भारत की राजनीति पर वंशवाद का साया बहुत गहरा है. पर देश में कई नेता ऐसे भी हैं जो छात्र राजनीति में अपनी पैठ बनाकर दिग्गज राजनेता बन पाए.
दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र संघों का चुनाव हो रहा है. दिल्ली ही नहीं बल्कि देश कि विभिन्न विश्वविद्यालयों से चुने गए कई छात्र नेताओं का आज राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा कद है.
जानिए ऐसे 10 नेताओं के बारे में.
सुषमा स्वराज – भारतीय जनता पार्टी
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1970 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ हरियाणा में राजनीतिक करियर की शुरुआत की.
पेशे से व़कील, 25 वर्ष की उम्र में हरियाणा में मंत्री बनी.
1990 में वे पहली बार राज्य सभा सदस्य बनीं. उन्होंने 1996 में दक्षिण दिल्ली से लोक सभा सीट जीती.
उसके बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री, केंद्र में सूचना-प्रसारण मंत्री, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री, लोक सभा में विपक्ष की नेता और अब मौजूदा सरकार में विदेश मंत्री हैं.
लालू प्रसाद यादव – राष्ट्रीय जनता दल
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पटना यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई करते हुए पटना यूनिवर्सिटी स्टुडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने.
1973 में फिर छात्र संघ चुनाव लड़ने के लिए पटना लॉ कॉलेज में दाखिला लिया, और जीते. फिर जेपी आंदोलन से जुड़े और छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष बनाए गए.
1977 में जनता पार्टी के टिकट पर लोक सभा चुनाव जीते. 29 साल के लालू यादव सबसे युवा सांसदों में से एक बने.
1990-97 के बीच लालू बिहार के मुख्यमंत्री रहे, लालू यादव यूपीए सरकार में 2004-09 तक रेल मंत्री भी रहे. फ़िलहाल वो राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
अजय माकन- कांग्रेस
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1985 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के अध्यक्ष बने. राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले माकन फिर दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के ताकतवर संघ के अध्यक्ष बने.
1993, 1998 और 2003 में दिल्ली से विधायक चुने गए. 2004 में पहली बार लोकसभा में चुने गए और फिर आवास और शहरी विकास मंत्री, खेल मंत्री और गृह राज्य मंत्री रहे.
साल 2015 में दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस की अध्यक्षता की, पर एक भी सीट नहीं जीत पाए. अब वो दिल्ली कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.
ममता बनर्जी – तृणमूल कांग्रेस
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1970 में कोलकाता में कांग्रेस के छात्र संगठन, ‘छात्र परिषद’, के साथ जुड़ीं और तेज़-तर्रार महिला नेता के तौर पर उभरीं.
आपातकाल और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में जादवपुर लोकसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ीं और दिग्गज वाम नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया.
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में ‘पश्चिम बंगाल यूथ कांग्रेस’ की अध्यक्ष और फिर नरसिंह राव की सरकार में मानव-संसाधन मंत्री बनीं.
1997 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी, ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ बनाई और 14 साल बाद, 2011 में पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनीं.
सीताराम येचुरी – मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी
हैदराबाद में जन्में येचुरी ने कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली में पूरी की. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पढ़ते हुए 1974 में छात्र संगठन स्टुडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़आई) से जुड़े.
आपातकाल में जेल गए पर रिहा होने के बाद तीन बार जेएनयू के छात्र संघ का चुनाव जीता. फिर एसएफ़आई के पहले ऐसे अध्यक्ष बने जो केरल या पश्चिम बंगाल से नहीं थे.
साल 1985 में सीपीएम की सेंट्रल कमेटी में और 1992 में पोलित ब्यूरो में चुने गए.
साल 2005 से येचुरी राज्य सभा सांसद हैं. इसी साल येचुरी निर्विरोध मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए.
प्रफुल्ल कुमार महंत – असम गण परिषद
असम के गुवाहाटी में वकालत की पढ़ाई करते हुए प्रभावशाली छात्र संगठन, ‘अखिल असम छात्र संघ’ से जुड़े और 1979 में उसके अध्यक्ष बनाए गए.
ग़ैर-असमिया लोगों के ख़िलाफ़ आंदोलन में प्रभावी नेता के तौर पर उभरे और 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ ऐतिहासिक असम समझौते पर हस्ताक्षर किए.
1985 में ही असम गण परिषद पार्टी बनी और उस साल पार्टी के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद महंत को मुख्यमंत्री बनाया दआ. उस व़क्त वो देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने.
2014 के आम चुनाव में एक भी सीट ना जीत पाने के बाद महंत ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया. फ़िलहाल वो असम विधानसभा में विधायक हैं.
अरुण जेटली – भारतीय जनता पार्टी
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1974 में दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने. उसी दौर में जेपी आंदोलन में छात्र और छात्र संगठनों की राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष बने.
आपातकाल में डेढ़ साल जेल में रहना पड़ा. जिसके बाद वकालत की पढ़ाई पूरी कर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील बने.
एनडीए सरकार में क़ानून मंत्री बने, पांच साल तक भारतीय जनता पार्टी के महासचिव रहे और उसके बाद राज्य सभा में विपक्ष के नेता बने. अब मौजूदा सरकार में वित्त मंत्री हैं.
नीतीश कुमार – जनता दल यूनाइटेड
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इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हुए छात्र नेता के तौर पर उभरे. बिहार अभियंत्रण महाविद्यालय स्टुडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने.
फिर जेपी आंदोलन में जुड़े और युवाओं की ‘छात्र संघर्ष समिति’ में अहम भूमिका निभाई. 1975-77 के बीच आपातकाल के चलते जेल जाना पड़ा.
1985 में लोक दल से विधायक चुने गए और 1989 के बाद छह बार लोकसभा की सीट जीती. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्रालय भी संभाला.
नीतीश कुमार वर्ष 2005 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.
