Thursday, 26 February 2015

राहुल की छुट्टी के पीछे राजपरिवार की तकरार? @मधुकर उपाध्याय

राजप्रासादों के अंदरूनी झगड़ों, मनमुटाव और कलह के हज़ारों क़िस्से इतिहास में दर्ज हैं और कांग्रेस पार्टी में इस समय जो हो रहा है, उसी का एक पन्ना दिखाई देता है.
राहुल गांधी की छुट्टी पर जाने की इच्छा को इस नज़रिए से देखने में कोई हर्ज़ नहीं है.

नए-पुराने की बहस

पार्टी के लोग बता रहे हैं कि राहुल की छुट्टी का संबंध आत्म-चिंतन से अधिक इसी साल बंगलुरु में कांग्रेस के प्रस्तावित महाधिवेशन से भी हो सकता है.
उनका मानना है कि यह पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाने का प्रयास है कि कमान युवा पीढ़ी को सौंप दी जाए, जिसके लिए इंतज़ार 10 साल से चल रहा है.
पार्टी के जानकार तो यहां तक कहते हैं कि राहुल गांधी के छुट्टी मांगने से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनकी अर्ज़ी स्वीकार कर ली. वे इसे दबाव के जवाब में डाला गया दबाव मानते हैं.
सोनिया गांधी संभवतः अब तक राहुल की नेतृत्व क्षमता से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं और यह फ़ैसला नहीं कर सकी हैं कि पार्टी के पुराने दिग्गजों को दरकिनार कर सारा ज़िम्मा ‘राहुल ब्रिगेड’ को सौंप दिया जाए. इसका निर्णय शायद बंगलुरु में होना है.
राहुल गांधी
पार्टी से छुट्टी मांगने की घटनाएं जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के मामले में भी हुई थीं लेकिन दोनों मामलों में पार्टी ने इससे इनकार कर दिया था. तो क्या इसका अर्थ यह है कि इस बार की दुविधा पहले से ज़्यादा बड़ी और कड़ी है?
नए और पुराने नेतृत्व के बीच एक को चुनने की बहस कांग्रेस में पहले भी कई बार हुई थी. उसी तर्ज पर, जैसी अब हो रही है.

परिवार की गद्दी

एक बार बहस के नतीजे में मोतीलाल नेहरू ने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर कमान युवा नेतृत्व को सौंपने की सलाह दी.
राहुल, सोनिया गांधी
उन्होंने यहां तक कहा कि ‘जवाहर टाइप’ नए लोग जितनी जल्दी कमान संभालें, उतना बेहतर क्योंकि पुरानी नस्ल तेज़ी से ख़त्म हो रही है. उनका कहना था कि अगर वल्लभभाई पटेल सबसे उपयुक्त व्यक्ति और विकल्प हैं लेकिन पार्टी अब नए लोगों को चलानी चाहिए.
महात्मा गांधी स्वयं सरदार पटेल के पक्ष में थे. उन्होंने मोतीलाल की सलाह मानने इनकार कर दिया और कहा कि ‘अभी जवाहर का समय नहीं आया है.’
नेहरू, गांधी
मोतीलाल नेहरू 1928 में कांग्रेस अध्यक्ष बने और 1929 के लाहौर अधिवेशन में पार्टी की कमान जवाहरलाल नेहरू को सौंप दी गई. 45 साल के इतिहास में यह पहला मौक़ा था जब पिता ने अपने पुत्र को पार्टी की ज़िम्मेदारी दी.
कांग्रेस की अध्यक्षता का सवाल 1939 में शायद सबसे गंभीर रूप से उठा, जब सुभाषचंद्र बोस ने गांधी के उम्मीदवार भोगाराजू पट्टाभि सीतारमैया को 205 मतों से हरा दिया.
गांधी बोस
गांधी इससे असंतुष्ट थे. उन्होंने कहा था, ‘पट्टाभि की हार मेरी हार है.’
नेहरू 1951 में फिर अध्यक्ष बने और 1954 के कलकत्ता अधिवेशन तक पद पर रहे. उसके बाद पांच साल, 1958 तक, यूएन धेबर ने यह ज़िम्मेदारी निभाई.
नेहरू, इंदिरा
इसे केवल एक राजनीतिक संयोग कैसे कहा जा सकता है कि इंदिरा गांधी 1958 में छुट्टी पर जाना चाहती थीं और 1959 के दिल्ली अधिवेशन में उन्हें पार्टी अध्यक्ष चुन लिया गया.
अगले साल उन्हें यह पद फिर देने की बात उठी, पर इंदिरा गांधी ने ख़ुद इससे इनकार कर दिया और नीलम संजीव रेड्डी अध्यक्ष बने.

उपेक्षा संभव नहीं

रेड्डी के बाद दक्षिण भारत से ही 1964 में कामराज और 1968 में निजलिंगप्पा ने पार्टी की ज़िम्मेदारी संभाली.
राहुल, सोनिया, प्रियंका गांधी, रॉबर्ट वाड्रा
पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल को छोड़कर कांग्रेस की अध्यक्षता नेहरू गांधी परिवार की राय को सबसे अहम मानकर एक से दूसरे को जाती रही.
सीताराम केसरी इसके अंतिम अपवाद थे, जिनके बाद पार्टी फिर परिवार पर आश्रित हो गई.
राहुल गांधी
एक अंतर और भी है. आज़ादी से पहले अध्यक्षता के सवाल के केंद्र में पार्टी होती थी, 1998 के बाद एक परिवार है, परिवार को पार्टी में विकल्प-शून्य समझा जाता है और ऐसे में केवल एक ही व्यक्ति इसका निर्णय कर सकता है- सोनिया गांधी.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सारी चुनावी विफलताओं और अंशकालिक नेतृत्व के बावजूद दस जनपथ के राजप्रासाद के लिए राहुल गांधी की उपेक्षा करना संभव नहीं होगा.
माना जा रहा है कि दबाव वाली छुट्टी से लौटकर राहुल गांधी पार्टी नेतृत्व संभाल लेंगे, जिस पर बंगलुरु में मुहर लग जाएगी, पार्टी देर-सबेर इस फैसले के पक्ष में खड़ी होगी.

