Wednesday, 1 April 2015

विलक्षण व्यक्तित्व का सम्मान @पवन के वर्मा

चूंकि अटल जी एक गंठबंधन की सरकार का नेतृत्व कर रहे थे, व्यावहारिकता की मांग थी कि राष्ट्रीय मामलों पर वे ऐसा रवैया अपनायें, जिससे उनके गंठबंधन के सहयोगी अलग-थलग न हों. लेकिन, दक्षिणपंथी पार्टी में स्वभाव से ही वे मध्यमार्गी थे. वे मानसिक रूप से उन लोगों से खुद को नहीं जोड़ सकते थे, जो धार्मिक घृणा की विभाजक और भड़काऊ भाषा बोलते थे.
शुक्रवार, 27 मार्च को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी शालीनतापूर्वक अटल बिहारी वाजपेयी के निवास पर उन्हें राष्ट्र का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान करने गये थे. इससे भारत गौरवान्वित हुआ है. अगर यह सम्मान यूपीए सरकार द्वारा पहले दिया जाता, तो मुङो व्यक्तिगत रूप से अधिक प्रसन्नता होती. कुछ मामले दलगत राजनीति से परे होते हैं. अटली जी का कद ऐसा है कि उन्हें भारत रत्न दिये जाने के लिए भाजपा के सत्ता में आने का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए था.
मुङो अटल जी को उनके प्रधानमंत्री रहते जानने का सौभाग्य और गौरव प्राप्त हुआ था. चूंकि मैं उस समय विदेश मंत्रलय में कार्यरत था, इस कारण कूटनीतिक मसलों पर उनके साथ विचार-विमर्श का अवसर भी प्राप्त हुआ था. लेकिन जिस कारण मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला और अकसर मिलता रहा, उसका कूटनीति से कोई लेना-देना नहीं था. अटल जी की इच्छा थी कि मैं उनकी कविताओं का अंगरेजी में अनुवाद करूं. इस संबंध में बातचीत करने के लिए प्रधानमंत्री निवास पर हुई बैठक को मैं कभी नहीं भूल सकता. रात के करीब आठ बजे थे, वे अपने चिर-परिचित पोशाक धोती-कुरते में औपचारिक अतिथि कक्ष में बैठे थे. जब उन्होंने अपना निवेदन रखा, तो मैंने कहा कि मुङो यह करने में बड़ी प्रसन्नता होगी, पर मेरी तीन शर्ते हैं. उन्होंने कहा, ‘कहिये’, और उनकी आंखें उस चमत्कारिक तरीके से चमक उठीं, जिसे उनसे मिलनेवाला कभी विस्मृत नहीं कर सकता.
मैंने कहा कि मैं उनकी ‘राजनीतिक’ कविताएं अनुदित करना पसंद नहीं करूंगा; दूसरा, बची हुई कविताओं में चयन मैं करूंगा; और अंतिम यह कि उन्हें तुरंत ‘हां’ नहीं करना चाहिए और निर्णय से पहले मेरे कुछ अनुवादों को देख लेना चाहिए. फिर, उनकी आंखों में चमक उभरी, और चेहरे पर मुस्कान लिये उन्होंने बस यही कहा, ‘मंजूर है’. और हुआ यह कि हिंदी में ‘इक्यावन कविताएं’ शीर्षक की मूल पुस्तक पेंग्विन द्वारा अंगरेजी संस्करण में ‘21 पोएम्स’ के नाम से छपी. पुस्तक के विमोचन के अवसर पर उन्होंने मेरी प्रति में अपने हाथों से लिखा : ‘पवन ने मेरी कविताओं का अनुवाद किया और उन्हें अधिक अर्थपूर्ण बना दिया’.
अटल जी के व्यक्तिगत संपर्क में आये लगभग हर किसी के पास उनके व्यक्तित्व की असाधारण गर्मजोशी के बारे में एक-दो कहानियां बताने के लिए जरूर होंगी. लगाव, परिहास, हाजिरजवाबी, हास्य, व्यंग्य और सुलभता के उनके गुण संयुक्त रूप से उन्हें उल्लेखनीय तौर पर आकर्षक व्यक्ति बनाते थे. परंतु, भारत रत्न पर उनका दावा इनसे अधिक ठोस कारणों पर आधारित है. पहला, वे अत्यंत उत्कृष्ट सांसद थे. भारत के लोकतांत्रिक वाद-विवाद के विकास में पांच दशकों तक उन्होंने जिस तरह से योगदान दिया, उसकी तुलना में बहुत कम उदाहरण मिलते हैं.
जब वे बोलते थे, तो सदन- और राष्ट्र- सुनता था, क्योंकि वे संतुलन और सत्व के साथ बोलते थे तथा जान-बूझ कर तीक्ष्ण और सतही दलीय भावना को दबा जाते थे, जो कि अब संसदीय बहसों की मुख्य विशेषता बनती जा रही है. अर्थभरे ठहरावों और महीन भाषिक दक्षता से लबरेज उनकी वक्तृत्व कला किसी भी श्रोता को मंत्रमुग्ध कर सकती थी. पहले जनसंघ, और फिर भारतीय जनता पार्टी के नेता के तौर पर वे मजबूत आलोचक हुआ करते थे.
लेकिन उन्होंने मसलों के गुण-दोषों के आधार पर अपना पक्ष रखा, और जब भी उन्हें लगा कि कोई मसला देशहित में है, तो उन्होंने सरकार का समर्थन किया. उन्होंने 1971 में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध में उनके नेतृत्व के लिए इंदिरा गांधी की प्रशंसा की जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ था. उन्होंने नरसिम्हा राव और डॉ मनमोहन सिंह का समर्थन किया, जब वे 1991 में आर्थिक सुधारों की ओर उन्मुख हो रहे थे. वे एक ऐसे नेता थे, जिनके लिए राष्ट्र पहले था, और राजनीतिक लाभ बाद में.
दूसरा, प्रधानमंत्री के रूप में, अटल जी की ऐतिहासिक भूमिका इस कोशिश में थी कि भाजपा को मुख्यधारा में लाया जाये. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विस्तृत संघ परिवार के रूढ़िवादी तत्वों को नियंत्रण में रखा, जिसके व्यावहारिक और ठोस कारण थे. चूंकि वे एक गंठबंधन की सरकार का नेतृत्व कर रहे थे, व्यावहारिकता की मांग थी कि राष्ट्रीय मामलों पर वे ऐसा रवैया अपनायें, जिससे उनके गंठबंधन के सहयोगी अलग-थलग न हों. लेकिन, दक्षिणपंथी पार्टी में स्वभाव से ही वे मध्यमार्गी थे. वे मानसिक रूप से उन लोगों से खुद को नहीं जोड़ सकते थे, जो धार्मिक घृणा की विभाजक और भड़काऊ भाषा बोलते थे.
यह सही है कि वे लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राम जन्मभूमि अभियान शुरू किये जाने के निर्णय में शामिल थे, किंतु यह बहस का विषय है कि वे बाबरी मसजिद के विध्वंस के पक्ष में थे या नहीं. इसी तरह 2002 में गुजरात नरसंहार के समय उन्होंने नरेंद्र मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह दी थी, हालांकि बाद में उन्होंने दबाव के कारण उनके मुख्यमंत्री बने रहने पर सहमति दे दी थी. आलोचक कह सकते हैं कि उन्हें झुकना नहीं चाहिए था, पर कुछ ही लोग इस पर संदेह करेंगे कि राजधर्म निभाने की उनकी सलाह सही थी.
तीसरा, एक स्तर पर, अटल जी की क्षमता यह थी कि वे अपनी पार्टी और संघ को पार कर सके थे. यह क्षमता विद्रोह में परिणत नहीं हुई, पर यह प्रतिबद्धता के उनके व्यक्तिगत साहस को भी न बुझा सकी. हल्के-फुल्के अंदाज में एक और व्यक्तिगत संस्मरण सुनाने की अनुमति लेते हुए बताना चाहूंगा कि एक बार गुनु (उनकी दत्तक पुत्री) कहीं मुझसे मिलीं और कहा कि बाप जी (अटल जी के लिए संबोधन) कह रहे थे कि ‘पवन जी तो अब हमारी स्पीच लिखते नहीं हैं. शायद वो हमारी पार्टी से नाराज हैं. तो उनसे कहना कि  हम अपनी पार्टी से कौन-सा बहुत खुश हैं!’ उनकी विनोदप्रियता, उनकी प्रतिबद्धता और उन्हें छोट दिखानेवाले लोगों की तुलना में उनके निश्चित बड़प्पन पर आधारित उनकी ऐसी टिप्पणियां उन्हें बाकियों से मजबूती से ऊंचे स्तर पर स्थापित करती हैं.
अटल जी की कविताओं को अनुदित करने के दौरान मुङो साइप्रस में उच्चायुक्त के रूप में पदस्थापित कर दिया गया. जाने से पहले मैं उनसे विदा लेने गया, तो उन्होंने रहस्यात्मक अंदाज में कहा : ‘आप चलिए, मैं आता हूं.’ मैंने तब उनकी टिप्पणी को गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन अगले वर्ष न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की बैठक में जाते हुए अटल जी साइप्रस की राजकीय यात्रा पर आये. जब मैंने उनकी आगवानी की, तो उन्होंने बड़ी मुस्कुराहट के साथ कहा : ‘मैंने अपना वादा पूरा किया’. अटल जी को भारत रत्न का सम्मान देकर राष्ट्र ने उनसे किया हुआ अपना विलंबित वादा पूरा किया है.

