Tuesday, 1 December 2015

नेता, नायक या एक सियासी प्रतीक? @गोपालकृष्‍ण गांधी

हम एक व्यक्तिपूजक देश हैं। धर्म, राजनीति, कला, हर क्षेत्र में हमने अपने-अपने व्यक्ति-रूपक रच डाले हैं। हम हमेशा खुद को विराट छवियों से घिरे रखना पसंद करते हैं। हमारे कैलेंडर पर लाल स्याही से अंकित वे तारीखें सभी का ध्यान खींचती हैं, जिन पर पर्व-त्योहार या किसी महापुरुष की जयंती या पुण्यतिथि अंकित होते हैं। ऐसा लगता है जैसे हमारे पास इसके लिए समय और संसाधनों की कोई कमी नहीं है।
ऐसा भी नहीं कि यह परिपाटी नई हो।
मिसाल के तौर पर राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों के लिए एक लंबे समय तक 31 अक्टूबर का मतलब सरदार पटेल की जयंती था। महात्मा गांधी से लेकर उनके तमाम साथी इस तारीख पर उन्हें 'विश" करना नहीं भूलते थे। लेकिन 1950 में उनकी मृत्यु के बाद इस तारीख का महत्व कम होता गया। 1984 के बाद से इस तारीख को इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि के तौर पर अधिक याद रखा जाता है। यही कहानी 14 नवंबर की भी है। लेकिन बात केवल 14 नवंबर तक ही सीमित नहीं।
आजादी के बाद देश में धड़ल्ले से गांधी और नेहरू की प्रतिमाएं स्थापित की गई थीं। अनगिनत सड़कों-चौराहों, इमारतों, संस्थानों का नामकरण इन दोनों हस्तियों के नाम पर किया गया। पता नहीं खुद गांधी और नेहरू इसे किस तरह से लेते, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उन्हें कल्ट, प्रतीकों, राजनीतिक प्रतिमाओं में सीमित कर दिया गया।
इसकी अति होने के बावजूद इसकी गति नहीं थमी, लेकिन कभी न कभी इस पर किंचित रोक तो लगना ही थी और वैसा जरूर हुआ। 1970 के दशक तक देश कांग्रेस में व्याप्त व्यक्तिपूजा की इस संस्कृति की सीमाएं महसूस करने लगा था। यह ठीक-ठीक कब हुआ, यह बता पाना तो खैर कठिन है, लेकिन वर्ष 1975 को इसकी धुरी जरूर माना जाना चाहिए, जब इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व पार्टी और सरकार के तमाम आयामों पर हावी हो गया था। गौरतलब है कि वह साल सरदार पटेल का जन्मशती वर्ष भी था, लेकिन 'इंडिया इज इंदिरा" के शोरगुल में भला इसकी सुध किसे होती।
लेकिन इसका नतीजा क्या हुआ? व्यक्तिपूजा से तो हम नहीं मुक्त हुए, हां व्यक्तित्वों को अवमूल्यित करने की एक परिपाटी जरूर शुरू हो गई। धीरे-धीरे भगत सिंह, नेताजी, आंबेडकर, पेरियार इत्यादि को भी उनके समर्थक-समूहों द्वारा इतना ही महत्व दिए जाने की चेष्टाएं की जाने लगीं। इस प्रक्रिया में ऐतिहासिक तथ्यों को भी नजरअंदाज किया गया, जोर इस पर था कि जिसका अभाव रहा आया है, उसकी भरपाई की जाए। लेकिन बात अब भरपाई तक ही सीमित नहीं रहकर प्रतिशोध की हद तक जा पहुंची है। इतिहास की भूलों को दुरुस्त करने के बजाय इतिहास को ही बदल देने की कोशिशें की जा रही हैं। यही कारण है कि आज जब हम पटेल का स्मरण करते हैं तो उनकी उपलब्धियों का पुनरावलोकन करने के लिए उतना नहीं, जितना कि नेहरू का कद कम करने के लिए ऐसा करते हैं। इसी तरह नेताजी, आंबेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, पीवी नरसिम्हाराव और यहां तक कि जयप्रकाश नारायण तक का बड़े विचित्र तरीके से पुनराविष्कार करने की कोशिशें की जा रही हैं।
बहरहाल, इससे इस मूल समस्या का समाधान नहीं हो जाता कि ऐसा करने का मौका ही क्यों दिया गया? क्या इसके लिए कांग्रेस और उसकी चयनशील व्यक्तिपूजा ही जिम्मेदार नहीं है? क्योंकि यदि कांग्रेस द्वारा पटेल की उपेक्षा नहीं की जाती, तो क्या अन्य दलों को उन्हें प्रतीकस्वरूप हथियाने का अवसर मिलता? यही बात पटेल के साथ ही अन्य राष्ट्रनायकों के बारे में भी कही जा सकती है।
आज 14 नवंबर है और मुझे पूरा विश्वास है कि मौजूदा सरकार प्रथम प्रधानमंत्री के प्रति आदरांजलि अर्पित करने की औपचारिकता का निर्वाह करने से नहीं चूकेगी। इससे ज्यादा की अपेक्षा तो खैर नहीं की जानी चाहिए। लेकिन कांग्रेस के बारे में क्या? हाल ही में राजीव गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ कंपेरेटिव स्टडीज द्वारा नेहरू पर एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। उसमें गंभीर चिंतकों-विद्वानों द्वारा नेहरू के अवदान का मूल्यांकन करने की कोशिशें की गईं, लेकिन पहले ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि वहां पर स्तुतिगान भी कम नहीं होने वाला है।
इससे बेहतर तो यह होगा कि 14 नवंबर के अवसर पर कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष कहें कि कांग्रेस केवल नेहरू-गांधी परिवार की बपौती नहीं है। कि यह पार्टी इस परिवार के उद्भव से पुरानी और उससे बड़ी है। कि भले ही यह परिवार पूरी एक सदी से इस पार्टी की सेवा कर रहा हो, लेकिन यह दोष भी उसी के सिर है कि उसके कारण पार्टी के अन्य कद्दावर नेताओं का उचित मूल्यांकन नहीं किया जा सका। कि बात केवल कांग्रेस तक ही सीमित नहीं, देश के पास ऐसे लोगों की भी कमी नहीं रही है, जो कांग्रेस के दायरे से बाहर होने के बावजूद हर लिहाज से एक राष्ट्रनायक की हैसियत रखते हैं। यदि वे ऐसा करते हैं तो यह कांग्रेस और देश की गहरी सेवा ही होगी। और अगर वे व्यक्तिपूजा की संस्कृति से ऊपर उठने की हिम्मत दिखाएंगे तो वे इतिहास की भी सेवा करेंगे। तब भाजपा भला कैसे सरदार पटेल व अन्य नेताओं का यह कहते हुए पुनर्मूल्यांकन करने की कोशिश कर सकती है कि प्रथम परिवार द्वारा उनकी उपेक्षा की गई है?
खबरें हैं कि केंद्र सरकार द्वारा डाक टिकटों पर से इंदिरा और राजीव गांधी की छवियां हटाने की कोशिश की जा रही है। अगर ऐसा होता है तो डाक टिकटों पर उनकी छवियां अंकित करना जितना अनुचित था, यह उससे भी अधिक निंदनीय कृत्य होगा। और कौन जानता है कि इसके बाद टिकटों की एक नई सीरीज भी जारी हो जाए, जिस पर किन्हीं दूसरे नायकों की छवियां अंकित हो? एक चेहरे के स्थान पर दूसरा चेहरा आ जाए?
भारतीय मुद्रा पर महात्मा गांधी की छवि अंकित रहती है। महात्मा के स्थान पर किसी और की छवि को वहां पर स्थापित करना तो खैर बेहद मुश्किल होगा, फिर भी इस तरह से महात्मा की छवि का शोषण किया ही क्यों जाए? क्यों ना वहां पर इसके स्थान पर हमारे पर्यावरण, वन्यजीवन और शिल्प से जुड़ी छवियां अंकित की जाएं। व्यक्तियों की छवियों को मुद्राओं पर अंकित करके पर्सनैलिटी कल्ट की प्रवृत्ति को क्यों बढ़ावा दिया जाए? राज्यसत्ता द्वारा अनेक चिह्नों, प्रतीकों, सीलों आदि का उपयोग किया जाता है और एक प्रतीक को बदलकर उसके स्थान पर दूसरे का उपयोग करने की प्रवृत्ति चलन में रही है। हम एक गणतांत्रिक देश हैं, कोई राजशाही नहीं। क्या एक गणतांत्रिक देश में ऐसी प्रवृत्तियां स्वागतयोग्य कही जा सकती हैं? डॉ. आंबेडकर ने हमें बहुत पहले चेता दिया था कि राजनीति में भक्ति और व्यक्ति-पूजा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह हमें अधिनायकवाद की ओर ले जाती है

