Tuesday, 3 February 2015

गोडसे ने आख़िर गांधी की हत्या क्यों की? @ आकार पटेल

आख़िर किन वजहों से नाथूराम गोडसे ने की महात्मा गांधी की हत्या?
गिरफ़्तार होने के बाद गोडसे ने गांधी के पुत्र देवदास गांधी (राजमोहन गांधी के पिता) को तब पहचान लिया था जब वे गोडसे से मिलने थाने पहुँचे थे. इस मुलाकात का जिक्र नाथूराम के भाई और सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने अपनी किताब गांधी वध क्यों, में किया है.
गोपाल गोडसे को फांसी नहीं हुई, क़ैद की सजा हुई थी. जब देवदास गांधी पिता की हत्या के बाद संसद मार्ग स्थित पुलिस थाने पहुंचे थे, तब नाथूराम गोडसे ने उन्हें पहचाना था.

गोपल गोडसे ने अपनी किताब में लिखा है, "देवदास शायद इस उम्मीद में आए होंगे कि उन्हें कोई वीभत्स चेहरे वाला, गांधी के खून का प्यासा कातिल नज़र आएगा, लेकिन नाथूराम सहज और सौम्य थे. उनका आत्म विश्वास बना हुआ था. देवदास ने जैसा सोचा होगा, उससे एकदम उलट."
निश्चित तौर पर हम ये नहीं जानते कि वाकई में ऐसा रहा होगा.

देवदास से वो मुलाकात

नाथूराम ने देवदास गांधी से कहा, "मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूं. हिंदी अख़बार हिंदू राष्ट्र का संपादक. मैं भी वहां था (जहां गांधी की हत्या हुई). आज तुमने अपने पिता को खोया है. मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुंचा है. तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुंचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है. कृप्या मेरा यक़ीन करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत रंजिश के चलते नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कोई ख़राब भाव."
देवदास ने तब पूछा, "तब, तुमने ऐसा क्यों किया?"
जवाब में नाथूराम ने कहा, "केवल और केवल राजनीतिक वजह से."
नाथूराम ने देवदास से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. अदालत में नाथूराम ने अपना वक्तव्य रखा था, जिस पर अदालत ने पाबंदी लगा दी.
गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक के अनुच्छेद में नाथूराम की वसीयत का जिक्र किया है. जिसकी अंतिम पंक्ति है- "अगर सरकार अदालत में दिए मेरे बयान पर से पाबंदी हटा लेती है, ऐसा जब भी हो, मैं तुम्हें उसे प्रकाशित करने के लिए अधिकृत करता हूं."

अदालत में गोडसे का बयान

ऐसे फिर नाथूराम के वक्तव्य में आख़िर है क्या? उसमें नाथूराम ने इन पहलुओं का ज़िक्र किया है-
पहली बात, वह गांधी का सम्मान करता था. उसने कहा था, "वीर सावरकर और गांधीजी ने जो लिखा है या बोला है, उसे मैंने गंभीरता से पढ़ा है. मेरे विचार से, पिछले तीस सालों के दौरान इन दोनों ने भारतीय लोगों के विचार और कार्य पर जितना असर डाला है, उतना किसी और चीज़ ने नहीं."
दूसरी बात, जो नाथूराम ने कही, "इनको पढ़ने और सोचने के बाद मेरा यकीन इस बात में हुआ कि मेरा पहला दायित्व हिंदुत्व और हिंदुओं के लिए है, एक देशभक्त और विश्व नागरिक होने के नाते. 30 करोड़ हिंदुओं की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा अपने आप पूरे भारत की रक्षा होगी, जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है. इस सोच ने मुझे हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नज़दीक किया. मेरे विचार से यही विचारधारा हिंदुस्तान को आज़ादी दिला सकती है और उसे कायम रख सकती है."
इस नज़रिए के बाद नाथूराम ने गांधी के बारे में सोचा. "32 साल तक विचारों में उत्तेजना भरने वाले गांधी ने जब मुस्लिमों के पक्ष में अपना अंतिम उपवास रखा तो मैं इस नतीजे पर पहुंच गया कि गांधी के अस्तित्व को तुरंत खत्म करना होगा. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों को हक दिलाने की दिशा में शानदार काम किया था, लेकिन जब वे भारत आए तो उनकी मानसिकता कुछ इस तरह बन गई कि क्या सही है और क्या गलत, इसका फैसला लेने के लिए वे खुद को अंतिम जज मानने लगे. अगर देश को उनका नेतृत्व चाहिए तो यह उनकी अपराजेयता को स्वीकार्य करने जैसा था. अगर देश उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता तो वे कांग्रेस से अलग राह पर चलने लगते."