55 साल पहले... ऐसा ही कानून हुआ था निरस्त

सुप्रीम कोर्ट ने 55 साल बाद अभिव्यक्ति की आजादी से संबंधित किसी कानून को निरस्त किया है। इससे पहले 1960 में दिग्गज समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया की पहल पर यूपी विशेष अधिकार एक्ट की धारा 3 को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया था।
मामला : 1954 में उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने किसानों द्वारा खेतों में सिंचाई के लिए सरकारी नहरों से लिए जाने वाले पानी की दरों को बढ़ा दिया। उस वक्त फायरब्रांड समाजवादी नेता और कांग्रेस के मुखर विरोधी राम मनोहर लोहिया ने इसका विरोध शुरू किया। सोशलिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेट्री लोहिया फर्रुखाबाद पहुंचे। उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया और किसानों से बढ़ी हुई सिंचाई दरों को अदा करने से मना कर दिया। इस तरह के सविनय अवज्ञा आंदोलन से निपटने के लिए अंग्रेजों ने संयुक्त प्रांत विशेष अधिकार एक्ट की धारा 3 को पास किया था। इसके तहत यदि कोई व्यक्ति देनदारी को चुकाने से मना करने के लिए यदि उकसाता है तो वह आपराधिक मामला माना जाएगा। 1932 में कांग्रेस पार्टी द्वारा टैक्स अदायगी से मना करने वाले आंदोलनों को रोकने के लिए अंग्रेजों ने यह कानून बनाया था। 1954 में उत्तर प्रदेश की जीबी पंत सरकार ने लोहिया के खिलाफ इसी कानून का इस्तेमाल किया।
आरोप-प्रत्यारोप : लोहिया ने इसके खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा कि एक्ट की धारा 3 असंवैधानिक है क्योंकि यह उनकी अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करती है। सरकार ने तर्क दिया कि यह जनहित में संविधान द्वारा 19(2) के तहत दी गई ‘तार्किक प्रतिबंध’ के दायरे में आता है। उनके भाषणों के कारण कानून व्यवस्था बिगड़ने का खतरा है और अशांति फैलने के साथ हिंसक प्रदर्शन हो सकते हैं।
फैसला : 1960 में सुप्रीम कोर्ट ने लोहिया के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि इस तरह के काल्पनिक विचारों के आधार पर व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। साथ ही कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि धारा 3 के तहत लागू किए जाने वाले प्रतिबंध का कानून व्यवस्था से कोई संबंध या करीबी लेना-देना भी नहीं है। इसलिए 19 (2) के तहत यह तार्किक प्रतिबंध लागू किए जाने की श्रेणी में नहीं आता और विवादित धारा 3 को असंवैधानिक ठहरा दिया गया।

