Wednesday, 1 April 2015

अरविंद जीते तो 'आप' की हार @अनुराग चतुर्वेदी

भारत का मध्यवर्ग, जो राजनीति में नैतिक शक्ति और सार्थक बदलाव का पक्षधर है, इस समय भारी सदमे में है। दिल्ली विधानसभा के हाल ही में संपन्न् हुए चुनावों में जिस तरह से दिल्ली की आम जनता ने भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अस्वीकार किया, उससे यह विश्वास बना था कि भारतीय मतदाता परिपक्व है, भारत में लोकतंत्र मजबूत है और लोग पारदर्शितापूर्ण और जिम्मेदार सरकार चाहते हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी में जिस तरह से सार्वजनिक विवाद, गाली-गलौज और टीवी माध्यमों के सामने दोफाड़ हुई है, उससे दोनों धड़ों का नुकसान तो तय है, बदलाव की एक नई राजनीति की संभावनाओं को भी झटका लगा है। जनता एक बार फिर ठगी हुई और परास्त महसूस कर रही है।
क्या यह स्वराजवादियों बनाम कुजात-लोहियावादियों का वैचारिक मतभेद है? क्या यह शुभ की शक्ति बनाम अशुभ की शक्ति में चलने वाले निरंतर संघर्ष का रूप है? या एक आंदोलन से बने संगठन और बाद में बनी सरकार के ऐसे नेताओं-कार्यकर्ताओं की कहानी है, जिनमें एक-दूसरे के प्रति इतना अविश्वास था कि वे डंक मारने (स्टिंग ऑपरेशन) को हमेशा तत्पर रहते थे। गुप्त रिकॉर्डिंगों के इस दौर में सबसे खतरनाक रिकॉर्डिंग उमेश सिंह की साबित हुई, जिन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के श्रीमुख से ऐसी भाषा का उपयोग देश के प्रबुद्धजनों को सुनवाया, जिसकी उन्हें आशा नहीं थी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार आम आदमी पार्टी के लोकसभा चुनाव प्रत्याशी भी थे। समाजशास्त्री प्रो. कुमार वह चुनाव हार गए थे। देश में समाजवादी आंदोलन के दौरान प्रासंगिक विचारों का प्रसार करने वाले इस मृदुभाषी के खिलाफ जिस भाषा का प्रयोग अरविंद केजरीवाल ने किया, उससे लगा कि वे 'जर्मनविंग्स" के उस सह-पायलट की तरह हैं, जिसने अपने विमान को ही गिराकर न केवल आत्मघात किया, बल्कि अनेक निर्दोष यात्रियों की भी नाहक ही जान ले ली।
आम आदमी पार्टी भारतीय राजनीति में विकल्प की पार्टी में रूप में उभरी थी। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ गोलबंद हुए युवाओं, सेकुलरों और निम्न-मध्यवर्ग के सपनों की पार्टी बनी। दिल्ली के गरीब-गुरबे भी उसे अपनी पार्टी मानते हैं, क्योंकि वह उन्हें सुरक्षा और बिजली-पानी में राहत देने की बात करती है। यह भी माना गया था कि आंतरिक लोकतंत्र की वकालत करने वाली यह पार्टी लोकतांत्रिक है, पारदर्शी है और बुद्धिजीवियों को विशेष पसंद है। 
भारत की राजनीति में सिद्धांतकार और बुद्धिजीवी अमूमन हाशिये पर ही रहे हैं। आजादी के आंदोलन में जरूर 'परदेस-पलट" वकीलों ने हिस्सा लिया था। समाजवादी आंदोलन में आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण ने उच्च शिक्षा ग्रहण की थी। पर कालांतर में 'सुप्रीमो-संस्कृति" विकसित होने के कारण बुद्धिजीवियों को केवल घोषणापत्र बनाने के लिए रखा जाने लगा। जनता पार्टी, जो आपातकाल के अत्याचारों के बाद विपक्षी दलों के तपे-तपाए नेताओं की पार्टी थी, बुद्धिजीवियों (वकील, प्राध्यापक, पत्रकार) को महत्ता देती थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद इसी पार्टी ने मधु लिमये, सुरेंद्र मोहन और अरुण शौरी को दरकिनार कर दिया। किसी भी राष्ट्रीय पार्टी की कार्यकारिणी में सिर्फ अंतिम स्थान पर उन्हें बमुश्किल जगह मिलती। ऐसे में यूपीए-2 में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ जब नागरिक असंतोष बढ़ने लगा तो एनजीओ और थिंक टैंकों में चले गए बुद्धिजीवी फिर से मुख्यधारा में आने की कोशिश करने लगे।
लेकिन चुनावों का गणित एक अलग समीकरण है। आम आदमी पार्टी को मान्यता आंदोलन के जरिये मिली और जिस तरह से नामी वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में जन अधिकार अपीलों को माध्यम बनाकर टेलीकॉम, कोयला जैसे क्षेत्रों में होने वाले सरकारी भ्रष्टाचार को सार्वजनिक किया, उससे आम आदमी पार्टी बुद्धिजीवियों में, खासतौर पर स्वतंत्र वामपंथियों में चर्चित हो गई। चुनाव के लिए नेता के रूप में अरविंद केजरीवाल का चेहरा सामने लाया गया। आंदोलन से जन्मे संगठन और चुनावी जरूरतों के लिए बने नेता ने पुरानी और जमी-जमाई राजनीति को दिल्ली में एक नहीं, दो बार सफलतापूर्वक चुनौती दी। हिंदी पट्टी की सहानुभूति भी इस पार्टी को मिली।
केजरीवाल ने अंग्रेजी के प्रयोग से दूरी बनाए रखी, लेकिन तकनीक को अपनाने में कभी कोई शर्म नहीं दिखाई। सोशल मीडिया, स्टिंग ऑपरेशन, टीवी डिबेट को उन्होंने नए राजनीतिक हथियार बना दिया। लेकिन राजनीति के पुराने घिसे-पिटे तरीकों से वे खुद को आखिरकार बचा नहीं पाए। पार्टी में अकेले वे ही सुप्रीमो हों, उनके बराबर के नेता न हों, केवल अनुयायी हों, भक्त हों, यह दिखने लगा। दिल्ली में टिकट बेचे जाने की खबरें भी आईं। कई आपराधिक इतिहास रखने वाले उम्मीदवार भी चुनाव जीत गए। फर्जी डिग्रीधारी को ही कानून मंत्री बना दिया गया। ऐसे में पार्टी में तो फूट होना ही थी। आंतरिक लोकपाल और उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी चंदा तक पार्टी के भीतर और बाहर चर्चाओं में रहा।
दिल्ली चुनावों में जीत के बाद आम आदमी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व एक नई वैकल्पिक संरचना बनाने में जुट गया था। पहले विचारवादी पत्रकार राजनीतिक गतिविधियों से जुड़कर पार्टी में रहते थे, फिर पार्टी से हट जाने पर फिर पत्रकार बन जाते। लेकिन आम आदमी पार्टी में आने से पहले पत्रकार खासे अमीर बने और बाद में पार्टी के सदस्य। आम आदमी पार्टी ने नौकरशाहों, टीवी एंकरों व वकीलों को शीर्ष नेतृत्व दिया और अभी तक तो यह प्रयोग नाकाम रहा है।
क्या योगेंद्र यादव ने भारत में शोषण के खिलाफ चल रहे जनांदोलन को तितर-बितर किया? जिस तरह मेधा पाटकर को मुंबई में चुनाव लड़ाया गया, क्या वह सही था? क्या आम आदमी पार्टी की कोई वैचारिक प्रतिबद्धता है भी? क्या हर समस्या का निदान भ्रष्टाचार-रहित समाज है? आम आदमी पार्टी में भूषण परिवार के तीन सदस्यों (पिता-पुत्र एवं पुत्री) की संदिग्ध भूमिका नहीं थी? क्या इस दल में सत्ता-संघर्ष शुरू से ही नहीं था?
आम आदमी पार्टी में जारी सार्वजनिक तमाशे से खफा होकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर ने तो पार्टी से त्यागपत्र दे दिया, लेकिन दिल्ली के विधायक कोई बड़ी बगावत नहीं कर पाएंगे। केजरीवाल समर्थक यह सोच सकते हैं कि यदि सरकार सुशासन से चले तो मतदाता पांच वर्ष बाद यह उठापटक भूल जाएंगे, लेकिन आम आदमी पार्टी की नैतिक शक्ति अब निस्तेज हो गई है। पार्टी के कार्यकर्ता निराश हैं और एक-दूसरे के प्रति अविश्वास चरम पर है। ऐसी स्थिति में यदि नए आंदोलन से उपजी नई पार्टी एक और पुरानी स्थापित पार्टी में बदल सकती है तो उसका हाल उन क्षेत्रीय दलों जैसा ही हो सकता है, जो लोकप्रियता के चलते शिखर पर पहुंचे, लेकिन आपसी अविश्वास, सत्ता-संघर्ष, अहंकार के कारण फिर से शून्य पर आ गए। केजरीवाल यदि एकछत्र होकर ही अपनी पार्टी और सरकार चलाना चाहते हैं तो देश के लोकतंत्र के लिए यह शुभ नहीं होगा। यह आम आदमी पार्टी के बुरे दिनों की शुरुआत है।