महात्मा पर आरोप

इस सोच ने नाथूराम को गांधी की हत्या करने के लिए उकसाया. नाथूराम ने भी कहा, "इस सोच के साथ दो रास्ते नहीं हो सकते. या तो कांग्रेस को गांधी के लिए अपना रास्ता छोड़ना होता और गांधी की सारी सनक, सोच, दर्शन और नजरिए को अपनाना होता या फिर गांधी के बिना आगे बढ़ना होता."
तीसरा आरोप ये था कि गांधी ने पाकिस्तान के निर्माण में मदद की. नाथूराम ने कहा, "जब कांग्रेस के दिग्गज नेता, गांधी की सहमति से देश के बंटवारे का फ़ैसला कर रहे थे, उस देश का जिसे हम पूजते रहे हैं, मैं भीषण ग़ुस्से से भर रहा था. व्यक्तिगत तौर पर किसी के प्रति मेरी कोई दुर्भावना नहीं है लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मैं मौजूदा सरकार का सम्मान नहीं करता, क्योंकि उनकी नीतियां मुस्लिमों के पक्ष में थीं. लेकिन उसी वक्त मैं ये साफ देख रहा हूं कि ये नीतियां केवल गांधी की मौजूदगी के चलते थीं."
नाथूराम के तर्कों के साथ समस्याएं थीं. मसलन, उसकी सोच थी कि गांधी देश के बंटवारे के प्रति उत्साहित थे, जबकि इतिहास के मुताबिक मामला बिलकुल उल्टा था. उन्होंने कहा कि कांग्रेस में गांधी तानाशाह थे, लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस के अंदर अपनी बात मनवाने के लिए गांधी को भूख हड़ताल करनी पड़ती थी. किसी तानाशाह को आदेश देने के सिवा कुछ करने की जरूरत क्यों होगी?

विचारधारा से नफ़रत

नाथूराम ने गांधी की अंतिम भूख हड़ताल (जो उन्होंने पाकिस्तान को फंड जारी करने से भारत के इनकार करने पर की थी) पर सवाल उठाए, लेकिन यह उन्होंने तब किया जब भारत अपने ही वादे से पीछे हट रहा था. गांधी ने इस मौके पर देश को सही एवं उपयुक्त रास्ता दिखाया था.
नाथूराम ने अदालत में जो भी कहा, तर्क के आधार पर उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता. यह देवदास को दिए बयान से भी उलट है. केवल राजनीति के चलते उसने गांधी की हत्या नहीं की थी.
वह गांधी की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से नफ़रत करता था. यह वास्तविक हिंदू धर्म भाव के बिलकुल उलट था और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उसका 'ब्रेनवाश' किया था.
वास्तविकता यही है कि गांधी का कोई भी रास्ता या तरीका ऐसा नहीं है, जिस पर सवाल उठाए जा सकें. यही वजह है कि दशकों बाद भी एक राजनेता के तौर पर उनकी वैश्विक साख कायम है.
1949 में गांधी के बारे में जॉर्ज ऑरवैल ने लिखा था, "सौंदर्यबोध के लिहाज़ से कोई गांधी के प्रति वैमनस्य रख सकता है जैसा कि मैं महसूस कर रहा हूँ. कोई उनके महात्मा होने के दावे को भी खारिज कर सकता है (हालांकि महात्मा होने का दावा उन्होंने खुद कभी नहीं किया). कोई साधुता को आदर्श के तौर पर ही खारिज कर सकता है और इसलिए ये मान सकता है कि गांधी का मूल भाव मानवविरोधी और प्रतिक्रियावादी था. लेकिन एक राजनेता के तौर पर देखने पर और मौजूदा समय के दूसरे तमाम राजनेताओं से तुलना करने पर हम पाते हैं- वे अपने पीछे कितना सुगंधित एहसास छोड़कर गए हैं."
2015 में गांधी के बारे में आज भी यही सत्य है, जबकि नाथूराम गोडसे की शिकायतें समय की धुंध में ग़ायब हो चुकी हैं