नेहरू की विरासत का मूल्यांकन जरूरी @पुष्‍पेश पंत

पिछले लगभग डेढ़ साल से हमारे देश में बहस छिड़ी हुई है कि जबसे केंद्र में मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार का गठन हुआ है, तभी से नेहरू की विरासत को नष्ट करने का षड्यंत्रकारी अभियान जारी है। मोटा-मोटा तर्क यह है कि नेहरू की विरासत का अभिन्न् अंग जनतांत्रिक संस्कार और धर्मनिरपेक्ष विचार है। इसका कोई मेल फासीवादी मानसिकता वाले सांप्रदायिक तत्वों से नहीं हो सकता। इसके अलावा भारत की बहुलतावादी संस्कृति को सहज भाव से स्वीकार करने वाले नेहरू के विचारों का संघर्ष संकीर्ण, असहिष्णु विचारधारा से अनिवार्य है। इसमें दो-तीन बातें और जोड़ सकते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक सोच, औद्योगीकरण और शहरीकरण को भारत के पुनर्जागरण और सबलीकरण के साथ जोड़ने वाले प्रमुख व्यक्ति भी जवाहरलाल नेहरू ही समझे जाते हैं। समाजवादी संस्कार हों या गुटनिरपेक्ष शांति समर्थक स्वाधीन विदेश नीति, यह भी नेहरू की विरासत का हिस्सा माना जाता रहा है।
यह वर्ष नेहरू के जन्म के सवा सौ साल पूरे हो जाने का वर्ष है और इसलिए उपरोक्त बातों के अलावा भारत के पहले प्रधानमंत्री के जीवन व कृतित्व का तटस्थ मूल्यांकन करने का यह अच्छा अवसर है। नेहरू के देहांत के बाद आधी सदी बीत चुकी है और समय के प्रवाह के साथ पूर्वाग्रह पक्षधरता आदि से मौजूदा पीढ़ी लगभग पूरी तरह मुक्त है।
सबसे पहली जरूरत यह रेखांकित करने की है कि भारत की आजादी की लड़ाई हो या आजादी के बाद राष्ट्रनिर्माण की चुनौतियों का सामना करने की दिलेरी, इनका श्रेय अकेले नेहरू को कतई नहीं दिया जा सकता और जो कुछ हम अपने इर्द-गिर्द देखते है, वह सब सिर्फ नेहरू की विरासत नहीं है। यह जरूर है कि आजादी के बाद नए भारत की दिशा तय करने में नेहरू ने उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने भारत में शासन का वैचारिक आधार उपलब्ध कराया और लंबे समय तक उसी आधार को आगे बढ़ने का मंत्र समझा जाता रहा। जबकि हकीकत यह है कि 'नेहरू के अपनों के भारत" और राष्ट्रपिता 'गांधी के सपनों के भारत" में एक गहरी और दर्दनाक खाई है, जिसे कोई भी अनदेखा नहीं कर सकता। गांव और शहर, खेती-बाड़ी और उद्योग-धंधों का बैर हमेशा से चला आया है और यही देहाती 'जहालत" और शहरी 'अकलमंदी" का भेद बापू और नेहरू के बीच लगातार तनाव पैदा करता रहा था।
हम बड़ी आसानी से उस विरासत को भुला देते हैं, जिसका श्रेय आजादी की लड़ाई के दूसरे दिग्गज नेताओं को दिया जाना चाहिए। साढ़े पांच सौ से अधिक रियासतों और रजवाड़ों का भारतीय संघ में विलय करवाने का पराक्रम सरदार पटेल ने दिखाया था और उन्हीं ने औपनिवेशिक नौकरशाही के इस्पाती ढंाचे को आजाद भारत की बदली जरूरतों के अनुसार नए सांचे में ढालने का बीड़ा भी उठाया। नेहरू की कैबिनेट में शिक्षा संस्कृति और वैज्ञानिक शोध मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया था दूसरे महारथी मौलाना आजाद को। उनके कार्यकाल में जिन बड़े-बड़े कामों का बीड़ा उठाया गया और जो आज भी गर्व से हमारा माथा ऊंचा करते हैं, उनका सेहरा भी नेहरू को नहीं बांधा जा सकता।
नेहरू का एक प्रसिद्ध भाषण है जिसमें उन्होंने बड़े-बड़े बांधों, इस्पात संयंत्रों आदि की तुलना नए भारत के नए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजाघरों से की थी। आज भी आप भारत के दूरदराज कोनों में जाएं तो भिलाई, हीराकुंड, बोकारो या भाखड़ानांगल को देखकर आप रोमांचित हुए बिना नहीं रह सकते। क्या दूरदर्शी सोच थी भारत के पहले प्रधानमंत्री की! विडंबना यह है अगर ठंडे दिमाग से और जरा तफसील से पड़ताल की जाए तो यह बात जाहिर होते देर नहीं लगेगी कि महत्वाकांक्षी पंचवर्षीय योजनाओं का मसौदा द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ही भारत के टाटा, बिड़ला जैसे प्रमुख उद्योगपतियों ने पहले तैयार कर लिया था। साम्यवादी रुझान के मेघनाथ साहा जैसे वैज्ञानिकों ने इसे वंचित गांव वालों के पक्ष में संतुलित करने का सार्थक प्रयास किया था। भौतिक और रसायन शास्त्र की राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के गठन की परियोजना भी आजादी के पहले मूर्तरूप लेने लगी थी। टाटा के दान से बेंगलुरु में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंसेज की स्थापना पहले ही हो चुकी थी और यहीं कार्यरत होमी भाभा ने पत्र लिखकर नेहरू की दिलचस्पी अणु शक्ति के शांतिपूर्ण उपयोग में जगाने की कोशिश की।
बची रहती है बात जनतांत्रिक संस्कार और रचनात्मक विदेश नीति की। इन दोनों संदर्भों में भी व्यक्तिपूजक महिमामंडन करने वाले मिथक निर्माण ने बड़ी गलतफहमियों को जन्म दिया है। जनतांत्रिक प्रणाली को प्रतिष्ठित करने वाले हमारे संविधान निर्माण में बाबासाहब आंबेडकर, बाबू राजेंद्र प्रसाद की भूमिका प्रमुख रही। आज यदि भारत का जनतंत्र वंशवादी नजर आता है, तो यह भी नेहरू की विरासत का ही हिस्सा है। अपने से असहमत प्रतिपक्षियों का नेहरू लगभग औपनिवेशिक अंदाज में दमन-शमन करते थे। इसी कारण राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण राजगोपालाचारी आदि से मतभेद और मनमुटाव होते रहे। सूबों में अपने विश्वासपात्र सामंती मिजाज के क्षत्रपों के माध्यम से सम्राट की मुद्रा में नेहरू राजकाज चलाते थे। मजेदार बात यह है कि किसी भी तरह का सैद्धांतिक मतभेद नेहरू बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। शेख अब्दुल्ला हों या बंबई में मोरारजी देसाई, दोनों इसी की मिसाल हैं। फिर क्यों जिक्र हर बार सिर्फ नेहरू की विरासत का होता है? ऐसा शायद इसीलिए संभव हुआ, क्योंकि नेहरू के निधन के बाद भी बहुत लंबे समय तक उनकी पार्टी, खासकर उनके अपने पारिवारिक वारिस ही भारत पर राज करते रहे हैं।