क्या मोदी बनेंगे भारत के ली कुआन? @ महेंद्र वेद

आधुनिक सिंगापुर के संस्थापक ली कुआन यिवू के अंतिम संस्कार में शामिल होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वास्तव में बहुत सूझबूझ का परिचय दिया है। इससे निश्चित ही सिंगापुर से हमारे रिश्ते और मधुर होंगे। अलबत्ता, यह तो अभी पता नहीं चल पाया है कि मोदी की कभी ली कुआन से भेंट हुई थी या नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि मोदी इससे पहले भी सिंगापुर की यात्रा कर चुके हैं और अनेक भारतीयों की तरह वे इस सिटी-स्टेट की सफलता की दास्तान से रोमांचित होते रहे हैं। ली भी कई बार भारत की यात्रा कर चुके थे। आखिरी बार वे वर्ष 2011 में भारत आए थे, जिसके बाद उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा, वरना मोदी से उनकी मुलाकात अवश्य होती।
जब एशिया में औपनिवेशिकता से मुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी, तब वियतनाम के हो ची मिन्ह और श्रीलंका के जेआर जयवर्धने और भंडारनायके के साथ ही ली कुआन ने भी भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। पं. जवाहरलाल नेहरू से तो उनकी मित्रता भी थी, हालांकि नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति को वे अव्यावहारिक मानते थे। लेकिन इसके बावजूद ली कुआन के लिए भारत इसलिए हमेशा खास बना रहा, क्योंकि सिंगापुर का नामकरण मूलत: संस्कृत शब्द 'सिंहपुरा" के आधार पर हुआ है। जब तक सिंगापुर मलय-संघ से पृथक होता और ली उसके प्रथम प्रधानमंत्री बनते, तब तक नेहरू की मृत्यु हो चुकी थी और ब्रितानी सिंगापुर ही नहीं, इस पूरे क्षेत्र से अपनी सेनाओं को वापस बुला रहे थे। तब ली ने प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को पत्र लिखकर सुरक्षा की मांग की थी और शास्त्री ने भी तुरंत सेंट्रल रिजर्व पुलिस का एक दल सिंगापुर रवाना कर दिया। दल में शामिल किरपा राम आगे चलकर सिंगापुर के सैन्यप्रमुख बने।
लेकिन भारत की अपनी कूटनीतिक सीमाएं भी थी। वह एक ऐसे क्षेत्र में एक सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बनना चाहता था, जहां चीन और पश्चिमी ताकतें अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही हों। वह इस क्षेत्र में कम्युनिज्म से संघर्ष कर रही ताकतों से दूरी बनाए रखना चाहता था। खुद ली कुआन में तानाशाही प्रवृत्तियां थीं और उन्होंने राजनीतिक विपक्ष को हाशिये पर कर दिया था। अपनी कठोर कार्यशैली को उन्होंने सिंगापुर की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया था। शायद यही कारण रहा होगा कि जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तो ली कुआन ने उसका समर्थन किया था, जबकि दुनियाभर की लोकतांत्रिक शक्तियां तब इसका विरोध कर रही थीं। उन्होंने वर्ष 1971 में बांग्लादेश युद्ध में भारत द्वारा निर्णायक हस्तक्षेप किए जाने की भी सराहना की थी।
इसके बावजूद भारत से उन्हें जो उम्मीदें थीं, वे बहुत हद तक पूरी नहीं हो सकीं। उन्होंने भारत को 'अनर्जित महानता" का देश भी कहा था। उन्हें इस बात को स्वीकार करने में बहुत समय लगा कि भारत सिंगापुर से कहीं विस्तृत, व्यापक और विविधतापूर्ण देश है और उसे विकास के किसी खांचे में आसानी से फिट नहीं किया जा सकता। वे इस बात को देर से समझे कि भारत में 20 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं, जबकि चीन की 90 फीसदी आबादी एक ही भाषा बोलती है। उन्होंने कहा था कि 'भारत अपनी नस्लीय विविधताओं और गठबंधन सरकारों को जन्म देने वाले बहुदलीय लोकतंत्र के अनुरूप ही आगे बढ़ सकेगा, जिसमें निर्णय लेना बहुत कठिन हो जाता है, लेकिन इसके बावजूद भारत दौड़ में पिछड़ रहा है और उसे थोड़ी फुर्ती दिखानी होगी।"
ली कुआन ने सुझाव दिया था कि भारत आसियान (एसोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस) देशों का संस्थापक सदस्य बने, लेकिन शीतयुद्ध के उस दौर में भारत ने जितनी कूटनीतिक भूलें कीं, उनमें से एक यह भी थी कि उसने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। बाद में यह क्षेत्र 'टाइगर इकोनॉमीज" के नाम से जाना गया, लेकिन इसमें अपना दबदबा बनाने का अवसर भारत ने गंवा दिया।
नरसिंह राव ने जो 'लुक ईस्ट" पॉलिसी बनाई थी, उसी को अब नरेंद्र मोदी अधिक गर्मजोशी के साथ 'एक्ट ईस्ट" पॉलिसी कहकर पुकार रहे हैं। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह दोनों ही खुद को ली कुआन का शिष्य मानते थे और हालांकि वे यह बात जानते थे कि भारत सिंगापुर नहीं है, इसके बावजूद सिंगापुर-मॉडल की अहमियत से वे इनकार नहीं करते थे। हमें भूलना नहीं चाहिए कि चीन जैसे विशाल देश ने भी ली के सिंगापुर-मॉडल से काफी प्रेरणा ली है।
क्या नरेंद्र मोदी भारत के ली कुआन बन सकते हैं और क्या वे सिंगापुर की सफलता से कुछ जरूरी सबक सीख सकते हैं? वास्तव में मोदी और ली में अनेक समानताएं हैं। ली की तरह मोदी भी तत्पर प्रशासक, कुशल वक्ता और व्यावहारिक हैं। दोनों ही विकास के मॉडल को तरक्की का मूल मानते हैं। अपने आलोचकों से बहस करने का मोदी का अपना ही तरीका है। वे उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश करने से भी नहीं कतराते। जिस तरह से उनकी पार्टी जम्मू-कश्मीर में सत्ता में साझेदार है, उसको देखकर पता चलता है कि मोदी दूर की सोचने वाले राजनेता हैं। और जिस तरह से उन्होंने ओबामा, शी जिनपिंग और शिंजो एबे के साथ व्यवहार किया, उससे पता चलता है कि उन्हें विदेशी दोस्तों के साथ बराबरी का सलूक करना आता है। लेकिन मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें विकास की डगर पर अडिग बने रहना होगा। इसके लिए सबसे पहले तो उन्हें अपनी ही पार्टी में मौजूद उन पुरातनपंथियों से निपटना होगा, जिनका दृष्टिकोण मध्यकालीन है।
मोदी के पास इतनी मानसिक दृढ़ता है कि वे भारत के ली कुआन बन सकें। वे भारत को एक मध्यमार्गी गुटनिरपेक्ष देश के बजाय एक वैश्विक महाशक्ति बनाना चाहते हैं। लेकिन वे महज प्रधान शिल्पकार हैं और उनके पास प्रोजेक्ट इंडिया के लिए एक बहुत अच्छी डिजाइन है, लेकिन उन्हें अन्य कुशल शिल्पकारों की भी जरूरत है। उनके आसपास जो लोग मौजूद हैं, उन्हें उठकर मोदी के विजन के स्तर तक पहुंचना होगा