'घर वापसी' जिसने बदल दिया भारत का इतिहास @ रेहान फ़ज़ल

महात्मा गांधी
1915 में एक भारतीय बैरिस्टर ने दक्षिण अफ़्रीका के अपने करियर को त्याग अपने देश वापस आने का फ़ैसला किया.
जब मोहनदास करमचंद गांधी मुंबई के अपोलो बंदरगाह में उतरे तो न वो महात्मा थे और न ही बापू.
फिर भी न जाने क्यों बहुतों को उम्मीद थी कि ये शख़्स अपने ग़ैर-परंपरागत तरीकों से भारत को अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद करा लेगा.
उन्होंने भारतवासियों को निराश नहीं किया. इसे इतिहास की विडंबना ही कहा जाएगा कि जब गांधी भारत लौटे तो एक समारोह में उनका स्वागत किया था बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने.
ये अलग बात है कि पांच साल के भीतर ही गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र से आने वाले इन धुरंधरों ने अलग-अलग राजनीतिक रास्ते अख़्तियार किए और भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रपिता कहलाए.
1915 से लेकर 1920 के बीच महात्मा गांधी ने किस तरह अपने आपको भारत के राजनीतिक पटल पर स्थापित किया.

पढ़िए पूरी विवेचना

मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी
नौ जनवरी 1915 को जब अरबिया जहाज़ ने मुंबई के अपोलो बंदरगाह को छुआ, उस समय मोहनदास करमचंद गाँधी की उम्र थी 45 साल.
12 साल से उन्होंने अपनी जन्म भूमि के दर्शन नहीं किए थे.
उस ज़माने में सिर्फ़ ब्रिटिश सरकार के ख़ास आदमियों और राजा-महाराजाओं को ही अपोलो बंदरगाह पर उतरने की अनुमति दी जाती थी.
गांधी को ये सम्मान सर फ़िरोज़शाह मेहता, बीजी हॉर्निमेन और गोपाल कृष्ण गोखले की सिफ़ारिश पर दिया गया था.
जब गाँधी जहाज़ से उतरे तो उन्होंने एक लंबा कुर्ता, धोती और एक काठियावाड़ी पगड़ी पहनी हुई थी.
उनसे मिलने आए लोगों ने या तो यूरोपियन सूट पहने हुए थे या फिर वो राजसी भारतीय पोशाक में थे.
महात्मा गांधी
बीमार होते हुए भी उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले पूणे से उनसे मिलने बंबई आए थे.
एक स्वागत समारोह की अध्यक्षता फ़िरोज़ शाह मेहता ने की थी तो दूसरे समारोह में एक साल पहले जेल से छूट कर आए बाल गंगाधर तिलक मौजूद थे.
इसी समारोह में जब गांधी की तारीफ़ों के पुल बांधे जा रहे थे तो उन्होंने बहुत विनम्रता से कहा था, "भारत के लोगों को शायद मेरी असफलताओं के बारे में पता नहीं है. आपको मेरी सफलताओं के ही समाचार मिले हैं. लेकिन अब मैं भारत में हूं तो लोगों को प्रत्यक्ष रूप से मेरे दोष भी देखने को मिलेंगें. मैं उम्मीद करता हूं कि आप मेरी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करेंगे. अपनी तरफ़ से एक साधारण सेवक की तरह मैं मातृभूमि की सेवा के लिए समर्पित हूं."

कैसरे-हिंद का ख़िताब

महात्मा गांधी
दक्षिण अफ़्रीका में अपना लोहा मनवाने के बाद गांधी की ख्याति भारत भी आ पहुंची थी और अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें गंभीरता से लेने का फ़ैसला लिया था.
महात्मा गांधी के पौत्र और उनकी जीवनी लिखने वाले राजमोहन गांधी कहते हैं, "गोखले के कहने पर गांधी बंबई के गवर्नर विलिंगटन से मिले थे और उनके कहने पर उन्हें ये आश्वासन दिया था कि सरकार के ख़िलाफ़ कोई क़दम उठाने से पहले वो गवर्नर को सूचित करेंगे. शायद सरकार भी गाँधी को अपने ख़िलाफ़ नहीं करना चाहती थी, इसलिए उनके भारत आने के कुछ समय के भीतर ही उसने दक्षिण अफ़्रीका में की गई उनकी सेवाओं के लिए कैसरे-हिंद के ख़िताब से नवाज़ा था."

