Wednesday, 23 December 2015

क्यों आज की धारणाओं के उलट मराठा शासक हमेशा हिंदू हितों के रक्षक नहीं रहे @शोएब दानियाल

1741 में मराठों का बंगाल पर हमला इस प्रचलित मिथक पर सवाल खड़े करता है कि उनकी सेना राष्ट्रवादी सेना थी और हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए युद्ध कर रही थी
सड़कों के नामों में कई कहानियां छिपी होती हैं. कलकत्ता, जिसका एक लंबा इतिहास रहा है, के बारे में यह बात कुछ ज्यादा ही लागू होती है. उत्तरी कलकत्ता के बागबाजार की एक ऐसी ही सड़क है ‘मरहाटा डिच लेन’
इस नाम के साथ इस्तेमाल ‘डिच’ यानी खाई या खंदक वास्तव में 1750 के दशक में उत्तरी कलकत्ता में बनाई गई थी. तो इसका मकसद क्या था? यह लंबी और गहरी खाई मराठी घुड़सवार सैनिकों को रोकने के लिए बनाई गई थी जो तब लूटमार करने के उद्देश्य से यहां धावा बोल रहे थे.
दक्षिण भारत की सैन्य विरासत में ‘मारो और भागो’ की छापामार रणनीति एक अहम रही है. मराठों ने लाचार बंगालवासियों के खिलाफ इसी रणनीति को अपनाया था
1741 में नागपुर के शासक राघोजी भोसले के घुड़सवार सैनिकों ने भास्कर पंडित की कमान में पश्चिमी बंगाल में घुसपैठ शुरू की थी. बंगाली मराठों को ‘बर्गी’ कहते थे. बर्गी मराठी शब्द बर्गीर (मूल शब्द फारसी से आया है) का बिगड़ा रूप है जिसका अर्थ है ‘घुड़सवारों की टुकड़ी’.
दक्षिण में अहमदनगर सल्तनत के प्रधानमंत्री मलिक अंबर (1549-1626) ने छापामार लड़ाई की रणनीति को प्रचलित किया था. इसे ही बाद में बर्गीर-गिरी कहा जाने लगा. दक्षिण भारत की सैन्य विरासत में ‘मारो और भागो’ की यह रणनीति एक अहम हिस्सा बन गई. शिवाजी इसमें पारंगत थे. मराठों ने लाचार बंगालवासियों के खिलाफ इसी रणनीति को अपनाया था.
बर्गीर-गिरी का शिकार आम बंगाली थे
1750 के दशक के दौरान बंगाल में नवाब अलीवर्दी खान का शासन था. तब मराठों की इस सैन्य रणनीति ने नवाब की सेना को बुरी तरह उलझा दिया था. हालांकि इससे पहले कुछ एक मौकों पर आमने-सामने की लड़ाई में उसने मराठों को हराया था लेकिन ज्यादातर समय वे नवाब की सुस्त घुड़सवार सेना को चकमा देकर आबादी वाले क्षेत्रों से लूटमार करने में लग जाते थे.
मराठा सैनिकों की लूट का यह सिलसिला दस साल तक चला. उनकी इस मुहिम ने सीमाक्षेत्र के बंगालवासियों को कंगाल कर दिया और यहां बड़े स्तर पर गरीबी फैल गई. तत्कालीन डच स्रोतों के मुताबिक इन सालों में बर्गियों ने चार लाख लोगों को मौत के घाट उतारा था. इतिहासकार पीजे मार्शल लिखते हैं कि पश्चिमी बंगाल के कई बड़े व्यापारी हमेशा के लिए तबाह हो गए थे.
मराठा सैनिकों की लूट का यह सिलसिला दस साल तक चला. उनकी इस मुहिम ने सीमाक्षेत्र के बंगालवासियों को कंगाल कर दिया और यहां बड़े स्तर पर गरीबी फैल गई
तत्कालीन बंगाल के एक कवि गंगाराम ने ‘महाराष्ट्र पुराण’ नाम की कविता में मराठों द्वारा की गई लूटपाट और उससे हुई तबाही का विस्तार से वर्णन किया है. इसमें वे एक स्थान पर लिखते हैं :
इसबार कोई नहीं बच पाया,
न ब्राह्मण, न वैष्णव, न संन्यासी और न ही गृहस्थ,
सबको एक जैसा फल भुगतना पड़ा, लोगों के साथ-साथ गायें भी मार दी गईं.
कलकत्ता के ‘डिचर’
बर्गियों ने सीमांत क्षेत्रों को तो लूटा ही साथ ही उन्होंने अपनी मारक क्षमता दिखाने के लिए बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद पर भी एक बार धावा बोला था. यहां उन्होंने उस समय भारत के सबसे अमीर लोगों में गिने जाने वाले मारवाड़ी महाजन जगत सेठ का घर लूट लिया था.
हालांकि इतना सब करने के बाद भी मराठों ने कभी कलकत्ता पर हमला नहीं किया. माना जाता है कि इसके लिए अंग्रेजों ने उन्हें कुछ पैसा दिया था. जो चौड़ी खाई शहर के एक तरफ खोदी गई थी उसका एक मकसद संयोग से पूरा हो गया था. बाद के समय में इसकी एक और देन रही. खाई या डिच के दक्षिण की ओर ‘खास’ कलकत्ता में रहने वालों को इसकी वजह से एक उपनाम मिल गया – ‘डिचर’. खाई धीरे-धीरे पाट दी गई और अब इसके ऊपर ‘बाहर सड़क’ बना दी गई है.
मराठों ने एक दशक तक बंगालियों पर हमले किए थे. ये तभी रुके जब इनसे परेशान होकर नवाब ने हार मान ली और राघोजी भोसले को उड़ीसा का राज्य दे दिया.
इतिहास की लोकप्रिय बहसों में यह मराठा आक्रमण एक अलग तस्वीर दिखाता है
मराठी सेना को अक्सर राष्ट्रवादी ताकत बताने का चलन रहा है जो भारत या हिंदू राष्ट्रवाद की स्थापना के लिए लड़ रही थी. हालांकि इसमें कुछ भी अजीब नहीं है क्योंकि आधुनिक राष्ट्र अपने को गढ़ने के लिए अतीत की कुछ घटनाओं से ही मिथक निकालते हैं और उन्हें विस्तार देते हैं. जैसे ज्यादातर पाकिस्तानी मानते हैं कि कुतबुद्दीन ऐबक के समय इस्लामी राष्ट्रवाद का अस्तित्व था तो वहीं भारतीयों को लगता है कि मराठा हिंदू राष्ट्रवाद के लिए काम कर रहे थे. उस मकसद के लिए जिसे विनायक सावरकर ने ‘हिंदू पद पादशाही’ नाम दिया था.
यह भी दिलचस्प है कि हिंदू पद पादशाही शब्दांश पूरी तरह से फारसी भाषा से बना है. यह दिखाता है कि साझे सांस्कृतिक सूत्र कैसे बनते हैं. लेकिन इतिहास का जब अपने हिसाब से सरलीकरण किया जाता है तो कुछ बातें छोड़नी पड़ती हैं. तब यह बात नहीं की जा सकती कि कैसे मराठे हिंदु बहुसंख्या वाले बंगाल में लूटमार कर रहे थे और वहां का मुस्लिम नवाब उनसे संघर्ष कर रहा था.

Saturday, 19 December 2015

दादी की नकल कहीं पोते को महंगी न पड़ जाए! @रशीद किदवई

Image copyrightAFP GETTY
कांग्रेस पार्टी बहुत अनमने ढंग से सोनिया गांधी के अनिवार्य 'रिटायरमेंट' की अपनी तैयारी कर रही थी और नीतीश कुमार, लालू यादव और अरविंद केजरीवाल जैसे तीसरे मोर्चे के नेता, भाजपा को चुनौती देने के लिए इस पुरानी पार्टी की जगह लेते नज़र आने लगे थे, लेकिन नेशनल हेरल्ड मामले में कोर्ट में पेशी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी को फिर से सुर्खियों में ला दिया है.
बुज़ुर्ग सोनिया ने पटियाला हाउस कोर्ट के अंदर और बाहर दोनों मोर्चों पर आगे रहकर संघर्ष करने का मन बना लिया है. यह वही जगह है जहां इंदिरा गांधी और संजय गांधी ने 1977-78 में शाह आयोग की जांच का सामना किया था.
इसीलिए उत्साह बिल्कुल साफ़ दिख रहा है. पार्टी के शीर्ष नेताओं से लेकर ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक से अपनी ताक़त दिखाने के लिए अदालत के बाहर प्रदर्शन करने को कहा गया है.
कांग्रेस की मोटा मोटी रणनीति अपने युवा उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए बेल बॉन्ड न भरने की है.
नेहरू गांधी परिवार के एक सदस्य की संभावित गिरफ़्तारी, तीन अक्टूबर 1977 की उस घटना की याद को ताज़ा करा सकती है, जब इंदिरा गांधी को ग़िरफ्तार किया गया था.