जमीन किसान की या राज्य की? @शंभूनाथ शुक्ल

आज भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध हो रहा है। पर अगर आजादी के तत्काल बाद सरकार किसान और उसकी जमीन के संदर्भ में अंग्रेजों के पूर्व की स्थिति बहाल कर देती, तो यह स्थिति पैदा नहीं होती। यानी आजादी के बाद की कांग्रेसी सरकारें भी विकास के लिए वही नीति अपनाना चाहती थी, जो अंग्रेजों की थी। अंग्रेजों से पहले राजाओं, सुल्तानों व मुगलों के समय तक किसान ही जमीन का मालिक होता था और राज्य किसानों से कर लिया करता था। कृषि भूमि पर अमूमन ग्राम समुदाय, गांव में बसे कुल या भातृसंघ का अधिकार होता था।

पर जैसे ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहले प्लासी की लड़ाई जीती, और बाद में बक्सर की लड़ाई में बंगाल, अवध व दिल्ली के बादशाह की साझा सेना का पतन किया, वैसे ही गंगा-जमना के उपजाऊ मैदान का बड़ा हिस्सा सीधे उसकी निगरानी में आ गया और उसने भू राजस्व के नए कानून बनाकर जमीन से किसानों की मिल्कियत समाप्त कर दी। कंपनी ने पहले की उपज कर नीति बदल दी और उपज के बदले नकद भुगतान की मांग करने लगे। नतीजतन ग्राम समुदाय अंग्रेजों के जमींदारों को नकद कर देने लगे। इससे जमीन से किसान की मिल्कियत तो गई ही, नकद मुद्रा के अभाव के कारण किसान की फसल मिट्टी के मोल जाने लगी।

कंपनी की इस नई कर नीति के कारण नए-नए हिंदुस्तानी और अंग्रेज जमींदार जमीन अपने नाम लिखाने लगे और मूल किसान उन्हीं के घर पर टहल-सेवा में लग गए। अवध की उपजाऊ जमीनें और बंगाल के सुसिंचित धान के कटोरे इन नए जमींदारों के पास चले गए। उस समय का वर्णन करते हुए सर जॉन स्टार्थी ने लिखा है-निजी संपत्ति में भूमि की मात्रा बढ़ाने की हमारी नीति रही है, जबकि पिछली सरकारों ने इसे बमुश्किल मान्यता दी।

जमीन पर मिल्कियत न होने से किसान अब न कर्ज ले सकता था, न उसे चुकता कर पाने की स्थिति में होता था। नतीजतन सीमांत किसान मजदूर बनते चले गए और किसानी के अभाव में गांव के पारंपरिक शिल्पी समाज के लोग बदहाली में शहर जाकर बसने लगे। बुनकरी का सारा काम-धंधा चौपट हो गया। लॉर्ड विलियम बेंटिक ने लिखा है, भारत के किसानों की जैसी दुर्दशा का और कोई उदाहरण वाणिज्यिक इतिहास में मिलना मुश्किल है। बुनकरों की हड्डियों से भारत के मैदानों की धुलाई हो रही है। मलमल के लिए पूरी दुनिया में मशहूर ढाका की जनसंख्या 1827 से 1837 के बीच डेढ़ लाख से घटकर मात्र बीस हजार ही रह गई है। बंगाल में जो मालगुजारी 1764-65 में 8,11,000 पाउंड थी, वह 1765-66 में बढ़कर 17,40,000 पाउंड हो गई।

ये आंकड़े बताते हैं कि जमीन से मिल्कियत खत्म करने की नीति ने किसानों को बर्बाद किया। इसी कारण साहूकारी व्यवस्था को बढ़ावा मिला। आजादी के बाद कहने को किसान जमीन का मालिक बना, पर एक तरह का शिकमी मालिक ही। उससे कलेक्टर द्वारा निर्गत धारा 4 का विरोध करने का हक छीन लिया गया। धारा 4 के विरुद्ध जो आपत्तियां मांगी जाती हैं, वे इतनी लचर हैं कि किसान उसे साबित नहीं कर पाते और उनकी जमीनें कभी नगर निकायों द्वारा, कभी प्रदेश व केंद्र सरकारों द्वारा अधिगृहीत कर ली जाती हैं। जब तक किसान को जमीन का मौरूसी हक अंग्रेजों की पूर्व स्थिति से बहाल नहीं होता, तब तक किसान की जमीन जाती रहेगी। जमीन का मौरूसी हक हासिल करने के अलावा किसानों को यह मांग भी करनी चाहिए कि नकदी के बजाय सरकारें उनकी उपज को मुद्रा मानकर मूल्य निर्धारण करे, ताकि प्राकृतिक आपदाओं से नष्ट हुई फसल की भरपाई उसे खुद-ब-खुद हो जाए।