पैरों में वेसलीन

महात्मा गांधी,राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल
गांधी ने गोखले की सलाह का पालन करते हुए पहले भारत के लोगों को जानने की कोशिश शुरू की. उन्होंने तय किया कि वो पूरे भारत का भ्रमण करेंगे और वो भी भीड़ से भरे तीसरे दर्जे के रेल के डिब्बे से.
तीसरे दर्जे के सफ़र में उनका लंबा कुर्ता और काठियावाड़ी पगड़ी बाधक साबित हुई, इसलिए उन्होंने उसका त्याग कर दिया.
गांधी के एक और जीवनीकार लुई फ़िशर लिखते हैं कि लोगों के छूने से उनके पैर और पिंडली इतनी खुरच जाती थी कि वहां पर गांधी के सहायकों को वैसलीन लगानी पड़ती थी.
बाद में उनकी अंग्रेज़ साथी मेडलीन स्लेड ने, जिन्हें गांधी मीराबेन कहा करते थे ने कुछ पत्रकारों को बताया कि वो खुद गांधी के पैरों को हर रात शैंपू से धोया करती थीं.

विश्वनाथ मंदिर में दक्षिणा देने से इनकार

महात्मा गांधी
अपनी भारत यात्रा शुरू करने से पहले गांधी, गोखले और तिलक से मिलने पुणे गए. उसके बाद वो राजकोट पहुंचे और फिर रवींद्रनाथ टैगोर से मिलने शांतिनिकेतन. वहीं उन्हें गोखले के निधन की सूचना मिली.
वो वापस पुणे लौटे और शोक के तौर पर उन्होंने चप्पलें पहनना भी छोड़ दीं.
गोखले के शोक समारोह में भाग ले कर वो वापस शांति निकेतन लौटे जहां टैगोर ने उन्हें पहली बार महात्मा शब्द से संबोधित किया. वहां से वो बनारस गए. वहां पर उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर में दक्षिणा देने से इनकार कर दिया.
एक पंडे ने उनसे कहा, "भगवान का ये अपमान तुझे सीधे नर्क में ले जाएगा." इसके बाद गाँधी तीन बार बनारस गए लेकिन उन्होंने एक बार भी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन नहीं किए.

चंपारण आंदोलन

महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू
1916 के कांग्रेस अधिवेशन में वो पहली बार जवाहरलाल नेहरू से मिले. वहीं बिहार से राज कुमार शुक्ल आए हुए थे.
उन्होंने गांधी को चंपारण के नील पैदा करने वाले किसानों की व्यथा बताई और किसी तरह उन्हें वहां आने के लिए राज़ी कर लिया.
जब गांधी पटना पहुंचे तो शुक्ल उन्हें नील किसानों के वक़ील डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के निवास पर ले गए. उस समय राजेंद्र प्रसाद अपने घर पर नहीं थे.
राजमोहन गांधी बताते हैं कि राजेंद्र प्रसाद के नौकरों ने गांधी को निम्न जाति का व्यक्ति समझते हुए उन्हें कुएं से पानी निकालने और शौचालय का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी.
बाद में राजेंद्र प्रसाद गांधी के निकट सहयोगी बने और उन्हें स्वाधीन भारत का पहला राष्ट्रपति बनाया गया.
महात्मा गांधी
जब चंपारण जाते हुए गांधी की ट्रेन आधी रात को मुज़फ़्फ़रपुर पहुंची तो उनके स्वागत में लालटेन ले कर आए आचार्य कृपलानी उन्हें ढूंढ नहीं पाए क्योंकि महात्मा गांधी तीसरे दर्जे में सफ़र कर रहे थे.
चंपारण में गांधी को पहली उपलब्ध ट्रेन से वो जगह छोड़ देने का फ़रमान सुनाया गया.
मोतिहारी की अदालत में गांधी ने कहा, "मैं इस आदेश का पालन इसलिए नहीं कर रहा कि मेरे अंदर क़ानून के लिए सम्मान नहीं है बल्कि इसलिए कि मैं अपने अन्तःकरण की आवाज़ को उस पर कहीं अधिक तरजीह देता हूं."
अंतत: सरकार को नील किसानों की समस्याओं को सुनने के लिए एक जांच कमेटी बनानी पड़ी और महात्मा गांधी को उसका सदस्य बनाया गया.
कमेटी ने एक मत से तिनकठिया व्यवस्था को समाप्त करने की सिफ़ारिश की. ये भारत की धरती पर सत्याग्रह का पहला सफल प्रयोग था.