सत्ता से बेदखल होने और जनता की हमदर्दी में कमी के इस दौर में इंदिरा गांधी ने अपनी वापसी का रास्ता बनाने के लिए जनता सरकार द्वारा खुद की गिरफ़्तारी को बहुत कुशलता से भुनाया था.
कोर्ट में पेश होने जातीं इंदिरा गांधीImage copyrightCOURTESY SHANTI BHUSHAN
तीन अक्टूबर,1977 को शाम पांच बजे सोनिया 12, वेलिंग्डन क्रीसेंट में अपनी सास के लिए चाय बना रही थीं, उसी समय सीबीआई के एसपी एनके सिंह ने घर का दरवाजा खटखटाया.
इंदिरा गांधी ने चीख कर कहा, “मुझे हथकड़ी लगाओ.”
उन्होंने एनके सिंह पर दहाड़ा, “मैं तबतक नहीं जाऊंगी जबतक हथकड़ी नहीं लगाई जाती.”
अभी सोनिया ठिठक कर इस घटना को देख ही रही थीं कि संजय गांधी ने कांग्रेस समर्थकों को जल्दबाज़ी में फ़ोन किया और दूसरे फ़ोन से आरके धवन ने स्थानीय मीडिया को ये सूचना दी.
उस ज़माने के रिपोर्टर आज भी याद करते हैं कि कैसे उस समय सूर्या मैगज़ीन से जुड़ी रहने वाली मेनका गांधी के उनके पास फ़ोन आए कि अगर वो इंदिरा गांधी के घर अभी जाएं तो उन्हें बड़ी कहानी हाथ लगेगी.
इंदिरा गांधीImage copyrightShanti Bhushan
जबतक मीडिया के लोग पर्याप्त संख्या में नहीं पहुंच गए, इंदिरा अपनी गिरफ़्तारी में देरी करती रहीं.
उन्होंने एनके सिंह से पूछा, “गिरफ़्तारी का वारंट और एफ़आईआर रिपोर्ट कहां है?”
जब सीबीआई अधिकारी ये संबंधित दस्तावेज़ निकाल ही रहे थे कि इंदिरा के वकील फ़्रैंक एंथनी ने कहा, “क्या चरण सिंह का यही नया क़ानून है?” उस समय चरण सिंह गृह मंत्री थे.
जबकि इंदिरा लगातार दुहराती रहीं, “मैं तबतक नहीं हिलूंगी, जबतक आप हथकड़ी नहीं लगाते, हथकड़ी ले आइए और मुझे ले चलिए.”
उस समय इंदिरा गांधी को तकनीकी आधार पर रिहा कर दिया गया.
राजीव गांधी और सोनिया
इस वाक़ये ने ही राजीव गांधी को ये टिप्पणी देने के लिए प्रेरित किया, “मम्मी अपने दम पर इतना बेहतर माहौल नहीं बना सकती थीं.” उस समय वो राजनीति में नहीं थे और उन्होंने ये बात एक विदेशी पत्रकार से कही थी.
ले मोंडे ने लिखा, “भारत में आमतौर पर राजनीतिक बंदी को शहीद के रूप में माना जाता है, यहां जेल सत्ता की सीढ़ी हो सकती है, जैसा कि मोरारजी देसाई सरकार के अधिकांश सदस्यों के मामले में एक बार हो चुका था.”
इंदिरा गांधी को एक अन्य मौके पर दिसम्बर 1978 में जेल जाना पड़ा था. असल में देसाई सरकार इंदिरा और संजय पर मुक़दमा चलाने के लिए विशेष अदालतों के गठन का क़ानून पास कराने में सफल हो गई थी.
संसद से उनके निष्कासन और नाटकीय विदाई के कुछ दिन बाद ही, इंदिरा गिरफ़्तार कर ली गईं और उन्हें तिहाड़ जेल में बंद किया गया, जहां उन्हें उसी बैरक में रखा गया जहां इमरजेंसी के दौरान जॉर्ज फ़र्नांडीस कैदी रहे थे.
इस दौरान सोनिया इंदिरा के लिए घर से तीनों पहर का खाना बनाकर ले जाती थीं.
Image copyrightAP
कांग्रेस में एक वर्ग का मानना है कि अगर मोदी सरकार नेशनल हेरल्ड मुद्दे पर सोनिया और राहुल गांधी को जेल भेजने की कोशिश करती है तो कांग्रेस के लिए वापसी का यह एक मौका होगा.
हालांकि उत्साही और आशावादी कांग्रेस को थोड़ी सावधानी और इतिहास के पन्नों से एक सबक लेने की ज़रूरत है.
पहली बात तो यही है कि 2015-16 का समय 1977-79 जैसा नहीं है. दूसरे, सोनिया इंदिरा गांधी भी नहीं हैं.
जब शरद पवार, पीए संगमा और तारिक़ अनवर ने उनके विदेशी मूल के होने के मुद्दे पर बगावत कर दी थी तो उन्होंने उन्होंने खुद मई, 1999 में कहा था कि वो जवाहरलाल नेहरू की लड़की नहीं हैं.
यह बात सच है कि एक तरफ जनता की हमदर्दी बटोरने और राजनीतिक वापसी के लिए अपनी गिरफ़्तारी को इंदिरा गांधी ने बहुत सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया, लेकिन संजय गांधी नहीं कर पाए.
मई 1978 में उन्हें एक महीने की जेल हुई. 1979 में छह बार जेल भेजे गए और पांच सप्ताह तक दिल्ली, देहरादून और बरेली के जेलों में गुजारे.
संजय गांधीImage copyrightGetty
फ़िल्म ‘क़िस्सा कुर्सी का’ से जुड़े आपराधिक मामले में, संजय को दो साल की सज़ा हुई.
संजय को ज़मानत का विकल्प चुनना पड़ा और यह मामला धीरे-धीरे गुमनामी में खो गया क्योंकि कई गवाह मुकर गए.
दो मई, 1979 में स्टेट्समैन अख़बार ने संजय गांधी की एक तस्वीर प्रकाशित की जिसमें उनके हाथों, पीठ और कंधों पर लाठी के निशान थे.
तत्कालीन दिल्ली के उपायुक्त पीएस बरार को उस समय संजय पर चिल्लाते हुए सुना गया था जब पुलिसकर्मियों द्वारा संजय पर लाठियां बरसाईं जा चुकी थीं.
इसके बाद अलगे दो हफ़्ते उन्होंने जेल में बिताए.
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कांग्रेसियों और राहुल गांधी के कार्यालय को ये सवाल पूछने की ज़रूरत है: क्या अपने चाचा जैसी हालत का सामना करने के लिए राहुल तैयार हैं या युवराज स्पेशल प्रोटेक्शन एक्ट ऑफ़, 1991 के भरोसे बैठे हैं, जिसकी छत्रछाया उन्हें किसी भी मुश्किल हालात से बचाती है

'कभी राजीव गांधी के ख़ास दोस्त थे स्वामी'

नेशनल हेरल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अदालत तक लाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी अपने सार्वजनिक जीवन में कई वजहों से चर्चा में रहे हैं. कभी प्रतिभाशाली गणितज्ञ के तौर पर मशहूर रहे स्वामी को कानून का जानकार भी माना जाता है.
उनके अब तक के सफ़र से जुड़ी 10 दिलचस्प बातें-
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1- स्वामी के पिता सीताराम सुब्रमण्यम जाने माने गणितज्ञ थे. वे एक समय में केंद्रीय सांख्यिकी इंस्टीच्यूट के डायरेक्टर थे. पिता की तरह ही स्वामी भी गणितज्ञ बनना चाहते थे. उन्होंने हिंदू कॉलेज से गणित में स्नातक की डिग्री ली. इसके बाद से भारतीय सांख्यिकी इंस्टीच्यूट, कोलकाता पढ़ने गए.
2- स्वामी के जीवन का विद्रोही गुण पहली बार कोलकाता में ज़ाहिर हुआ. उस वक्त भारतीय सांख्यिकी इंस्टीच्यूट, कोलकाता के डायरेक्टर पीसी महालानोबिस थे, जो स्वामी के पिता के प्रतिद्वंद्वी थे. लिहाजा उन्होंने स्वामी को ख़राब ग्रेड देना शुरू किया. स्वामी ने 1963 में एक शोध पत्र लिखकर बताया कि महालानोबिस की सांख्यिकी गणना का तरीका मौलिक नहीं है, बल्कि यह पुराने तरीके पर ही आधारित है.
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3- स्वामी ने महज 24 साल में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली. 27 साल में वे हार्वर्ड में गणित पढ़ाने लगे थे. 1968 में अमृत्य सेन ने स्वामी को दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स में पढ़ाने का आमंत्रण दिया. स्वामी दिल्ली आए और 1969 में आईआईटी दिल्ली से जुड़ गए.