मैं न्यूजीलैंड के साथ हूं @रामचंद्र गुहा

बीती सदी के साठ के दशक में अपने बचपन के दिनों के दौरान मैं वेस्ट इंडीज और न्यूजीलैंड को विश्व क्रिकेट के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की तरह देखता था। दोनों अंग्रेजी भाषी थे और दोनों की ज्यादातर द्वीपीय आबादी ईसाइयों की थी। जनसंख्या के मामले में इन दोनों की तुलना भारत के किसी मध्यम आकार के शहर से की जा सकती थी। भौगोलिक और जनांकिकीय समानताएं दोनों टीमों को काफी हद तक समान बनाती थीं। हां, क्रिकेटीय कौशल के मामले में जरूर दोनों टीमें एक-दूसरे से बिल्कुल उलट थीं। जहां वेस्ट इंडीज निर्विवाद तौर पर विश्व चैंपियन थी, वहीं न्यूजीलैंड अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की सबसे कमजोर टीम थी। दूसरी ओर मेरी टीम भारत थी, जिसके वेस्ट इंडीज से हरदम हारने, और न्यूजीलैंड से हमेशा जीतने की उम्मीद रहती थी। शायद इसी वजह से यह अप्रत्याशित नहीं ‌था कि वह कीवी ही थे, जिनके खिलाफ हमने विदेशी जमीन पर अपनी पहली टेस्ट सीरीज जीती थी। हालांकि 17 फरवरी, 1976 से पहले तक भारतीय क्रिकेट के प्रशंसक कीवियों की क्रिकेट और उनके खिलाड़ियों को बेहद हलके ढंग से लेते ‌थे। दरअसल, उसी दिन समंदर पार से यह खबर आई थी कि हमें एक टेस्ट मैच में उस टीम के खिलाफ पारी की हार का सामना करना पड़ा, जिसे अब तक हम दुनिया की सबसे बदतर टीम मानते थे। एक अनजाने से युवा खिलाड़ी आर जे हेडली ने वेलिंगटन के बेसिन रिजर्व में केवल 23 रन देकर हमारे सात विकेट ‌चटकाए थे, और इसकी बदौलत भारत की टीम तीन विकेट पर 75 के स्कोर से आगे खेलते हुए 81 पर ऑल आउट हो गई थी।

वैसे, अतीत में न्यूजीलैंड टीम में बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं। इनमें बाएं हाथ से बल्लेबाजी करने वाले मार्टिन डोनेली और बर्ट सटक्लिफ के अलावा जे ए कोवी और डिक मोत्ज जैसे बेहतरीन स्विंग गेंदबाज शामिल थे। इन सभी खिलाड़ियों की अपने समय के विश्व एकादश में शामिल होने की दावेदारी बनती थी। मगर महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से किसी से भी उम्मीद की जा सकती थी, कि वह विपक्षी टीम के खिलाफ न्यूजीलैंड को जीत दिला दे। दरअसल, वह रिचर्ड हेडली थे, जिन्होंने पहली बार कीवियों को यह एहसास कराया कि अगर दिन और परिस्थितियां माकूल हों, तो वे वाकई टेस्ट मैच जीत सकते थे। युवावस्‍था में एक लापरवाह तेज गेंदबाज रहे हेडली ने परिपक्व होने पर गेंदबाजी के तमाम कौशलों का विकास किया। वह गेंद को दोनों तरफ सीम और स्विंग करा सकते थे, बेहतरीन यॉर्कर फेंकते ‌थे और गेंद पर उनका नियंत्रण देखने लायक होता था। इतना ही नहीं, वह निचले क्रम के एक उपयोगी बल्लेबाज भी थे। खेल पर निर्णायक छाप छोड़ने वाले न्यूजीलैंड के दूसरे खिलाड़ी मार्टिन क्रो थे। हेडली की तरह उनका भी एक बड़ा भाई था, जिसने टेस्ट क्रिकेट भी खेला। कैरियर के अच्छे दिनों में जिस तरह हेडली दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज माने जाते थे, उसी तरह 1980 के दशक के कुछ वर्षों के दौरान क्रो को खेल के प्रतिष्ठित जानकार विश्व का सबसे अच्छा बल्लेबाज मानते थे। वह विकेट के चारों ओर स्ट्रोक खेल सकते थे, धीमी या तेज, वह हर तरह की गेंदबाजी का सामना करने में सक्षम थे और पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ खेलते वक्त तो उनका कोई सानी ही नहीं था। स्विंग और ‌रिवर्स स्विंग के मास्टर वसीम अकरम ने उनके बारे में कहा था कि उनकी गेंदों को क्रो से बेहतर किसी भी बल्लेबाज ने नहीं खेला।

मैंने रिचर्ड हेडली को कभी लाइव नहीं देखा, मगर उनकी गेंदबाजी के कई स्पेल मैंने रेडियो पर सुने हैं, और कुछ को टेलीविजन पर देखा भी है। हां, मार्टिन क्रो को खेलते हुए दो बार मैंने लाइव देखा है, मगर अफसोस की बात है कि दोनों ही बार क्रो भारत में विवादास्पद अंपायरिंग का शिकार बने। 1987 के विश्व कप के दौरान बंगलूरू में भारत के खिलाफ खेलते हुए क्रो को मनिंदर सिंह की गेंद पर स्टंप आउट दिया गया, जबकि रिप्ले में साफ था कि जब विकेटकीपर ने स्टंप बिखेरे, तब गेंद उसके हाथ में नहीं थी। आठ वर्ष बाद इसी मैदान पर उन्हें अनिल कुंबले की गेंद पर पगबाधा आउट दिया गया, जबकि गेंद न केवल ऊंची थी, बल्कि साफ तौर पर लेग स्टंप के बाहर भी जा रही थी।

तीसरे महान कीवी खिलाड़ी, जो ज्यादा पुराने भी नही हैं, क्रिस केर्यन्स थे। मैदान के बाहर उनका आचरण कैसा भी हो, मगर इसमें संदेह नहीं कि वह कमाल के क्रिकेटर थे और हवा में शॉट खेलना उनकी खूबी थी। मुझे इंग्लैंड में हुआ एक मैच याद आता है, जो मैं टेलीविजन पर देख रहा था। उस मैच में केर्यन्स ने बाएं हाथ के धीमे गेंदबाज फिल टफनेल की खूब ठुकाई की थी। उनके एक ओवर के दौरान केर्यन्स ने क्रीज से बाहर आते हुए शॉट खेली, मगर गेंद ठीक से उनके बल्ले पर नहीं आई। इसके बावजूद गेंद ने सीमा रेखा को थोड़ी ही दूरी से पार किया और उन्हें छह रन मिले। अगली गेंद पर उन्होंने फिर क्रीज से बाहर आते हुए गजब की टाइमिंग के साथ गेंद पर प्रहार किया, और स्टंप पर लगे माइक्रोफोन के जरिये कीवी लहजे में उनकी आवाज सुनाई दी, 'दैट्स बैटर'। वह वाकई बेहतरीन शॉट थी, क्योंकि गेंद मैदान को पार करते हुए पार्किंग स्‍थल पर गिरी थी।