डी राजा – कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया
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तमिलनाडु के भूमिहीन खेत मज़दूरों के घर में पैदा हुए डी राजा अपने गांव में ग्रेजुएशन की डिग्री लेने वाले पहले छात्र बने.
मद्रास विश्वविद्यालय से जुड़े कॉलेजों में पढ़ाई करते व़क्त छात्र राजनीति में कदम रखा.
साल 1994 से डी राजा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय सचिव हैं.
वर्ष 2007 में वो तमिलनाडु से राज्य सभा सांसद हैं.
सीपी जोशी – कांग्रेस
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1973 में राजस्थान के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष बने. इसके बाद नाथद्वारा से विधायक का चुनाव जीता. चार बार विधायक बने और राज्य सरकार में कई मंत्रालय संभाले. 2008 के चुनाव में नाथद्वारा से एक वोट से हारे.
2009 में भीलवाड़ा लोकसभा सीट से जीतकर पहली बार सांसद बने. तत्कालीन यूपीए सरकार में ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री बने.
राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके जोशी फ़िलहाल कांग्रेस पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता हैं.
कुछ साल पहले मुझे अरुणाचल प्रदेश की राजधानी इटानगर स्थित 'राजीव गांधी यूनिवर्सिटी" में बोलने का अवसर मिला था। व्याख्यान के अगले दिन मुझे इटानगर की सैर कराई गई और वहां के दर्शनीय स्थान दिखाए गए। वहां के दर्शनीय स्थानों में प्रमुख थे : 'जवाहरलाल नेहरू स्टेट पार्क" और 'इंदिरा गांधी स्टेट म्यूजियम!"
हाल ही में जब मैंने पढ़ा कि नई दिल्ली स्थित औरंगजेब रोड का नाम बदलकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखा जा रहा है तो मुझे अपनी इटानगर यात्रा की याद हो आई। सोशल मीडिया सहित सार्वजनिक विमर्श के अन्य उपायों में सरकार के इस कदम का खूब गर्मजोशी से स्वागत किया जा रहा था। इस उत्साह का एक कारण तो यही था कि भारत में अब्दुल कलाम का नाम बेहद आदर के साथ लिया जाता है। कुछ अर्थों में इसका एक अन्य कारण मुगल शासक औरंगजेब के प्रति सामान्यत: प्रदर्शित की जाने वाली घृणा थी। वहीं कुछ को शायद यह देखकर राहत मिली हो कि नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के नाम पर सड़कों, हवाई अड्डों, पार्कों और म्यूजियमों का नामकरण करने की परंपरा अब खत्म हो रही है।
इसी के साथ ये सुझाव भी दिए जाने लगे कि इस परिपाटी को कायम रखा जाए। वे नाम सुझाए जाने लगे, जिनके आधार पर इस तरह से सड़कों आदि का नामकरण किया जा सकता है। बेंगलुरु स्थित उद्यमी मोहनदास पै ने ट्वीट किया कि हमारी रक्षा के लिए लड़ाई लड़ने वाले छत्रपति शिवाजी, रंजीत सिंह और महाराणा प्रताप के नाम पर नई दिल्ली में सड़कें और इमारतें क्यों नहीं हो सकतीं? इस ट्वीट को बहुत सराहना मिली और कइयों ने इसे शेयर किया। इससे यह संकेत मिला कि अनेक मध्यवर्गीय भारतीय भी यही चाहते हैं कि नई दिल्ली की सड़कों का नामकरण इन शासकों के नाम पर किया जाए। अभी दिल्ली की प्रमुख सड़कों का नामकरण हुमायूं, बाबर, अकबर आदि के नाम पर किया गया है।
मैं मोहनदास पै को जानता हूं और उनकी सराहना करता हूं। उनमें जनकल्याण और परोपकार की भावना बहुत सघन है और उन्होंने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा गरीबी उन्मूलन पर केंद्रित समाज-कल्याण की योजनाओं के लिए समर्पित कर दिया है। लेकिन ताजा मामले में यह जरूर कहना होगा कि उनका उत्साह उनकी ऐतिहासिक समझ पर हावी हो गया है।
नई दिल्ली की सड़कों का नामकरण शिवाजी, राणा प्रताप और रंजीत सिंह के नाम पर करना तीन कारणों से अनुचित होगा। पहला कारण तो यही कि इससे बहुसंख्यकवाद की उस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, जो कि दिन-ब-दिन हमारे समाज में गहराई से पैठती जा रही है। यह बहुसंख्यकवाद एक समुदाय के बरक्स दूसरे समुदाय को श्रेष्ठ बताने की चेष्टा करता है। अलबत्ता पै महोदय स्वयं सांप्रदायिक सोच वाले व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन उनसे प्रेरित होकर ऐसी मांग करने वाले दूसरों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता।
दूसरा अधिक महत्वपूर्ण कारण यह है कि शिवाजी, राणा प्रताप और रंजीत सिंह मूलत: क्षेत्रीय नायक थे। यह कहना इतिहास की एक गलत व्याख्या करना होगा कि उन्होंने 'हमारी" रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी थी। पै महोदय का गृहनगर मैंगलोर है, मेरा गृहनगर देहरादून है। शिवाजी और राणा प्रताप के शासनकाल और संघर्षकाल के दौरान कोंकण समुद्रतट और दून घाटी के बाशिंदे उनसे अनजान थे। उदयपुर में जरूर महाराणा प्रताप के नाम पर एक पार्क है। और मुंबई में तो एक हवाई अड्डे, एक रेलवे टर्मिनस, एक म्यूजियम सहित बहुत कुछ का नामकरण शिवाजी के नाम पर किया गया है। क्षेत्रीय संदर्भों में राजपूत और मराठा अस्मिता की अभिव्यक्ति भले तर्कसंगत हो, लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश की राजधानी में क्षेत्रीय अस्मिताओं की ज्यादा अहमियत नहीं होती। तीसरा और सबसे प्रमुख कारण यह है कि ये सभी सामंतवाद के युग के शासक थे और राजधानी की सड़कों का नामकरण उनके नाम पर किए जाने से बचना चाहिए। मुगलों की तरह हिंदू-सिख शासक भी जातिगत ऊंच-नीच की भावना से ग्रस्त थे और मुगलों की तरह उनके राज में भी महिलाओं की सामाजिक स्थिति दोयम दर्जे की थी।