अटलजी को भारत रत्‍न : देशकाल से ऊपर सरल अटल @PRASHANT MISHRA

त्रिकालदर्शियों, मनीषियों और भारत के विधिवेत्ताओं ने जब भी 'भारत रत्न" के लिए सोचा होगा तो उनके मनोमस्तिष्क में अटल बिहारी वाजपेयी जरूर रहे होंगे। वाजपेयी का व्यक्तित्व वास्तव में अब 'भारत रत्न" से कहीं ज्यादा विराट हो गया है। वे दल विशेष, क्षेत्र विशेष, वर्ग विशेष, जाति या धर्म के राजनेता मात्र नहीं रहे। वे देश या काल विशेष के नेता हो गए हैं। वे जितने कोमल, सरल, सरस, सहृदय हैं, समय आने पर उतने ही दृढ़ और सख्त भी दिखे।
वाजपेयी आजीवन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर रहे। अपने दल और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता को उन्होंने कभी भी दलगत या विरोधी के प्रति द्वेष की सियासत में तब्दील नहीं होने दिया। इसीलिए वे सर्वस्वीकार्य नेता और अजातशत्रु के तौर पर जाने गए। स्वीकार्य क्यों न भी हों, जो व्यक्ति बलरामपुर की तपती दोपहरी से लेकर ग्वालियर की कड़कड़ाती ठंड में साइकिल पर निकल पड़ता हो, जिसने भारत की आत्मा को आत्मसात किया हो, चेन्न्ई में मरीना बीच में उसी जोश से, उसी भावात्मा के साथ मिलता हो, उसके लिए भारत में कोई बंधन नहीं था।
वह जितने वज्र रहे हैं, उतने ही सरस भी। जब दृढ़ता की जरूरत पड़ी तो पोखरण-2 था। उनको मालूम था कि प्रतिबंध आएंगे। मगर डरे नहीं। कश्मीर गए तो उन्होंने कहा कि इंसानियत से ही काम चलेगा। वास्तव में लोकतंत्र के असली वाहक वे ही हैं। लोकतंत्र उन्हीं जैसी जिजीविषा शक्ति का परिचायक है। नेता और राजनेता तो बहुत हैं, लेकिन अटल जैसा व्यक्तित्व पैदा करने में नियति को भी युग लगेंगे।
उनकी सदाशयता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। वाजपेयी की इस विरासत को शायद कोई भी हासिल नहीं कर सकता। उनके ऊपर कोई प्रतिद्वंद्विता का प्रहार भी नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत संबंधों को भी सम्मान देने का सबसे बड़ा उदाहरण उनके धुरविरोधी रहे चंद्रशेखर के लिए बलिया सीट से कभी भाजपा प्रत्याशी न खड़ा करना है। दोस्तों के वे दोस्त हैं, यह बात सभी दलों के नेता बिना किसी हिचक के कहते हैं।
राष्ट्रीय मुद्दों पर कभी उन्होंने दल या विचार को आड़े नहीं आने दिया। यही कारण था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या जनसंघ के विरोधी रहे देश् के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरूहों या फिर इंदिरा गांधी या फिर नरसिंह राव, सभी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब देश के प्रतिनिधित्व की बात आई तो अटल को अनदेखा कभी नहीं किया। यहां तक कि अब जब केंद्र में भाजपा की ही सरकार है तो उसको भी आईना दिखाने के लिए विरोधी दल सिर्फ अटलजी से ही तुलना करते हैं। यह सब इस बात का द्योतक है कि गैरभाजपा दलों के नेताओं के दिलों में भी अटल बिहारी वाजपेयी कितने गहरे उतरे हुए हैं।
वाकपटु और बिना किसी आक्रामकता के राजनीतिक मुद्दों पर संसद से लेकर सड़क तक वाजपेयी जितने प्रभावशाली और शक्तिशाली वार करते थे, उसकी मिसाल हर दल का सियासतदां देता है। ओजस्वी वक्ता होने के साथ-साथ उनके 'वन लाइनर" यानी एक लाइन में ही बड़ी-बड़ी बातें कह देने की उनकी अद्वितीय क्षमता और अदा का पूरा हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया कायल रही है। जटिल या तनावपूर्ण हालात में भी तर्कशील और कम शब्दों में दिल तक पैवस्त करने वाली उनकी पंक्तियां पूरा माहौल बदलने की क्षमता रखती थीं।
कारगिल युद्ध के अरसे बाद भारतीय क्रिकेट टीम जब पाकिस्तान में टेस्ट और वनडे श्रृंखला खेलने जा रही थी तो दोनों ही देशों के बीच भावनाएं चरम पर थीं। मगर वाजपेयी ने अपने दो जुमलों से ही पूरा माहौल हल्का कर दिया। उन्होंने खुद से मिलने आई भारतीय टीम से कहा कि 'क्रिकेट खेलने जा रहे हैं, युद्ध के मैदान में नहीं। मैच भी जीतो, दिल भी जीतो।"
उनके विशाल हृदय और साफगोई का गवाह मैं खुद भी हूं। पहली बार जब 13 दिन की सरकार बनी तो मैंने अपने आईएनएस दफ्तर से उनको फोन किया। मैंने कहा कि 'बधाई और मिठाई..।" वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि अटल ने इसे पूरा किया 'बधाई, मिठाई और विदाई..।" कुल मिलाकर वे इस ताजपोशी का अंजाम जानते थे और उससे जरा-भी चिंतित नहीं थे। ऐसे कई क्षणों के मेरे समेत तमाम लोग गवाह बने हैं। इसीलिए, जब मोदी सरकार उनको 'भारत रत्न" दे रही है तो लगता है कि वास्तव में 'भारत रत्न" का ही सम्मान हो रहा है।