4- उन्होंने आईआईटी के सेमिनारों में ये कहना शुरू किया कि भारत को पंचवर्षीय योजनाएं खत्म करनी चाहिए और विदेशी फंड पर निर्भरता हटानी होगी. इसके बिना भी भारत 10 फ़ीसदी की विकास दर को हासिल कर सकता है. स्वामी तब इतने महत्वपूर्ण हो चुके थे कि उनकी राय पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था यह विचार वास्तविकता से परे है.
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5- इंदिरा गांधी की नाराजगी के चलते स्वामी को दिसंबर, 1972 में आईआईटी दिल्ली की नौकरी गंवानी पड़ी. वे इसके ख़िलाफ़ अदालत गए और 1991 में अदालत का फ़ैसला स्वामी के पक्ष में आया. वे एक दिन के लिए आईआईटी गए और इसके बाद अपना इस्तीफ़ा दे दिया.
6- नानाजी देशमुख ने स्वामी को जनसंघ की ओर से राज्यसभा में 1974 में भेजा. आपातकाल के 19 महीने के दौर में सरकार उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर सकी. इस दौरान उन्होंने अमरीका से भारत आकर संसद सत्र में हिस्सा भी ले लिया और वहां से फिर ग़ायब भी हो गए.
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7- 1977 में जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे. 1990 के बाद वे जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे. 11 अगस्त, 2013 को उन्होंने अपनी पार्टी का विलय भारतीय जनता पार्टी में कर दिया.
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8- चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में वाणिज्य एवं कानून मंत्री रहते हुए उन्होंने आर्थिक सुधारों की नींव रखी थी. नरसिम्हा राव सरकार के समय विपक्ष में होने के बावजूद स्वामी को कैबिनेट रैंक का दर्जा हासिल था.
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9-सोनिया गांधी को मुश्किल में डालने वाले स्वामी ने 1999 में वाजपेयी सरकार को गिराने की कोशिश की थी. इसके लिए उन्होंने सोनिया और जयललिता की अशोक होटल में मुलाक़ात भी कराई. हालांकि ये कोशिश नाकाम हो गई. इसके बाद वे हमेशा गांधी परिवार के ख़िलाफ़ ही नज़र आए.
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10- हालांकि एक समय में स्वामी राजीव गांधी के नजदीकी दोस्तों में भी शामिल थे. बोफोर्स कांड के दौरान वे सदन में ये सार्वजनिक तौर पर ये कह चुके थे कि राजीव गांधी ने कोई पैसा नहीं लिया है. एक इंटरव्यू में स्वामी का दावा है कि वे राजीव के साथ घंटों समय व्यतीत किया करते थे और उनके बारे में सबकुछ जानते थे.

Thursday, 17 December 2015

Angry & Bitter with the State Department @B Raman

Throughout my 26 years in the Research and Analysis Wing (R&AW), India’s external intelligence agency, I was known as a man with a poker face.
As someone, who showed no emotions or passion on his face or in his words.
As someone, who led a robot-like existence, working from 8 in the morning till 9-30 in the night — seven days a week, 365 days in a year.
As someone, who took life in its stride.
I was angry and bitter at the US State Department.
But, I was a different man that day — on August 31, 1994, as I was driven home in the official car, after having attended a party hosted by the officers of the R&AW to bid farewell to another officer and me, who had retired that evening from service at the age of 58.
Anyone, who had seen me as I entered my flat that night, might not have recognized me.
All the pent-up emotions, all the anger and bitterness, which I had kept suppressed inside me for 26 years, burst out.
“BASTARDS”, I shouted.
I was angry and bitter.
Not at my organization, which had always treated me with honour and generosity.
Not at my colleagues, who had always respected and admired me.
Not at Narasimha Rao, the then Prime Minister, and his predecessors, who were directly in charge of the R&AW, right from the day it was created on September 21,1968, by bifurcating the Intelligence Bureau (IB) on the orders of Indira Gandhi.
I was angry and bitter at the US State Department.
The message said that the Ambassador had been called by a middle-level officer of the State Department and told that it was aware that the covert action division of the R&AW was meddling in the internal affairs of Pakistan and trying to destabilize it.
I have always loved the US.
I have always liked the American people.
But, there is one American species, which I could never bring myself to like during the 27 years I spent in the intelligence community — the officers of the US State Department.
During the one year I spent in the IB as in charge of Burma and South-East Asia before the R&AW was formed.
During the 26 years I spent in the R&AW.
My dislike for the US State Department went up even further during my last days in the R&AW.
A few days before my retirement, the chief of the R&AW told me that he had been called by Narasimha Rao for a discussion on a sensitive subject and that I should accompany him. I did so.
Narasimha Rao took out a personal message, which he had received from the Indian Embassy in Washington DC and gave it to my chief.
He went through it in silence and then passed it on to me.
As I read it , I felt like vomiting and spitting at the State Department officials. I might have done so had they been there.
The message said that the Ambassador had been called by a middle-level officer of the State Department and told that it was aware that the covert action division of the R&AW was meddling in the internal affairs of Pakistan and trying to destabilize it. The State Department officer, who had previously served in the US Embassy in New Delhi, asked the Ambassador to tell New Delhi that if the R&AW did not stop what the State Department described as its covert actions in Pakistan, the US might be constrained to act against Pakistan and India for indulging in acts of terrorism against each other.
Can any of your actions be misinterpreted as acts of terrorism?
According to the message, the State Department officer said: “You have been asking us for many years to declare Pakistan as a State-sponsor of terrorism. Yes, we will do so. But we will simultaneously act against India too if it did not stop meddling in Pakistan.”
“What kind of covert actions you have in Pakistan?” Narasimha Rao asked.
“We have been actively interacting with different sections of Pakistani society, which are well disposed towards India and extending to them discreet political and moral support,” I replied.
“Since when?” he asked.
“Since 1988, when Pakistan-sponsored terrorism in Punjab increased in its brutality and evidence came in from one of the Western intelligence agencies that they had received confirmation that Talwinder Singh Parmar, one of the terrorists of the Babbar Khalsa, Canada,who had participated in the blowing up of the Kanishka, the Air India aircraft, in June,1985, off the Irish coast, had been given sanctuary in Pakistan by its Inter-Services Intelligence (ISI) Directorate. Rajiv Gandhi asked us not to confine any longer our contacts to only the ruling circles of Pakistan, but to diversify them and start interacting with others too — particularly those who think and wish well of India,” I said, and added: “We had also kept you informed of this when you took over as the Prime Minister in 1991 and subsequently.”
We have every right to maintain contacts with all sections of Pakistani society. We need not be worried if the Americans dislike this.
“Yes. I know. But, why is the State Department talking of acts of terrorism? Can any of your actions be misinterpreted as acts of terrorism?”
“Definitely not, Sir.”
Narasimha Rao thought for a while and said: “Let me have a draft reply to the Ambassador, directing him to strongly deny the allegations of the State Department. Don’t discontinue your interactions. We have every right to maintain contacts with all sections of Pakistani society. We need not be worried if the Americans dislike this.”
The draft of the reply to the Ambassador was the last paper I prepared before I retired. I gave it to my chief, who forwarded it to Narasimha Rao.
I do not know if Narasimha Rao sent it to the Ambassador and, if so, in what form and language.
The day after I retired, the late Rajesh Pilot, the then Minister of State for Internal Security, sent for me.
“What are your plans?” he asked.
“Sir, I am booked to return to Madras on September 20 to settle down there.”
“There is no question of your returning to Madras. I have spoken to Rao about you. He has agreed that we should utilize your knowledge and experience in the North-East by appointing you as the Intelligence Co-Ordinator in that region. You have dealt with the North-East for many years in the 1970s and the 1980s. Your insights will be invaluable.”
I told him I would prefer to go back to Madras. I added that any Intelligence Co-ordinator for the North-East has to be from one of the North-Eastern States and that an outsider would not be effective.
When we did not agree to this, they threatened to declare India as not co-operating in the fight against narcotics.
A few days later, Narasimha Rao sent for me.
“Pilot tells me you are returning to Madras for good on the 20th.”
“Yes, Sir.”
“But, why are you in a hurry? We want to utilize your services. If you don’t like dealing with the North-East, we can find something else for you.”
I expressed my regrets and requested him to permit me to return to Madras.
“If you insist. But do keep in touch with me.”
As I was about to get up and leave, he mentioned the name of an official of the US State Department and asked me what I thought of her.
I told him that my impression was that she had a visceral dislike of India. I added: “Sir, she is behind much of our troubles in Jammu and Kashmir. She is the mentor of the anti-New Delhi Kashmiri leaders. She is a close personal friend of Benazir Bhutto. I had a suspicion that she had shared with Benazir the contents of some of our intelligence reports regarding the activities of the Khalistani terrorists in Pakistani territory, which we had shared with the US. We lost a couple of valuable sources.”