हेडली, क्रोव और केर्यन्स जैसे क्रिकेटरों की बदौलत कीवी क्रिकेटरों के भीतर यह एहसास जागा कि वे भी भारत, पाकिस्तान, इंग्लैंड या फिर ऑस्ट्रेलिया को हरा सकते हैं। यह इन खिलाड़ियों की ही विरासत है, जिसने न्यूजीलैंड की वर्तमान टीम को ताकत दी है। यह आत्मविश्वास सबसे ज्यादा उनके कप्तान ब्रैंडन मैककुलम में दिखता है। उनकी बल्लेबाजी की बात करें, तो पहले दस ओवर में मैच का नतीजा निर्धारित करने की क्षमता के मामले में वह सनथ जयसूर्या तक को पीछे छोड़ चुके हैं। वहीं, अगर उनकी कप्तानी पर गौर किया जाए, तो बल्लेबाजी कर रही टीम के रनों का प्रवाह रोकने के बजाय लगातार विकेट चटकाने को लेकर अपने उत्साह को लेकर वह स्टीव वॉ से भी आगे दिखते हैं।

इस विश्व कप में कीवी टीम ने अपनी प्रतिभाओं का शानदार प्रदर्शन किया है। फिर चाहे वह मैककुलम के अलावा इलियट, विलियम्सन, टेलर और गु‌प्टिल की बल्लेबाजी हो, बोल्ट और साउदी की स्विंग गेंदबाजी हो, या फिर हमेशा युवा दिखने वाले डैनियल वेटोरी की फिरकी गेंदबाजी हो। टीम का क्षेत्ररक्षण बेहतरीन रहा है। फिर, जैसा कि कभी वेस्ट इंडीज के बारे में कहा जाता था, न्यूजीलैंड की जनसंख्या से तुलना करें, तो उनकी उपलब्धियां चौंकाने वाली हैं। इस देश में सात करोड़ भेड़ें हैं, जबकि लोगों की संख्या 50 लाख से भी कम है। मतलब यह कि न्यूजीलैंड की पूरी आबादी अकेले नोएडा में समा सकती है, जब‌कि उनके क्रिकेटर पूरी दुनिया को जीतने का माद्दा रखते हैं।

विश्व कप के फाइनल वाली सुबह यह कॉलम प्रकाशित होगा। मगर आज के मैच का नतीजा कुछ भी हो, मेरे लिए न्यूजीलैंड टूर्नामेंट की सर्वश्रेष्ठ टीम है। अब तक उन्होंने रोमांचकारी क्रिकेट खेला है। इतना ही नहीं, लंबे समय से क्रिकेट की दुनिया की कथित महाशक्तियों ने न्यूजीलैंड को जिस हल्के ढंग से लिया है, मैदान पर अपनी उपलब्धियों के जरिये मैककुलम की टीम ने उसका मुंहतोड़ जवाब दे दिया है।

Tuesday, 31 March 2015

शशि कपूर को सलाम @शशि शेखर

शशि कपूर को ‘दादा साहब फाल्के’ पुरस्कार देने की घोषणा उस समय हुई, जब वह अपने प्रशंसकों की स्मृतियों की पिछली तहों में समाने लगे थे। इस पुरस्कार की विडंबना यही है कि यह अक्सर कलाकारों को उस उम्र में हासिल होता है,  जब उनका नाता रुपहले परदे से सिर्फ नाम मात्र का रह जाता है। ‘इंसाफ’ की तरह ‘इनाम’ भी अगर देर से हासिल हों, तो वे अपनी अहमियत खो बैठते हैं। शशि कपूर का जीवन ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। खुद अपने घर में उनके दो बड़े भाई ऐसे थे, जिन्होंने फिल्म जगत में खास पहचान बना रखी थी। पृथ्वीराज कपूर तब जिंदा थे और शशि के लिए पिता और भाइयों की छाया से बाहर निकलना आसान नहीं था। उस जमाने में लोग अपनी खास अदा विकसित करते थे और उसके सहारे उनकी जिंदगी कट जाती थी। जब उनकी पहली फिल्म धर्म पुत्र रिलीज हुई, तब रुपहले परदे पर दिलीप कुमार, राज कपूर और देवानंद की तिकड़ी राज कर रही थी। अंदाज के जरिये दिलीप ‘ट्रेजडी किंग’ और राज कपूर ‘ग्रेट शो मैन’ बनने का रास्ता हमवार कर चुके थे। देवानंद की एक ‘खिलंदड़ी इमेज’ थी। शम्मी कपूर ने इस तिकड़ी के बीच से अपना रास्ता बनाने के लिए अलग शैली बनाई थी।

ऐसे में क्या करें, शशि कपूर ने यकीनन यह सोचा होगा। उनकी दीक्षा ‘पृथ्वी थिएटर’ में हुई थी। उन्होंने अभिनय की सहज शैली को ही चुनने और उसके सहारे आगे बढ़ने का फैसला किया। अगर आपने धर्म पुत्र देखी हो, तो उस ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्म में भी आपको उनकी आंखें बोलती नजर आएंगी। शशि की तरह यश चोपड़ा की अपने बैनर-तले बनी वह पहली ही फिल्म थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं दिखा सकी, अलबत्ता उसे अनेक पुरस्कार मिले। उस समय कोई सोच नहीं सकता था कि हिंदी सिनेमा के सबसे कारगर निर्देशक और अनूठे अभिनेता का इसके जरिए जन्म हो चुका है। यश चोपड़ा से इसी दौरान परवान चढ़ी उनकी दोस्ती भी ताजिंदगी अटूट रही। उनके निजी जीवन के बारे में बाद में बात करेंगे, पहले उनके कला पक्ष पर चर्चा करते हैं। कन्यादान फिल्म का एक हिट गाना है- लिखे जो खत तुझे..।  इसमें पहली नजर में आशा पारेख ज्यादा प्रभावित करती नजर आएंगी। इसके विपरीत शशि का चेहरा थोड़ा कम बोलता दिखता है, पर मामला उल्टा है। आशा अभिनय कर रही थीं, जबकि वह उस गाने को जी रहे थे।

दीवार फिल्म में उनके एक डायलॉग- मेरे पास मां है -का जिक्र बार-बार होता है। उसी फिल्म में ए के हंगल के सामने उन्होंने जो अभिनय किया था, वह यादगार है। पश्चाताप में जलता हुआ पुलिस इंस्पेक्टर पहले से ही पेशेवर मांग और निजी रिश्तों के द्वंद्व में उलझा हुआ है। युद्ध क्षेत्र में खड़े अर्जुन की तरह उसे अपने संशय का कोई किनारा नहीं मिल रहा। वह एक स्कूल मास्टर के बेटे को गोली मार देता है, जो अपने भूखे मां-बाप के लिए डबलरोटी चुरा रहा था। शिक्षक की भूमिका निभा रहे हंगल कहते हैं, ‘जुर्म तो जुर्म है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा।’ शशि कपूर कहते हैं, ‘ऐसी शिक्षा सिर्फ एक शिक्षक के यहां मिल सकती थी’ और इसके साथ ही लगता है कि जैसे उनके मन पर पड़ा बोझ हट रहा है। आप देख सकते हैं, ग्लानि से झूला शरीर आत्मा के फैलाव के साथ ही निर्णय पर पहुंचने की प्रक्रिया में तन जाता है। ग्लानि, पश्चाताप, कशमकश और निर्णय- इतने सारे भावों को उन्होंने कुछ ही पलों में दर्शा दिया।