216 साल बाद आई टीपू की याद! @एनके सिंह

इतिहासकार बीडी पांडेय ने राज्यसभा के पटल पर 29 जुलाई 1977 को कुछ चौंकाने वाले तथ्य रखे थे। उन्होंने बताया था कि मैसूर के शासक टीपू सुलतान के बारे में उत्तर भारत के सात राज्यों में बच्चों के पाठ्यक्रमों में एक पाठ है, जिसमें पढ़ाया जा रहा है कि मैसूर के 3000 ब्राह्मणों ने इसलिए आत्महत्या कर ली थी, क्योंकि टीपू की तरफ से दबाव डाला जा रहा था कि वे इस्लाम कबूल कर लें। पांडेय ने बताया कि जब उन्होंने छानबीन की तो पाया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था, बल्कि इसके उलट टीपू 156 मंदिरों के रखरखाव के लिए शाही खजाने से हर माह रकम देता था, उसके संबंध शंकराचार्य से बेहद मधुर थे और उसके राज्य के प्रधानमंत्री पुन्न्ैया व सेनापति कृष्णा राव ब्राह्मण थे। इस चौंकाने वाले तथ्य के बावजूद न तो तत्कालीन सत्ताधारी जनता पार्टी और न ही विपक्षी कांग्रेस ने मांग की कि इसे दुरुस्त किया जाए। तबसे लेकर आज तक कांग्रेस, वामपंथी दल, तीसरा मोर्चा, भाजपा (जनसंघ का नया अवतार) कई बार शासन में आ चुके हैं, लेकिन किसी ने तथ्यों को पता करने की जरूरत नहीं समझी। शायद राजनीति में हकीकत से ज्यादा भावना मदद करती है।
पांडेय, जो कि इतिहासकार-प्रोफेसर होने के अलावा सांसद और ओडिशा के राज्यपाल भी रह चुके थे, ने सदन में बताया कि जब उन्होंने पाठ्यक्रम देखा तो उस लेख के लेखक का पता जाना। लेखक थे कलकत्ता विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष महामहोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री। पांडेय ने मैसूर विश्वविद्यालय के इतिहास के विभागाध्यक्ष और जाने-माने इतिहासकार प्रोफेसर श्रीकांतिया को पत्र लिखकर सच्चाई जानना चाही। श्रीकांतिया का जवाब था कि समूचे मैसूर गजेटियर में कहीं भी इस घटना का उल्लेख नहीं है कि टीपू के दबाव के चलते हजारों ब्राह्मणों ने आत्महत्या की। इसके बाद पांडेय ने शास्त्री को पत्र लिखकर पूछा कि इस तथ्य का सोर्स क्या है? जवाब नहीं आया। दोबारा पत्र भेजा गया, लेकिन फिर कोई जवाब नहीं। तब पांडेय ने कलकत्ता विवि के कुलपति प्रोफेसर आशुतोष मुखर्जी को पत्र लिखकर इस गलती की ओर ध्यान दिलाया। तब जाकर सात राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और असम में पाठ्यक्रम से यह लेख हटाया गया। हालांकि पांडेय ने राज्यसभा को बताया कि कुछ साल बाद उन्हें पता चला कि यह लेख फिर से उत्तर प्रदेश में कक्षा सात के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है।
तमाम इतिहासकार निर्विवाद रूप से यह मानते हैं कि टीपू के खिलाफ निजाम, मराठा शासक और अंग्रेजी हुकूमत एक हो गई थी। यह भी तथ्य है कि अकेले टीपू ही अंग्रेजों के खिलाफ आजीवन लड़ता रहा। इस दौरान जिस किस्म की सैन्य शक्ति और सामरिक कौशल का परिचय दिया, उसकी नेपोलियन बोनापार्ट तक ने प्रशंसा की थी। नेपोलियन तो टीपू की मदद के लिए भी आना चाहता था।
प्रतिमान बनाना हर समाज के लिए जरूरी प्रक्रिया है। लेकिन भारत में हमने पिछले दो सौ साल से कुछ गलत आइकॉन बनाने का धंधा भी शुरू किया। इसके तीन मुख्य कारण हैं। पहला अंग्रेज 100 साल से ज्यादा समय तक गलत तथ्य पेश करते रहे थे या सही तथ्य छुपाते रहे थे, लिहाजा हम अपने प्रतिमानों का सही आकलन नहीं कर पाए। दूसरा, आज हम राजनीति की वजह से गलत प्रतिमान खड़े कर रहे हैं। कोई गोडसे का मंदिर बनवा रहा है तो किसी को अचानक टीपू के जन्मदिवस की याद आ जाती है। कई बार यह भी कोशिश हो रही है है कि दूसरे के प्रतिमानों को अपना बनाकर पेश करो यानी प्रतिमानों की चोरी। तीसरा और सबसे खतरनाक है जनसंचार माध्यमों का इस्तेमाल कर त्रुटिपूर्ण प्रतिमान बनाना या सही प्रतिमानों को दबाना। टीवी के मनोरंजन कार्यक्रम के किसी डांस शो का युवा किशोरों के लिए आइकॉन बन जाता है, पर एक रिक्शा चालक का बेटा जो आईआईटी की परीक्षा में बगैर किसी महंगी कोचिंग के शीर्ष में आता है, वह हमारे नौनिहालों का प्रतिमान नहीं बन पाता।
भारत में आधुनिक शिक्षा के जनक लार्ड मैकाले के साथ ही एक साजिश शुरू होती है युवाओं में बौद्धिक स्तर पर एक खास किस्म की परजीवी मानसिकता विकसित करने की, जिसे 1857 के गदर के बाद हिंदू-मुसलमान विभेद के रूप में विकसित किया गया। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार को टीपू सुल्तान को आइकॉन बनाने की याद इस शासक के मरने के 216 साल बाद आई। लेकिन इसी कांग्रेस के शासनकाल में दशकों तक उत्तर भारत के आधा दर्जन से अधिक राज्यों में बच्चों के पाठ्यक्रमों में बताया जाता रहा कि मैसूर में इस शासक के हिंदुओं के धर्म-परिवर्तन के लिए दबाव के कारण 3000 ब्राह्मणों ने आत्महत्या की। इस तथ्य की आज तक किसी ने जांच करने की कोशिश की कि हकीकत क्या थी? अंग्रेजों और बाजार के गलत प्रतिमानीकरणों से उगी फसल आज भी हम काट रहे हैं