क्यों आज अलग से रेल बजट की जरूरत नहीं है?

करीब एक सदी पहले रेल बजट को आम बजट से अलग करने का फैसला हुआ था. लेकिन आज क्या इसका कोई औचित्य बचा है?
जब इतना बड़ा आम बजट है तो अलग से एक रेलवे बजट की क्या जरूरत है? यह सवाल अक्सर पूछा जाता है. इसके जवाब की तलाश के तार करीब एक सदी पीछे तक जाते हैं. दरअसल 1921 में विलियम एकवर्थ की अध्यक्षता में बनी एक समिति ने सिफारिश की थी कि भारत सरकार और भारतीय रेलवे के खाते अलग-अलग कर दिए जाएं. वह भारत में अंग्रेजी शासन का दौर था. एकवर्थ जाने-माने रेलवे विशेषज्ञ और ब्रिटेन की कंजरवेटिव पार्टी के समर्पित सदस्य थे. तब सरकार के बजट का तीन चौथाई अकेले रेलवे पर खर्च होता था. लोगों और सामान की आवाजाही मुख्य रूप से रेल के जरिये ही होती थी इसलिए हिसाब-किताब और बजट के मामले में इसे अलग करने की सिफारिश तर्कसंगत थी. सरकार ने एकवर्थ की यह सिफारिश मान ली.+
लेकिन आज भारतीय रेलवे उस जमाने के अपने रसूख से बहुत दूर दिखता है. लोगों और सामान की आवाजाही के मामले में अब सड़क परिवहन का दबदबा है. 1950 में यात्री परिहवन का 35 फीसदी हिस्सा सड़कों पर निर्भर था. आज यह आंकड़ा करीब 85 फीसदी है. इसमें अहम भूमिका इस तथ्य की रही है कि बीते कुछ दशक के दौरान भारत में सड़कों का जाल खूब फैलता गया है. दूसरी तरफ, रेलवे विस्तार के मोर्चे पर सड़क परिवहन से काफी पीछे है.+
उस दौर में लोगों और सामान की आवाजाही मुख्य रूप से रेल के जरिये ही होती थी इसलिए हिसाब-किताब और बजट के लिहाज से रेलवे को अलग करने की सिफारिश तर्कसंगत भी थी.
खर्च के मामले में भी देखें तो सब्सिडी और रक्षा मंत्रालय जैसे मोर्चों पर सरकार रेलवे से कहीं ज्यादा खर्च करती है. 1921 में भले ही सरकार के कुल खर्च का तीन चौथाई रेलवे पर खर्च होता रहा हो, लेकिन आज यह आंकड़ा चार फीसदी से भी कम है. भारतीय रेलवेइन तथ्यों के बावजूद रेलवे बजट लगभग उतनी ही सुर्खियां बटोरता है जितना आम बजट. जबकि बहुत से लोग मानते हैं कि रेल बजट से कहीं महत्वपूर्ण भारत सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण अक्सर इन दोनों के शोर में दब जाता है.
बहुत से लोग मानते हैं कि रेलवे मंत्रालय और उसके बजट की यह अहमियत उस राजनीति का नतीजा है जो देश ने बीते दो दशक के दौरान देखी. इससे पहले लंबे समय तक केंद्र में गठबंधन सरकारें रहीं. रेल मंत्रालय उनके सबसे अहम सहयोगी के पास रहा. रेलवे मंत्रालय गठबंधन के अहम सहयोगियों को तुष्ट करने का जरिया होता था और रेलवे बजट क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिकता देता था. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी इसके उदाहरण हैं.