Benazir Bhutto was then the Prime Minister of Pakistan.
Narasimha Rao said: “I know the State Department has never been well disposed towards India. Why this sudden increased dislike of India?”
“Sir, it is not sudden. If you recall, in 1992 they had threatened to impose economic sanctions against India by declaring it as non-cooperating with the US in the fight against narcotics.”
“Yes. I remember vaguely. Why did they do so?”
“They alleged that there was large-scale illicit opium cultivation along the Sino-Indian border in certain areas and wanted the Directorate-General of Security (DGS) to take aerial photographs of the region with the help of an aircraft given by the US some years ago. We agreed to do so. They said that they wanted one of their intelligence officers to travel in the aircraft when it went on aerial photography missions along the Sino-Indian border. When we did not agree to this, they threatened to declare India as not co-operating in the fight against narcotics. With your approval, we stood firm in our refusal. They did not raise the issue again.”
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“ We have to get along with them; at the same time, we have to be careful of them,’’ he remarked and wished me farewell.
That was my last meeting with Narasimha Rao, but I kept writing to him from Madras from time to time expressing my thoughts on matters of national security. He never replied to them, but I had an impression that he did read them, because on a couple of occasions, serving officers of the intelligence community met me as desired by Rao to discuss some of the points made by me in my letters to him — particularly on the dangers of allowing foreign participation in our telecom services.

Monday, 14 December 2015

नरेंद्र मोदी के संकटमोचक!

हॉलीवुड के मशहूर किरदार का नाम है जेम्स बॉन्ड. जासूस जेम्स बॉन्ड का 007 नंबर भी आपने सुना होगा. दरअसल जासूसी की दुनिया जितनी तिलस्मी है उतनी ही रहस्यों से भरी हुई भी होती है इसीलिए हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक जासूसी की कहानियों पर रोमांचक फिल्मों का दौर आज भी जारी है. रील लाइफ में जासूसों का किरदार बेहद आकर्षक अंदाज में पेश किया जाता है लेकिन रीयल लाइफ के जिस जासूस की बात हम आज आपको बता रहे हैं वह ना तो हवाओं में उड़ता था और ना ही आसमान में तैरता नजर आता था. फिल्मी जेम्स बॉन्ड की तरह ये जासूस ना तो दुश्मन पर गोलियां बरसाता था और ना ही हसीनाओं से आंखे लड़ाता था लेकिन अपनी हिम्मत और जज्बे से उसने जासूसी की दुनिया में ऐसी मिसालें कायम कर दी जिन्होनें उन्हें बना दिया है देश का रीयल जेम्स बॉन्ड.
म्यांमार में घूसकर उग्रवादियों को भारतीय सेना ने मार गिराया. इसके मुख्य सूत्रधार रहे अजित डोभाल. भारत में जासूसी की दुनिया का ये वो चेहरा रहा है जो आज नरेंद्र मोदी की सरकार में रुतबे और रसूख की एक नई पहचान बन चुका है. देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की प्रधानमंत्री मोदी से ये करीबियत ही उनकी अहमियत को बयान कर देती है. डोभाल केंद्र सरकार में सबसे ताकतवर अफसर माने जाते हैं क्योंकि उनके कंधों पर देश की सुरक्षा का भार है. देश के अहम फैसलों में उनकी राय की अहमियत और खास जगहों पर उनकी मौजूदगी से भी जाहिर है कि केंद्र सरकार में अजित दोभाल बन गए हैं कितने अहम और कितने खास.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दुल्लत बताते हैं कि उनका बहुत क्रूसल रोल है . इस सरकार के सक्सेस और असफल के बीच अजीत दोभाल ही होगा. मैं इस तरह कहूंगा इसे. देश के पांचवे सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राइट हैंड मैन माने जाते है लेकिन उनके इतने ऊंचे रुतबे के पीछे संघर्ष की उतनी ही बड़ी एक दास्तान भी दर्ज है. जासूसी की दुनिया में अजित डोभाल का एक हैरतअंगेज इतिहास रहा है उनके उस इतिहास में भी झांकने की कोशिश हम करेंगे लेकिन पहले आपको बताते है कि आखिर कौन है अजित डोभाल.
31 मई को प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने अजित डोभाल इंटेलीजेंश ब्यूरों के चीफ रह चुके हैं. उन्हें आंतरिक सुरक्षा और काउंटर टेरेरिज्म का मास्टर माना जाता हैं क्योकि पंजाब से लेकर नार्थ ईस्ट तक और कंधार से लेकर कश्मीर तक एक जासूस के तौर पर डोभाल ने देश और दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ लडाई में अहम योगदान दिया है और उनकी इन्हीं खूबियों के चलते आज वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद और सबसे खास बन गए हैं.
खुफिया ब्यूरो पूर्व आफिसर के एन सिंह बताते हैं कि नरेंद्र मोदी की सरकार में अभी तक जो एपाइंटमेंट हुए है एक एक बड़े चुन के हुए हैं. किसी में कोई खामी नहीं निकाल सकता है लेकिन मेरे ख्याल से सबसे अच्छा सलेक्शन अजीत दोभाल का ही था. जैसा कि मैने कहा कि एनएसए को इंटरनल सेक्युरिटी और एक्सटरनल सेक्युरिटी का पूरा कंप्लीट ज्ञान होना चाहिए. जो इनमें है औऱ  इसीलिए चाहे चाइना. चाइनीज प्रेसीडंट के एडवांस विजिट में वहां गए. यहां भी आपने देखा होगा ब्राजील में गए साथ में जापान में क्रूसल रोल प्ले किया. अभी आपने देखा म्यामार गए. आस्ट्रेलिया में है हर जगह मैं तो देखता हूं टीवी में आपके चैनल के माध्यम से मुझे मालूम होता है मैं देखता हूं कि इन सब इंपार्टेंट मीटिंग में राइट हैंड पर बैठे होते हैं अजीत दोभाल. तो मुझे तो खुशी होती है बैच मैट और गुड फ्रैंड.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साये की तरह नजर आने वाले डोभाल का मशवरा सत्ता के गलियारों में ऊंचा मकाम रखता हैं. दरअसल राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का मुखिया राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होता है जिसका मुख्य काम प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सलाह देना होता है. एनएसए का ये पद 1998 में पहली बार उस वक्त बना था जब देश में दूसरी बार परमाणु परीक्षण किया गया था. तब देश का न्यूक्लियर प्लान और पॉलिसी बनाने और इस मुद्दे पर विदेशी सरकारों से बात करने के लिए एक सुरक्षा परिषद का गठन भी किया गया था जिसका कोऑर्डीनेटर ऱाष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को बनाया गया था लेकिन बदले हालात में जब देश को आतंकवाद से बड़ी चुनौती मिली तो देश के अंदर और बाहर सुरक्षा की जिम्मेदारी भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के दायरे में आ गई. जाहिर है आज एनएसए का ये ओहदा देश के सबसे अहम पदों में शुमार हो गया है और यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ नजर अहम जगहों पर नजर आते हैं देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दुल्लत बताते हैं कि देखिए अभी तो सरकार को छह महीने भी नहीं हुए हैं. लेकिन ऐसा है कि जो मैने देखा है. उससे बडी पॉजीटिव चीज जो देखने में आती है उससे लगता है कि  मोदी जी का और डोवाल साहब का रिलेशनशिप बहुत करीबी लग रहा है. जो जरुरी है उसके बगैर एनएसए फंक्शन नहीं कर सकता. और मैं समझता हूं कि इनकी सोच भी मिलती जुलती है. एक दूसरे को जानते हैं. समझते हैं और डोभाल साहब के लिए इशारा काफी होता है बाकी वो संभाल लेंगे.
आईबी के पूर्व प्रमुख अरुण भगत ने कहा कि चाहे डिफेंस मिनिस्टर हो चाहे होम मििनस्टर हो. चाहे प्राइम मिनिस्टर हो. उनको इन पर काफी भरोसा है. और पूरा यकीन है कि इनको जो भी काम दिया जाए या जो भी काम का दायरा है. उसको ये पूरी तरह समझते है. और उसमें वह जो सलाह देंगे वो सबसे अच्छी सलाह होगी. सबसे अच्छा तरीका होगा इसीलिए मुझे लगात है कि उन पर जो भरोसा किया जा रहा है. वो इन वजहों से है.
जून महीने में 46 भारतीय नर्सों को ईराक में आतंकी संगठन ISIS ने बंधक बनाया था. नर्सों की वापसी को लेकर उस वक्त खूब हंगामा भी मचा था तब परदे के पीछे नर्सों की सुरक्षित वापसी के लिए जो ऑपरेशन चला उसके मास्टर माइंड थे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल.
पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों की नई शुरुवात हो या फिर पश्चिमी देशों के साथ संबंधों का नया दौर जानकार मानते हैं कि इन सारी कवायद के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का ही दिमाग काम कर रहा है.