अंग्रेजों ने जब नई दिल्ली बसाई थी तो उन्होंने खुद को अतीत के राष्ट्रव्यापी प्रसार वाले शासकों व साम्राज्यवादियों का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना था। यही कारण था कि दिल्ली की सड़कों का नामकरण उन्होंने अकबर और औरंगजेब जैसे मुगल शासकों के साथ ही सम्राट अशोक के नाम पर भी किया। हिंदू राजा पृथ्वीराज चौहान के नाम पर भी लुटियंस दिल्ली में एक सड़क है। लेकिन जो लोग दिल्ली की सड़कों का नामकरण मध्यकाल के शासकों (फिर चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम) के नाम पर करने की मांग करते हैं, वे जाने-अनजाने ब्रिटिश राज के साम्राज्यवादी और गैर-लोकतांत्रिक आग्रहों का समर्थन करते हैं। क्योंकि सच्चाई तो यही है कि गत छह दशकों से भी अधिक समय से भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र रहा है और ऐसे में मध्यकालीन सामंतों और शासकों के प्रति सराहना का भाव रखना भारतीय संविधान के मूल्यों और भावना के अनुरूप नहीं होगा।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। जिस तरह से वे देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे, वह केवल स्वातंत्र्योत्तर भारत में ही संभव हो सकता था। कलाम सही मायनों में एक गणतांत्रिक नायक थे। उनके जैसे ही और भी कई ऐसे नायक हैं, जिनके नाम पर राजधानी की सड़कों और इमारतों का नाम रखकर उन्हें आदरांजलि अर्पित की जा सकती है।
आखिर आधुनिक भारत के महानतम वैज्ञानिक सीवी रमन के नाम पर दिल्ली में एक सड़क क्यों नहीं होनी चाहिए? भारत की सर्वाधिक विलक्षण आधुनिक महिलाओं में से एक कमलादेवी चट्टोपाध्याय को इस तरह से सम्मानित क्यों नहीं किया जाना चाहिए, जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन, रिफ्यूजियों के पुनर्वास से लेकर हस्तकौशल के पुनरुत्थान सहित कई चीजों में अग्रणी भूमिका निभाई थी? सत्यजित राय जैसे महान फिल्मकार, बिस्मिल्ला खां जैसे महान संगीतकार, नंदलाल बोस जैसे महान कलाकार के नाम पर दिल्ली में सड़कें क्यों नहीं होनी चाहिए?
औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखने का निर्णय तो खैर ऐसी कोई बहस शुरू होने से पहले ही लिया जा चुका था, लेकिन अब सवाल उठता है कि हम आगे कर सकते हैं? हम नामकरण की प्रवृत्ति को लेकर आगे बढ़ने का भी चयन कर सकते हैं और पीछे हटने का भी। जो भी हो, हमें यह निर्णय विवेकपूर्वक ही करना चाहिए
1965 में जब पाकिस्तान की सेना ने भारत पर हमला किया, उस वक्त मैं 16 साल का होने जा रहा था। इस उम्र के कच्चे किशोर मन पर कई घटनाएं गहरी खरोंच छोड़ जाती हैं। उस युद्ध ने मेरे जैसे करोड़ों हिंदुस्तानी दिलों के साथ भी कुछ ऐसा ही किया था।
अमेरिका के तेज-तर्रार पैटन टैंक और सैबर जेट विमानों से लैस पाकिस्तानी सेना के दिमाग पर ताकत का नशा पागलपन की हद तक चढ़ा हुआ था। भारतीय सेना के पास सोवियत संघ से मिले दोयम दर्जे के हथियार थे, जो अमेरिकी हथियारों के मुकबले पासंग भी नहीं थे। इसी नशे में धुत्त पाकिस्तान के फौजी शासक फील्ड मार्शल अयूब खां ने घोषणा कर दी थी कि थोड़े दिनों में ही वह विजेता पाकिस्तानी फौज के साथ लाल किले में चाय पिएंगे।
इधर भारत का नेतृत्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री कर रहे थे, जो अपनी शालीनता और सादगी के लिए मशहूर थे। यह वह जमाना था, जब पाकिस्तान अमेरिका की गोद में बैठा हुआ था और रूस के साथ दोस्ती के अपराध में अमेरिका और उसके दोस्त भारत को हर छोटी-बड़ी बात पर सजा देने को उतावले रहते थे। यही दौर था, जब अनाज की कमी और अकाल से पीड़ित भारत अमेरिका के ‘पीएल-480’ कानून के तहत खैरात में मिलने वाले गेहूं पर बुरी तरह आश्रित था।
शुरू-शुरू में तो अमेरिकी टैंक और हवाई जहाजों के बूते पर पाकिस्तान का पलड़ा भारी रहा। लेकिन भारतीय फौजियों के हौसले ने कुछ दिनों में ही लड़ाई का रुख बदल दिया।
लोहे का चलता-फिरता किला माने जाने वाले पैटन टैंकों को भारतीय फौजियों ने पंजाब के खेमकरण सेक्टर में इस कदर बर्बाद किया कि वहां का ‘असल उत्तर’ गांव पैटन टैंक के अंतरराष्ट्रीय कब्रिस्तान के रूप में आज भी मशहूर है। यही हाल भारत के लड़ाका नेट विमानों ने सैबर जेटों का किया। अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार में अपने सबसे मशहूर फौजी साजो-सामान की ऐसी खिल्ली उड़ती देख अमेरिका की सरकार का तिलमिलाना तय था। उधर जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के हाजी पीर दर्रे और टिथवाल पर भारतीय सेना के कब्जे ने भी अयूब खां के होश फाख्ता कर दिए थे।