आरके पचौरीः नोबेल से जेल की नौबत तक @पवन वर्मा

डॉक्टर आरके पचौरी से आईपीसीसी का अध्यक्ष पद छोड़ने की मांग लंबे अरसे से की जा रही थी लेकिन, शायद ही किसी ने सोचा हो कि उन्हें इस तरह जाना पड़ेगा.
डॉ संजय नाथ जलवायु परिवर्तन के विशेषज्ञ हैं. जिंदगी का छठवां दशक जी रहे इस वैज्ञानिक ने अपना बचपन नैनीताल में बिताया और फिर पढ़ाई के लिए अमेरिका चला गया. वहां सालों तक नौकरी की. कुछ समय लैटिन अमेरिकी देश पेरू में भी रहा. आज वह वापस नैनीताल आ चुका है. अब संजय नाथ एक योग गुरू हैं. लेकिन आज भी वे अमेरिका में अपनी एक महिला मित्र के साथ बिताए अंतरंग क्षण याद करते हैं. बाद में नैनीताल में ही उनके कई महिलाओं से संबंध बनते हैं और इन सभी घटनाओं को वे अपने जीवन की आध्यात्मिक यात्रा कहते हैं.+
यह कथानक 2010 में प्रकाशित उपन्यास रिटर्न टू अलमोड़ा का है. इसे इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के पूर्व चेयरमैन डॉ राजेंद्र कुमार पचौरी ने लिखा था. पचौरी द एनर्जी एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट (टेरी) के भी महानिदेशक हैं. दिलचस्प बात यह है कि उपन्यास के नायक की बहुत सी बातें पचौरी से मिलती हैं. सबसे पहली तो यही कि उसका बचपन भी नैनीताल में बीता है. इंसान द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की कोशिशें उसे बेचैन करती हैं. बाद में उसकी भी पढ़ाई अमेरिका में होती है और पचौरी की तरह वह भी जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ बनता है.+
उपन्यास के नायक की बहुत सी बातें पचौरी से मिलती हैं. सबसे पहली तो यही कि उसका बचपन भी नैनीताल में बीता है. इंसान द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की कोशिशें उसे बेचैन करती हैं
कई बार जीवन की हकीकत में अच्छे-अच्छे उपन्यासों से ज्यादा नाटकीयता होती है. आरके पचौरी के साथ भी ऐसा ही होता दिख रहा है. टेरी की एक कर्मचारी द्वारा यौन शोषण का आरोप लगने के बाद पचौरी को आईपीसीसी से इस्तीफा देना पड़ा. टेरी से उन्होंने कुछ समय की छुट्टी ले ली है लेकिन यहां से भी उनके इस्तीफे की मांग लगातार तेज होती जा रही है. आलम यह है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए वे अग्रिम जमानत की कवायद कर रहे हैं.+
1940 में पैदा हुए पचौरी सामान्य परिवार के बच्चे नहीं थे. उनके पिता शिक्षा मनोविज्ञानी थे जिन्होंने लंदन से पीएचडी की थी. मां बर्मा मूल की थीं. यानी उनके लिए बाहरी दुनिया आम भारतीय बच्चों की तरह कभी अजूबा नहीं रही. फिर उनकी शिक्षा भी लखनऊ के प्रतिष्ठित ल मार्टिनीयर स्कूल में हुई थी. वे लगभग इसी रास्ते पर थे कि आगे जाकर किसी बड़े संस्थान को संभालें. उनकी मां चाहती थीं कि वे सिविल सर्विस में जाएं लेकिन, उन्होंने रेलवे के इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री ली. इसके बाद उनकी तैनाती बनारस में हो गई. कुछ ही महीनों बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए. नॉर्थ कैरोलीना युनिवर्सिटी से उन्होंने इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में पीएचडी की.+
पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका में राजेंद्र पचौरी एक बड़ा नाम 2002 में बने जब आईपीसीसी के चेयरमैन पद का चुनाव लड़ा. वे भारत समर्थित प्रत्याशी थे
ऐसा बहुत कम होता है कि कोई अपने देश से पहले अंतर्राष्ट्रीय जगत में जाना-माना नाम बन जाए. आरके पचौरी इन्हीं लोगों में से हैं. आईपीसीसी से जुड़ने के पहले वे नॉर्थ कैरोलीना स्टेट युनिवर्सिटी और वैस्ट वर्जीनिया युनिवर्सिटी में प्रोफेसर रह चुके थे. इसके बाद वे भारत लौटे. यहां कुछ सरकारी संस्थानों में काम करने के बाद 1982 में वे टेरी के निदेशक बन गए. यही पहला मंच था जहां से उन्होंने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाए. 90 के दशक तक पश्चिमी देशों में यह मुद्दा काफी महत्वपूर्ण बन चुका था. यह आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी कि जलवायु परिवर्तन के मसले पर एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता हो. 1997 का क्योटो प्रोटोकॉल इसी नतीजा था. इसकी रूपरेखा तय करने में पचौरी की भी अहम भूमिका रही. यह भी एक वजह थी कि संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन से जुड़े विशेषज्ञों के बीच उनका कद काफी बढ़ गया.+