विकसित देश के लिए नेहरू की सोच @पीटर रोनाल्ड डिसूजा, डॉ एस राधाकृष्णन चेयर, राज्यसभा

महात्मा गांधी ने अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में जवाहरलाल नेहरू को ही क्यों चुना? वह सरदार पटेल को चुन सकते थे, जो उनके गृह-राज्य के थे। वह अंबेडकर का भी चयन कर सकते थे, जो दलितों को लेकर गांधी की तरह ही राय रखते थे। उनके वारिस मौलाना आजाद भी हो सकते थे, ताकि अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा हो सके। 

मगर उन्होंने नेहरू के रूप में एक ऐसे शख्स को चुना, जिनकी राजनीतिक सोच और भारत को लेकर नजरिया उनके विपरीत था। आखिर बापूजी ने नेहरू को ही क्यों चुना? लोग चाहें, तो इसका जवाब नेहरू के भाषणों, या उनकी नीतियों, या गुटनिरपेक्ष आंदोलन में उनकी नेतृत्व क्षमता या फिर गांधी में उनकी अटूट श्रद्धा में ढूंढ़ सकते हैं। मगर मैं इसका जवाब नेहरू के पत्रों में तलाशने की कोशिश करूंगा, जो खास तौर पर उन्होंने मुख्यमंत्रियों को लिखे।

नेहरू ने 16.5 वर्षों में करीब 378 पत्र लिखे। इसे राष्ट्र-निर्माण का साझा सपना बनाने की कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें न सिर्फ बड़े-बड़े मुद्दों पर चर्चा की गई, बल्कि राजनीति की छोटी-छोटी बातों को भी जगह दी गई। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोनॉमिकल ऐंड संस्कृत रिसर्च के निदेशक राम स्वरूप शर्मा को 16 जुलाई, 1959 को लिखे पत्र में प्रधानमंत्री नेहरू ने लिखा- प्रिय श्री शर्मा। 13 जुलाई को आपका एक पत्र मुझे प्राप्त हुआ। धन्यवाद। आपने उस पत्र में ज्योतिष में मेरा विश्वास न होने का जिक्र किया है। यह सच है। हर तरह के वैज्ञानिक शोध, जो वैज्ञानिक सिद्धांतों पर कसे जाते हों, स्वागत के योग्य हैं। मेरा मानना है कि हमारे पूर्वजों ने खगोलीय गणना में काफी बेहतर काम किया है। आप इन्हें विज्ञान की कसौटी पर कसने के जो भी प्रयास कर रहे हैं, वे स्वागतयोग्य हैं। मगर इस किताब को मुझे समर्पित करना उचित नहीं होगा।

ज्योतिष और वैज्ञानिक सोच पर हमारी बहस के संदर्भ में नेहरू के इस पत्र में चार सबक निहित हैं। पहला, ज्योतिष भविष्यवाणी के दावों में उनका कोई विश्वास नहीं था, इसलिए ज्योतिष की किताब को उन्हें समर्पित करना उनकी वैज्ञानिक सोच के खिलाफ गया। दूसरा, प्राचीन भारत के ज्योतिष और खगोल विज्ञान में अंतर संबंधी उनकी सोच, और पूर्वजों की उनकी सराहना। तीसरी बात थी, ज्योतिष में अपने अविश्वास के बावजूद ज्ञान के सभी आयामों में वैज्ञानिक शोध को लेकर उनका सकारात्मक रुझान। और चौथा, लोगों की ज्योतिष में गहरी आस्था होने के बाद भी बतौर प्रधानमंत्री ज्योतिष के खिलाफ राय रखना। ऐसा करना उनके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता था, मगर वह खुद को देश का पहला शिक्षक मानते थे, जिनके लिए आधुनिकता और विज्ञान को सार्वजनिक संस्कृति में शामिल करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। हमें खुद से पूछना चाहिए कि उस वैज्ञानिक सोच की दिशा में आज क्या हो रहा है? तर्कवादी क्यों मारे जा रहे हैं?

वैज्ञानिक सोच के प्रति नेहरू जितने संजीदा थे, उतने ही संवेदनशील वह गरिमा और आत्मसम्मान जैसे मुद्दों को लेकर भी थे। 12 जून, 1960 को मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरू ने लिखा-  मैं आपको झाड़ू के विषय में बताना चाहता हूं, जिसका इस्तेमाल हमारे सफाईकर्मी तो करते ही हैं, हम अपने घरों में भी उसका प्रयोग करते हैं। सामान्य भारतीय झाड़ू हम झुककर या फिर बैठकर ही लगा सकते हैं... एक लंबे बेंत के सहारे बंधा झाड़ू या ब्रश, जिसे खड़े रहकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है, काम की दक्षता के हिसाब से भी ज्यादा प्रभावशाली है और इसे इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के लिए अपेक्षाकृत कम थकाऊ भी है। पूरी दुनिया में बेंत लगे झाड़ू अथवा ब्रश का इस्तेमाल होता है। तब क्यों हम एक अक्षम और मनोवैज्ञानिक तौर पर गलत व्यवहार का प्रयोग कर रहे हैं? नीचे झुककर झाड़ू देना शारीरिक रूप से अधिक थका देने वाला काम है और मेरा मानना है कि यह एक तरह की मानसिक गुलामी की सोच भी पैदा करता है।  यह पत्र बताता है कि नेहरू का ध्यान न सिर्फ सफाई कर्मचारियों के श्रम की ओर था, बल्कि दासता संबंधी  सोच की ओर भी था। आधुनिक उपकरणों के बिना सीवर साफ करने वालों की दुर्दशा आज भी जारी है, क्योंकि हमारी नगरपालिकाएं नेहरू की उस संवेदनशीलता से कोसों दूर चली गई हैं।

 तीसरा पत्र खाद्यान्न संकट पर उनकी चिंता दर्शाता है। इस समस्या से निपटने के लिए उनका एक केंद्रीय प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव था। वह संघीय इकाइयों के बीच इस तरह का सहयोग बढ़ाना चाहते थे, ताकि अतिरिक्त खाद्यान्न केंद्र उन राज्यों को भेज सके, जहां अनाज की कमी हो। इतना ही नहीं, आधुनिक उपकरणों की सहायता से खाद्यान्नों की स्थिति पर निगरानी और व्यापक सार्वजनिक शिक्षा के भी वह हिमायती थे। तीन फरवरी, 1949 को लिखे पत्र में उन्होंने बताया है कि यह काम कैसे हो सकता है- अगर पर्याप्त मात्रा में धान नहीं है, तो गेहूं का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अगर धान और गेहूं, दोनों की उपलब्धता कम है, तो कुछ और प्रयास करने चाहिए... लोगों को उन खाद्यान्नों की तरफ उन्मुख किया जाना चाहिए, जिनकी उपलब्धता है।  तब उन्होंने पांच तरीके बताए थे, जिन्हें अपनाकर खाने की आदतें बदली जा सकती थीं। आज भी संयुक्त राष्ट्र का खाद्य व कृषि संगठन (एफएओ) अपनी रिपोर्ट में भारत को निचले पायदान पर रखता है और बताता है कि लाखों भारतीय भूखे सोने को मजबूर हैं।

