के निकट वेडछी के संपूर्ण क्रांति विद्यालय में हुई। तो उम्र हुई नब्बे साल की-एकदम पकी उम्र! इस उम्र के किसी की मृत्यु न तो अकाल मृत्यु मानी जा सकती है, न ऐसी मृत्यु पर शोक का कोई कारण होना चाहिए। यह जानने के बाद तो हर्गिज नहीं कि पिछले 10 दिसंबर से वह मस्तिष्क आघात के कारण प्राय: चेतना शून्य ही थे। नारायण देसाई गांधी के कारखाने में गढ़े गए एक अनोखे इंसान थे। इतिहास में विराट हस्तियों की कमी नहीं है। कमी है, तो सेतुओं की, जो दिलों, धाराओं, प्रवाहों और एकाधिक बार इतिहास के कालखंडों को जोड़ते हैं। नारायण देसाई ऐसे ही एक पुल थे।

वह उन बिरले लोगों में थे, जो महात्मा गांधी, विनोबा भावे और लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसी विराट व मौलिक प्रतिभाओं के बीच सेतुबंध का काम करते थे। गांधी के पुत्रवत निजी सचिव महादेव देसाई के पुत्र नारायण देसाई गांधी के ‘बाबला' थे और उनकी गोद में खेले-पढ़े-बढ़े थे। गांधी की हत्या होने तक उन्होंने वह जीवन दिशा खोज ली थी, जिसकी तलाश में हम जीवन भर भटकते हैं। इसलिए गांधी के बाद, गांधी की अहिंसक क्रांति की परिकल्पना को लेकर जब विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन शुरू किया, तो नारायण देसाई उसमें सहजता से समा गए। जयप्रकाश का साथ मिला, तो नारायण देसाई काफी खिले। दुनिया के शांतिवादियों में उनकी अग्रिम जगह बनी और युद्ध विरोधी अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का उन्होंने मार्गदर्शन भी किया।

जयप्रकाश गए, तो गांधी क्रांति की धारा कुछ हतप्रभ हुई और कुछ भटकी भी। उस वक्त जिन कुछ लोगों ने आगे आकर उसे संभालने और दिशा देने का काम किया, उनमें ओडिशा के मनमोहन चौधरी, राजस्थान के सिद्धराज ढड्ढा, महाराष्ट्र के ठाकुरदास बंग के साथ नारायण देसाई भी एक थे। सूरत के निकट वेडछी गांव में उन्होंने संपूर्ण क्रांति का प्रशिक्षण देने हेतु एक विद्यालय प्रारंभ किया-संपूर्ण क्रांति विद्यालय! युवाओं को अहिंसक क्रांति से परिचित कराने की उनकी यह योजनाबद्ध कोशिश थी। प्रकृति से वह शिक्षक थे, वृत्ति से शांति सैनिक और विचारों से क्रांतिकारी। पिछले कुछ वर्षों से देश भर में गोलबंद हो रही प्रतिक्रियावादी ताकतों को भांपते हुए वह उसकी अहिंसक काट खोजने में लगे थे। वह राम जन्मभूमि विवाद के समय भी विवेक की आवाज लगाते रहे, फिर अयोध्या पहुंच कर, उपवास-धरना के कार्यक्रम में शरीक हुए और पिटाई आदि से गुजरे। और फिर गुजरात में 2002 का नरसंहार हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लगा कि उनके मुख्यमंत्री ने राजधर्म का पालन नहीं किया, तो नारायण देसाई को लगा कि राष्ट्रधर्म का पालन करने में चूक हुई। तो परिमार्जन क्या? उन्हें भीतर से रास्ता मिला और वह गांधी-कथा लेकर समाज के सामने उपस्थित हुए। उन्हें गांधी की जीवन-गाथा में ही एक हथियार नजर आया और वह उस हथियार को लेकर लोगों के बीच जाने लगे।

नारायण देसाई दिल के मरीज थे। उनकी ओपन हार्ट सर्जरी हो चुकी थी। वह पेसमेकर पर चलते थे। लेकिन अपना चरखा उठाए और अपना चरखा चलाते वह कितनी ही बार काल की गति को पीछे छोड़ते रहे। लेकिन हर स्पर्धा का अंत होता ही है। काल के साथ की अपनी स्पर्धा उन्होंने समाप्त कर दी। संपूर्ण क्रांति की प्रतिबद्धता को जैसे रेखांकित करते हुए संपूर्ण क्रांति विद्यालय में उन्होंने अंतिम विश्राम लिया। वेडछी गांव से सटकर बहने वाली वाल्मिकी नदी के किनारे सजाई चिता के सहारे वह अपने गांधी-विनोबा-जयप्रकाश के पास पहुंच गए।