अरविंद जीते तो 'आप' की हार @अनुराग चतुर्वेदी

भारत का मध्यवर्ग, जो राजनीति में नैतिक शक्ति और सार्थक बदलाव का पक्षधर है, इस समय भारी सदमे में है। दिल्ली विधानसभा के हाल ही में संपन्न् हुए चुनावों में जिस तरह से दिल्ली की आम जनता ने भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अस्वीकार किया, उससे यह विश्वास बना था कि भारतीय मतदाता परिपक्व है, भारत में लोकतंत्र मजबूत है और लोग पारदर्शितापूर्ण और जिम्मेदार सरकार चाहते हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी में जिस तरह से सार्वजनिक विवाद, गाली-गलौज और टीवी माध्यमों के सामने दोफाड़ हुई है, उससे दोनों धड़ों का नुकसान तो तय है, बदलाव की एक नई राजनीति की संभावनाओं को भी झटका लगा है। जनता एक बार फिर ठगी हुई और परास्त महसूस कर रही है।
क्या यह स्वराजवादियों बनाम कुजात-लोहियावादियों का वैचारिक मतभेद है? क्या यह शुभ की शक्ति बनाम अशुभ की शक्ति में चलने वाले निरंतर संघर्ष का रूप है? या एक आंदोलन से बने संगठन और बाद में बनी सरकार के ऐसे नेताओं-कार्यकर्ताओं की कहानी है, जिनमें एक-दूसरे के प्रति इतना अविश्वास था कि वे डंक मारने (स्टिंग ऑपरेशन) को हमेशा तत्पर रहते थे। गुप्त रिकॉर्डिंगों के इस दौर में सबसे खतरनाक रिकॉर्डिंग उमेश सिंह की साबित हुई, जिन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के श्रीमुख से ऐसी भाषा का उपयोग देश के प्रबुद्धजनों को सुनवाया, जिसकी उन्हें आशा नहीं थी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार आम आदमी पार्टी के लोकसभा चुनाव प्रत्याशी भी थे। समाजशास्त्री प्रो. कुमार वह चुनाव हार गए थे। देश में समाजवादी आंदोलन के दौरान प्रासंगिक विचारों का प्रसार करने वाले इस मृदुभाषी के खिलाफ जिस भाषा का प्रयोग अरविंद केजरीवाल ने किया, उससे लगा कि वे 'जर्मनविंग्स" के उस सह-पायलट की तरह हैं, जिसने अपने विमान को ही गिराकर न केवल आत्मघात किया, बल्कि अनेक निर्दोष यात्रियों की भी नाहक ही जान ले ली।
आम आदमी पार्टी भारतीय राजनीति में विकल्प की पार्टी में रूप में उभरी थी। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ गोलबंद हुए युवाओं, सेकुलरों और निम्न-मध्यवर्ग के सपनों की पार्टी बनी। दिल्ली के गरीब-गुरबे भी उसे अपनी पार्टी मानते हैं, क्योंकि वह उन्हें सुरक्षा और बिजली-पानी में राहत देने की बात करती है। यह भी माना गया था कि आंतरिक लोकतंत्र की वकालत करने वाली यह पार्टी लोकतांत्रिक है, पारदर्शी है और बुद्धिजीवियों को विशेष पसंद है। 
भारत की राजनीति में सिद्धांतकार और बुद्धिजीवी अमूमन हाशिये पर ही रहे हैं। आजादी के आंदोलन में जरूर 'परदेस-पलट" वकीलों ने हिस्सा लिया था। समाजवादी आंदोलन में आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने उच्च शिक्षा ग्रहण की थी। पर कालांतर में 'सुप्रीमो-संस्कृति" विकसित होने के कारण बुद्धिजीवियों को केवल घोषणापत्र बनाने के लिए रखा जाने लगा। जनता पार्टी, जो आपातकाल के अत्याचारों के बाद विपक्षी दलों के तपे-तपाए नेताओं की पार्टी थी, बुद्धिजीवियों (वकील, प्राध्यापक, पत्रकार) को महत्ता देती थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद इसी पार्टी ने मधु लिमये, सुरेंद्र मोहन और अरुण शौरी को दरकिनार कर दिया। किसी भी राष्ट्रीय पार्टी की कार्यकारिणी में सिर्फ अंतिम स्थान पर उन्हें बमुश्किल जगह मिलती। ऐसे में यूपीए-2 में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ जब नागरिक असंतोष बढ़ने लगा तो एनजीओ और थिंक टैंकों में चले गए बुद्धिजीवी फिर से मुख्यधारा में आने की कोशिश करने लगे।
लेकिन चुनावों का गणित एक अलग समीकरण है। आम आदमी पार्टी को मान्यता आंदोलन के जरिये मिली और जिस तरह से नामी वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में जन अधिकार अपीलों को माध्यम बनाकर टेलीकॉम, कोयला जैसे क्षेत्रों में होने वाले सरकारी भ्रष्टाचार को सार्वजनिक किया, उससे आम आदमी पार्टी बुद्धिजीवियों में, खासतौर पर स्वतंत्र वामपंथियों में चर्चित हो गई। चुनाव के लिए नेता के रूप में अरविंद केजरीवाल का चेहरा सामने लाया गया। आंदोलन से जन्मे संगठन और चुनावी जरूरतों के लिए बने नेता ने पुरानी और जमी-जमाई राजनीति को दिल्ली में एक नहीं, दो बार सफलतापूर्वक चुनौती दी। हिंदी पट्टी की सहानुभूति भी इस पार्टी को मिली।
केजरीवाल ने अंग्रेजी के प्रयोग से दूरी बनाए रखी, लेकिन तकनीक को अपनाने में कभी कोई शर्म नहीं दिखाई। सोशल मीडिया, स्टिंग ऑपरेशन, टीवी डिबेट को उन्होंने नए राजनीतिक हथियार बना दिया। लेकिन राजनीति के पुराने घिसे-पिटे तरीकों से वे खुद को आखिरकार बचा नहीं पाए। पार्टी में अकेले वे ही सुप्रीमो हों, उनके बराबर के नेता न हों, केवल अनुयायी हों, भक्त हों, यह दिखने लगा। दिल्ली में टिकट बेचे जाने की खबरें भी आईं। कई आपराधिक इतिहास रखने वाले उम्मीदवार भी चुनाव जीत गए। फर्जी डिग्रीधारी को ही कानून मंत्री बना दिया गया। ऐसे में पार्टी में तो फूट होना ही थी। आंतरिक लोकपाल और उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी चंदा तक पार्टी के भीतर और बाहर चर्चाओं में रहा।
दिल्ली चुनावों में जीत के बाद आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व एक नई वैकल्पिक संरचना बनाने में जुट गया था। पहले विचारवादी पत्रकार राजनीतिक गतिविधियों से जुड़कर पार्टी में रहते थे, फिर पार्टी से हट जाने पर फिर पत्रकार बन जाते। लेकिन आम आदमी पार्टी में आने से पहले पत्रकार खासे अमीर बने और बाद में पार्टी के सदस्य। आम आदमी पार्टी ने नौकरशाहों, टीवी एंकरों व वकीलों को शीर्ष नेतृत्व दिया और अभी तक तो यह प्रयोग नाकाम रहा है।
क्या योगेंद्र यादव ने भारत में शोषण के खिलाफ चल रहे जनांदोलन को तितर-बितर किया? जिस तरह मेधा पाटकर को मुंबई में चुनाव लड़ाया गया, क्या वह सही था? क्या आम आदमी पार्टी की कोई वैचारिक प्रतिबद्धता है भी? क्या हर समस्या का निदान भ्रष्टाचार-रहित समाज है? आम आदमी पार्टी में भूषण परिवार के तीन सदस्यों (पिता-पुत्र एवं पुत्री) की संदिग्ध भूमिका नहीं थी? क्या इस दल में सत्ता-संघर्ष शुरू से ही नहीं था?
आम आदमी पार्टी में जारी सार्वजनिक तमाशे से खफा होकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने तो पार्टी से त्यागपत्र दे दिया, लेकिन दिल्ली के विधायक कोई बड़ी बगावत नहीं कर पाएंगे। केजरीवाल समर्थक यह सोच सकते हैं कि यदि सरकार सुशासन से चले तो मतदाता पांच वर्ष बाद यह उठापटक भूल जाएंगे, लेकिन आम आदमी पार्टी की नैतिक शक्ति अब निस्तेज हो गई है। पार्टी के कार्यकर्ता निराश हैं और एक-दूसरे के प्रति अविश्वास चरम पर है। ऐसी स्थिति में यदि नए आंदोलन से उपजी नई पार्टी एक और पुरानी स्थापित पार्टी में बदल सकती है तो उसका हाल उन क्षेत्रीय दलों जैसा ही हो सकता है, जो लोकप्रियता के चलते शिखर पर पहुंचे, लेकिन आपसी अविश्वास, सत्ता-संघर्ष, अहंकार के कारण फिर से शून्य पर आ गए। केजरीवाल यदि एकछत्र होकर ही अपनी पार्टी और सरकार चलाना चाहते हैं तो देश के लोकतंत्र के लिए यह शुभ नहीं होगा। यह आम आदमी पार्टी के बुरे दिनों की शुरुआत है।