चौथा संदर्भ प्रशासन में राजनीतिक दखलंदाजी से जुड़ा है। एक अक्तूबर, 1950 को मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरू ने अगाह किया था- मुझे अक्सर यह सुनने को मिलता है कि जब कोई अधिकारी किसी रसूखदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करता है, तो लोग तुरंत आरोपी गुनहगार को बचाने की गुहार लगाने पहुंच जाते हैं। कई बार मंत्री भी उसे बचाने की बात कहते हैं.. अधिकारियों के काम में इस तरह की दखलंदाजी होगी, तो फिर वे काम कैसे कर सकते हैं?  विडंबना यह है कि राजनीतिक हस्तक्षेप आज की एक सच्चाई है, जिसके कारण हमारी प्रशासनिक व्यवस्था खस्ता हालत में है।

कहने को ये चार छोटी कहानियां हैं, मगर यह उस शख्स के चिंतन को सामने लाती हैं, जो उन छोटी-छोटी चुनौतियों के बारे में भी सोचता था, जिनसे भारत जूझ रहा था। भाजपा उनके नाम को कमतर करने की कोशिश कर सकती है, मगर वह उनकी विरासत को कम नहीं कर पाएगी। कांग्रेस को भी वे चिट्ठियां फिर से पढ़नी पड़ेंगी, जो खुद उसके शैक्षिक उत्थान के लिए जरूरी है। बुद्धिजीवियों को नेहरूवादी नजरिये पर एक व्यापक अभियान चलाना चाहिए।  अंधविश्वास, अपमान, भूख और राजनीतिक हस्तक्षेप को समेटते इन चार पत्रों के संदेश को समझने की जरूरत है। यही वह अकेली सोच है, जो स्थिर व प्रगतिशील भारत की राह प्रशस्त कर सकती है।

वरना हम नायक ढूंढ़ते रह जाएंगे @अरुण कुमार त्रिपाठी

वैश्वीकरण और हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद व इस्लामी आतंकवाद के इस तेजाबी दौर में हमारे नायकों की कड़ी धुलाई चल रही है। धुलाई इतनी कठिन है कि या तो हमारे नायक इस अक्वारेजिया में विलीन हो जाएंगे या फिर जीर्ण-शीर्ण होकर किसी कोने में रखने लायक बचेंगे। ताजा विवाद 18वीं सदी के मैसूर के शासक टीपू सुल्तान को लेकर है। एक तरफ कर्नाटक सरकार टीपू को देशभक्ति, भारतीयता और धर्मनिरपेक्षता का आदर्श बताते हुए उनकी जयंती मनाने पर डटी है तो दूसरी तरफ भाजपा और विहिप उन्हें हिंदुओं का हत्यारा साबित करते हुए इसे अल्पसंख्यक तुष्टीकरण बता रही है। इस बीच रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकारों ने कहा है कि हमें लोकतंत्र में राजाओं-रानियों की जयंती मनानी ही नहीं चाहिए।
टीपू सुल्तान अच्छा था या बुरा इस बारे में परस्पर विरोधी ऐतिहासिक तथ्य हैं और अगर हम इतिहास को तार्किक और निरपेक्ष दृष्टि से नहीं देखेंगे तो किसी एक तरफ फिसलने का खतरा रहेगा। नब्बे के दशक में संजय खान के धारावाहिक ‘टीपू सुल्तान की तलवार (स्वॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान)’ को लेकर विवाद हुआ था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और आपत्ति उठाने वाले मुकदमा हार गए। आरोप यही था कि टीपू ने मालाबार पर हमला किया और हजारों हिंदुओं को मारा, मंदिरों को अपवित्र किया और धर्म परिवर्तन किया। टीपू के बचाव में एक ऐसा व्यक्ति निकला जिसकी आज कल्पना नहीं की जा सकती। वे थे भाजपा के तत्कालीन उपाध्यक्ष केआर मलकानी। मलकानी भाजपा के विचारक व उसके संस्थापकों में एक थे। वे ऑर्गनाइजर के संपादक भी रह चुके थे।

मलकानी ने टीपू के पक्ष में जो तर्क दिए वे उनकी किताब ‘इंडिया फर्स्ट’ के अध्याय ‘ग्रेटनेस ऑफ टीपू सुल्तान’ में संकलित हैं। इंडिया फर्स्ट वही अवधारणा है, जिसका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार जिक्र करते हैं। उनका कहना था कि टीपू के मालाबार पर आक्रमण को कुछ लोग हिंदू विरोधी बताते हैं, जिसका सर्वाधिक फायदा अंग्रेजों ने उठाया और उन्होंने इस बारे में टीपू के बेटों की गवाही भी पेश की। पर वह हिंदुओं पर नहीं अंग्रेजों के व्यावसायिक भागीदारों पर हमला था। मलकानी का कहना था कि हिंदू विरोधी कहानी की वजह यह भी थी कि अंग्रेजों ने टीपू के बेटों को अपनी मुट्‌ठी में करने के लिए उनका भत्ता 600 प्रतिशत बढ़ा दिया था। मालाबार पर हुए जुल्म की जिम्मेदारी जरूर टीपू पर जाती है, लेकिन वैसा करने वाले पिंडारी और ठग थे, जिन्हें वह रोक नहीं सका।
टीपू की तारीफ में मलकानी अंग्रेजों के विरुद्ध उसकी बहादुरी का जिक्र करते हुए मंगलूर संधि पर बनाए गए एक कार्टून का वर्णन करते हैं। उस कार्टून में अंग्रेज टीपू के आगे घुटने टेक कर खड़े हुए हैं। टीपू गवर्नर की नाक पकड़कर खड़ा हुआ है, जो हाथी की सूंड जैसी लंबी हो गई है और उसमें से सोने-चांदी की वर्षा हो रही है। पर इस कार्टून का आनंद वही ले सकता है, जो भारत में अंग्रेजी शासन का विरोधी है और उसे गुलामी मानता है। जो अंग्रेजों को भारत को सभ्य बनाने के लिए भेजा गया देवदूत मानता हो वह भला कैसे टीपू की बहादुरी की सराहना कर सकता है। मलकानी में वह समझ थी तभी वे भारतीय आजादी के एक नायक की हिफाजत करते हुए कहते हैं कि मालाबार टीपू पर उसी तरह धब्बा है, जिस तरह महान शासक अशोक पर कलिंग में एक लाख लोगों को मारने का, बंदा बैरागी पर 30 हजार मुस्लिमों को मारने का है।
हम इतिहास के इन दागदार प्रसंगों को आजाद भारत के शासकों के समय हुई घटनाओं तक खींच सकते हैं और कह सकते हैं इंदिरा गांधी पर इमरजेंसी लगाने, ऑपरेशन ब्लू स्टार करने, राजीव गांधी पर सिख विरोधी दंगा होने देने, भाजपा, आडवाणी और संघ परिवार पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर बाबरी मस्जिद गिराने, नरेंद्र मोदी पर गुजरात का 2002 का दंगा होने देने और दूसरे तमाम क्षेत्रीय नायकों पर भ्रष्टाचार करने और वैचारिक समझौता करने के धब्बे भी उसी तरह हैं। सवाल तो स्वाधीनता संग्राम के उन महानायकों पर भी है, जिन्हें भारत ही नहीं भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश के साझे पुरखों के तौर पर माना जाना चाहिए। अगर देश में सभी लोग महात्मा गांधी को नायक मानते होते तो न तो नाथूराम गोडसे उनकी हत्या करता और न ही गोडसे की फांसी के दिन पूरे देश में कार्यक्रम होते और उनके नाम से वेबसाइट जारी होती।