सीमा पर पाकिस्तान को करारा जवाब देने की केंद्र की नीति हो या फिर देश के अंदर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई एनएसए अजित डोभाल हर मोर्चे पर आगे नजर आए हैं. अक्टूबर में पश्चिम बंगाल के वर्धमान में जब बम फटे तो जांच अधिकारियों के साथ खुद अजित डोभाल घटना स्थल का जायजा लेने वर्धमान भी पहुंचे थे और ऐसा पहली बार हुआ है कि देश का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मौके ए वारदात पर नजर आया हैं. 
वरिष्ट पत्रकार कंचन गुप्ता ने बताया कि दोवाल साहब का पश्चिम बंगाल मे जाने का तीन कारण था. एक तो है कि ग्राउंड का असेसमेंट करना. स्थिती कितनी खराब है. इनकी पेनीट्रेशन कहां तक हुई है. दूसरा है ये एक अच्छा मौका था कि आप एक टेस्ट करें कि आपकी जो एक्जिस्टिंग इंटेलीजेंश नेटवर्किंग है वो कितनी मजबूत है. या वो कितना बिगड़ गया है. तो आप उसको उस हिसाब से करेक्ट कर सकते हैं. तीसरा जो है पश्चिम बंगाल की जो सरकार है. उसके साथ बात करके उनको ये समझाना कि देखिए ये पश्चिम बंगाल की इश्यू नहीं है ये वर्धमान की इश्यू नहीं है. ये एक जिला दो जिला या तीन जिला की इश्यू नहीं है. ये पूरे देश का इश्यू है.
 खुफिया ब्यूरो पूर्व आफिसर के एन सिंह बताते हैं कि ये खुद इनवाल्व हो जाते हैं. जो हम आर्मी और पुलिस में कहते है हू इज द लीडर, हू कैन लीड द फ्रंट. तो ये वो लीडर है जो खुद आगे चलते है पीछे लोग आए. इनमें ये क्षमता है और इसीलिए पंजाब में इन्होंने मिलिटेंशी जो वहां पर इनहोंने हैंडल किया 80 में. शायद ये पहले पुलिस आफिसर है जिनको कीर्ति चक्र मिला.
अजित डोभाल के साथ काम कर चुके के एम सिंह बताते हैं कि डोभाल अपने करियर में ऊंची उड़ान भरते रहे हैं लेकिन उनके पैर हमेशा जमीन पर टिके रहते हैं. एक जासूस के तौर पर उन्होनें बेशुमार खतरों का सामना भी किया है लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने के बाद अब उनके सामने चुनौतियां बेशुमार है. डोभाल की उन चुनौतियों का जिक्र भी हम करेंगे आगे लेकिन पहले सुनिए कहानी जासूस अजित डोभाल की. 
आईबी के पूर्व प्रमुख अरुण भगत ने बताया कि जब आप ऐसे लोगों से मिलते हैं. जो आपके देश की तरफ आपकी तरफ दुश्मनी की भावना से देखते हैं. तो उनसे आप मिलते है ऐसी टेरेटरी में जिसमें आपके पास कोई प्रोटेक्शन नहीं होता है. तो खतरा तो बहुत है. पर फिर भी खतरा मोल ना लिया जाए तो फिर जो जानकारी आपको चाहिए. जो रिलेशनशिप आपने बनाने है. वो नहीं बन पाते. तो इस लिहाज से मैं समझता हूं कि दोभाल एक कंप्लीट इंटेलीजेश आफिसर हैं. जो सिक्योरिटी के जितने भी पहलू हैं. उनकी समझ बहुत आच्छी है.
1968 बैच के IPS ऑफिसर अजीत डोभाल ने चार साल बाद 1972 में इंटेलीजेंश ब्यूरो ज्वाइन कर लिया था. 46 साल की अपनी नौकरी में महज 7 साल ही उन्होनें पुलिस की वर्दी पहनी है क्योंकि डोभाल का ज्यादातर वक्त देश के खुफिया विभाग में बतौर जासूस गुजरा है इसीलिए पहली नजर में अजित डोभाल जितने सामान्य नजर आते है उनका करियर उतनी ही करिश्माई कामयाबियों से भरा हुआ है.
खुफिया ब्यूरो पूर्व आफिसर के एन सिंह बताते हैं कि यही एक अफसर है जो कि आईबी में रहे. इन्होंने मिजोरम इनसरजेंशी वर्स्ट आफ द पीरियड 1975 से हैंडल किया है. पंजाब प्रो खालिस्तान मिलिटेंशी जब अपनी हाइट पर थी तब उसको इन्होंने हैंडल किया है. कश्मीर 90 में जब बहुत बुरी हालात थी तब हैंडल किया है. तो आतंरिक सुरक्षा में इन्होंने हर पहलू को हैंडल किया है. जहां तक बाहर का है सबसे बड़ा पाकिस्तान हमारा सबसे बड़ा प्राब्लम होता है. इन्होनें इंडियन हाई कमीशन पाकिस्तान में छह साल से ऊपर काम किया है. इसका अलावा वेस्टर्न वर्ल्ड में इंडियन हाई कमिशन लंदन में करीब चार साल तक रहे. दस साल से ऊपर ये फारेन सर्विस में भी काम किए हैं. तो दोनों जो प्राब्ल्म है उसका इनकों पूरा अनुभव भी है ज्ञान भी है. और इतना इनमें विजन है कि सोच भी सकते है कि कैसे इसे हल किया जाए.
फिल्मी परदे पर जासूसी की जो कहानी दर्शकों को रोमांच से भर देती है लेकिन असल जिंदगी की जासूसी की कहानी अगर सुनाई जाए तो सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाए. एक जासूस की जिंदगी कैसे खतरों से भरी होती है ये आप खुद सुनिए उन्हीं लोगों की जुबानी जिन्होंने अजित डोभाल के साथ जासूसी के खतरनाक काम को अंजाम दिया है. 
आईबी के पूर्व प्रमुख अरुण भगत ने बताया कि उसमें स्ट्रेस भी बड़ा रहता है. फिर इसके जो रिएक्शन होते हैं इसके नतीजे उल्टे भी पड़ सकते हैं. तो ये बड़ी टेंस लाइफ होती है इटेंलीजेंस आफिसर की. खास कर के जो हालात आज कल के है और पीछे जो थे. सिचुएशऩ इतनी खराब थी.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दुल्लत बताते हैं कि रिस्क तो होता ही है लोनलीनेस बहुत ज्यादा होती है. क्योंकि आप अकेले रहते हैं. और जो चीजें आपको मालूम है वो आप किसी के साथ शेयर नहीं कर सकते. अकेलापन बड़ा लगता है. और जब चीजें आपके हक में जा रही हो आपके फेवर में जा रही हो तो बड़ा मजा आता है जब चीजें आपके खिलाफ होने लगती हैं गलत होने लगती है तो वो अकेलापन काफी बढ जाता है.
अजित डोभाल का जासूसी की दुनिया में 37 साल का तजुर्बा रहा है. वह नौ साल पहले इंटेलीजेंस ब्यूरो यानी आईबी प्रमुख के पद से रिटायर हुए हैं. अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में डोभाल मल्टी एजेंसी सेंटर और ज्वाइंट इंटेलिजेंस टास्क फोर्स के चीफ के तौर पर भी काम कर चुके है लेकिन डोभाल की दूसरी खूबी उनकी ये विचारधारा भी रही है.
अजित डोभाल का झुकाव हिंदुत्ववादी विचारधारा की ओर माना जाता है. वो उस विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के फाउंडर अध्यक्ष भी रह चुके है जो राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के थिंक टैंक के तौर पर जाना जाता हैं. साल 2010 में बीजेपी ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर हरिद्वार में जो पहला अधिवेशन बुलाया था उसमें भी अजीत डोभाल को खास तौर से बुलाया गया था. यानी बीजेपी और आऱएसएस से उनकी करीबियत पुरानी रही है.
अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में अहम पदों पर रहे अजित डोभाल लालकृष्ण आडवाणी के भी करीबी माने जाते हैं. कहा जाता है कि अगर 2009 में बीजेपी चुनाव जीतती और आडवाणी प्रधानमंत्री बनते तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की जिम्मेदारी अजित डोभाल को ही सौंपी जानी तय थी.
आईबी के पूर्व प्रमुख अरूण भगत ने बताया कि आरएसएस का उसका संबंध तो डेफीनेटली है. क्योंकि विवेकानंद फाउंडेशन उन्हीं का बनाया हुआ है.
वरिष्ट पत्रकार कंचन गुप्ता ने कहा कि मैं ये नहीं कह रहा कि सलाहकार कुछ भी कह दें और सरकार मान ले ऐसा होता भी नहीं है. उसकी प्रापर एससमेंट होती है उसके आप्शन होते हैं. ये भी सही है कि अभी की जो सरकार है. इस सरकार के साथ नेशनल सेक्युरिटी एडवाइजर की एक अडरस्टैंडिग कहिए या जो रिलेशनशिप होता है ट्रस्ट का वो भी है. वो पहले से था इनके करीबी हैं तो इन सब बातों का भी असर होता है.