क्या मोदी बनेंगे भारत के ली कुआन? @ महेंद्र वेद

आधुनिक सिंगापुर के संस्थापक ली कुआन यिवू के अंतिम संस्कार में शामिल होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वास्तव में बहुत सूझबूझ का परिचय दिया है। इससे निश्चित ही सिंगापुर से हमारे रिश्ते और मधुर होंगे। अलबत्ता, यह तो अभी पता नहीं चल पाया है कि मोदी की कभी ली कुआन से भेंट हुई थी या नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि मोदी इससे पहले भी सिंगापुर की यात्रा कर चुके हैं और अनेक भारतीयों की तरह वे इस सिटी-स्टेट की सफलता की दास्तान से रोमांचित होते रहे हैं। ली भी कई बार भारत की यात्रा कर चुके थे। आखिरी बार वे वर्ष 2011 में भारत आए थे, जिसके बाद उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा, वरना मोदी से उनकी मुलाकात अवश्य होती।
जब एशिया में औपनिवेशिकता से मुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी, तब वियतनाम के हो ची मिन्ह और श्रीलंका के जेआर जयवर्धने और भंडारनायके के साथ ही ली कुआन ने भी भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। पं. जवाहरलाल नेहरू से तो उनकी मित्रता भी थी, हालांकि नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति को वे अव्यावहारिक मानते थे। लेकिन इसके बावजूद ली कुआन के लिए भारत इसलिए हमेशा खास बना रहा, क्योंकि सिंगापुर का नामकरण मूलत: संस्कृत शब्द 'सिंहपुरा" के आधार पर हुआ है। जब तक सिंगापुर मलय-संघ से पृथक होता और ली उसके प्रथम प्रधानमंत्री बनते, तब तक नेहरू की मृत्यु हो चुकी थी और ब्रितानी सिंगापुर ही नहीं, इस पूरे क्षेत्र से अपनी सेनाओं को वापस बुला रहे थे। तब ली ने प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को पत्र लिखकर सुरक्षा की मांग की थी और शास्त्री ने भी तुरंत सेंट्रल रिजर्व पुलिस का एक दल सिंगापुर रवाना कर दिया। दल में शामिल किरपा राम आगे चलकर सिंगापुर के सैन्यप्रमुख बने।
लेकिन भारत की अपनी कूटनीतिक सीमाएं भी थी। वह एक ऐसे क्षेत्र में एक सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बनना चाहता था, जहां चीन और पश्चिमी ताकतें अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही हों। वह इस क्षेत्र में कम्युनिज्म से संघर्ष कर रही ताकतों से दूरी बनाए रखना चाहता था। खुद ली कुआन में तानाशाही प्रवृत्तियां थीं और उन्होंने राजनीतिक विपक्ष को हाशिये पर कर दिया था। अपनी कठोर कार्यशैली को उन्होंने सिंगापुर की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया था। शायद यही कारण रहा होगा कि जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तो ली कुआन ने उसका समर्थन किया था, जबकि दुनियाभर की लोकतांत्रिक शक्तियां तब इसका विरोध कर रही थीं। उन्होंने वर्ष 1971 में बांग्लादेश युद्ध में भारत द्वारा निर्णायक हस्तक्षेप किए जाने की भी सराहना की थी।
इसके बावजूद भारत से उन्हें जो उम्मीदें थीं, वे बहुत हद तक पूरी नहीं हो सकीं। उन्होंने भारत को 'अनर्जित महानता" का देश भी कहा था। उन्हें इस बात को स्वीकार करने में बहुत समय लगा कि भारत सिंगापुर से कहीं विस्तृत, व्यापक और विविधतापूर्ण देश है और उसे विकास के किसी खांचे में आसानी से फिट नहीं किया जा सकता। वे इस बात को देर से समझे कि भारत में 20 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं, जबकि चीन की 90 फीसदी आबादी एक ही भाषा बोलती है। उन्होंने कहा था कि 'भारत अपनी नस्लीय विविधताओं और गठबंधन सरकारों को जन्म देने वाले बहुदलीय लोकतंत्र के अनुरूप ही आगे बढ़ सकेगा, जिसमें निर्णय लेना बहुत कठिन हो जाता है, लेकिन इसके बावजूद भारत दौड़ में पिछड़ रहा है और उसे थोड़ी फुर्ती दिखानी होगी।"
ली कुआन ने सुझाव दिया था कि भारत आसियान (एसोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस) देशों का संस्थापक सदस्य बने, लेकिन शीतयुद्ध के उस दौर में भारत ने जितनी कूटनीतिक भूलें कीं, उनमें से एक यह भी थी कि उसने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। बाद में यह क्षेत्र 'टाइगर इकोनॉमीज" के नाम से जाना गया, लेकिन इसमें अपना दबदबा बनाने का अवसर भारत ने गंवा दिया।