भगत सिंह और गांधी के साझा नायकत्व पर कभी-कभी भारत-पाकिस्तान दोनों मुल्कों से आवाज उठती है और कभी-कभी 1857 के शहीदों के लिए भी, लेकिन अभी तक तो ऐसा आयोजन नहीं हुआ जिसमें दोनों देश मंच साझा कर सकें। नायकत्व तो उन मिथकीय चरित्रों का भी विवादित है जिन पर कम से कम एक महजब के मानने वाले एकमत बताए जाते हैं। राम के विरोध में सीता निष्कासन तथा शंबूक वध और विष्णु के विरोध में राजा बलि, हिरण्यकश्यप आदि तमाम असुर राजाओं से छल करने का आख्यान चलाने वाला दलित विमर्श जारी है।

धर्म और जाति में बुरी तरह बंटे और बंटते जा रहे भारतीय समाज के इतने विवादों और विखंडनों की स्थिति में न तो ऐतिहासिक नायकत्व निरापद है न ही पौराणिक। विशेषकर जब कोई नायक मुस्लिम है तो उसे स्थापित करना तो और भी जोखिम का काम होता जा रहा है। एक तो उसकी सहिष्णुता की कठिन से कठिन परीक्षा ली जाएगी और फिर उसके बलिदान में भी अगर मजहबी तत्व है तो उसे खारिज करने में देर नहीं की जाएगी। इस दौरान जिसकी भी प्रतिमा स्थापित करने की कोशिश होगी उसे ही भंजित करने वाला कोई न कोई खड़ा हो जाएगा। सारा नायकत्व किसी न किसी वैचारिक आग्रह और दुराग्रह पर गढ़ा जा रहा है और खंडित किया जा रहा है। वैचारिक दुराग्रह किसी के प्राण न्योछावर करने को भी मिथ्या बता सकता है और किसी के सामान्य वक्तव्य को भी शहीदी साबित कर सकता है।
हम जितने अविश्वास और विखंडन की स्थिति में जी रहे हैं उसमें हमारी सारी रचनात्मकता पर ग्रहण लगने वाला है। हम न तो साहस के साथ इतिहास लिख पाएंगे और न ही उपन्यास, कविता और नाटक। हम चित्रकला और मूर्तिकला का विकास भी नहीं कर पाएंगे। हमारे लिए ऐतिहासिक धारावाहिक और फिल्में बनाना भी दुरूह हो जाएगा। इससे बचने का एक उपाय है और वह यह कि या तो हम मिथक और इतिहास के समस्त नायकों को भूल जाएं और सिर्फ सिनेमा के नायकों को याद रखें। पर क्या ऐसा संभव है? शायद नहीं। शायद तब हम जी नहीं पाएंगे। हमें यह मानना होगा कि एक विविधतापूर्ण और लंबे इतिहास वाले समाज में तमाम नायक रहेंगे और वे सभी सब को स्वीकार्य नहीं होंगे। हमें एक-दूसरे के नायकों को स्वीकार करना होगा। यही सहिष्णुता है। वरना हम ढूंढ़ते रह जाएंगे और हमारे समाज में नायक ही नहीं रहेंगे। सब महज खलनायक होंगे

जॉर्ज के बरी होने की चर्चा तक नहीं @यशवंत सिन्हा

बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया होगा कि 13 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने वाजपेयी सरकार में रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडीस को कारगिल ताबूत घोटाले में पूरी तरह निर्दोष करार दिया। किंतु सबको याद होगा कि फर्नांडीज पर ताबूत मामले में कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए थे। उन्हें कफन चोर की संज्ञा भी दी गई थी और कांग्रेस ने संसद में उनका बहिष्कार भी किया था। यूपीए की सरकार आने के बाद जून 2006 में सीबीआई ने इस मामले की जांच शुरू की और उसने भी फर्नांडीस को निर्दोष करार दिया था। दिसंबर 2013 में सीबीआई कोर्ट ने दूसरे आरोपियों को भी बरी कर दिया। उसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट गया, जिसमें 13 अक्टूबर को फैसला सुनाया गया और फर्नांडीस को पूरी तरह निर्दोष करार दिया गया। उसी प्रकार भारतीय नौ सेना के लिए इज़रायल के साथ हुए बराक मिसाइल सौदे के बारे में भी फर्नांडीस तथा अन्य के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे। यह मामला तहलका के माध्यम से 2001 में सामने आया था। इसमें भी सीबीआई की जांच हुई और किसी को दोषी नहीं पाया गया। कोर्ट ने सीबीआई की बात मानते हुए दिसंबर 2013 में मामला बंद कर दिया।

फर्नांडीस कांग्रेस पार्टी के प्रबल विरोधी थे। आपातकाल में उनकी भूमिका बागी की थी। लोकसभा में वे पहली बार कांग्रेस के दिग्गज नेता एसके पाटिल को हराकर आए थे। संसद में भी वे कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध आक्रामक भूमिका में रहते थे। कांग्रेस पार्टी और उनके संबंंधों में भयंकर तथा व्यक्तिगत कटुता थी। इस स्थिति में फर्नांडीस, पर कांग्रेस का भीषण आक्रमण आसानी से समझ में आता है। अत: फर्नांडीस के चरित्र, उनकी ईमानदारी पर मौका मिलते ही आक्रमण करना कांग्रेस पार्टी की आदत-सी बन गई थी। ताबूत तथा अन्य रक्षा सौदों के मामले में फर्नांडीस पर आरोप लगाना आसान था, क्योंकि मीडिया में कुछ लोगों ने इसे मुद्‌दा बनाया था। मीडिया में कुछ लोगों का यह भ्रम है कि वही नेताओं को बनाते हैं और बिगाड़ते हैं। कलयुग के इस दौर में यह सही है कि उपलब्धियों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उनका प्रचार हो गया है। बनाने-बिगाड़ने के इस खेल में तथ्यों का कोई महत्व नहीं रह गया है। काम कम और प्रचार ज्यादा कई नेताओं की शैली बन चुकी है। उसी प्रकार बिना तथ्यों के किसी नेता के ऊपर आरोप लगाना तथा उसकी छवि बिगाड़ देना भी अब खेल हो गया है। छवि बनाने में वर्षों लगते हैं, बिगाड़ने में कुछ क्षण।
सार्वजनिक जीवन में आरोप लगते ही उनको सही मान लिया जाता है, फिर वह अारोप तथ्यों से परे क्यों न हों। बरी होने की खबर, जैसाकि हमने फर्नांडीज के मामले में देखा, या तो छपती नहीं है या छोटी खबर बनकर रह जाती है। अत: फर्नांडीस पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए, संसद में कांग्रेस ने कई वर्षों तक उनका बहिष्कार भी किया। यह सब सुर्खियों में रहा, लेकिन फर्नांडीस को क्लीनचिट मिली, सीबीआई जांच के वर्षों बाद सारे आरोप बेबुनियाद पाए गए यह खबर हैडलाइन नहीं बन पाई।