लाल किले पर चाय पीने का सपना देखने वाले अयूब खां को जब लाहौर भी हाथ से निकलता दिखा, तो वह लगे वाशिंगटन से गुहार लगाने। अमेरिकी राष्ट्रपति ने शास्त्री जी को धमकी दे डाली कि अगर भारत ने पाकिस्तान की पिटाई बंद नहीं की, तो वह ‘पीएल-480’ रोक देंगे। शास्त्री जी को भारतीय सेना की बहादुरी पर तो पूरा भरोसा था, लेकिन गेहूं की कमी से गृहयुद्ध की आशंका बहुत डरावनी थी। अमेरिकी धमकी ने पूरे भारत को अपमान की भट्ठी में झोंक दिया।
पर शास्त्री जी तो शास्त्री ही थे। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि अगर वे लोग सप्ताह में केवल एक भोजन छोड़ने का व्रत रखें, तो भारत सरकार इस अमेरिकी धमकी का जवाब देगी और भारतीय सेना पाकिस्तान को धूल चटा देगी। शास्त्री जी की अपील ने जादू का काम किया। व्रत रखने वाले करोड़ों लोगों में मेरे जैसे लाखों किशोर भी थे।
वह युद्ध 22 दिन चला। भारतीय सेना की जोरदार जीत हुई। लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव में वार्ता की मेज पर भारत को पाकिस्तान से जीते हुए इलाके वापस करने पर मजबूर होना पड़ा। ताशकंद में हुए उस समझौते के बाद शास्त्री जी को ऐसा सदमा लगा कि वह दिल के दौरे से वहीं स्वर्ग सिधार गए। बाद में हरित क्रांति ने भारत को विदेशी खैरात से मुक्ति दिलाई। निर्यात भी शुरू हुआ और जरूरतमंद देशों को मदद भी दी जाने लगी। इसके बावजूद देश के लाखों लोगों का साप्ताहिक व्रत जारी रहा। उन घायल दिलों में से एक किशोर मन मेरा भी था, जो एक ताकतवर देश की दादागीरी और भारत के अपमान की टीस से मुक्त होने को तैयार नहीं था। यह दर्द अब केवल उस दिन खत्म होने को तैयार था, जब भारत भी अमेरिका को भोजन और आर्थिक मदद की खैरात बांटता।
दोस्तों के बीच मेरा यह ‘पॉलिटिकल व्रत’ अक्सर मजाक का विषय बनता रहा। भला कौन मानने को तैयार था कि कभी ऐसा दिन भी आएगा? यह ‘मजाक’ चालीस साल तक चलता रहा। और मेरा व्रत भी। फिर अचानक सितंबर, 2005 में अमेरिका में कटरीना तूफान के कहर और विनाश लीला की खबर आई। अमेरिका को मदद की जरूरत थी। भारत सरकार ने अमेरिकी सरकार को पांच करोड़ डॉलर नकद और दो हवाई जहाज भरकर भोजन और राहत सामग्री भेजी।
इस खबर ने दिल को दोनों तरफ से छू लिया। एक तरफ हजारों अमेरिका वासियों के प्रति दुख और संवेदना थी, दूसरी ओर एक अपमानित देश के आत्मसम्मान की बहाली की खुशखबरी थी। आखिरकार व्रत तोड़ने का दिन आ गया था। मैंने मंदिर जाकर कटरीना के शिकार अमेरिकियों के लिए प्रार्थना की और भगवान को हिंदुस्तानी होने का गर्व लौटाने के लिए धन्यवाद भी किया। इस गर्व को वापस पाने के लिए 40 साल का उपवास और इंतजार तो बनता ही है न
1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध को भारतीय इतिहास में मात्र हाशिए की जगह मिलती है. लोगों की यादों में भी उस युद्ध की वो जगह नहीं है जो शायद 1962 के भारत चीन युद्ध या 1971 के बांगलादेश युद्ध की है.
कारण शायद ये है कि इस लड़ाई से न तो हार की शर्मसारी जुड़ी है और न ही निर्णायक जीत का उन्माद.
घटना के पचास साल बाद तस्वीरें या तो ज़हन से पूरी तरह मिट जाती हैं या धुंधली पड़ जाती हैं. लेकिन इससे एक फ़ायदा भी होता है. बीता हुआ समय तस्वीर को एक बेहतर परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है.
बीबीसी हिंदी की संपादकीय टीम की बैठक में 1965 के युद्ध के पचास साल होने पर कवरेज की बात हो रही थी तो हमारे संपादक निधीश त्यागी का सुझाव था- "क्यों न युद्ध के 22 दिनों से जुड़ी 22 कहानियों पर काम किया जाए जिनके बारे में लोगों को या तो बिल्कुल पता नहीं हैं या बहुत कम पता है".
लेकिन ये कोई आसान काम नहीं था. वो जमाना इंटरनेट का नहीं था कि हर चीज़ गूगल पर मिल जाए. लेकिन काम शुरू हो चुका था- पुस्तकालय खंगाले गए, सैंकड़ों किताबें पढ़ी गईं, अभिलेखागार में जाकर कभी गोपनीय रहे दस्तावेज़ों पर नज़र दौड़ाई गई. इतना ही नहीं, सैनिक केंद्रों पर जाकर 50 साल पुरानी युद्ध डायरियों को भी हमने पलटा.
47 लोगों से बातचीत
Image copyrightdefence.pkImage captionपाकिस्तानी वायुसेना के सेबर जेट विमानों ने भारत का बड़ा नुकसान किया.
लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत थी लड़ाई में शामिल अफ़सरों को तलाशना और उन्हें बात करने के लिए राज़ी करना क्योंकि एक तो उनमें से बहुत से लोग अब इस दुनिया में नहीं रहे, जो हैं भी वो बहुत उम्रदराज़ हो चले हैं, उनकी सेहत और याददाश्त ने भी उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया है.