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी से अजित डोभाल की करीबियत से कही ज्यादा अहम उनकी काबीलियत है. डोभाल खुफिया जगत में सीधी कार्रवाई करने वाले सबसे तेज-तर्रार अधिकारियों में शुमार किए जाते रहे हैं और अपनी ऐसी ही साफ समझ की बदौलत अजित डोभाल ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को भी एक बड़े संकट से उभारा था.   
24 दिसंबर 1999 को नेपाल से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया के जहाज का अपहरण कर लिया था. एयर इंडिया की फ्लाइट आईसी 814 को आतंकवादी हाईजैक कर अफगानिस्तान के शहर कंधार ले जाने में कामयाब रहे थे. उस समय भारत सरकार एक बड़े संकट में फंस गई थी क्योंकि विमान में 176 भारतीय सवार थे.  
अफगानिस्तान में उन दिनों तालिबान की हुकूमत थी जिसे भारत सरकार ने मान्यता नहीं दी थी. कंधार एयरपोर्ट पर भारतीय जहाज को तालिबान कमांडो ने चारों तरफ से घेर रखा था इसीलिए ये मामला और भी ज्यादा पेचीदा हो गया था. ऐसे हालात के बीच उन आतंकवादियों से बातचीत भी मुश्किल हो गई थी जो यात्रियों के बदले भारतीय जेलों में कैद 35 आतंकवादियों को रिहा करने की मांग कर रहे थे.
वरिष्ठ पत्रकार राजू संथानम ने बताया कि अजीत डोभाल गए थे जो रिलीफ प्लेन गई थी कंधार में. साथ ही हम ये भी कोशिश कर रहे थे कि क्या कोई रेस्क्यू भी हो सकती है या नहीं और उसके लिए कहते हैं कि 15-20 कमांडो भी थे प्लेन में . ग्रीन लाइट का इंतजार था सेंटर की तरफ से पर वो आई नहीं .
कंधार में हाईजैकिंग का ये पूरा ड्रामा करीब सात दिनों तक चला और इस दौरान इधर देश में सरकार पर यात्रियों को सुरक्षित वापस लाने का दबाव काफी बढ़ गया था. ऐसे मुश्किल हालात के बीच अजित दोभाल ने सरकार और आतंकवादियों के बीच बातचीत में अहम भूमिका निभाई थी और सरकार महज तीन आतंकवादियों की रिहाई के बदले 176 भारतियों को सुरक्षित देश वापस लाने में कामयाब रही थी.
खुफिया ब्यूरो पूर्व ऑफिसर के एम सिंह ने कहा कि ये कश्मीर में पोस्टेड थे. तो हाईजैकर जो थे कश्मीर के मिलिटेंट को निगोशिएट कर रहे थे. इनको उसके बारे में पूरा आइडिया था. तो जो निगोशिएशन हुआ. शायद इनसे अच्छा कोई और हैंडल नहीं कर सकता था इसीलिए उनको चुना गया और कंधार भेजा गया. और लेकर वापस आए लोगों को.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख दुल्लत बताते हैं कि 814 में ज्यादा इलेबरेशन का स्कोप है नहीं. क्योंकि हमारे जो आप्शन थे वह बंद हो चुके थे. एक ही चीज थी कि वो जो हमारे लोग फंसे हुए थे जहाज में उनको वापस कैसे लाना. और कम से कम प्राइस पर. और वह उन्होंने करवाया डोभाल साहब ने. सिर्फ डोभाल साहब ही नहीं और भी थे हमारे सहाय साहब थे विवेक काटजू भी थे एन एच एल संधू भी थे जो बाद में डीआईबी बने. और मुझे याद आता है आनंद आदनी भी थे. बहुत सारे लोग थे टीम वर्क था.
अजित डोभाल को काउंटर टेरेरिज्म का माहिर माना जाता है क्योंकि सीमा पार पलने वाले आतंकवाद को उन्होंने बेहद करीब से देखा और उसके खिलाफ कई अंडर कवर ऑपरेशन में वो हिस्सा भी ले चुके हैं इसीलिए आतंकवाद के खिलाफ उनका रुख बेहद सख्त रहा है.
एक इंटेलीजेंश ऑफिसर के तौर पर अजित डोभाल अपने विरोधियों पर मनोवैज्ञानिक असर डालने में महारत रखते हैं. 90 के दशक में जब कश्मीर आतंकवाद की आग में झुलस रहा था तब ऐसे खतरनाक हालात में डोभाल ने पाक समर्थित आतंकवादी संगठनों की कमर तोड़ कर रख दी थी. डोभाल के बैच मैट रहे के एम सिंह वह पूरी कहानी बताते है कि कैसे डोभाल ने कश्मीर में आतंकवादियों को ही आतंकवादियों के खिलाफ इस्तेमाल किया था. 
खुफिया ब्यूरो के पूर्व अफसर केएम सिंह बताते हैं कि जब कश्मीर में मिलिटेंशी शुरु हुई तो पाकिस्तानियों ने एक इंप्रेशन दिया चाहे जेकेएलएफ वाले थे या बाकी जो मिलिटेंट आर्गेनाइजेशन को. कि आप वहां मिलिटेंशी शुरु करो इनसरजेंशी शुरु करो. और जब एक लेवल तक पहुंच जाएगा तो हम लोग आकर आपको हेल्प करेंगे और आपको आजाद करा देंगे. तो ये जो मूवमेंट चल रहा था इसमें मारे जा रहे थे कश्मीरी, मारे जा रहे थे सेक्युरिटी फोर्सेस वाले. पाकिस्तान का सिर्फ पैसा खर्च हो रहा था. तो उनके लिए ये चीपेस्ट और बेस्ट आप्शन था . इंडिया को ब्लीड कराने के लिए. उस हालत में जाकर इन्होंने जो मिलिटेंट के साथ राप्ता और आम कश्मीरियों के साथ राप्ता कायम करके. उनको ये समझाना कि आप मारे जा रहे हो. आपके लोग मारे जा रहे हैं जनरेशन खराब हो रही है. पाकिस्तान आपको बेवकूफ बना रहा है. आप इंडिया से बात करो गवर्मेंट इंडिया से बात करो. जो चाहों आप ओपन टेबल पर बात करो. जो कहते है माइंड सेट चेंज करने वाली वो माइंड सेट चेंज करने वाला एक बहुत बड़ा काम इन्होंने किया.
ये पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी कूका पैरी की साल 2003 की आखिरी तस्वीरें हैं जब वो एक आतंकवादी हमले का शिकार बन गया था. कहा जाता है कि कूका पैरी का ब्रैनवॉश कर अजीत डोभाल ने ही उसे और उसके संगठन इखवान ए मुस्लेमीन को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया था. डोभाल के इस अंडर कवर ऑपरेशन के बाद ही कश्मीर में राजनीतिक भी राह निकली थी. कश्मीर में 1996 में केंद्र सरकार चुनाव करवाने में कामयाब रही थी. आतंकवादी कूका पैरी ने भी अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव में हिस्सा लिया था और वो विधायक चुना गया था लेकिन 2003 में एक आतंकवादी हमले में कूका पैरी मारा गया.   
रॉ के पूर्व अफसर आर के यादव ने बताया कि डोभाल हार्ड टास्क मास्टर है. वो जो काम अपने हाथ में लेते है वो उसकी तह तक जाकर उसको पूरा करके रहते हैं. अब कश्मीर में जब मिलिटेंशी 90 के मिडिल में थी. तो वहां पर जो टेरेरिस्ट थे उनको जीत कर के उनको एक्रास द बार्डर जो लोग आ रहे थे उनके खिलाफ यूज किया था. उसमें एक कूका पैरी नाम का टेरेरिस्ट था बाद में उसको गर्वमेंट की सपोर्ट मिली और बहुत से पाकिस्तानी मिलिटेंट थे उसको मारा. बाद में उसको भी उन्होंने हांलाकि एक एंबुस में उडा दिया था. लेकिन वो एक नई ट्रेंड मिलिटेंसी में शुरु हुई थी कश्मीर में. और उसका एक ये रिजल्ट हुआ था. कि सब एक दूसरे को शक की नजर से देखने लगे थे. और उनमें अफरा तफरी मचनी शुरु हो गई थी. ये जो सेप्रेटिस्ट लीडर जो है जो पाकिस्तान का राग अलाप रहे थे. इनको भी इन्होंने लाइन पर ले आए थे इन्होंने इलेक्शन करा दिया था 96 में. तो डोभाल को जो भी काम दिया जाता है वो इसको पूरी हिम्मत से डेयर डेविल तरीके से करते हैं.
कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ ऐसे अभियान और कूका पैरी की बात किस्स कहानियां का ही हिस्सा रहे हैं और इनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. खुद अजित डोभाल ने भी इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा है. इस शो के लिए भी डोभाल ने एबीपी न्यूज से बात नहीं की है.
फिल्मों में जासूस की जिंदगी में रहस्य भी होता है और रोमांच भी. एक जासूस की जिंदगी जितनी दिलचस्प होती है उतने ही खतरों से भरी भी होती है क्योंकि जासूस के लिए उसका मिशन ही उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद बन जाता है. हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक फिल्मों में जबरदस्त एक्शन के जरिए जासूसी की इस दुनिया को एक आकर्षक अंदाज में पेश किया जाता है लेकिन असलियत में जासूसी की ये दुनिया एक अलग ही रंग में रंगी होती है और वो रंग देश भक्ति का है. देश के लिए जान की बाजी लगा देने का जज्बा लिए जब एक जासूस अपने मिशन पर निकलता है तो उसके पीछे छूट जाता है उसका परिवार और पूरा समाज. 1968 बैच के IPS  ऑफिसर अजित कुमार डोभाल ने भी जब इंटेलीजेंश ब्यूरो में काम शुरु किया तो उनका ये काम ही उनकी जिंदगी का जुनून बन गया और 70 के दशक में डोभाल का यही जुनून उन्हें पूर्वोत्तर के राज्य मिजोरम तक खींच लाया था.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व ऑफिसर के एम सिंह बताते हैं कि काम उनकी पहली प्राथमिकता है. मिजोरम 1970 में जब हालात वहां इतनी खराब थी बहुत खराब थी. कोई जाने को तैयार नहीं था ये चले गए. इनकी कुछ ही साल पहले शादी हुई थी. फैमिली को यहां छोड़कर चले गए. और वो कई महीनों तक नहीं आए यहां इसी हालत में हम लोग साथ थे. मिजोरम ये हालात थी कि आपको पता होगा जो आईजी थे मिजोरम मिस्टर आर्या. वह वहां मारे गए थे आफिस एक्सप्लोशन में मारे गए थे. उस हालात मे जब मिजोरम जाने में लोगों को डर लगता था. अजीत डोभाल ने वोलेटियर करके गए वहां पर. वहां भी इनका सबसे बड़ा ये रहा है कि ये मिलिटेंट से डायरेक्टली मिलने में डर नहीं लगता है. मिले बात किए आपरेशन लांच किए. विन औवर किए.
भारत का पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम. कुदरती खूबसूरती से सराबोर है मिजोरम. लेकिन 70 के दशक में मिजोरम भारत विरोध का अड्डा बन गया था. यहां अलगाववादी नेता लालडेंगा सरकार के लिए एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ था. वह अलग देश की मांग कर रहा था और इसीलिए उसके संगठन मिजो नेशनल आर्मी ने लंबे वक्त से सरकार के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठा रखा था. उन दिनों आईबी आफिसर अजित डोभाल पूर्वोत्तर में ही तैनात थे. तब डोभाल के साथ ही रहे विनोद दुग्गल बताते हैं कि कैसे एक अंडर कवर ऑफरेशन के तहत आईबी ने मिजो नेशनल आर्मी की कमर तोड़ दी थी.
पूर्व गृह सचिव विनोद दुग्गल ने बताया कि मेरी लाइफ के ऊपर भी बहुत थ्रेट थे उस समय मीजो नेशनल फ्रंट और मीसो नेशनल आर्मी बहुत एक्टिव थी उस वक्त और मैं डिस्ट्रिक्ट सेशन जज भी था. मैं केसेज ट्राई भी करता था . आईबी हेड के तौर पर वो हम सब के लिए बहुत मतलब कि एडमिनिस्ट्रेशन और भी जो लोग हैं उनके ऊपर कोई आंच न आए. तो मैं तो इनका उसी वक्त से जैसे कि ये जैसे काम करते थे जैसे कनेक्ट करते थे अंडरग्राउंड के साथ और कैसे उन्होंने . मैं समझता हुं कि 1976 में जो हमारा पहला पीस एकॉर्ड हुआ एमएनएफ के साथ वो इंप्लीमैंट नहीं हो पाया इसकी वजह दूसरी है. लेकिन 1976 में जो पहला पीस एकॉर्ड हुआ भारत सरकार औऱ अंडरग्राउंड लोग. जो कि फ्रंट था मीजो नेशनल फ्रंट , जो कि सेपरेट स्टेट सेपरेट कंट्री चाहते थे उसमें अजीत का रोल निंसंदेह सबसे ज्यादा था.
मिजो नेशनल आर्मी के मुखिया लाल डेंगा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अजित डोभाल ने उनके 7 में से 6 टॉप कमांडरों को उनके ही खिलाफ भड़का दिया था. दसअसल डोभाल ने उस मिजो नेशनल आर्मी में ही सेंध लगा दी थी जो मिजोरम में भारत सरकार के खिलाफ खड़ी थी और इसका नतीजा ये हुआ कि साल 1986 में लाल डेंगा को भारत सरकार के साथ समझौता करने के लिए मजूबर होना पडा था. 
आईबी के पूर्व प्रमुख अरूण भगत ने बताया कि उसमें उन्होंने बहुत अच्छा काम किया था अंडरग्राउंड गए थे उनको इनफ्रट्रेट किया था. और उनके बारे में बहुत सारी जानकारियां ली थी. और फिर जब समझौता भी हुआ उसमें भी इनका एक बहुत बड़ा हाथ था. और उसमें भी इन्होंने अपना दिखाया कि किस तरीके से अपनी जान पर खेल कर ये आपरेशन इन्होंने किया था.
पूर्व गृह सचिव विनोद दुग्गल बताते हैं कि जो उस वक्त रणनीतियां बनाई जाती थीं जो उस वक्त स्ट्रेटजी एडॉप्ट की जाती थी  उसमें इनकी बहुत भागीदारी होती थी. मैं तो पहले भी कह चुका हूं कि लेकिन आखिर में सारी चीजे पॉलीटिकल डिसीजन से होती  देश के जो हेड होते हैं उन्हें कई चीजे सोचनी होती है इसमें उनका कंट्रीब्यूशन ज्यादा था ये मैं नहीं कह सकता लेकिन जो वहां पर लोकल स्ट्रेटजी थी जो हम भारत सरकार के अप्रूवल के साथ हम अडाप्ट करते थे उसमें इट वास फेनटास्टिक.
मिजो नेशनल आर्मी को शिकस्त देकर डोभाल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भी दिल जीत लिया था. यही वजह है कि उन्हें महज 6 साल के करियर के बाद ही इंडियन पुलिस मेडल से सम्मानित भी किया था जबकि ये पुरस्कार 17 साल की नौकरी के बाद ही दिया जाता है. क्रास ब्रॉर्डर टेरेरिज्म के अलावा आंतरिक सुरक्षा के भी डोभाल माहिर खिलाड़ी माने जाते है. ऐसी बातें भी कहानियों की शक्ल में सामने आती रही है कि अजित डोभाल ने अंडर कवर ऑफरेशन के तहत मुंबई अडंरवर्ल्ड में दाउद इब्राहीम की काट के तौर पर डॉन छोटा राजन को इस्तेमाल किया था. किस्सा ये भी है कि एक वक्त दाऊद इब्राहीम तक भी पहुंच गए थे अजित डोभाल के हाथ.
रॉ के पूर्व अफसर आर के यादव ने बताया कि दाउद पर एक अटैक हुआ था. करांची में और जो विक्की मलहोत्रा जो एक छोटा राजन का आदमी था उसने उस पर अटैक किया था. वो दाउद को खत्म करने के लिए वो दोभाल का ही आपरेशन था. और फिर 2005 मे जब ये रिटायर हुए तो वही विक्की मल्होत्रा को दाउद ने मुंबई पुलिस से मिल के इनकी गाड़ी से दिल्ली में अरेस्ट करा दिया था क्योंकि ऐसा सुनने में आया था कि आपरेशन चल रहा था तो दाउद को जो उसकी लड़की की शादी होनी थी दुबई में. उस पर कुछ करने के लिए विक्की मल्होत्रा को दोबारा यूज करना था. ये खबरे हैं अब आपरेशन में क्या था ये सच्चाई हमारे सामने नहीं है.
मुंबई अडंरवर्ल्ड के खिलाफ ऐसे किसी अभियान से जुड़ी ये बातें किस्से-कहानियों में रही है और इनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. खुद अजित डोभाल ने भी इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा है. इस शो के लिए भी अजित डोभाल ने एबीपी न्यूज से बात नहीं की है.
अजित डोभाल ने 6 साल पाकिस्तान की जमीन पर भी गुजारे हैं. वो चीन और बांग्लादेश की सीमा के उस पार मौजूद आतंकवादी संगठनों और घुसपैठियों की नाक में नकेल डालने में भी कामयाब रहे हैं. डोभाल की कामयाबी की लिस्ट में आतंकवाद से जूझ रहे कश्मीर ही नहीं पंजाब में भी चुनाव कराना शामिल रहा है.