खेड़ा और सरदार पटेल

महात्मा गांधी
गांधी की दूसरी परीक्षा हुई खेड़ा में जहां भारी बारिश के कारण किसानों की सारी फ़सल बरबाद हो गई. स्थानीय किसानों ने लगान माफ़ कराने के लिए गांधी की सहायता मांगी.
गांधी के आह्वान पर 3000 किसानों ने लगान देने से इनकार कर दिया. इस आंदोलन में सरदार पटेल ने गांधी के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम किया. अंतत: किसानों की जीत हुई और सरकार को लगान माफ़ करना पड़ा.
महात्मा गांधी,आभा,मनु
आचार्य कृपलानी ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मैंने अपनी आंखों से देखा कि किस तरह पटेल गांधी के जादू में आ गए. पहले वो एक युवा बैरिस्टर की तरह एक फ़ैशनेबल जीवन जिया करते थे. खेड़ा के दौरान न सिर्फ़ उन्होंने अपने विदेशी कपड़ों और आरामदायक जीवन को त्याग दिया बल्कि वो किसानों के साथ रहने लगे. उनका साधारण खाना खाने लगे, ज़मीन पर सोने लगे और यहां तक कि अपने कपड़े भी ख़ुद धोने लगे. लेकिन उनकी ज़ोरदार हंसी और विनोदी स्वभाव पहले की तरह बरकरार रहा."
इसके बाद गांधी ने अहमदाबाद के कपड़ा मिलों की वेतन वृद्धि की लड़ाई लड़ी.
उन्होंने घोषणा की कि जब तक उनके वेतन में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी नहीं हो जाती वो अन्न को हाथ नहीं लगाएंगे. मालिकों को मज़दूरों की मांग माननी पड़ी. ये गांधी का पहला राजनीतिक उपवास था.

2119 दिन जेल में

महात्मा गांधी
1971 में अहमदाबाद के चंदूलाल दलाल ने एक किताब में नौ जनवरी, 1915 से लेकर 30 जनवरी, 1948 तक गांधी के भारत प्रवास के एक-एक दिन का ब्योरा दिया.
इसके अनुसार गांधी ने इस दौरान 12075 दिन बिताए. इसमें 4739 दिन वो अहमदाबाद और वर्धा में रहे, 2119 दिन उन्होंने ब्रिटिश जेलों में काटे, 5217 दिन वो सफ़र करते रहे.
इस दौरान वो भारत के अलावा इंग्लैंड, बर्मा और श्रीलंका भी गए. इनमें से अधिकतर यात्राएं तीसरे दर्जे के डिब्बे में की गईं.
दांडी मार्च में वो कई दिनों तक पैदल भी चले. इसके अलावा उन्होंने कभी-कभी घोड़े, हाथी और ऊंट की सवारी का सहारा भी लिया और नावों, स्टीमरों और कार की सवारी भी की.
अपनी इच्छा के विपरीत बहुत झिझकते हुए वो एक बार पालकी में भी चढ़े और एक बार उन्होंने साइकिल भी चलाई.

जनवरी 1948, दिल्ली: 'मरता है तो मरने दो' @ अपूर्वानंद

महात्मा गांधी
जनवरी, 2015 को गाँधी की भारत वापसी की सदी के तौर पर मनाया जा रहा है. लेकिन जनवरी से गांधी का जुड़ाव और भी कई स्तरों पर है.
जनवरी में ही गांधी ने अपने जीवन का आख़िरी उपवास किया. जनवरी ख़त्म होने को ही थी कि गाँधी की ज़िंदगी ख़त्म कर दी गई. इसलिए गांधी और भारत के बीच के रिश्ते को समझने के लिहाज़ से जनवरी एक महत्वपूर्ण महीना है.
इसकी शुरुआत भारत और गांधी के प्रेम प्रसंग से हुई जो बत्तीस साल तक चला. उसके बाद शुरू हुआ गांधी के साथ भारत का संघर्ष. वे अपने ही मुल्क से लड़ रहे थे और हारा हुआ महसूस कर रहे थे.
इसका अंत हुआ गाँधी की भारत से निराशा के साथ.
कम से कम भारत के बड़े हिस्से के हिंदू उनसे अधिक निराश हो चुके थे. उनके मुताबिक़ गांधी उनके लिए न सिर्फ़ ग़ैरज़रूरी हो गए थे, बल्कि उनको लगने लगा था कि गांधी का जीवित रहना भारत के लिए ख़तरनाक हो सकता था.