बहरहाल, इस पूरे अभियान में 47 लोगों से आमने-सामने बात की गई और न जाने कितने लोगों से फ़ोन पर. इनसे मिलने के लिए भारत के कई शहरों में जाना हुआ. बात केवल इस ओर की नहीं थी, पाकिस्तान के भी कई सैनिक अफसरों को ढूँढ निकाला गया, उन्होंने भी रोमांचित कर देने वाले अनुभव सुनाए.
Image copyrightSajad HaiderImage captionसज्जाद हैदर ने पाकिस्तान की ओर से सेना में अहम भूमिका निभाई. तस्वीर में ठीक मध्य में खड़े हैं हैदर.
पाकिस्तानी एयर कोमोडोर सज्जाद हैदर ने बताया कि पठानकोट पर हमला करने से पहले उन्होंने एक बाल्टी में पानी भरवा कर उसमें ईयू-डे-कोलोन की पूरी बोतल खाली कर दी. आठ तौलिए मंगवाए गए. आपरेशन में शामिल सभी आठ पायलटों से कहा कि वो इस सुगंधित पानी में तौलिए भिगोकर अपना मुंह पोछ लें ताकि अगर अल्लाह से मिलने का मौक़ा आ जाए तो उनके जिस्म से खुशबू आए.
तारापोर की अंतिम इच्छा
उसी तरह चविंडा की लड़ाई के बीचोंबीच कर्नल तारापोर ने अपने साथी मेजर चीमा को निर्देश दिया कि अगर इस लड़ाई के दौरान वे इस दुनिया में न रहें तो उनका अंतिम संस्कार युद्ध के मैदान पर ही किया जाए.
'मेरी प्रेयर बुक मेरी मां को दे दी जाए. मेरी अंगूठी मेरी पत्नी को और मेरा फ़ाउंटेन पेन मेरे बेटे ज़र्ज़ीस को दे दिया जाए.’ पांच दिन बाद तारापोर एक पाकिस्तानी टैंक गोले के शिकार हुए. उन्हें मरणोपरांत भारत का वीरता का सबसे बड़ा पदक परमवीर चक्र दिया गया.
Image copyrightZarin BoyceImage captionकर्नल तारापोर का अस्थि कलश लेकर जातीं उनकी पत्नी और बेटी.
उस लड़ाई में भारत की ओर से शरीक कैप्टन अजय सिंह ने बताया कि कुछ लोगों ने कहा कि अगर कर्नल तारापोर का अंतिम संस्कार लड़ाई के मैदान में किया जाता है तो चिता से उठते धुएँ को देखकर पाकिस्तानी टैंक उन पर फ़ायर करेंगे.
लेकिन उनकी यूनिट ने तय किया कि चाहे जो हो जाए, पाकिस्तान के कितने ही गोले उनके ऊपर आएं, तारापोर की अंतिम इच्छा का सम्मान किया जाएगा. तारापोर की अंत्येष्टि पाकिस्तानी सेना के आग उगलते गोलों के बीच लड़ाई के मैदान में ही की गई.
युद्ध के अधिकतर ब्योरों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है. इस सीरीज़ में इससे बचने की कोशिश की गई है. लड़ाइयों में भी ग़लतियां होती हैं. 1965 की लड़ाई में भी ग़लतियां हुईं, दोनों पक्षों की ओर से.
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इन्हें छिपाने की कोशिश नहीं की गई है. ऐसे भी मौके आए जब एक पक्ष ने दूसरे पक्ष के सैनिकों के कारनामों की तारीफ़ की है. ये बताता है कि सैनिक बहादुरी का सम्मान करते हैं, चाहे वो दुश्मन की ही क्यों न हो.
शमा जलती रहे तो बेहतर
यह सीरीज़ आपको 50 साल पहले हुए उस भारत पाकिस्तान युद्ध की ओर ले जाएगी जहाँ से बहुत से सैनिक कभी वापस नहीं लौटे, कुछ वापस आए जीवट की दास्तान लेकर.
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हमारा मक़सद न तो किसी का कीर्तिगान करना है और न ही किसी को सही या ग़लत ठहराना, सैनिकों की कहानियों के ज़रिए पूरी तस्वीर आपके सामने पेश करना चाहते हैं. . बीबीसी हिंदी ऑनलाइन और रेडियो पर हमारी ये कोशिश कितनी कामयाब रही, ये हमें बताइगा जरूर.
बहरहाल, साहिर लुधियानवी की नज़्म बरबस याद आती है--
स्थान रक्षा मंत्रालय का कार्यालय. रूम नंबर 108. साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली. दिन सितंबर 1, 1965. समय दोपहर 4 बजे.
रक्षा मंत्री यशवंत राव चव्हाण, एयर मार्शल अर्जन सिंह, रक्षा मंत्रालय में विशेष सचिव एचसी सरीन, एडजुटेंट जनरल लेफ़्टिनेंट जनरल कुमारमंगलम के साथ गहन मंत्रणा में व्यस्त थे.
मुद्दा था छंब सेक्टर में उस दिन सुबह हुआ पाकिस्तानी टैंकों और तोपों का ज़बरदस्त हमला जिसने भारतीय सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों को अचरज में डाल दिया था.
पाकिस्तान का हमला तड़के साढ़े तीन बजे शुरू हुआ था और नौ बजते-बजते छंब उनके क़ब्ज़े में था. एक दिन पहले ही हालात का जायज़ा लेने के लिए थल सेनाध्यक्ष जनरल जेएन चौधरी कश्मीर गए थे. वो उस दिन वहाँ से वापस आने वाले थे.
बैठक शुरू हुए अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि जनरल चौघरी ने कमरे में प्रवेश किया.