अमिताभ के साथ उनकी एक और फिल्म कभी-कभी का जिक्र यहां जरूरी है। एक दृश्य में,  अमिताभ उनके घर आते हैं। शशि कपूर जान चुके हैं कि कॉलेज के दिनों में उनकी पत्नी और इस व्यक्ति के बीच प्रेम संबंध रहा है। इसके बावजूद वह पूरी गरिमा और शालीनता के साथ अपनी बात की शुरुआत में कहते हैं, माफ कीजिएगा विजय साहब..। एक पल को भी ऐसा नहीं लगता कि वह सत्य को स्वीकारने में कोई संकोच कर रहे हैं। वे हालात से पिटे नहीं, उन्हें पीटते नजर आ रहे हैं। जवाब में अमिताभ ‘एंग्री यंगमैन’ के दायरे में सिमटे-सिकुड़े हैं। यह दृश्य भी अभिनय के कर्म और किरदार में समा जाने के फर्क को साफ करता है। अगर ऐसे उदाहरण गिनाने लगूं, तो सैकड़ों पन्ने भर जाएंगे, पर सच यह है कि शशि कपूर को अपनी वास्तविक अभिनय शैली के लिए उस समय वह व्यावसायिक प्रतिष्ठा नहीं मिली, जिसके वह हकदार थे। 1960 के दशक में वह कई शिफ्टों में काम करने वाले अकेले अभिनेता हुआ करते थे। 1970 के दशक में उन्हें सहायक भूमिकाओं में आना पड़ा, पर वे भी कितनी जोरदार थीं, इसके कुछ उदाहरण मैंने अभी आपके सामने पेश किए हैं।

अब आते हैं,  उनकी निजी जिंदगी पर। यश चोपड़ा से दोस्ती का कुछ देर पहले जिक्र हुआ था। वह कितने भरोसेमंद दोस्त हैं, इसका नमूना देखिए। सिलसिला की कास्टिंग के दौरान यश ने स्मिता पाटिल और परवीन बॉबी का चयन किया था। शूटिंग शुरू होने ही वाली थी कि श्रीनगर में अमिताभ और यश के बीच फैसलाकुन बातचीत हुई। दोनों का मानना था कि इस रोल के लिए जया बच्चन और रेखा सबसे मौजूं हैं। संयोग से दोनों मान गईं। अब समस्या यह थी कि परवीन बॉबी को कैसे मना किया जाए? इसके लिए यश चोपड़ा ने शशि कपूर को चुना और उन्होंने इस कठिन दायित्व का पूरी जिम्मेदारी से निर्वाह किया। फिल्म बन गई और परवीन बॉबी से यश के संबंध भी बचे रहे।

अपनी निजी जिंदगी में वह अपनी पत्नी जेनिफर के प्रति भी बेहद समर्पित रहे। एक बार उन्होंने कहीं कहा कि विवाह के वक्त हम दोनों ने तय किया कि मैं और जेनिफर कभी एक-दूसरे की ओर पीठ करके नहीं सोएंगे। यही कारण है कि उनके बीच कोई मनमुटाव एक घंटे से ज्यादा नहीं चला। वे आजीवन प्रेमी-प्रेमिका ही बने रहे और सर्वाधिक ग्लैमरस हीरोइनों के साथ काम करने के बावजूद उनका ‘एक पत्नीव्रत’ कायम रहा। जेनिफर की मौत के बाद शशि कपूर टूट गए। वह सदैव संयम और अनुशासन का जीवन जीते रहे। उस जमाने के हीरो अपने शरीर को दुरुस्त रखने के लिए आज के नायकों जैसा जोर नहीं देते थे। खुद राज और शम्मी थुलथुल हो चले थे। शशि कपूर ने यहां भी अलग रहगुजर चुनी। वह नियमित तौर पर कम खाते और अपनी उम्र से हमेशा कम लगते।

जेनिफर के जाने के बाद कपूर खानदान के अन्य लोगों की तरह लगता है, वह भी दिमाग से ज्यादा अपने पेट की सुनने लगे। बढ़ते वजन के साथ बीमारियों ने उन्हें घेर लिया। जेनिफर के इंतकाल के बाद वह ऐसे जी रहे हैं, जैसे जिंदगी उनसे दूर हो गई हो। सुख-दुख हर इंसान के जीवन में आते हैं, परंतु उन्हें धीरता के साथ ग्रहण कर लेने की क्षमता कम लोगों में होती है। शशि कपूर ऐसे ही चुनिंदा लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आपको हमारा सलाम कपूर साहब।

विदाई हो तो माइकल क्लार्क जैसी @राजीव कटारा

शायद लोककथाएं यहीं से बननी शुरू होती हैं। अपने आखिरी मैच में कमाल की कप्तानी। एक बहती हुई बेहतरीन पारी। दुनिया की सबसे बड़ी ट्रॉफी अपने देश के नाम। अपने ही घर में खचाखच भरे ऐतिहासिक मैदान पर, तालियों के बीच साथियों के कंधे पर ‘विक्ट्री मार्च’ और अलविदा। क्या लमहा है यह! माइकल क्लार्क वनडे से विदा हो गए। इससे बेहतर विदाई की कल्पना और क्या हो सकती है? महान क्रिकेटरों की तरह उन्होंने भी शिखर पर रहते हुए अलविदा कहना बेहतर समझा। ताकि दुनिया कहे, ‘अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं।’ किसी भी महान खिलाड़ी को उसी वक्त विदाई लेनी चाहिए, जब लोगों को कसक हो। खेल को उनकी कमी खले। बेशक महान खिलाड़ी हैं क्लार्क! और ठीक वैसा ही बर्ताव उन्होंने किया है। इस बार का विश्व कप जब शुरू हुआ था, तब शायद ही किसी ने सोचा हो कि क्लार्क वनडे को अलविदा कह देंगे। यह ठीक है कि वह अपने शरीर की दिक्कतों से जूझ रहे थे। कमर दर्द और जांघों की मांसपेशियों के खिंचाव ने उन्हें परेशान कर दिया था। कमर की तो हाल ही में सजर्री हुई थी।उसकी वजह से वह भारत के साथ पूरी टेस्ट सीरीज नहीं खेल सके थे। लेकिन उन्होंने वापसी कर ली थी। और ठीकठाक फॉर्म में नजर भी आ रहे थे। फाइनल में तो उन्होंने बेहतरीन पारी खेली ही।