चूल्हा नहीं जला

महात्मा गांधी
इसलिए जब नाथूराम गोडसे ने उन्हें गोली मारकर उनकी इहलीला समाप्त कर दी तो एक तरफ़ कई घरों में चूल्हा नहीं जला, लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों और समर्थकों ने मिठाइयाँ बांटी और दीवाली मनाई.
आज जब वह संघ भारत की सत्ता पर क़ाबिज़ है. तो यह एक मौक़ा हो सकता है यह विचार करने का कि क्या अंतिम रूप से गाँधी के विचारों को विदाई दे दी गई है.
12 जनवरी,1948 को गांधी ने अपनी शाम की प्रार्थना सभा में अगले दिन से बेमियादी उपवास का ऐलान किया. गाँधी 78 साल के हो चुके थे.
वे उपवास करने में माहिर थे, लेकिन इस थकी देह और उम्र में इस फ़ैसले ने पूरे देश को चिंता और हैरानी में डाल दिया.
गांधी की मांग इस बार अपने ही लोगों से थी और वे भी ख़ासकर हिंदुओं से. वे हिंदुओं, सिखों और मुसलमानों के दिलों के मिलने की मांग कर रहे थे.

दो मुल्क

महात्मा गांधी
1946-47 गाँधी ही नहीं देश के सभी नेताओं के लिए बेहद थकान भरे साल थे. आज़ादी क़रीब आ रही थी, लेकिन यह दो मुल्कों के बनने का वक़्त भी था. पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अकल्पनीय हिंसा भड़क उठी थी. दोनों ही अमानवीयता की चरम को छूने को बेताब थे.
जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन (सीधी कार्रवाई) के ऐलान ने कलकत्ते में क़त्लोग़ारत की शुरुआत कर दी थी. गांधी वहां गए और उपवास पर बैठ गए. तभी हिंसा के दोषी माने जाने वाले सुहरावर्दी वहां आए और उन्होंने माफ़ी माँगी. इस प्रकार कलकत्ते में अमन क़ायम हुआ.
12 जनवरी को गांधी ने कहा, “जब मैं नौ सितंबर को कलकत्ते से दिल्ली लौटा तो इरादा पश्चिम पंजाब जाने का था, लेकिन ऐसा न हो सका. उस समय ख़ुशदिल दिल्ली मुर्दों का शहर लग रही थी. मैं जब ट्रेन से उतरा तो हर चेहरे पर उदासी पुती थी. सरदार प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद थे. उन्होने बिना वक़्त गँवाए मुझे इस महानगर की गड़बड़ियों के बारे में बताया. मैंने फ़ौरन समझ लिया कि मुझे दिल्ली में ही रहना है और ‘करना है या मरना है'. उन्होंने आगे कहा, "हालांकि फ़ौज और पुलिस की वजह से ऊपरी अमन था, लेकिन दिलों में तूफ़ान था. वह कभी भी फूट सकता था. "इससे मेरा ‘करने’ का संकल्प पूरा नहीं होता था और वही मुझे मौत से अलग रख सकता था, मौत जो अतुलनीय मित्र है. जिस दिल्ली में ज़ाकिर हुसैन इत्मीनान से न चल-फिर सकें, वह उनकी नहीं हो सकती थी.