उन्होंने एयर मार्शल अर्जन सिंह के साथ कुछ देर दबे शब्दों में बात की और रक्षा मंत्री चव्हाण की तरफ़ देख कर कहा कि उन्हें छंब सेक्टर में वायु सेना के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए. चौधरी ने चव्हाण से ये भी कहा कि उन्हे जवाबी हमला करने के लिए सीमा पार करने की इजाज़त भी दी जाए.
बमबारी का फ़ैसला
Image copyrightwww.bharatrakshak.comImage caption1965 के युद्ध के दौरान भारत के थल सेना अध्यक्ष जेएन चौधरी और भारतीय वायुसेना अध्यक्ष अर्जन सिंह.
चव्हाण कुछ मिनटों तक सोचते रहे जबकि कमरे में मौजूद सभी लोगों की निगाहें उन पर लगी हुई थीं. फिर उन्होंने मुलायम लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोलना शुरू किया, "भारत सरकार आपको छंब में वायु सेना के इस्तेमाल की इजाज़त देती है. आप सीमा पर भारतीय सैनिकों के लिए भी सिग्नल जारी करें."
रक्षा सचिव पीवीआर राव ने चव्हाण के मौखिक आदेशों को रिकॉर्ड किया. समय था चार बजकर 45 मिनट. पांच बजकर 19 मिनट पर भारत के वैंपायर विमानों ने छंब पर बमबारी करने के लिए टेक ऑफ़ किया.
कुछ करना होगा
उसी दिन स्थान 10 जनपथ, प्रधानमंत्री का कार्यालय. समय रात के 11 बजकर 45 मिनट. प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अचानक अपनी कुर्सी से उठे और अपने दफ़्तर के कमरे के एक छोर से दूसरे छोर तक तेज़ी से चहलक़दमी करने लगे.
शास्त्री के सचिव सीपी श्रीवास्तव ने बाद में अपनी किताब 'ए लाइफ़ ऑफ़ ट्रूथ इन पॉलिटिक्स' में लिखा, "शास्त्री ऐसा तभी करते थे जब उन्हें कोई बड़ा फ़ैसला लेना होता था. मैंने उनको बुदबुदाते हुए सुना... अब तो कुछ करना ही होगा."
आधी रात के बाद शास्त्री अपने दफ़्तर के बग़ल में अपने निवास स्थान पर कुछ घंटों की नींद लेने पहुंचे. श्रीवास्तव लिखते हैं कि उनके चेहरे को देख कर ऐसा लग रहा था कि उन्होंने कोई बड़ा फ़ैसला कर लिया है.
कुछ दिनों बाद हमें पता चला कि उन्होंने तय किया था कि कश्मीर पर हमले के जवाब में भारतीय सेना लाहौर की तरफ़ मार्च करेगी. लेकिन उस समय तक उन्होंने ये बात किसी से साझा नहीं की. अगले दिन और फिर तीन सितंबर को दोबारा उन्होंने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई और पाकिस्तान पर हमला करने की योजना को अंतिम रूप दिया.
डिसपैच राइडर पकड़ा गया
उधर तीन-चार सितंबर की रात को पाकिस्तान में डिवीज़न हेडक्वार्टर के कर्नल एस.जी. मेंहदी ने मिलिट्री इंटेलिजेंस के मुख्यालय में लेफ़्टिनेंट कर्नल शेर ज़माँ को फ़ोन कर बताया कि उन्होंने भारत के एक डिसपैच राइडर को पकड़ा है जो कि भारत की फ़र्स्ट आर्मर्ड डिवीज़न के लिए एक पत्र ले कर जा रहा था. उसमें बताया गया है कि भारत लाहौर पर हमला करने वाला है जिसे ऑपरेशन नेपाल का नाम दिया गया है.
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पाकिस्तान ने इस लीड को गंभीरता से नहीं लिया. उन्हें लगा कि भारत ने जानबूझ कर उन्हें गुमराह करने के लिए डिसपैच राइडर को पकड़वाने का नाटक रचा था. उस समय पाकिस्तान के मिलिट्री ऑपरेशन के महानिदेशक लेफ़्टिनेंट जनरल गुल हसन खाँ अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्हें याद है कि उन्होंने चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ लेफ़्टिनेंट जनरल शेर बहादुर को इस बारे में बात कर सुझाव दिया था कि पाकिस्तान अपनी सेना को सीमा पर रक्षात्मक पोज़ीशन पर ले आए.
शेर बहादुर ऐसा करने में झिझक रहे थे क्योंकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने ताकीद कर रखी थी कि भारत को किसी भी हालत में भड़कने का मौक़ा न दिया जाए. पाकिस्तान के थल सेनाध्यक्ष जनरल मूसा उस दिन छंब का दौरा कर रहे थे और देर रात तक वापस नहीं लौटे थे.
जनरल मूसा और मेलविल डिमैलो
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चार सितंबर की शाम जनरल हेडक्वार्टर के ऑपरेशन रूम में पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल मूसा आकाशवाणी का बुलेटिन सुन रहे थे. उद्घोषक मेलविल डिमैलो ने श्रोताओं का आगाह किया कि एक महत्वपूर्ण फ़्लैश के लिए तैयार रहिए. उन्होंने घोषणा की, प्रधानमंत्री ने लोकसभा को सूचित किया है कि पाकिस्तानी सेना ने सियालकोट सेक्टर से जम्मू की तरफ़ बढ़ना शुरू कर दिया है.
जनरल मूसा और डिमैलो बैच मेट थे और दोनों को साथ साथ देहरादून में इंडियन मिलिट्री अकादमी में कमीशन मिला था. बाद में डिमैलो सेना छोड़ कर आकाशवाणी चले गए थे. पाकिस्तानी सेना के बढ़ने की ख़बर पूरी तरह से ग़लत थी. मूसा ताज़ा हवा लेने के लिए ऑपरेशन रूम से बाहर आए. उन्हें डिमैलो के ग़लत ख़बर देने और बोलने के अंदाज़ से लगा कि भारत कुछ बहुत बड़ा करने जा रहा है.