पूर्व संचार सचिव श्यामल घोष का मामला तो इससे भी ज्यादा गंभीर है। फर्नांडीज तो सार्वजनिक जीवन में थे, संसद में थे, अपनी सफाई दे सकते थे, लेकिन एक नौकरशाह के लिए यह सब कहां संभव है? ईमानदार नौकरशाह तो केवल पिसता है। श्यामल घोष के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 2जी घोटाले को देश की जनता भूली नहीं होगी। संसद का पूरा सत्र बर्बाद करने के बाद यूपीए सरकार ने अंतत: विपक्ष की उस मांग को स्वीकार कर लिया कि इसकी जांच के लिए एक संसदीय समिति बनानी चाहिए। 2जी घोटाले के दाग से बचने के लिए सत्तारूढ़ कांग्रेस ने कई चालें चलीं। पहले तो उन्होंने कहा कि इसमें कोई घाटा हुआ ही नहीं था। दूसरा, उन्होंने कहा कि वे जिस नीति पर चल रहे थे, वह वाजपेयी सरकार की ही नीतियां थीं। तीसरा, उन्होंने कहा कि इससे भी बड़ा घोटाला वाजपेयी सरकार के समय हुआ था। चौथा, संसद की लोक लेखा समिति के द्वारा इस मामले की जो जांच की जा रही थी, उसको उन्होंने हंगामे की भेंट चढ़ा दिया। संसद के सदनों में तो हंगामा देखा था, लेकिन संसद की समिति में हंगामा मैंने पहली बार देखा। पांचवां, जब संसदीय समिति का बनना तय हो गया तो भाजपा तथा वाजपेयी सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए कांग्रेस ने जोर दिया कि जांच 1998 से शुरू की जाए, जिसमें वाजपेयी सरकार का संपूर्ण कार्यकाल शामिल था। घोटाला यूपीए सरकार में हुआ था और जांच वाजपेयी सरकार के कार्य-कलापों की होने लगी। संयुक्त संसदीय समिति में जो राजनीति हुई तथा सत्तारूढ़ दल द्वारा लोकतांत्रिक परंपराओं की जिस तरह धज्जियां उड़ाई गईं वह जगजाहिर है। मैंने एक अलग रिपोर्ट तैयार की, जो भाजपा के छह सदस्यों ने अध्यक्ष को सौंपी और वह अभिलेखों का हिस्सा बनी।

वाजपेयी सरकार को यूपीए सरकार की श्रेणी में लाने के लिए तत्कालीन दूरसंचार मंत्री और उनकी सरकार ने बहुत गंदा खेल खेला। उन्होंने सेवानिवृत्त न्यायाधीश को जांच के लिए नियुक्त किया, जिसने ईमानदारी ताक पर रखते हुए अनाप-शनाप रिपोर्ट दी। उस रिपोर्ट के आधार पर एक मामले में सीबीआई ने जांच शुरू की। यह मामला जनवरी 2002 का था, जब प्रमोद महाजन दूरसंचार मंत्री थे और श्यामल घोष मंत्रालय के सचिव। महाजन का निधन हो चुका था, इसलिए वे अभियुक्त नहीं बनाए जा सकते थे, लेकिन घोष और तीन दूरसंचार कंपनियों को इसमें आरोपी बनाया गया। आरोप था कि घोष ने कंपनियों की मिलीभगत से कम कीमत पर स्पैक्ट्रम बांट दिया, जिससे सरकारी खजाने को 846 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। सीबीआई अदालत ने 15 अक्टूबर 2015 के फैसले में सीबीआई पर गंभीर आरोप लगाते हुए आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई द्वारा पेश किए गए तथ्य मनगढ़ंत और मिथ्या थे। पूरा मामला पूर्वग्रह से ग्रसित होकर लाया गया था। सीबीआई ने न्यायालय को दिग्भ्रमित करने का प्रयास भी किया। कोर्ट ने सीबीआई निदेशक को आदेश दिया कि वे इसकी जांच करें और सीबीआई के दोषी पदाधिकारियों के विरुद्ध आवश्यक कानूनी कार्रवाई करें। श्यामल घोष को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। मैं यह भी जानता हूं कि अपने लंबे कार्यकाल में उन्होंने लगातार पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ काम किया है। उनका चरित्र पूरी तरह से स्वच्छ है। सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने किसी निजी कंपनी की नौकरी भी नहीं की। ऐसे पदाधिकारी को सेवानिवृत्त होने के दस साल बाद झूठे मुकदमे में फंसाकर बदनाम करना, मानसिक यातना देना, समाज में उनकी प्रतिष्ठा गिराना इत्यादि गंभीर अपराध हैं और ऐसे अपराधियों को माफ करना भारी भूल होगी। मेरा मोदी सरकार से आग्रह है कि वह शीघ्रतिशीघ्र दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध आवश्यक कानूनी कार्रवाई करे।

दो महान नेता और उनकी विरासत @राजदीप सरदेसाई

वर्ष 2012 में हमने महात्मा गांधी (1947 के बाद) के बाद महानतम भारतीय की पहचान के लिए टीवी शो किया था। गांधीजी से कुछ दूरी पर डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर विजेता रहे थे, जबकि जवाहरलाल नेहरू ने टॉप टेन में जगह बनाई थी। नेहरू और डॉ. आंबेडकर, इस देश के दो महान सपूत, जन्म में सिर्फ दो वर्ष का अंतर। आज नेहरू की 125वीं जयंती का समापन हो रहा है, जबकि आंबेडकर की 125वीं जयंती अागामी अप्रैल में भव्य समारोह में मनेगी। कांग्रेस ने दिल्ली के बस स्टैंड्स को नेहरू के पोस्टरों से पाट दिया है, राजीव गांधी फाउंडेशन ने नेहरूवादी मू्ल्यों पर सेमीनार आयोजित किया, लेकिन इसके अलावा नेहरू जयंती के मौके पर ज्यादा कुछ नहीं है। इसके विपरीत हर राजनीतिक दल डॉ. आंबडेकर की जयंती पर बड़े आयोजन की योजना बना रहा है। उनके जन्म स्थान महू में बड़ी संख्या में लोग इकट्‌ठा होंगे। भाजपा से बसपा, कांग्रेस से रिपब्लिकन गुट तक हर राजनीतिक दल उन्हें अपना बनाने का प्रयास करेगा।