मौत की ओर क़दम

महात्मा गांधी
गांधी ने अपने प्रयासों को नाकाफ़ी मानकर मौत की तरफ़ क़दम बढ़ाने का फ़ैसला किया. गांधी ने कहा, "जब तक आज तक मिलकर रहने वाले हिंदू और मुसलमान उन्हें यक़ीन न दिला दें कि उन्होंने आपसी रंजिश मिटा दी है और साथ-साथ रहने को तैयार हैं, तब तक वे उपवास नहीं तोड़ेंगे."
दिल्ली पाकिस्तान से आए शरणार्थियों से भरी हुई थी. उनके साथ पाकिस्तान में हिंदुओं पर हुए ज़ुल्म की भयानक कहानियां भी आ रहीं थीं. यहाँ मुसलमानों पर हमले हो रहे थे, वे अपने इलाक़ों को छोड़ने पर मजबूर थे. मस्जिदों को तोड़ा और मंदिरों में बदला जा रहा था. महरौली के ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन के मज़ार पर हिन्दुओं का क़ब्ज़ा हो गया था.
गांधी की मांग थी कि शरणार्थी हिंदू और सिख, मुस्लिम घरों और पूजा स्थलों से निकलें. ये पाकिस्तान से अपना सब कुछ खो कर आए थे और यहाँ उनसे जनवरी की कड़ाके की ठंड को झेलने को कहा जा रहा था. वे गाँधी के उपवास से बेहद नाराज़ थे. दिल्ली में ‘मरता है तो मरने दो’ के नारे लग रहे थे. गाँधी अविचलित थे.
वे पाकिस्तान जाना चाहते थे और वहां मुसलमानों को वही कहना चाहते थे जो यहाँ हिन्दुओं को कह रहे थे. आख़िर नोआखाली के हमलावर मुसलमानों की नफ़रत झेलकर भी उन्होंने उन्हें हिंसा के रास्ते से अलग कर लिया था, लेकिन अगर यहाँ मुसलमानों पर हमले होते रहे तो वे किस मुंह से पाकिस्तान जाएंगे.

इंसाफ़ और उदारता की माँग

महात्मा गांधी
उन्होंने बँटवारे की वजह से संसाधनों के बँटवारे में भी भारत से इंसाफ़ और उदारता की माँग की और पाकिस्तान को उसका हिस्सा देने को कहा.
गाँधी के बेटे ने कहा कि वे उपवास करके ग़लत कर रहे थे. उनके जीवित रहने पर लाखों जानें बच सकती थीं. गाँधी ने बेटे की अपील भी ठुकरा दी.
गाँधी का यह उपवास सत्रह तारीख़ तक चला. दिल्ली और भारत ही नहीं पूरी दुनिया की निगाहें इस विचित्र उपवास पर लगी थीं. एक सनातनी हिंदू अपने ही धर्मवालों से इस उपवास के ज़रिए बहस कर रहा था. वह उन्हें अपने ह्रदय को जागृत करने को कह रहा था. यह तक़रीबन नामुमकिन माँग थी.
गाँधी मुसलमानों से किसी भी वफ़ादारी के ऐलान की मांग के ख़िलाफ़ थे. जिन मुसलमानों ने यहाँ रहने का फ़ैसला किया था, उनपर शक करना गुनाह था. भारत को धर्म-निरपेक्ष होना था. क्या यह प्रयोग नाकामयाब हो जाएगा? फिर गाँधी के बचे रहने का भी कोई मतलब न था.
17 जनवरी को राजेन्द्र प्रसाद के घर पर करोल बाग़, पहाडगंज, सब्ज़ी मंडी और दूसरे इलाक़ों के अगुओं की बैठक हुई. शरणार्थी शिविरों के हिन्दुओं और सिखों ने इस वादे पर दस्तख़त किए कि वे मुस्लिम मिल्कियत वाली जगहों को और मस्जिदों को ख़ाली कर देंगे.

तोड़ा उपवास

महात्मा गांधी
18 जनवरी की सुबह सब फिर राजेन्द्र प्रसाद के घर इकठ्ठा हुए और दुबारा संकल्प पर ग़ौर किया. फिर सब गांधी के पास पहुँचे.
राजेंद्र बाबू ने उनकी ओर से गाँधी को विश्वास दिलाया कि सबने सच्चे ह्रदय से हिंसा और दुराव ख़त्म करने का निर्णय किया है. महरौली के ख़्वाजा का सालाना उर्स भी पहले जैसे ही मिल कर मनाया जाएगा.
18 तारीख़ को भारत में यह अनोखी घटना हुई. सांप्रदायिक सौहार्द का घोषणा पत्र हिंसा के बीच सबने क़बूल किया. गाँधी ने इसके बाद दिन के पौन बजे अपना उपवास तोड़ा.
गाँधी के इस उपवास ने धर्मनिरपेक्ष भारत की नींव रखी. ज़ाहिर है, इससे वे उन लोगों की नज़र में सबसे बड़े दुश्मन हुए जो इसे पाकिस्तान की तर्ज़ पर हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे.