ऑपरेशन बैंगिल
पहले तय हुआ कि एच आवर यानि हमला करने का समय सात सितंबर को सुबह चार बजे होगा. लेकिन पश्चिम क्षेत्र के कमांडर-इन-चीफ़ लेफ़्टिनेंट जनरल हरबख़्श सिंह ने 24 घंटे पहले यानि छह सितंबर को आगे बढ़ने का फ़ैसला किया. इस पूरे ऑप्रेशन का कोड वर्ड था ‘बैंगिल.’ सेना मुख्यालय से एक और कोडवर्ड भेजा गया ‘बैनर’. इस का अर्थ था कि इस अभियान को नियत समय पर शुरू किया जाए.
पाकिस्तान को इसकी भनक न लगे ये सुनिश्चित करने के लिए जनरल हरबख़्श सिंह जानबूझ कर शिमला में एक पूर्व निर्धारित दोपहर भोज में शामिल हुए. भोज ख़त्म होते ही एक हेलिकॉप्टर उन्हें दोबारा सीमा पर ले आया. वो पहले अमृतसर में रुके और उन्होंने पूरे शहर में कर्फ़्यू लगाने का आदेश दिया. निर्धारित समय पर भारत ने चार जगहों से पाकिस्तानी सीमा के अंदर प्रवेश किया और कुछ ही घंटों में डोगराई के उत्तर में भसीन, दोगाइच और वाहग्रियान पर क़ब्ज़ा कर लिया.
Image copyrightBBC World ServiceImage captionलेफ़्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह पाकिस्तान के लेफ़्टिनेंट जनरल बख़्तिायर राना के साथ. ये तस्वीर युद्ध की समाप्ति के बाद की है.
मेजर जनरल निरंजन प्रसाद की 15 डिवीज़न ने तो इच्छोगिल नहर पार कर ली और उनके कुछ सैनिक बाटापुर पहुंच गए जहाँ जूते बनाने वाली कंपनी बाटा की एक फ़ैक्ट्री थी. वहाँ से जो तस्वीरें भेजी गईं, उसके आधार पर बीबीसी ने भी ग़लत ख़बर प्रसारित की कि भारतीय सेना लाहौर में घुस चुकी है.
अयूब की डांट
पाकिस्तान के राष्ट्रपति फ़ील्ड मार्शल अयूब ख़ाँ को इस हमले की सूचना रावलपिंडी में एयर डिफ़ेंस हेडक्वार्टर में तैनात एयर कोमॉडोर अख़्तर ने दी. अयूब ने इसकी उम्मीद नहीं की थी. उन्होंने आईएसआई के प्रमुख ब्रिगेडियर रियाज़ हुसैन को फ़ोन मिलाया. रियाज़ को तब तक भनक भी नहीं थी कि भारतीय सेना पाकिस्तान में घुस चुकी है.
अयूब उन पर चिल्ला पड़े, "भारत की पहली आर्मर्ड डिवीज़न भूसे में सुई की तरह नहीं है कि आप को पता ही न चल सके कि वो इस समय कहाँ है?"
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ब्रिगेडियर रियाज़ ने कांपती हुई आवाज़ में जवाब दिया, "सर हमें दोष मत दीजिए. जून 1964 से ही मिलिट्री इंटेलिजेंस को सिर्फ़ राजनीतिक ज़िम्मेदारियाँ दी जा रही है." विदेश मंत्री भुट्टो और विदेश सचिव अज़ीज़ अहमद पहले दिन से अयूब को आश्वस्त कर रहे थे कि भारत पंजाब पर आक्रमण नहीं करेगा.
नौ बजे पाकिस्तानी सेना के चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टॉफ़ ने जनरल हेडक्वार्टर को सूचित किया कि भारत ने लाहौर और सियालकोट पर हमला बोल दिया है. उनके आख़िरी शब्द थे, "जो कुछ भी हमारे पास है वो शो विंडो में ही है. इसके अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं है. गुड लक."
मेजर अज़ीज़ भट्टी की बहादुरी
Image copyrightdefence.pkImage caption1965 युद्ध में असाधारण वीरता दिखाने वाले पाकिस्तानी मेजर अज़ीज़ भट्टी की पत्नी को मरणोपरांत निशान-ए-हैदर देते हुए अयूब ख़ान.
ये वाक़्या पाकिस्तान की असली सैनिक स्थिति को रेखाँकित करता था, हांलाकि उसके पास आला दर्जे के अमरीकी हथियार थे. पाकिस्तान के नेतृत्व की फ़ैसले लेने की क्षमता पर कई सवाल उठाए गए.
अगले 22 दिनों में हुई बड़ी लड़ाइयों में दोनों देशों के निचले स्तर के अफ़सरों और सैनिकों ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन कमान के स्तर पर दोनों तरफ़ से कई बड़ी ग़लतियाँ हुईं.
बर्की के मोर्चे पर पाकिस्तान के मेजर अज़ीज़ भट्टी ने पांच दिनों तक भारतीय सैनिकों की ज़बर्दस्त गोलाबारी का मुक़ाबला किया. इस दौरान वो हमेशा सबसे आगे रहे और आख़िर में एक भारतीय टैंक के गोले का शिकार हुए. उन्हें पाकिस्तान का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार निशान-ए हैदर-दिया गया.
Image copyrightBBC World ServiceImage captionपाकिस्तान की ओर से मेजर अज़ीज भट्टी ने असीम साहस का प्रदर्शन दिखाया.
उस लड़ाई में भारत की ओर से लड़ने वाले ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह कहते हैं, "पाकिस्तान के सैनिक जिस तरह हमारे ऊपर इतना एक्युरेट फ़ायर कर रहे थे, उससे साफ़ लगता था कि उनका अफ़सर किस स्तर का आर्टलरी अफ़सर होगा. भट्टी को ये श्रेय जाता है कि उन्होंने इतनी देर तक और इतने अच्छे तरीक़े से मोर्चा संभाला."