Thursday, 19 March 2015

गांधी विचार के हत्यारों के खिलाफ @प्रीतीश नंदी


दो अक्टूबर 1983 को मोहनदास करमचंद गांधी की विरासत पर वस्तुनिष्ठ पुनरावलोकन के साथ इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादक के रूप में मेरा पत्रकारीय कॅरिअर शुरू हुआ। आपातकाल और उथल-पुथल वाले सत्तर के दशक की पृष्ठभूमि में कवर स्टोरी लिखी थी लंदन स्थित पाकिस्तानी लेखक और मार्क्स तथा सशस्त्र क्रांति की कसमें खाने वाले तारिक अली ने। वे उन युवा गर्म दिमागों में से थे, जिन्होंने 1968 के वसंत में पेरिस में छात्र विद्रोह का नेतृत्व किया और जो जल्द ही यूरोप के कई हिस्सों में फैल गया। कवर स्टोरी को जबर्दस्त प्रतिसाद मिला (और इसने मैगज़ीन में जान फूंक दी, जो तब तक बंद पड़ी थी), इसलिए नहीं कि तारिक ने गांधी की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया बल्कि इसलिए कि उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि क्या स्वतंत्र भारत को अब उनके विचारों के साथ जीने की आवश्यकता है या उसे अपने भविष्य की नए सिरे से कल्पना करना चाहिए। उन्होंने प्रासंगिकता पर सवाल उठाया था।
यह तीन दशक पहले की बात है। मजे की बात है कि काल्पनिक शत्रुओं से लड़ने की ओर झुकाव रखने के लिए ख्यात जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने पिछले हफ्ते अपने फेसबुक ब्लॉग में यही प्रश्न उठाया। किंतु जज महोदय के कहे में तारिक की भावनात्मक निष्ठा और बौद्धिक प्रखरता का अभाव था। इसकी बजाय वे गांधी पर मूर्खतापूर्ण, उतावला प्रहार कर बैठे। दुर्भाग्य से यह कुछ राजनीतिक हलकों में महात्मा को एक और ऐसे कांग्रेसी के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिशों से मिलता है, जो स्वतंत्रता हासिल करने का सारा श्रेय ले गए, जबकि असली संघर्ष तो दूसरों ने किया और इतिहास ने उन असली योद्धाओं की सुविधाजनक रूप से उपेक्षा कर दी।
जस्टिस काटजू के कई हीरो हैं। वे ज्यादातर भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सूर्या सेन और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारी हैं, जो भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़े और उन्होंने अपने प्राण अर्पित कर दिए। काटजू दलीलें देते हैं कि गांधीजी असल में ब्रिटिश एजेंट थे, जिन्होंने सत्याग्रह का बेतुका विचार (यह उनका कहना है, मेरा नहीं) अपना लिया ताकि स्वतंत्रता संघर्ष को उसके असली मार्ग से भटकाया जा सके। परिणाम? देश का रक्तरंजित विभाजन और एक स्वतंत्र राष्ट्र की बजाय दो लड़ते-झगड़ते राष्ट्र।
यह दलील सतही तौर पर सही लगती है, जैसी कि काटजू की ज्यादातर दलीलें इन दिनों नजर आती हैं। इसके बाद भी मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं होती यदि इन दलीलों का उद्‌देश्य गांधी के विचारों पर ताजा बहस खड़ी करने का होता। दलीलें यह देखने के लिए दीं होती कि क्या अब बिल्कुल अलग किस्म के वातावरण में गांधी के विचार अब भी प्रासंगिक हैं। इसकी बजाय लगता यही है कि जस्टिस काटजू उन लोगों की भीड़ में शामिल हो गए, जो हमारे लोकजीवन में गांधी के महत्व को जल्दी से मिटा देना चाहते हैं। ब्लॉग बहुत हल्का, मूर्खतापूर्ण और बुरी दलीलों से युक्त है। क्योंकि आप और मैं गांधी के बारे में कुछ भी सोचें, लेकिन उन्हें ऐसा ब्रिटिश एजेंट बताना, जिसका इरादा स्वतंत्रता हासिल करना नहीं बल्कि भारत को विभाजित करना था, बहुत ही मूर्खतापूर्ण लगता है- जस्टिस काटजू के मानदंडों से भी।
सारे स्वतंत्रता संघर्षों की तरह हमारा संघर्ष भी बहुत जटिल था। कई संघर्ष जारी थे और सब एकसाथ। प्रत्येक का अपना इतिहास था, अपनी प्रासंगिकता थी। यह गांधी ही थे, जो उन्हें एकजुट कर एक ऐसे समय ब्रिटिश शासकों के खिलाफ विजयी रणनीति में बदलने में कामयाब हुए, जब अंग्रेजों के सामने थोड़े ही विकल्प थे। यह सही है कि विभाजन बहुत बुरा सौदा था। हम सब यह जानते हैं। दंगों से बहुत रक्तपात हुआ और वह बहुत ही घिनौना दौर था। उन जख्मों के निशान अब भी मौजूद हैं। परंतु गांधीजी ने बहुत ही कुशलता से स्वतंत्रता की ओर हमारे मार्च का नेतृत्व किया। इससे इनकार कोई मूर्ख और कुंद दिमाग का व्यक्ति ही कर सकता है, क्योंकि यह ऐतिहासिक तथ्य है।
कई अद्‌भुत लोग थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाई थी। इसमें तो कोई संदेह ही नहीं, लेकिन यदि कोई एक व्यक्ति, एक चेहरा है, जो वाकई स्वतंत्रता संग्राम की पहचान है तो वे गांधी ही थे। उनके हत्यारे भी यह बात जानते थे। यही वजह थी कि हमले के लिए उन्होंने गांधी को चुना। उन्हें उनमें हिंदुओं को नीचा देखने के लिए मजबूर करने वाला व्यक्ति दिखाई दिया। मजे की बात है कि जस्टिस काटजू गांधी को ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं, जिन्होंने राम-राज्य, गोरक्षा, ब्रह्मचर्य और वर्णाश्रम धर्म जैसे विचार लाकर स्वतंत्रता संग्राम को जान-बूझकर नुकसान पहुंचाया। वे तर्क देते हैं कि इससे मुस्लिमों में अलगाव पैदा हो गया।
आज जब गोवा सरकार सुविधाजनक रूप से गांधी जयंती को अपने राष्ट्रीय अवकाशों की सूची में शामिल करना भूल जाती है, नाथूराम गोडसे के मंदिर देश के विभिन्न हिस्सों में उग आए हैं और द हिंदू की तो रिपोर्ट है कि हिंदू महासभा ने विभिन्न पूजास्थलों में रखने के लिए गांधी के हत्यारे की 500 प्रतिमाएं बुलवाई हैं तो गांधी पर जस्टिस काटजू के प्रहार मौजूदा व्यवस्था (और उसके क्षुद्र सहयोगियों) के साथ बड़ी सफाई से फिट होते हैं। फिर चाहे उनकी दलीलें बिल्कुल विपरीत क्यों न नजर आती हों। दोनों सांप्रदायिक सौहार्द्र को चोट पहुंचाते हैं, जो भारतीय समाज के हृदय स्थल में है, चाहे अब यह हमारी राजनीति के हृदय स्थल में शायद नहीं रहा है।