नरसिंह राव ने जो 'लुक ईस्ट" पॉलिसी बनाई थी, उसी को अब नरेंद्र मोदी अधिक गर्मजोशी के साथ 'एक्ट ईस्ट" पॉलिसी कहकर पुकार रहे हैं। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह दोनों ही खुद को ली कुआन का शिष्य मानते थे और हालांकि वे यह बात जानते थे कि भारत सिंगापुर नहीं है, इसके बावजूद सिंगापुर-मॉडल की अहमियत से वे इनकार नहीं करते थे। हमें भूलना नहीं चाहिए कि चीन जैसे विशाल देश ने भी ली के सिंगापुर-मॉडल से काफी प्रेरणा ली है।
क्या नरेंद्र मोदी भारत के ली कुआन बन सकते हैं और क्या वे सिंगापुर की सफलता से कुछ जरूरी सबक सीख सकते हैं? वास्तव में मोदी और ली में अनेक समानताएं हैं। ली की तरह मोदी भी तत्पर प्रशासक, कुशल वक्ता और व्यावहारिक हैं। दोनों ही विकास के मॉडल को तरक्की का मूल मानते हैं। अपने आलोचकों से बहस करने का मोदी का अपना ही तरीका है। वे उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश करने से भी नहीं कतराते। जिस तरह से उनकी पार्टी जम्मू-कश्मीर में सत्ता में साझेदार है, उसको देखकर पता चलता है कि मोदी दूर की सोचने वाले राजनेता हैं। और जिस तरह से उन्होंने ओबामा, शी जिनपिंग और शिंजो एबे के साथ व्यवहार किया, उससे पता चलता है कि उन्हें विदेशी दोस्तों के साथ बराबरी का सलूक करना आता है। लेकिन मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें विकास की डगर पर अडिग बने रहना होगा। इसके लिए सबसे पहले तो उन्हें अपनी ही पार्टी में मौजूद उन पुरातनपंथियों से निपटना होगा, जिनका दृष्टिकोण मध्यकालीन है।
मोदी के पास इतनी मानसिक दृढ़ता है कि वे भारत के ली कुआन बन सकें। वे भारत को एक मध्यमार्गी गुटनिरपेक्ष देश के बजाय एक वैश्विक महाशक्ति बनाना चाहते हैं। लेकिन वे महज प्रधान शिल्पकार हैं और उनके पास प्रोजेक्ट इंडिया के लिए एक बहुत अच्छी डिजाइन है, लेकिन उन्हें अन्य कुशल शिल्पकारों की भी जरूरत है। उनके आसपास जो लोग मौजूद हैं, उन्हें उठकर मोदी के विजन के स्तर तक पहुंचना होगा

जमीन किसान की या राज्य की? @शंभूनाथ शुक्ल

आज भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध हो रहा है। पर अगर आजादी के तत्काल बाद सरकार किसान और उसकी जमीन के संदर्भ में अंग्रेजों के पूर्व की स्थिति बहाल कर देती, तो यह स्थिति पैदा नहीं होती। यानी आजादी के बाद की कांग्रेसी सरकारें भी विकास के लिए वही नीति अपनाना चाहती थी, जो अंग्रेजों की थी। अंग्रेजों से पहले राजाओं, सुल्तानों व मुगलों के समय तक किसान ही जमीन का मालिक होता था और राज्य किसानों से कर लिया करता था। कृषि भूमि पर अमूमन ग्राम समुदाय, गांव में बसे कुल या भातृसंघ का अधिकार होता था।

पर जैसे ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहले प्लासी की लड़ाई जीती, और बाद में बक्सर की लड़ाई में बंगाल, अवध व दिल्ली के बादशाह की साझा सेना का पतन किया, वैसे ही गंगा-जमना के उपजाऊ मैदान का बड़ा हिस्सा सीधे उसकी निगरानी में आ गया और उसने भू राजस्व के नए कानून बनाकर जमीन से किसानों की मिल्कियत समाप्त कर दी। कंपनी ने पहले की उपज कर नीति बदल दी और उपज के बदले नकद भुगतान की मांग करने लगे। नतीजतन ग्राम समुदाय अंग्रेजों के जमींदारों को नकद कर देने लगे। इससे जमीन से किसान की मिल्कियत तो गई ही, नकद मुद्रा के अभाव के कारण किसान की फसल मिट्टी के मोल जाने लगी।

कंपनी की इस नई कर नीति के कारण नए-नए हिंदुस्तानी और अंग्रेज जमींदार जमीन अपने नाम लिखाने लगे और मूल किसान उन्हीं के घर पर टहल-सेवा में लग गए। अवध की उपजाऊ जमीनें और बंगाल के सुसिंचित धान के कटोरे इन नए जमींदारों के पास चले गए। उस समय का वर्णन करते हुए सर जॉन स्टार्थी ने लिखा है-निजी संपत्ति में भूमि की मात्रा बढ़ाने की हमारी नीति रही है, जबकि पिछली सरकारों ने इसे बमुश्किल मान्यता दी।