सेल्यूट न कर पाने पर आँसू
उसी तरह भारत की तरफ़ से 4-हॉर्स के मेजर भूपेंदर सिंह ने फ़िलौरा की लड़ाई में अदम्य बहादुरी का परिचय दिया. उन्होंने कई पाकिस्तानी टैंक बरबाद किए. उनके टैंक पर पाकिस्तानियों ने कोबरा मिसाइल से हमला किया. उससे इतनी गर्मी पैदा हुई कि भूपेंदर सिंह का कड़ा गल कर उनकी खाल में घुस गया.
Image copyrightwww.bharatrakshak.comImage captionतत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री आर्मी अस्पताल में घायल जवान को देखते हुए.
उनके बदन के सारे कपड़े और उनकी पूरी खाल बुरी तरह से जल गई. उनको इलाज के लिए दिल्ली के बेस हॉस्पिटल लाया गया. वो इस बुरी तरह जले हुए थे कि उनके ज़ख्मों पर पट्टी तक नहीं लगाई जा सकती थी. इसी दौरान प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री उनसे मिलने गए. जब वो उनके सामने पहुंचे तो मेजर भूपेंदर की आँखों से आँसू निकल आए.
शास्त्री ने उनसे कहा, "आप इतनी बहादुर सेना के इतने बहादुर सिपाही है. आप की आँखों पर आँसू शोभा नहीं देते." मेजर भूपेंदर ने कहा, "मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ कि मुझे दर्द है. मैं इस लिए रो रहा हूँ कि एक सिपाही खड़े हो कर अपने प्रधानमंत्री को सेल्यूट नहीं कर पा रहा है." मेजर भूपेंदर को बचाया नहीं जा सका लेकिन उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया.
अयूब का टेक ऑफ़, भारत का हमला
लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल शास्त्री ने बीबीसी को बताया कि लड़ाई के दौरान प्रधानमंत्री निवास स्थान 10 जनपथ पर उनके परिवार की सुरक्षा के लिए एक बंकर बनाया गया था. दिन में कम से कम एक बार वहाँ पूरा शास्त्री परिवार इकट्ठा होता था.
Image captionबीबीसी स्टूडियो में अनिल शास्त्री रेहान फ़ज़ल के साथ.
वैसे सुरक्षा के लिहाज़ से शास्त्री जी का पूरा परिवार ज़्यादातर राष्ट्रपति भवन में सोने जाया करता था. ऐसा तत्कालीन राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन के ख़ास अनुरोध पर किया गया था क्योंकि राधाकृष्णन का मानना था कि राष्ट्रपति भवन की दीवारें कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं.
उधर फ़ील्ड मार्शल अयूब खाँ अपने शयन कक्ष में जब तक मौजूद रहते वहाँ हरी बत्ती जलती रहती. 19 सितंबर को उन्होंने विदेश मंत्री भुट्टो के साथ गुप्त रूप से चीनी नेताओं से बात करने के लिए चीन जाने का फ़ैसला किया. उनके बेडरूम की हरी बत्ती जलते रहने दी गई ताकि पूरी दुनिया को ये आभास रहे कि वो रावलपिंडी में हैं. यहाँ तक कि उनका स्टाफ़ रोज़मर्रा की तरह उनके बेडरूम में बेड टी पहुंचाता रहा.
यात्रा को गुप्त रखने के लिए उन्होंने रावलपिंडी के बजाए पेशावर से बीजिंग के लिए उड़ान भरने का फ़ैसला किया. जब उनका जहाज़ टेक ऑफ़ कर ही रहा था कि भारतीय युद्धक विमानों ने पेशावर हवाई अड्डे पर हमला बोल दिया. टेक आफ़ रोका गया लेकिन जहाज़ के इंजिन को बंद नहीं किया गया. जैसे ही भारतीय विमान हमला करके वापस अपने देश के लिए उड़े, अयूब खाँ के विमान ने बीजिंग के लिए उड़ान भरी.
लड़ाई जारी रखने की झिझक
बाइस दिनों तक चलने वाली इस लड़ाई में भारत के क़रीब 3,000 और पाकिस्तान के क़रीब 3,800 सैनिक मारे गए. टाइम पत्रिका ने लिखा कि युद्ध विराम के समय भारत के पास पाकिस्तान का 690 वर्ग मील क्षेत्र था जबकि पाकिस्तान ने भारत के 250 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर क़ब्ज़े का दावा किया था. दोनों देशों ने जीत का दावा किया लेकिन वास्तव में दोनों ही देश अपने सैनिक उद्देश्यों को पूरा करने में असफल रहे.
प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी से पूछा, "अगर लड़ाई को कुछ दिनों तक और जारी रखा जाए तो क्या भारत की जीत हो सकती है."
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जनरल ने जवाब दिया कि भारत के सभी मुख्य हथियार इस्तेमाल हो चुके हैं और बहुत से टैंक भी बरबाद हुए हैं. लेकिन वास्तव में 22 सितंबर तक भारत ने सिर्फ़ 14 फ़ीसदी असलहे का इस्तेमाल किया था.
दूसरी तरफ़ जब अयूब ने यही सवाल अपने जनरलों से पूछा तो जनरल मूसा और एयर मार्शल नूर ख़ाँ दोनों ने लड़ाई को जारी रखने के ख़िलाफ़ सलाह दी. अयूब इस युद्ध से इतने हतोत्साहित हुए कि उन्होंने एक मंत्रिमंडल की बैठक में कहा, "मैं चाहता हूँ कि यह समझ लिया जाए कि पाकिस्तान 50 लाख कश्मीरियों के लिए 10 करोड़ पाकिस्तानियों की ज़िंदगी कभी नहीं ख़तरे में डालेगा...कभी नहीं.