जब नेहरू जीवित थे तो उनकी छवि सारे समकालीनों से ऊपर रही खासतौर पर 1950 में सरदार पटेल के गुजरने के बाद। डॉ. आंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार करने का नेतृत्व किया, वे उत्कृष्ट न्यायविद, सुधारक और बुद्धिजीवी थे, लेकिन उस पीढ़ी के कई अन्य नेताओं की तरह वे भी नेहरू के करिश्मे के कारण पृष्ठभूमि में रहे। पहले प्रधानमंत्री को उनके जीवनकाल में लाखों लोग पूजते थे : चाचा नेहरू मूल भारतीय हीरो थे। और इसके बावजूद पिछले दशक में भूमिकाएं उलट गईं: अब डॉ. आंबेडकर को पूजा जा रहा है, जबकि नेहरू की आलोचना हो रही है। आंबेडकर और नेहरू के निधन के बाद उनके क्रमश: उदय और पतन की क्या व्याख्या हो सकती है? स्वाभाविक कारण तो यह होगा कि डॉ. आंबेडकर के विपरीत नेहरू, भारतीय राजनीति की उदीयमान शक्ति, संघ परिवार के लिए वैचारिक चुनौती की तरह देखे जाते हैं। नेहरू के मन में भगवा परिवार के लिए स्वभावगत नफरत थी। उन्हें यकीन था कि यह ‘हिंदू पाकिस्तान’ निर्मित कर देगा। इसे वे ‘हिंदू सांप्रदायिकता’ के रूप में देखते थे और इसके लिए कड़े रुख का मतलब यही था कि उन्हें उन लोगों की नाराजगी झेलनी ही थी, जो नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता को अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के नाम पर उनका तुष्टीकरण मानते हैं। फिर चाहे विभाजन हो, जम्मू-कश्मीर संबंधी अनुच्छेद 370 हो या ‘बांध आधुनिक भारत के मंदिर’ होने का उनका विश्वास, संघ और इसके समर्थकों को यकीन हो गया कि नेहरू उस अंग्रेजीदा कुलीन वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसका उससे संबंध नहीं है, जिसे वे देश की धार्मिक-सांस्कृतिक प्रकृति मानते हैं।

अब सत्ता में आने के बाद भाजपा नेहरू की विरासत को गौण बनाना चाहती है। केवल उन वर्षों का बदला लेने के लिए जब नेहरूवाद राजनीतिक विमर्श पर हावी था। नरेंद्र मोदी के उदय ने यह प्रक्रिया और तेज कर दी: प्रधानमंत्री ने विशाल प्रतिमा बनाकर और ‘एकता दौड़’ के जरिये पटेल को देवता का दर्जा देना तय किया, नेताजी की फाइलों को जाहिर करने का आदेश दिया और लाल बहादुर शास्त्री की स्तुति करने लगे। किंतु उन्होंने जान-बूझकर या अन्यथा नेहरू के योगदान की अनदेखी करने का निर्णय लिया। यहां तक कि अक्टूबर में भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन में भी मोदी ने भारत-अफ्रीका सद्‌भाव में नेहरू के योगदान का जिक्र तक नहीं किया। गुटनिरपेक्षता की नेहरूवादी विरासत को पूरी श्रद्धा का काम मेहमान अफ्रीकी राष्ट्राध्यक्षों पर छोड़ दिया गया। भाजपा समर्थकों को उम्मीद है कि नेताजी संबंधी फाइलें जाहिर किए जाने से नेहरू तथा उनके समर्थक और शर्मिंदा होेंगे खासतौर पर तब जब फाइलें यह पुष्टि करें कि नेहरू ने नेताजी के परिवार की जासूसी का समर्थन किया था। नेहरू की छवि के पतन के दूसरा कारण कांग्रेस द्वारा उनकी विरासत पर एकाधिकार के प्रयास से है। चाहे स्टेडियमों, सरकारी योजनाओं को नेहरू का नाम देने की रस्म हो, कांग्रेस ने अपने लंबे शासन काल में नेहरू को राष्ट्रीय नेता के रूप में पेश करने की बजाय ऐसे ऑयकन के रूप में पेश किया, जिनका संबंध विशेष परिवार और पार्टी से है। समाजशास्त्री आंद्रे बिटाइल ने टिप्पणी की थी (जैसा इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने उन्हें उद्धृत किया), ‘मरणोपरांत नेहरू का वर्णन बाइबल की उक्ति के एकदम उलट होता जा रहा है। बाइबल के अनुसार पिता के पाप सात पीढ़ियों को भुगतने पड़ते हैं। नेहरू को उनकी बेटी, पोतों, बेटी की बहू और पड़पोते के पाप भुगतने पड़ रहे हैं।’

बिटाइल ने बिल्कुल ठीक कहा है : आज की पीढ़ी नेहरू को लगभग पूरी तरह उनके उत्तराधिकारियों के प्रिज़्म से देख रही है। विडंबना है कि इस बात के शायद ही कोई सबूत हैं कि नेहरू वंशवादी राजनीति को बढ़ावा देना चाहते थे। इंदिरा गांधी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की अचानक हुई मौत के कारण संयोगवश प्रधानमंत्री बनीं। अौर इसके बाद भी, जिन लोगों को सत्तारूढ़ कांग्रेस घराने से घृणा है वे हर नाकामी के लिए नेहरू को निशाना बनाते हैं। फिर चाहे भारत-चीन युद्ध हो या केंद्रीकृत नियोजन की खामियां। सहिष्णुता और नागरिकता पर आधारित लोकतांत्रिक भावना को संस्थागत रूप से स्थापित करने में नेहरू की भूमिका के लिए उनके मन में कोई आदर नहीं है। इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी को राजनीति में लगभग अप्रासंगिक बना दिया गया है। किंतु उनकी विरासत जिंदा है और फल-फूल रही है, हालांकि उन्हें प्रतिमा तक सीमित कर दिया गया है।
वोट बैंक राजनीति के उदय का नतीजा यह रहा कि सामाजिक न्याय और समानता का विचार लाखों दलितों व पिछड़ी जातियों को एकजुट करने का शक्तिशाली हथियार बन गया। डॉ. आंबेडकर ने चाहे हिंदू ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती दी, लेकिन उच्चवर्ग के प्रभुत्व वाले आरएसएस को भी डॉ. आंबेडकर के विज़न को, चाहे उदासीनता से ही सही, स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा (आरक्षण पर सर संघचालक मोहन भागवत का हाल का बयान देख लीजिए)। बसपा जैसे दलों ने डॉ. आंबेडकर को देवता जैसी छवि दे दी है। उनकी जरा-सी आलोचना भी हिंसक प्रतिक्रिया का कारण बन सकती है। कोई पार्टी डॉ. आंबेडकर के विचारों को चुनौती नहीं दे सकती, इस डर से कि वे वोटों का विशाल आधार न खो बैठें। ऐसा कोई नेहरूवादी वोट बैंक नहीं है, जो उन लोगों को चुनौती दे, जो उनकी आलोचना करते हैं, खासतौर से दक्षिणपंथियों के प्रभुत्व वाले सोशल मीडिया के रहते। किंतु आंबेडकरवादी वोट बैंक है, जो शायद उनके हीरो को चुनौती देने सोशल मीडिया साइट को कही बंदकरा दे। दोनों भारतीय गणराज्य के विचार में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महान नेता हैं। दुख की बात होगी यदि उनकी विरासत राजनीतिक पक्षपात की शिकार बनी रहे।