जमीन पर मिल्कियत न होने से किसान अब न कर्ज ले सकता था, न उसे चुकता कर पाने की स्थिति में होता था। नतीजतन सीमांत किसान मजदूर बनते चले गए और किसानी के अभाव में गांव के पारंपरिक शिल्पी समाज के लोग बदहाली में शहर जाकर बसने लगे। बुनकरी का सारा काम-धंधा चौपट हो गया। लॉर्ड विलियम बेंटिक ने लिखा है, भारत के किसानों की जैसी दुर्दशा का और कोई उदाहरण वाणिज्यिक इतिहास में मिलना मुश्किल है। बुनकरों की हड्डियों से भारत के मैदानों की धुलाई हो रही है। मलमल के लिए पूरी दुनिया में मशहूर ढाका की जनसंख्या 1827 से 1837 के बीच डेढ़ लाख से घटकर मात्र बीस हजार ही रह गई है। बंगाल में जो मालगुजारी 1764-65 में 8,11,000 पाउंड थी, वह 1765-66 में बढ़कर 17,40,000 पाउंड हो गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि जमीन से मिल्कियत खत्म करने की नीति ने किसानों को बर्बाद किया। इसी कारण साहूकारी व्यवस्था को बढ़ावा मिला। आजादी के बाद कहने को किसान जमीन का मालिक बना, पर एक तरह का शिकमी मालिक ही। उससे कलेक्टर द्वारा निर्गत धारा 4 का विरोध करने का हक छीन लिया गया। धारा 4 के विरुद्ध जो आपत्तियां मांगी जाती हैं, वे इतनी लचर हैं कि किसान उसे साबित नहीं कर पाते और उनकी जमीनें कभी नगर निकायों द्वारा, कभी प्रदेश व केंद्र सरकारों द्वारा अधिगृहीत कर ली जाती हैं। जब तक किसान को जमीन का मौरूसी हक अंग्रेजों की पूर्व स्थिति से बहाल नहीं होता, तब तक किसान की जमीन जाती रहेगी। जमीन का मौरूसी हक हासिल करने के अलावा किसानों को यह मांग भी करनी चाहिए कि नकदी के बजाय सरकारें उनकी उपज को मुद्रा मानकर मूल्य निर्धारण करे, ताकि प्राकृतिक आपदाओं से नष्ट हुई फसल की भरपाई उसे खुद-ब-खुद हो जाए।

मैं न्यूजीलैंड के साथ हूं @रामचंद्र गुहा

बीती सदी के साठ के दशक में अपने बचपन के दिनों के दौरान मैं वेस्ट इंडीज और न्यूजीलैंड को विश्व क्रिकेट के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की तरह देखता था। दोनों अंग्रेजी भाषी थे और दोनों की ज्यादातर द्वीपीय आबादी ईसाइयों की थी। जनसंख्या के मामले में इन दोनों की तुलना भारत के किसी मध्यम आकार के शहर से की जा सकती थी। भौगोलिक और जनांकिकीय समानताएं दोनों टीमों को काफी हद तक समान बनाती थीं। हां, क्रिकेटीय कौशल के मामले में जरूर दोनों टीमें एक-दूसरे से बिल्कुल उलट थीं। जहां वेस्ट इंडीज निर्विवाद तौर पर विश्व चैंपियन थी, वहीं न्यूजीलैंड अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की सबसे कमजोर टीम थी। दूसरी ओर मेरी टीम भारत थी, जिसके वेस्ट इंडीज से हरदम हारने, और न्यूजीलैंड से हमेशा जीतने की उम्मीद रहती थी। शायद इसी वजह से यह अप्रत्याशित नहीं ‌था कि वह कीवी ही थे, जिनके खिलाफ हमने विदेशी जमीन पर अपनी पहली टेस्ट सीरीज जीती थी। हालांकि 17 फरवरी, 1976 से पहले तक भारतीय क्रिकेट के प्रशंसक कीवियों की क्रिकेट और उनके खिलाड़ियों को बेहद हलके ढंग से लेते ‌थे। दरअसल, उसी दिन समंदर पार से यह खबर आई थी कि हमें एक टेस्ट मैच में उस टीम के खिलाफ पारी की हार का सामना करना पड़ा, जिसे अब तक हम दुनिया की सबसे बदतर टीम मानते थे। एक अनजाने से युवा खिलाड़ी आर जे हेडली ने वेलिंगटन के बेसिन रिजर्व में केवल 23 रन देकर हमारे सात विकेट ‌चटकाए थे, और इसकी बदौलत भारत की टीम तीन विकेट पर 75 के स्कोर से आगे खेलते हुए 81 पर ऑल आउट हो गई थी।

वैसे, अतीत में न्यूजीलैंड टीम में बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं। इनमें बाएं हाथ से बल्लेबाजी करने वाले मार्टिन डोनेली और बर्ट सटक्लिफ के अलावा जे ए कोवी और डिक मोत्ज जैसे बेहतरीन स्विंग गेंदबाज शामिल थे। इन सभी खिलाड़ियों की अपने समय के विश्व एकादश में शामिल होने की दावेदारी बनती थी। मगर महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से किसी से भी उम्मीद की जा सकती थी, कि वह विपक्षी टीम के खिलाफ न्यूजीलैंड को जीत दिला दे। दरअसल, वह रिचर्ड हेडली थे, जिन्होंने पहली बार कीवियों को यह एहसास कराया कि अगर दिन और परिस्थितियां माकूल हों, तो वे वाकई टेस्ट मैच जीत सकते थे। युवावस्‍था में एक लापरवाह तेज गेंदबाज रहे हेडली ने परिपक्व होने पर गेंदबाजी के तमाम कौशलों का विकास किया। वह गेंद को दोनों तरफ सीम और स्विंग करा सकते थे, बेहतरीन यॉर्कर फेंकते ‌थे और गेंद पर उनका नियंत्रण देखने लायक होता था। इतना ही नहीं, वह निचले क्रम के एक उपयोगी बल्लेबाज भी थे। खेल पर निर्णायक छाप छोड़ने वाले न्यूजीलैंड के दूसरे खिलाड़ी मार्टिन क्रो थे। हेडली की तरह उनका भी एक बड़ा भाई था, जिसने टेस्ट क्रिकेट भी खेला। कैरियर के अच्छे दिनों में जिस तरह हेडली दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज माने जाते थे, उसी तरह 1980 के दशक के कुछ वर्षों के दौरान क्रो को खेल के प्रतिष्ठित जानकार विश्व का सबसे अच्छा बल्लेबाज मानते थे। वह विकेट के चारों ओर स्ट्रोक खेल सकते थे, धीमी या तेज, वह हर तरह की गेंदबाजी का सामना करने में सक्षम थे और पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ खेलते वक्त तो उनका कोई सानी ही नहीं था। स्विंग और ‌रिवर्स स्विंग के मास्टर वसीम अकरम ने उनके बारे में कहा था कि उनकी गेंदों को क्रो से बेहतर किसी भी बल्लेबाज ने नहीं खेला।