हालांकि पचौरी इससे पहले ही आईपीसीसी से जुड़ चुके थे. 1995 में इस संस्था की जो दूसरी समीक्षा रिपोर्ट आई, पचौरी उसके मुख्य लेखकों मे शामिल थे. दरअसल आईपीसीसी एक निश्चित समयावधि के बाद जलवायु परिवर्तन पर अपनी समीक्षा रिपोर्टें जारी करता है जो अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का आधार बनती हैं. तीसरी रिपोर्ट के समय तक वे आईपीसीसी के को-चेयरमैन बन गए. पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका में वे एक बड़ा नाम 2002 में बने जब उन्होंने इस संस्था के चेयरमैन पद का चुनाव लड़ा. वे भारत समर्थित प्रत्याशी थे और उन्हें अमेरिका की बुश सरकार भी इस पद पर देखना चाहती थी. पचौरी रॉबर्ट वॉटसन के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे जिन्हें अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति और पर्यावरणविद अल गोर का समर्थन हासिल था.+
2010 में इंग्लैंड के डेली टेलीग्राफ ने दावा किया था कि टेरी का निदेशक रहते हुए उन्होंने कई निजी कंपनियों का फायदा पहुंचाने का काम किया है. हालांकि ये आरोप कभी साबित नहीं हो पाए.
यह चुनाव वॉटसन हार गए. इसपर अल गोर ने पचौरी की काफी आलोचना की थी. यहां तक कि उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख भी लिखा. इसी अखबार के माध्यम से पचौरी ने भी इसका जवाब दिया. इस विवाद से पचौरी पश्चिमी दुनिया में काफी चर्चित हो गए. हालांकि बताते हैं कि बाद में अल गोर उनके कामों से प्रभावित हुए और उनके बीच अच्छे संबंध बन गए. प्रतीकात्मक रूप से ही सही लेकिन इसकी सार्वजनिक घोषणा उस समय हुई जब 2007 मे अल गोर और आईपीसीसी को संयुक्तरूप से शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया.+
भारत में आरके पचौरी की चर्चा 2007 में ही सबसे ज्यादा हुई. लेकिन विडंबना यह थी कि इसके पीछे एक अच्छी वजह थी तो दूसरी बुरी. अच्छी वजह यही थी कि आईपीसीसी को नोबेल पुरस्कार मिला था और उसका नेतृत्व एक भारतीय यानी राजेंद्र कुमार पचौरी के हाथ में था. अब बुरी वजह पर आते हैं. आईपीसीसी पर आरोप लगता रहा है कि यह संस्थान एक विशेष एजेंडे के तहत जलवायु परिवर्तन की आड़ में विकासशील देशों की नीतियां बदलवाने का काम करता है. आईपीसीसी की 2007 में आई एक रिपोर्ट को ऐसे आरोपों के पक्ष में सबसे बड़ी मिसाल बताया जाता है. इसमें दावा किया गया था कि ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हिमालय के सारे ग्लेशियर 2035 तक पिघल जाएंगे. इस रिपोर्ट पर भारत में सबसे ज्यादा बहस होनी थी. लेकिन बहस शुरू होने पहले ही यह पता चला कि ये सारे दावे गलत हैं और इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. आईपीसीसी की रिपोर्ट का यह हिस्सा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कार्यरत एक पर्यावरणविद् सैयद इकबाल हसनैन के किसी मीडिया इंटरव्यू से लिया गया था. हसनैन ने यह दावा अनुमानों के आधार पर किया था. आईपीसीसी का इतना बड़ा दावा गलत होने बाद भी पचौरी ने कभी इसकी जिम्मेदारी नहीं ली.+
हालांकि इस विवाद का पचौरी के करियर पर कोई असर नहीं पड़ा और 2008 में वे आईपीसीसी के चेयरमैन पद के लिए दोबारा चुन लिए गए. उनका यह कार्यकाल भी विवादों से परे नहीं रहा है. 2010 में इंग्लैंड के डेली टेलीग्राफ ने दावा किया था कि टेरी का निदेशक रहते हुए उन्होंने कई निजी कंपनियों का फायदा पहुंचाने का काम किया है. हालांकि ये आरोप कभी साबित नहीं हो पाए. ऐसे ही कुछ आरोप द गार्जियन और दूसरे अखबार भी लगाते रहे है. इस आधार पर उनसे आईपीसीसी से इस्तीफा देने की मांग भी लगातार की गई. पचौरी के साथ विडंबना यह रही कि जो उनका मुख्य काम था उसके लिए तो नहीं लेकिन एक दूसरे मामले की वजह से उन्हें न सिर्फ आईपीसीसी बल्कि टेरी के प्रमुख के पद से भी इस्तीफा देना पड़ा.+
आरके पचौरी अक्सर अमेरिका के आदिवासी नेता की एक उक्ति दोहराते हैं जिसका सार है कि इंसान जीवन का तानाबाना नहीं बुनता. बल्कि वह उसकी एक कड़ी है और उसका एक काम उसके पूरे जीवन को प्रभावित कर देता है. हो सकता है पचौरी के जीवन में इस समय यही उक्ति लागू हो रही हो.