यों खबरें आ रही थीं कि क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। उन्हें बांग्लादेश के मैच से पहले फिट होने का अल्टीमेटम दे दिया गया था। या फिर यह कि कोच डैरन लीमेन, नए कप्तान स्मिथ और चयन समिति के प्रमुख रोडनी मार्श के साथ उनके रिश्ते बिगड़ने लगे हैं। हो सकता है कि क्लार्क के इस फैसले में यह भी एक वजह हो। लेकिन शरीर भी एक सच्चाई है। वनडे खेलना कई मायनों में टेस्ट क्रिकेट से ज्यादा शरीर को तोड़ता है। यों उनकी उम्र कोई बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन शरीर की दिक्कतें दिखने लगी हैं। सो, उनका यह फैसला समझ में आता है। भारत से सेमीफाइनल जीतते ही उन्हें लगा कि अब अलविदा कहने का सही समय है। और आनन फानन में उन्होंने यह घोषणा कर दी। 12 साल पहले क्लार्क का वनडे करियर इंग्लैंड के खिलाफ एडिलेड में शुरू हुआ था। उस रात बेहद कम स्कोर के मैच में उन्होंने आउट हुए बिना 39 रन बनाए थे। लेफ्ट आर्म स्पिन करते हुए एक विकेट भी ले लिया था। उसी मैच से समझ में आ गया था कि एक महान खिलाड़ी ने क्रिकेट की दुनिया में दस्तक दे दी है। लेकिन वह कतई ऑस्ट्रेलियाई नहीं दिखलाई पड़े थे।

आम तौर पर ऑस्ट्रेलियाई पावर बैटिंग के लिए जाने जाते हैं। क्लार्क को देखकर वह ‘ऑस्ट्रेलियन फील’ नहीं आती। वह ‘टिपिकल ऑस्ट्रेलियाई’ हैं ही नहीं। ऑस्ट्रेलियाई तो अपनी ‘किलर इंस्टिंक्ट’ को चेहरे पर लिए खेलते हैं। गाली-गलौज, बदतमीजी, अक्खड़पन उनकी पूरी ‘बॉडी लैंग्वेज’ से टपकता है। ऐसे में, माइकल क्लार्क मुस्कराते हुए किसी और ग्रह के नजर आते हैं। ऑस्ट्रेलियाई टीम को देखकर अक्सर सर्जन याद आते हैं। महसूस होता है कि आप सजर्नों से भरपूर किसी टीम को देख रहे हैं। उनके लिए ‘क्लीनिकल अप्रोच’ की बात की जाती है। लेकिन क्लार्क को देखकर हमेशा कोई कलाकार याद आता है। मानो बल्ला उनके लिए कोई तलवार या चाकू न हो। कोई कूची हो। जो हरे मैदान के कैनवस पर चल रही है। अलग-अलग स्ट्रोक लगाती हुई। रनों की बौछार हो रही है या रंगों की कभी-कभी दुविधा पैदा करती हुई।

यह संयोग नहीं है कि पहली बार उन्हें बैटिंग करते देखकर मार्क वॉ की याद आई थी। मार्क एकदम अलग तरह के बैट्समैन थे। अपने जुड़वां भाई स्टीव से बिल्कुल अलग। स्टीव की पूरी शख्सियत में ऑस्ट्रेलियाई दिखता था। एक अड़ियल शख्सियत, चाहे बैटिंग हो या बॉलिंग। मार्क तो अलग ही दुनिया के बैट्समैन नजर आते थे। कुछ-कुछ एशियाई टच आर्टिस्ट की तरह। क्लार्क उसी परंपरा के बैट्समैन हैं। लेकिन क्लार्क के बाद उस परंपरा में कोई नजर नहीं आ रहा है। क्लार्क की क्रिकेटीय परवरिश में एक हिन्दुस्तानी मूल के शख्स की भूमिका रही है। उनके शुरुआती कोच नील डीकोस्टा के माता पिता की जन्मभूमि चेन्नई रही है। नील ने ही माइकल के पिता को मनाया था कि वह पढ़ाई छोड़कर क्रिकेट पर ध्यान दें। उनके माता-पिता ने नील का कहना माना। बाकी सब तो इतिहास है। अगर क्लार्क की बैटिंग में कुछ हिन्दुस्तानीपन नजर आता है,  तो कोई अजीब बात नहीं है। नील का असर कहीं तो दिखाई पड़ना था न। शायद इसीलिए उनकी बैटिंग में कभी विश्वनाथ, कभी अजहर, तो कभी लक्ष्मण की परछाईं नजर आ जाती है। उनके स्क्वेयर कट, कवर या स्ट्रेट ड्राइव और फ्लिक में कलाकारी ज्यादा झलकती है। मानो पावर से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

एक चकल्लस यह भी है कि ऑस्ट्रेलियाई आका वनडे में उस किस्म के क्रिकेट का कोई भविष्य नहीं देख रहे हैं। क्रिकेट बहुत तेजी से पावर गेम में बदलने लगा है। जहां कलाकारों को लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है। ट्वंटी-20 से तो उन्हें धकेल ही दिया गया है। यह संयोग नहीं कि उस फटाफट क्रिकेट में क्लार्क जैसा बैट्समैन भी अपने को खोया हुआ-सा पा रहा है। उन्होंने पहले ही अपने को उससे अलग कर लिया है। आज नहीं, तो कल उन्हें वनडे क्रिकेट में भी अजनबीपन का एहसास होना ही था। उस क्रिकेट को पावर गेम में बदलते देखना उन्हें रास नहीं आ रहा। यही वजह है कि उन्होंने आईसीसी से क्रिकेट में बदलाव की अपील की है, ताकि वह महज बल्ला मेले में तब्दील न हो जाए। एक ऐसा क्रिकेट, जिसमें कोई बॉलर होने की तमन्ना ही न करे। वनडे की एक बेहतरीन टीम स्टीव स्मिथ को देकर वह विदा हो रहे हैं। बीच में ऑस्ट्रेलियाई टीम को काफी मशक्कत करनी पड़ी है। उसको धीरे-धीरे फिर से बनाया है क्लार्क ने।

रिकी पॉन्टिंग से उन्हें जो टीम मिली थी, उससे बेहतर टीम देकर वह जा रहे हैं। एक चैंपियन टीम स्मिथ को विरासत में मिल रही है। अब 23 नंबर की पीली जर्सी मैदान पर दिख तो सकती है, लेकिन उस जर्सी की आत्मा क्लार्क अब उसमें नहीं होंगे। शेन वॉर्न ने रिटायर होते हुए अपनी लकी नंबर की जर्सी क्लार्क को दी थी। शेन अपनी तरह के कलाकार रहे। माइकल अपनी तरह के कलाकार हैं। शेन ने उसे पहनकर क्रिकेट को एक अलग आयाम दिया था। अब माइकल भी क्रिकेट को एक अलग ऊंचाई देकर विदा हो रहे हैं। वह टेस्ट खेलते रहेंगे। हम उन्हें वहां देख सकते हैं। अभी तो यही राहत की बात है। उनकी मुस्कराहट, सिल्की स्ट्रोक अब रंगीन कपड़ों में नहीं दिखलाई पड़ेंगे। सफेद कपड़ों में वह खेलते रहेंगे। ऐसा महसूस हो रहा है, मानो उन्होंने क्रिकेट से वानप्रस्थ ले लिया हो। संन्यास भी बहुत दूर नहीं लगता। लेकिन हमारी चाहत है कि उस  संन्यास के हम जल्द गवाह न बनें। 