जहां तक जस्टिस काटजू का सवाल है, मैं उनसे सिफारिश करूंगा कि वे वही लिखें, जिसमें उनकी महारत है : राजनीति मेंखूबसूरत महिलाओं का महत्व और उर्दू शायरी। स्वाभाविक रूप से वे दोनों विषयों के विद्वान हैं। दोनों विषय उनके दिल के करीब हैं। गांधी पर राजनीतिक विचार को लेकर मौजूदा प्रदूषण से शायद वे अपने को अलग रखना चाहें, जो हाल में खोजे गए राष्ट्रवाद के दिखावे में किया जा रहा है। राजनीतिक विचार के इस प्रदूषण में जानकारी का उतना ही अभाव है, जितना वह घातक है। नहीं, मैं कोई कांग्रेस का गुर्गा नहीं हूं और न गांधी का बहुत बड़ा प्रशंसक। मैं तो सिर्फ स्वतंत्र भारत के नागरिक के रूप में यह देखना चाहता हूं कि गांधी की प्रतिष्ठा अचानक सत्ताधीश बन गए लोगों के मौजूदा समूह के रहते भी बनी रहे, जो राजनीति में आपके और मेरे प्रतिनिधित्व का दावा करते हैं। गांधी की उपलब्धियों को मलीन करना तथ्यों को झुठलाना होगा और केवल मूर्ख और फासीवादी ही ऐसा करेंगे