1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार . तब भारतीय फौज ने अकाल तख्त पर काबिज जनरैल सिंह भिड़रावाले और उसके आतंकवादियों को मार गिराया था. ऑपरेशन ब्लू स्टार के ठीक चार साल बाद 1988 ऑपरेशन ब्लैक थंडर. जब स्वर्ण मंदिर में छिपे चरमपंथियों को बाहर निकालने के लिए एक बार फिर सुरक्षा बलों ने धावा बोला था. ऑफरेशन ब्लैक थंडर को 300 नेशनल सिक्युरिटी गार्ड और BSF के 700 जवानों नें अंजाम दिया था. इस ऑफरेशन में अजित डोभाल ने खुफिया ब्यूरो के अधिकारियों के दल का नेतृत्व किया था.
वरिष्ठ पत्रकार राजू संथानम ने बताया कि ऑपरेशन ब्लैक थंडर हुआ था ब्लू स्टार के बाद 1988 में और उस टाइम केपी एस गिल थे डायरेक्टर जेनेरल पंजाब उस टाइम सिख मिलिटेंट ने फिर से आकाल तख्त तक पहुंच गए थे. काफी हथियार और बारूद थे अंदर, तब डोभाल को ऑथराइज किया कि वो जाए और उनसे मिले . एक खालिस्तान टेरिरिस्ट की तरह , आईएसआई टेरेरिस्ट की तरह और वो मिलें और लोगों से बात करें  और वो अंदर  घुस गए  और वहां से उन्होंने जो स्नाइपर्स थे बाहर  हर स्नाइपर को इंफरमेंशन मिलता था कि कौन सा टेरेरिस्ट कहां है और एक एक को मार दिया उन्होंने.
अस्सी के दशक में जब पंजाब आतंकवाद की चपेट में था तब 1988 में किसी वक्त डोभाल ने पाकिस्तानी एजेंट बन कर स्वर्ण मंदिर में एंट्री मारी थी. कहा जाता है कि डोभाल ने उस वक्त एक रिक्शा चलाने वाले का भेष बनाया था और वो खालिस्तान समर्थक आतंकियों को ये समझाने में कामयाब रहे थे कि वो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के एजेंट हैं और उनकी मदद करने के लिए ही यहां आए हैं.
ऑपरेशन ब्लैक थंडर से दो दिन पहले अजित डोभाल रिक्शेवाले के भेष में स्वर्ण मंदिर के अंदर दाखिल हुए थे और जब वो बाहर आए तो उनके पास स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों से जुड़ी सारी अहम जानकारियां मौजूद थी. बताया जाता है कि सेना जब ऑपरेशन ब्लैक थंडर को अंजाम दे रही थी उस वक्त भी अजित डोभाल हरमिंदर साहब के अंदर ही मौजूद थे.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व अफसर के एम सिंह ने बताया कि ये जो इंटेलीजेंश जनरेशन ऐसी चीज है. उसके बड़े पहलू होते हैं ऑपरेशन के तो ये तो पब्लिक डोमेन में नहीं होता है. इसके बारे में बात करना उचित नहीं होगा पर मैं यही कहूंगा. कि ये एक ऐसे पुलिस आफिसर थे कि पोस्टेड तो थे दिल्ली में पंजाब आपरेशन हैडंल कर रहे थे. लेकिन दिल्ली से हैंडल नहीं किया खुद अमृतसर गए पंजाब के डिस्ट्रिक्ट हैडक्वार्टर में गए. वहां से उन्होंने हैंडल किया. जितने इंपार्टेंड आपरेशन हुए वो खुद उन्होने हैडंल किया. ये ऐसे इंटेलीजेंश आफिसर हैं जो थ्रू इंटेलिजेंश आपरेशन टॉप मिलिटेंट से खुद मिलकर बात करना इनमें ये क्षमता है और निर्भीक होकर काम करने वाली जो बात है. ये नहीं कि मिलिटेंट से कैसे मिले तो ये काफी बड़ी बात है बाकी इंटेलीजेंश आपरेशन कैसे हैंडल किया ये पब्लिक डोमेन की बात नहीं है.
ऑपरेशन ब्लैक थंडर से जुडी ये सारी बीते किस्से- कहानियों में रही हैं और इसका कोई आधिकाराधिक रिकॉर्ड नहीं है. जासूसी की दुनिया में अजित डोभाल का नाम एक ऊंचा मकाम रखता है. डोभाल को आंतरिक सुरक्षा और काउंटर टेरेरिज्म का माहिर माना जाता रहा है. क्रास बॉर्डर टेरेरिज्म और ट्रांस बॉर्डर टेरेरिज्म से निपटने में डोभाल अपनी काबलियत बार – बार साबित कर चुके है लेकिन देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर अब उनका रोल बेहद बड़ा हो गया है और उनकी जिम्मेदारी बेहद अहम. 
पूर्व गृह सचिव विनोद दुग्गल बताते हैं कि एनएसए का जो रोल है वो काफी बड़ा रोल है इससे काफी बढ़के तो उसमें सिर्फ काउंटर टेरेरिज्म ही नहीं उसमें पॉलिसी हैं. स्ट्रेटजीस हैं उसमें देश को प्रोटेक्ट करते हुए कैसे आगे बढ़ना है.
वरिष्ठ पत्रकार राजू संथानम ने बताया कि चुनौतियां बहुत हैं चाइना उभरता हुआ कंट्री है और एक इकॉनमिक और सेक्यूरिटी थ्रेट माना जा सकता है और बगल में पाकिस्तान है और पाकिस्तान से आजकल रिश्ते कठिन होते जा रहे हैं  दूसरी बात हमें फॉरेन इनवेस्टमेंट भी चाहिए तो एक तरफ हम इकॉनामिक इनवेस्टमेंट चाहते हैं बाकि देशों से और दूसरी ओर सेक्यूरिटी कनसर्न हैं दोनों को बैलेंस करना उनके लिए कठिन है और चैलेंजिग हैं.
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का मानना है कि देश के अंदर और बाहर आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए NCTC यानी नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर जैसी किसी बड़ी संस्था बनाने की जरूरत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आतंकवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते रहे हैं हांलाकि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होनें NCTC का विरोध भी किया था लेकिन अब जबकि सत्ता उनके हाथ में है तो ऐसे में उन्हें ऐसे हाथ की जरुरत है जो आतंकवाद पर मजबूत वार कर सके.
आईबी के पूर्व प्रमुख ए एस दुल्लत बताते हैं कि मैं ये सोचता हूं कि ये एक नियर परफेक्ट च्वाइस है. परफेक्ट च्वाइस थी ब्रजेश मिश्रा जी. क्योकि आपको याद होगा उस समय ब्रजेश मिश्रा सिर्फ एनएसए नहीं थे वो प्रिसिंपल सेक्रेटरी भी थे. और एक तरह से मुल्क को वही चलाते थे अटल जी के गाइडेंश के अंदर. तो वो बहुत परफेक्ट रिलेशनशिप था. अब इसको मैं नियर परफेक्ट समझता हूं. मोदी जी का और डोवाल साहब का जो है.
खुफिया ब्यूरो के पूर्व प्रमुख अरुण भगत बताते हैं कि एक तो टेरेरिज्म है. और टेरेरिज्म भी यहां दो तीन किस्मों का है. एक तो हमारा एथनिक है हमारा. और दूसरा रिलिजियस है इस्लामिक टेरेरिज्म है. और साथ साथ माओइस्ट कहिए नकस्लाइट कहिए उन्हें जो भी है. तो ये तीनो फार्म आफ टेरेरिज्म जो है. ये हमारे देश में काफी देर से मौजूद है. और इनको कंट्रोल करना इनको खत्म करना मेरे ख्याल से सबसे बड़ी चुनौती जो एनएसए के लिए है और देश के लिए भी वहीं है. 
मंबई पर 26-11 के आतंकवादी हमले के बाद से देश की आंतरिक सुरक्षा एक बार फिर NSA के रडार पर है. देश की करीब पांच हजार किलोमीटर लंबी सीमा पर आतंकियों की घुसपैठ भी एक बड़ी चुनौती है. कश्मीर में किस तरह की रणनीति अपनाना है. उडीसा से लेकर आंध्रप्रदेश तक फैले रेड कॉरीडोर में माओवादियों की चुनौती से किस तरह निपटना है. पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत करने की भी जरुरत है ताकि भारत विरोधी हरकतों पर शिकंजा कसा जा सके. देश में आर्थिक तरक्की की रफ्तार बढाने और विदेशी निवेश लाने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की मजबूत किलेबंदी बेहद अहम हो चुकी है. जाहिर है भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के सामने वक्त कम है और चुनौतियां है बेशुमार.