Friday, 27 March 2015

हाशिमपुरा के अन्याय में सभी दोषी @विभूति नारायण राय

हाशिमपुरा का नरसंहार स्वतंत्रता बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग (हिरासत में मौत) की घटना है। इसके पहले जहां तक मुझे याद है, कभी इतनी बड़ी संख्या में पुलिस ने अपनी हिरासत में लेकर लोगों को नहीं मारा था। इसके बावजूद एक भी अपराधी को दंडित नहीं किया जा सका। अदालत के फैसले से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ है। मैंने पहले ही दिन से यही अपेक्षा की थी। दरअसल भारतीय राज्य का कोई भी स्टेक होल्डर नहीं चाहता था कि दोषियों को सजा मिले। राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, मीडिया-सभी ने 22 मई, 1987 से ही इस मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की थी। भारतीय न्याय प्राणाली की चिंता का आलम यह है कि इतने जघन्य मामले का फैसला करने में अदालतों को लगभग अट्ठाइस साल लग गए।

22 मई, 1987 को रात लगभग साढ़े दस बजे मुझे हाशिमपुरा नरसंहार की घटना की जानकारी हुई। शुरू में तो मुझे इस सूचना पर यकीन नहीं हुआ, पर जब कलक्टर और दूसरे अधिकारियों के साथ मैं घटनास्थल पर पहुंचा, तब जाकर मुझे यह एहसास हुआ कि मैं धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य के सबसे शर्मनाक हादसे का साक्षी बनने जा रहा हूं। मैं उस समय गाजियाबाद का पुलिस कप्तान था और पीएसी ने मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले से उठाकर कई दर्जन मुसलमानों को मेरे इलाके में लाकर मार दिया था।

22-23 मई, 1987 की आधी रात दिल्ली-गाजियाबाद सीमा पर मकनपुर गांव से गुजरने वाली नहर की पटरी और किनारे पर उगे सरकंडों के बीच टॉर्च की रोशनी में खून से लथपथ धरती पर मृतकों के बीच किसी जीवित को तलाशना और हर अगला कदम उठाने से पहले यह सुनिश्चित करना कि वह किसी जीवित या मृत शरीर पर न पड़े- मेरी स्मृति पटल पर किसी हॉरर फिल्म की तरह अंकित है। मैंने पीएसी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई और करीब 28 वर्षों तक उन सारे प्रयासों का साक्षी रहा हूं, जो भारतीय राज्य के विभिन्न अंग दोषियों को बचाने के लिए करते रहे हैं। इन पर मैं विस्तार से अपनी किताब में लिख रहा हूं, पर यहां संक्षेप में कुछ का जिक्र करूंगा।

हाशिमपुरा संबंधी मुकदमे गाजियाबाद के लिंक रोड और मुरादनगर थानों में दर्ज हुए थे। मगर कुछ ही घंटों में उसकी तफ्तीशें राज्य के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के आदेश से सीआईडी को सौंप दी गईं। सीआईडी ने पहले दिन से ही दोषी पुलिसवालों को बचाने के प्रयास शुरू कर दिए। अपनी किताब लिखने के दौरान मैंने सीआईडी की केस डायरियां पढ़ीं, तो ऐसा लगा कि मैं बचाव पक्ष के दस्तावेज पढ़ रहा हूं। कुल उन्‍नीस अभियुक्तों में सबसे वरिष्ठ ओहदेदार एक सब-इंस्पेक्टर था। मैं कभी यह नहीं मान सकता कि बिना वरिष्ठ अधिकारियों की शह और अभयदान के मजबूत आश्वासन के एक जूनियर अधिकारी बयालीस लोगों के कत्ल का फैसला कर सकता है। सीआईडी ने बेमन से छोटे ओहदेदारों के खिलाफ चार्जशीट लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, जबकि बड़े अफसरों को उसने पूरी तरह छोड़ दिया। सीआईडी ने फौज की भूमिका की गंभीर पड़ताल नहीं की। अपनी किताब के लिए सामग्री एकत्र करते हुए मेरे हाथ ऐसे दस्तावेज लगे हैं, जो दंगों के दौरान मेरठ में तैनात फौजी कॉलम के बारे में गहरे शक पैदा करते हैं। मजेदार बात यह है कि ये तमाम तथ्य सीआईडी के पास भी थे। सवाल यह है कि फिर उन्होंने इसे क्यों नजरंदाज किया। क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या फिर अपराधियों को बचाने का सुनियोजित प्रयास था? मैं थोड़े-से प्रयास से उस महिला तक पहुंच गया, जो उस पूरी घटना की सूत्रधार थी। हैरानी की बात यह है कि फिर भला सीआईडी उस तक क्यों नहीं पहुंच सकी? निश्चित रूप से सीआईडी के अधिकारी एक लेखक के मुकाबले ज्यादा साधन संपन्न थे और उनके पास कानूनी अख्तियारात भी थे। दरअसल उनकी दिलचस्पी ही नहीं थी कि इस हत्याकांड के अभियुक्तों की सही शिनाख्त हो और उन्हें अपने जुर्म की सजा मिले।

मामला सिर्फ पुलिस-प्रशासन और जांच एजेंसी का ही नहीं है। हकीकत तो यह है कि राजनेताओं ने भी इस मामले में आपराधिक चुप्पी अख्तियार की। जिस समय यह कांड हुआ, लखनऊ और दिल्ली, दोनों जगह कांग्रेस की सरकारें थीं, और उसके बाद दोनों जगहों पर सरकारें बदलती रहीं। मैं नहीं समझता कि किसी ने भी इस मामले को चुनौती के रूप में लिया। खास तौर से उत्तर प्रदेश की सरकारों ने तो गंभीर लापरवाहियों से हत्यारों को दोषमुक्त होने में मदद की। वर्षों तक दोषियों को निलंबित नहीं किया गया, आरोपितों के खिलाफ अभियोजन में देरी की गई। गाजियाबाद न्यायालय में अभियुक्त पेश नहीं होते थे, इसके बावजूद राज्य के कान पर जूं तक नहीं रेंगती थी। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से यह मुकदमा दिल्ली की अदालत में आया भी, तो काफी समय तक योग्य अभियोजक नहीं नियुक्त किया गया। इस तरह के अनगिनत उदाहरण हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय राज्य को ही यह चिंता नहीं थी कि इतने जघन्य हत्याकांड में दोषियों को सजा मिले।

हाशिमपुरा हत्याकांड में आए अदालत के ताजा फैसले के बाद भारतीय राज्य की भूमिका क्या होनी चाहिए? मेरा मानना है कि यह उसके लिए परीक्षा की घड़ी है। यदि आजादी के बाद के इस सबसे बड़े हिरासती हत्याकांड में वह हत्यारों को सजा नहीं दिला पाया, तो उसका चेहरा पूरी दुनिया में स्याह हो जाएगा। उसे अविलंब हरकत में आना चाहिए। एक ऐसी हरकत, जिससे हाशिमपुरा हत्याकांड की एक बार फिर से निष्पक्ष तफ्तीश हो सके, और समयबद्ध न्यायिक कार्रवाई के जरिये हत्यारों को सजा दिलाई जा सके। करीब अट्ठाइस साल बाद होने वाली यह हरकत तेज और फैसलाकुन होनी चाहिए।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति, रिटायर्ड आईपीएस अफसर और हिंदी के साहित्यकार