ख़त से खुला ट्रेन में शौचालय का दरवाज़ा

भारतीय रेलवे
भारत में रेल के डिब्बों में शौचालय लगाने के पीछे एक दिलचस्प वाक़या है.
कहा जाता है कि 1909 में पश्चिम बंगाल के एक यात्री ओखिल चंद्र सेन ने रेलवे स्टेशन को एक चिट्ठी लिखी थी.
इसमें उन्होंने शिकायत की थी कि वह लघुशंका के लिए गए थे और इसी दौरान उनकी ट्रेन उन्हें छोड़ कर चली गई.
लेकिन सेन की चिठ्टी के बाद सभी डिब्बों को इस सुविधा से जोड़ा गया.
असल में पहले ट्रेनों में शौचालय नहीं हुआ करते थे और वर्ष 1891 में केवल फ़र्स्ट क्लास के डिब्बों को इस सुविधा से जोड़ा गया था.

भारतीय रेलवे का संक्षिप्त इतिहास

भारतीय रेलवे
रेल में पहली यात्राः 16 अप्रैल 1853 को मुंबई के तत्कालीन बोरी बंदर स्टेशन (अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनल) से ठाणे के लिए चली इस ट्रेन में लगभग 400 लोगों ने सफर किया. रेल का यह पहला सफर करीब 34 किलोमीटर लंबा था.
सबसे पुराना लोकोमोटिव इंजनः हैरिटेज ट्रेन ‘फ़ेयरी क्वीन’ में लगे दुनिया के सबसे पुराने भाप इंजन का निर्माण 1855 में ब्रितानी कंपनी किटसन ने किया था. साल 1997 के बाद इस ट्रेन को हैरिटेज़ ट्रेन के रूप में चलाया जाने लगा.
भारतीय रेलवे
टॉय ट्रेनः 4 जुलाई 1881 को पूर्वोत्तर में पहली बार आधिकारिक तौर पर यह ‘खिलौना रेल’ चली. ये ट्रेन दो फ़ुट चौड़े नैरो गेज ट्रेक पर दौड़ती है और इसे यूनेस्को से वर्ल्ड हैरिटेज़ साइट का दर्जा प्राप्त है. ये खिलौना ट्रेन भारत के सबसे ऊंचे रेलवे स्टेशन घूम तक जाती है.
रेल नेटवर्क का बंटवाराः 14 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान का बंटवारा होने के साथ ही रेल नेटवर्क भी दोनों देशों के बीच बंट गया. अब भारत और पाकिस्तान के बीच सप्ताह में दो दिन समझौता एक्सप्रेस चलती है. जबकि कोलकाता और ढाका के बीच मैत्री एक्सप्रेस 40 साल बाद फिर 2008 में शुरू हुई.
भारतीय रेलवे
राष्ट्रीयकरणः 1951 से पहले भारतीय रेलवे के नेटवर्क में 40 से अधिक सिस्टम थे. आज़ादी के चार साल बाद इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. अभी यह लगभग 14 लाख कर्मचारियों के साथ दुनिया में सबसे ज़्यादा रोज़गार देने वाला विभाग है.
भारतीय रेल
सबसे तेज़ ट्रेनः वर्ष 1988 में दिल्ली और भोपाल के बीच शताब्दी एक्सप्रेस शुरू की गई. इसकी रफ़्तार 150 किलोमीटर प्रति घंटा थी. पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की जन्मशती पर इसे शुरू किया गया था.
ऑनलाइन टिकट बुकिंगः तीन अगस्त 2002 को पहली बार भारतीय रेलवे ने घर बैठे इंटरनेट के ज़रिए टिकट बुक कराने की सुविधा शुरू की.