मैंने रिचर्ड हेडली को कभी लाइव नहीं देखा, मगर उनकी गेंदबाजी के कई स्पेल मैंने रेडियो पर सुने हैं, और कुछ को टेलीविजन पर देखा भी है। हां, मार्टिन क्रो को खेलते हुए दो बार मैंने लाइव देखा है, मगर अफसोस की बात है कि दोनों ही बार क्रो भारत में विवादास्पद अंपायरिंग का शिकार बने। 1987 के विश्व कप के दौरान बंगलूरू में भारत के खिलाफ खेलते हुए क्रो को मनिंदर सिंह की गेंद पर स्टंप आउट दिया गया, जबकि रिप्ले में साफ था कि जब विकेटकीपर ने स्टंप बिखेरे, तब गेंद उसके हाथ में नहीं थी। आठ वर्ष बाद इसी मैदान पर उन्हें अनिल कुंबले की गेंद पर पगबाधा आउट दिया गया, जबकि गेंद न केवल ऊंची थी, बल्कि साफ तौर पर लेग स्टंप के बाहर भी जा रही थी।

तीसरे महान कीवी खिलाड़ी, जो ज्यादा पुराने भी नही हैं, क्रिस केर्यन्स थे। मैदान के बाहर उनका आचरण कैसा भी हो, मगर इसमें संदेह नहीं कि वह कमाल के क्रिकेटर थे और हवा में शॉट खेलना उनकी खूबी थी। मुझे इंग्लैंड में हुआ एक मैच याद आता है, जो मैं टेलीविजन पर देख रहा था। उस मैच में केर्यन्स ने बाएं हाथ के धीमे गेंदबाज फिल टफनेल की खूब ठुकाई की थी। उनके एक ओवर के दौरान केर्यन्स ने क्रीज से बाहर आते हुए शॉट खेली, मगर गेंद ठीक से उनके बल्ले पर नहीं आई। इसके बावजूद गेंद ने सीमा रेखा को थोड़ी ही दूरी से पार किया और उन्हें छह रन मिले। अगली गेंद पर उन्होंने फिर क्रीज से बाहर आते हुए गजब की टाइमिंग के साथ गेंद पर प्रहार किया, और स्टंप पर लगे माइक्रोफोन के जरिये कीवी लहजे में उनकी आवाज सुनाई दी, 'दैट्स बैटर'। वह वाकई बेहतरीन शॉट थी, क्योंकि गेंद मैदान को पार करते हुए पार्किंग स्‍थल पर गिरी थी।

हेडली, क्रोव और केर्यन्स जैसे क्रिकेटरों की बदौलत कीवी क्रिकेटरों के भीतर यह एहसास जागा कि वे भी भारत, पाकिस्तान, इंग्लैंड या फिर ऑस्ट्रेलिया को हरा सकते हैं। यह इन खिलाड़ियों की ही विरासत है, जिसने न्यूजीलैंड की वर्तमान टीम को ताकत दी है। यह आत्मविश्वास सबसे ज्यादा उनके कप्तान ब्रैंडन मैककुलम में दिखता है। उनकी बल्लेबाजी की बात करें, तो पहले दस ओवर में मैच का नतीजा निर्धारित करने की क्षमता के मामले में वह सनथ जयसूर्या तक को पीछे छोड़ चुके हैं। वहीं, अगर उनकी कप्तानी पर गौर किया जाए, तो बल्लेबाजी कर रही टीम के रनों का प्रवाह रोकने के बजाय लगातार विकेट चटकाने को लेकर अपने उत्साह को लेकर वह स्टीव वॉ से भी आगे दिखते हैं।

इस विश्व कप में कीवी टीम ने अपनी प्रतिभाओं का शानदार प्रदर्शन किया है। फिर चाहे वह मैककुलम के अलावा इलियट, विलियम्सन, टेलर और गु‌प्टिल की बल्लेबाजी हो, बोल्ट और साउदी की स्विंग गेंदबाजी हो, या फिर हमेशा युवा दिखने वाले डैनियल वेटोरी की फिरकी गेंदबाजी हो। टीम का क्षेत्ररक्षण बेहतरीन रहा है। फिर, जैसा कि कभी वेस्ट इंडीज के बारे में कहा जाता था, न्यूजीलैंड की जनसंख्या से तुलना करें, तो उनकी उपलब्धियां चौंकाने वाली हैं। इस देश में सात करोड़ भेड़ें हैं, जबकि लोगों की संख्या 50 लाख से भी कम है। मतलब यह कि न्यूजीलैंड की पूरी आबादी अकेले नोएडा में समा सकती है, जब‌कि उनके क्रिकेटर पूरी दुनिया को जीतने का माद्दा रखते हैं।

विश्व कप के फाइनल वाली सुबह यह कॉलम प्रकाशित होगा। मगर आज के मैच का नतीजा कुछ भी हो, मेरे लिए न्यूजीलैंड टूर्नामेंट की सर्वश्रेष्ठ टीम है। अब तक उन्होंने रोमांचकारी क्रिकेट खेला है। इतना ही नहीं, लंबे समय से क्रिकेट की दुनिया की कथित महाशक्तियों ने न्यूजीलैंड को जिस हल्के ढंग से लिया है, मैदान पर अपनी उपलब्धियों के जरिये मैककुलम की टीम ने उसका मुंहतोड़ जवाब दे दिया है।