Wednesday, 25 February 2015

सारे धर्मगुरू इस अपराध के दोषी हैं @गायत्री आर्य

क्यों हमारे धर्मगुरू उस संवेदनहीनता पर कुछ नहीं बोलते जो समाज में महिलाओं के प्रति भयानक रूप से पसरी हुई है?
गायत्री आर्य 1
हाल में फिलीपींस की अपनी यात्रा के दौरान ईसाई धर्मगुरू पोप फ्रांसिस ने ऐसी कई बातें कहीं जो अपने आप में ऐतिहासिक हैं. अपनी अंतिम सामूहिक सभा (फाइनल मास) में पोप फ्रांसिस ने कहा कि ‘पुरुषों को स्त्रियों के विचारों को ज्यादा सुनना चाहिए और खुद को श्रेष्ठ नहीं मानना चाहिए’. पोप के मन में ये विचार उस समय आए जब उनको संबोधित करने वाले पांच लोगों में से चार पुरुष थे. वे हैरान थे कि स्त्रियों का वहां कितना कम प्रतिनिधित्व है. पोप का कहना था, ‘आज के समय में स्त्रियों के पास हमें कहने के लिए बहुत कुछ है. हमने स्त्रियों को कोई जगह नहीं दी है, लेकिन उनके पास चीजों को अलग नजरिए से देखने की दृष्टि है. स्त्रियों के पास ऐसे सवाल खड़े करने की ताकत है जो हम मर्द समझ भी नहीं सकते.’ उन्होंने गौर किया कि सवाल पूछने वाले पांच लोगों में से सिर्फ एक 12 साल की बच्ची ही थी जिसने सबसे मुश्किल सवाल किया कि ‘ईश्वर बच्चों को लावारिस क्यों छोड़ देता है?‘+
किसी ने नहीं कहा कि भ्रूण हत्या करने वाले को ईश्वर ने नरक में जाने का आदेश दिया है और उसके लिए ‘नरक के ट्रेलर‘ का इंतजाम इसी जीवन में किया जाए.
रोमन कैथोलिक चर्च अपने इस निर्णय पर अभी भी अटल है किसी स्त्री को पादरी नहीं बनाया जा सकता. ऐसी स्थिति में पोप फ्रांसिस का कहना है कि ज्यादा से ज्यादा ननों की भर्ती की जाए, साथ ही वेटिकन में चर्च में उच्च पदों पर ज्यादा स्त्रियों की नियुक्ति की जाए. चुटकी लेते हुए उनका कहना था, ‘जब अगला पोप मनीला आए तो आप लोगों की भीड़ में स्त्रियों की संख्या ज्यादा होनी चाहिए‘. इससे पहले पोप फ्रांसिस ने समलैंगिकों के समर्थन में भी अपने विचार रखे थे. कुल मिलाकर वे पहले ऐसे पोप बने जिन्होंने वैश्विक स्तर पर पहली बार स्त्रियों के प्रति इस कदर संवेदनशीलता दिखाई है और लोगों को उनके प्रति ज्यादा सहिष्णु होने की सीख दी है.+
मेरे अल्प ज्ञान के मुताबिक पूरी दुनिया के इतिहास में अभी तक किसी धर्मगुरू ने पुरुषों को ऐसी सीख नहीं दी. अपवादों को छोड़ दें तो सारी दुनिया के धर्मों, धर्मग्रंथों और धर्मगुरुओं की सारी सीखें हमेशा सिर्फ और सिर्फ स्त्रियों के लिए ही रही हैं. क्या भारत में किसी भी पंडित, धर्माचार्य, पादरी, मौलवी या ग्रंथी ने कभी स्त्रियों के संदर्भ में पुरुषों से कोई जेंडर संवेदी अपील की है? कम से कम मेरी जानकारी में तो ऐसा नहीं है. दरअसल अपवादों को छोड़ दें तो हमारे देश के ज्यादातर धर्माचार्य आकंठ भोग और स्त्रियों के यौन शोषण में डूबे हुए हैं. जब-तब किसी न किसी के बारे में भांडाफोड़ होता ही रहता है. जिनका भांडाफोड़ नहीं हुआ है, वे दूध के धुले हैं यह खुद को झूठी तसल्ली देने जैसा होगा. छवि उनकी खराब ही है और यह सिर्फ समय, परिस्थिति और ताकत का खेल है कि उनके पापों का घड़ा कब फूटना है.+
लेकिन अच्छी छवि वाला भी तो ऐसा कोई धर्माचार्य, मौलवी, ग्रंथी या पादरी नहीं जिसने स्त्रियों के प्रति समाज में पसरी भयानक असंवेदना पर कभी एक शब्द भी कहा हो. जिसने पुरुषों से ऐसी कोई अपील की हो कि वे भी अपनी जिंदगी की महत्वूर्ण स्त्रियों (मां, बहन, जीवनसाथी) के प्रति अपना अटूट प्रेम दिखाने के लिए साल में एक दिन निर्जल व्रत रखें. किसी धर्माचार्य ने नहीं कहा कि दहेज लेने वाले का सामाजिक बहिष्कार किया जाए, बलात्कार या किसी भी तरह के यौन शोषण में लिप्त पुरुष का हुक्का-पानी बंद किया जाए. किसी ने नहीं कहा कि भ्रूण हत्या करने वाले को ईश्वर ने नरक में जाने का आदेश दिया है और उसके लिए ‘नरक के ट्रेलर‘ का इंतजाम इसी जीवन में किया जाए. ऐसी कोई पहल किसी भी धर्म के धर्मगुरू की तरफ से क्या कभी हुई है?+
इसके विपरीत लड़कियों को ‘अच्छी बेटी‘, स्त्रियों को ‘अच्छी पत्नी और मां‘ बनने की अंतहीन सलाहें हमेशा दी गई हैं. पतियों के लिए एकाग्र समर्पण रखने, उनकी खुशियों-जरूरतों का हर क्षण ख्याल रखने और उनके लिए हमेशा खड़े रहने की सीख धर्मगुरुओं द्वारा हमेशा दी जाती हैं. लेकिन कभी ऐसी कोई सलाह नहीं आई कि लड़कों को ‘अच्छा बेटा‘ बनना चाहिए पुरुषों को  ‘अच्छा पति और पिता‘ बनना चाहिए. क्यों? क्या सारी अच्छाई का ठेका सिर्फ लड़कियों/स्त्रियों ने उठा रखा है? लड़कों/पुरुषों को अच्छा बनने का स्वाद क्यों नहीं चखना चाहिए? क्या ‘अच्छा‘ बनना इतना बेस्वाद है कि वह पुरुषों के चखने लायक चीज ही नहीं? या फिर सारी लड़कियां ही ऐब की पोटली लेकर पैदा हुई हैं कि उन्हें आजीवन अच्छा बनना सीखने में ही अपनी सारी ऊर्जा लगा देनी है?+
क्या सच में ये सारे धर्मग्रंथ किसी सर्वशक्तिशाली ईश्वर ने लिखे हैं. अगर हां तो ईश्वर स्वयं भयानक रूप से लिंगभेद करता है. अगर नहीं तो फिर दूसरी संभावना यह है कि सारे के सारे धर्मग्रंथ पुरूषों द्वारा ही लिखे गए हैं
बड़ा सवाल यह भी है कि जब धर्मों, धर्मग्रंथों और धर्मगुरूओं की अधिकतर सीखें स्त्रियों के लिए ही हैं तो कोई धर्मगुरू स्त्री क्यों नहीं है. किसी भी धर्म में सर्वोच्च गुरू स्त्री नहीं है. आज भी किसी स्त्री को सर्वोच्च धर्मगुरू बनने की अनुमति नहीं. यही एक तर्क सारी दुनिया के धर्मग्रंथों और धर्मगुरुओं पर सवाल खड़ा करता है कि इस मामले में भी वही धांधली और लैंगिक असमानता क्यों है जो आम घरों में आम चीजों में होती है. यहीं से सवाल पैदा होता है कि क्या सच में ये सारे धर्मग्रंथ किसी सर्वशक्तिशाली ईश्वर ने लिखे हैं. अगर हां तो ईश्वर स्वयं भयानक रूप से लिंगभेद करता है. अगर नहीं तो फिर दूसरी संभावना यह है कि सारे के सारे धर्मग्रंथ पुरूषों द्वारा ही लिखे गए हैं. तीसरी कोई संभावना इसलिए नहीं बनती, क्योंकि यह संभव ही नहीं कि स्त्रियां धर्मग्रंथ लिखतीं और सारे कड़े नियम, कठोर व्रत, उपवास, तपस्याएं अपने लिए रख लेतीं, पुरुषों को इस सब से मुक्त रखतीं. यह प्रकृति के खिलाफ है कि कोई इंसान स्वयं के लिए कष्ट चुने और अपने साथी को मौज करने दे. यह असंभव है कि कोई अपने लिए तमाम तरह के प्रतिबंध चुने और साथ वाले को अबाध नहीं बल्कि ‘निरंकुश‘ आजादी दे. यदि स्त्रियों ने ही धर्मग्रंथ लिखे होते तो क्या वे अपने ही सर्वोच्च धर्मगुरू बनने पर पाबंदी लगा लेतीं?+
जिस दुनिया में धर्म किसी नशे जैसा हो और धर्मगुरू किसी ईश्वर सरीखे जिनका कहा असंख्य लोग नहीं टालते, उस दुनिया में कितनी आसानी से बड़े-बड़े सामाजिक बदलाव लाए जा सकते हैं. आज के दौर में धर्मगुरू ही हैं जिनकी कही बातें लोग पत्थर की लकीर की तरह मानते हैं, या मानने की कोशिश तो जरूर ही करते हैं. स्त्रियों के साथ भेदभाव, भ्रूण हत्या, दहेज, बलात्कार, यौन शौषण जैसे मुददों पर तो इन धर्मगुरूओं की मदद से युद्ध स्तर पर बदलाव और सुधार लाए सकते हैं, वह भी बिना किसी बड़े तामझाम के या बगैर जबरदस्ती किए.+
लेकिन सभी धर्मों के अधिकतर धर्माचार्य दिन-रात सिर्फ भोग, भावनाओं को भड़काने या फिर सिर्फ स्त्रियों को ही ज्ञान और तरह-तरह की सीख देने में लगे हैं. समाज की किसी भी भयानक समस्या की तरफ से आंखें बंद करके बैठे इन तमाम धर्मगुरूओं को कभी माफ नहीं किया जा सकता. इसलिए कि इन्होंने अपने पद और असीमित ताकत का समाज के हित में वैसा उपयोग नहीं किया जैसा ये कर सकते थे या इन्हें करना चाहिए था. अपनी सत्ता और ताकत का सही उपयोग न करना भी ताकत के दुरुपयोग करने जैसा ही भयानक अपराध है. न सिर्फ भारत के बल्कि पूरी दुनिया के अधिकांश धर्माचार्य इस अपराध के लिए दोषी हैं.

चाहे दीवाली के हों या असली, रॉकेट तो दक्षिण भारत में ही बनते हैं @पवन वर्मा

क्या वजह है कि रॉकेट विज्ञान से संबंधित इसरो के 20 सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से 14 दक्षिण भारत में हैं?
हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान के राज के दौरान मैसूर की रियासत और अंग्रेजों के बीच चार युद्ध हुए थे. चौथे युद्ध के बाद मैसूर पर अंग्रेजों का शासन हो गया था. लेकिन पहले तीन युद्ध ऐसे रहे जिनमें अंग्रेजी फौज को काफी नुकसान उठाना पड़ा. इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि मैसूर की सेना के पास रॉकेट थे. इनसे वह दो किलोमीटर दूर तक दुश्मन सेना को निशाना बना सकती थी. इतिहासकारों के मुताबिक युद्ध में रॉकेट तकनीक का इस्तेमाल दुनिया में सबसे पहले (1780 में) दक्षिण भारत की इसी रियासत में हुआ.+
संयोग है कि आज भी जब हम भारत में किसी रॉकेट के प्रक्षेपण की खबर सुनते हैं तो वह भी दक्षिण (केरल के थुंबा या आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा) से ही आती है. रॉकेट विज्ञान में कोई शोध या नई खोज हो तब भी हमें दक्षिण भारत के ही किसी शहर का नाम सुनाई देता है. और तो और, बीती जनवरी में गूगल लूनर एक्स प्राइज (गूगल द्वारा चांद पर उतरने की तकनीक के विकास से जुड़ी एक प्रतियोगिता) की घोषणा हुई तो पता चला कि इसमें एक पुरस्कार बैंगलोर की इंडस नाम की निजी कंपनी को मिला है.+
बीती जनवरी में गूगल लूनर एक्स प्राइज की घोषणा हुई तो पता चला कि इसमें से एक पुरस्कार बैंगलोर की इंडस नाम की निजी कंपनी को मिला है. यानी सरकारी संस्थानों के साथ दक्षिण भारत के निजी संस्थान भी इस मामले में पीछे नहीं हैं.
यानी सरकारी संस्थानों के साथ दक्षिण भारत के निजी संस्थान भी इस मामले में पीछे नहीं है. सरकारी संस्थानों की बात करें तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के 20 सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से 14 दक्षिण के राज्यों में ही हैं. रॉकेट निर्माण से लेकर परीक्षण, लॉन्च और ट्रेकिंग के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र इसी क्षेत्र में हैं. इन सब की बदौलत दक्षिण भारत पूरी दुनिया में रॉकेट विज्ञान का हब बन चुका है. वैसे एक दिलचस्प बात यह भी है कि शिवकाशी नाम का वह मशहूर शहर भी दक्षिण भारत में ही है जहां दीवाली के रॉकेट बनते हैं.+
लेकिन क्या वजह रही कि उत्तर भारत इस मामले में पिछड़ गया? दरअसल दक्षिण भारत में अंतरिक्ष संस्थानों के विकास के पीछे इतिहास, विज्ञान और सहूलियत, इन तीनों का मिलाजुला योगदान है. साथ ही इसमें इसरो की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण रही है.+
बात 1962 शुरू होती है. तब मशहूर वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा की सलाह पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए एक समिति बनाई थी. इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च यानी इंकोस्पार नाम की इस समिति के प्रमुख विक्रम साराभाई का पहला काम था कि वे ऐसी जगह की खोज करें जहां से विदेशों से मिले प्रायोगिक रॉकेट छोड़े जा सकें. वैज्ञानिक नियमों के हिसाब से इस काम के लिए वे जगहें सबसे उपयुक्त होती हैं जहां से मैग्नेटिक इक्वेटर लाइन गुजरती हो. भारत में ये क्षेत्र देश के दक्षिणी हिस्से में हैं. यही वजह है कि एक अदद प्रक्षेपण केंद्र की खोज भाभा व साराभाई को केरल ले गई. इस तरह से रॉकेट विज्ञान के क्षेत्र में थुंबा के एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने की शुरूआत हुई और इसे रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र के रूप में विकसित किया गया.+
भारत को उस समय अमेरिका, सोवियत संघ और फ्रांस से प्रायोगिक रॉकेट मिले थे. थुंबा में इनके प्रायोगिक प्रक्षेपण भारतीय वैज्ञानिकों का अनुभव बढ़ाने में काफी मददगार साबित हुए. अब इन वैज्ञानिकों को स्वदेशी रॉकेटों का परीक्षण करना था. 1969 में इंकोस्पार का नाम औपचारिक रूप से इसरो कर दिया गया. स्वदेशी रॉकेटों के विकास का काम इसी की कमान में होना था.+
थुंबा प्रक्षेपण केंद्र में शुरूआत में रॉकेट साइकिल से ढोकर ले जाए जाते थे
थुंबा प्रक्षेपण केंद्र में शुरूआत में रॉकेट साइकिल से ढोकर ले जाए जाते थे
अब रॉकेटों से जो सेटेलाइट छोड़े जाने थे उनके लिए इसरो को पूर्वी तट पर एक बड़े लॉन्चिंग पैड की जरूरत थी. इसके लिए चेन्नई से 100 किलोमीटर उत्तर में श्रीहरिकोटा का चयन किया गया. यह इस लिहाज से भी ठीक था कि इसके एक तरफ बंगाल की खाड़ी है तो दूसरी तरफ जंगल. यदि रॉकेट छोड़ने के बाद यहां कोई दुर्घटना हो भी जाए तो जानमाल के नुकसान की आशंका कम से कम है.+
इसके बाद केरल के ही तिरुवअनंतपुरम में लिक्विड प्रॉपल्शन सेंटर की स्थापना हुई. इसका नाम बाद में विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) कर दिया गया. अब जो रॉकेट इंजन वीएसएससी में बनने थे उनके परीक्षण के लिए पास ही कोई सेंटर बनाने की जरूरत थी तो इसके लिए तमिलनाडु का महेंद्रगिरी चुन लिया गया.+
इन सभी केंद्रों से प्रशासनिक तालमेल के लिए बैंगलोर में इसरो का मुख्यालय बन गया. श्रीहरिकोटा और वीएसएससी से इसकी समान दूरी है. बाद में जैसे-जैसे इसरो का विकास हुआ उससे जुड़े दूसरे संस्थान भी बैंगलोर के आसपास ही खुलने लगे जैसे इसरो टेलिमेट्री ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क हेडक्वार्टर और इसरो सेटेलाइट सेंटर आदि.+
जो भी रॉकेट इंजन वीएसएससी में बनने थे उनके परीक्षण के लिए पास ही कोई सेंटर बनाने की जरूरत थी. इसके लिए तमिलनाडु का महेंद्रगिरी चुना गया
इसरो से संबद्ध बड़े संस्थानों में डीप स्पेस ट्रेकिंग सेंटर सबसे नया है. इसकी स्थापना 2008 में हुई थी. यह भी दक्षिण भारत यानी कर्नाटक के ब्याललु में बनाया गया है. इस जगह बहुत कम आबादी है और यहां इलेक्ट्रो मैग्नेटिक डिस्टरबेंस भी न्यूनतम है. हैदराबाद में रिमोट सेंसिंग का मुख्य केंद्र बनाया गया क्योंकि यह नए संस्थानों से भी समान दूरी पर स्थित है.+
ऐसा नहीं कि उत्तर भारत इस लिहाज से बिल्कुल ही अछूता है. लेकिन यहां इसरो के जो भी संस्थान हैं वे मुख्य रूप से बुनियादी अनुसंधान और पेलोड के निर्माण का काम करते है. अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी में एस्ट्रो फिजिक्स के उच्च अनुसंधान होते हैं. शहर के ही दूसरे संस्थान- स्पेस एप्लीकेशन सेंटर में सेटेलाइट और दूसरे पेलोड का निर्माण किया जाता है. भोपाल में इसरो ने एक ट्रेकिंग सेंटर स्थापित किया है.+
दक्षिण भारत में इन संस्थानों के विकास को इस बात से भी जोड़ा जाता है कि ये पाकिस्तान और चीन से काफी दूर हैं. हालांकि बैलेस्टिक मिसाइलों के इस दौर में अब यह दूरी मायने नहीं रखती लेकिन, 1970 के दशक में यह एक महत्वपूर्ण वजह जरूर रही होगी.+
इसरो ने अपनी विकास यात्रा विदेशों से आयातित ऐसे रॉकेटों के प्रेक्षेपण से शुरू की थी जो 60 किमी से ऊपर नहीं जा पाते थे. लेकिन आज वह भूस्थैतिक कक्षा (36,000 किमी की ऊंचाई) और मंगल की कक्षा तक में सेटेलाइट भेज चुका है. ये उपलब्धियां उत्तर-दक्षिण, और पूरब-पश्चिम के सभी भारतीयों में समान रूप से गर्व की भावना पैदा करती हैं. यानी जमीन पर जो कुछ भी दिखे आखिर में हमारे रॉकेट विज्ञान ने देश को क्षेत्रीयता से ऊपर उठाने का ही काम किया है.