गोलियाँ दाग़ीं

महात्मा गांधी
शपथ तोड़ना किसी भी धर्म में पाप माना जाता है. लेकिन उनकी नज़रों में गांधी ने भारत में मुसलमानों की इज़्ज़त, हिफ़ाज़त और बराबरी का इंतज़ाम करके सबसे बड़ा पाप किया था. इसके लिए उन्हें सज़ा दी ही जानी थी.
उपवास ख़त्म होने के बाद गाँधी की प्रार्थना सभा पर बम विस्फोट हुए और मदन लाल पहवा नाम का व्यक्ति गिरफ़्तार हुआ.
नाथूराम गोडसे, जो अपने दल के साथ दिल्ली में डेरा डाले हुए थे, इसके बाद यहाँ से निकल गए, लेकिन वह फिर लौटे.
30 जनवरी को वह प्रार्थना सभा की ओर जाते हुए गांधी के आगे रुके, उन्हें प्रणाम किया और फिर उनपर गोलियाँ दाग़ दीं.

Sunday, 1 February 2015

जिसने देखा भारत की पहली थिएटर कंपनी का सपना / अतुल तिवारी, वरिष्ठ कलाकार

हिंदुस्तानी थियेटर के कलाकार
पृथ्वीराज कपूर के साथ 'आम्रपाली' नाटक में काम करने वाले कलाकार.
वर्ष 1980 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में जाने से पहले ही, हम जैसे छोटे शहरों से आने वाले नौसिखिए नौजवानों को विश्व नाटककारों से परिचित कराने वालों में कुछ ख़ास नाम थे.
शेक्सपियर के लिए रांगेय राघव और एनएसडी के ही जेएन कौशल और सबसे बड़ा नाम था बेग़म क़ुदसिया ज़ैदी का.
एनएसडी के ज़्यादातर नाटकों के पोस्टरों में बेग़म क़ुदसिया का नाम ज़रूर हुआ करता था.
और जब यह नाम इब्राहिम अल्काज़ई के साथ दिखता था तो हमारे जैसे नए लोगों के लिए और बड़ा हो जाता था.

बेग़म क़ुदसिया की जन्मशती पर विशेष लेख

बेगम क़ुदसिया ज़ैदी
जैसे-जैसे थिएटर की दुनिया से हमारा ताल्लुक बढ़ा, तो पता चला कि ‘बेग़म क़ुदसिया ज़ैदी’ सिर्फ़ कुछ पटकथाओं से जुडा नाम नहीं था. यह नाम तो कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसे नए आज़ाद हिन्दुस्तान में थिएटर की नींव रखने वाले में से एक था.
पचास के दशक में, जहाँ कमलादेवी संगीत नाटक अकादमी, एशियन थिएटर इंस्टीट्यूट और एनएसडी जैसी संस्थाओं को साकार करने में लगीं थी वहीं, उनकी दोस्त बेगम क़ुदसिया ज़ैदी आज़ाद भारत की पहली पेशेवर थिएटर कंपनी का सपना देख रहीं थीं.
और इस सपने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ थी हिन्दुस्तानी ज़बान में भारतीय और विदेशी, दोनों भाषाओं के नाटकों की पटकथा की उपलब्धता.
फ़िर क्या था, बिना किसी और का इंतज़ार किए बेग़म साहिबा एक के बाद एक नाटक, अनुवाद और रूपांतर के काम पर लग गईं.

हबीब तनवीर

हबीब तनवीर
और देखते ही देखते पहली बार संस्कृत के पुराने क्लासिक्स शकुंतला, मिट्टी की गाड़ी और मुद्राराक्षस जैसे नाटकों के अलावा पचास के दशक के मशहूर नाटककार बर्टोल्ल ब्रेस्ट के 'गुड वुमेन ऑफ़ सेज़ॉन' जैसे नाटकों से भी परिचय हुआ.
बेग़म क़ुदसिया ने सिर्फ इसी जर्मन लेखक से नहीं, बल्कि हेनरिक इब्सन, अलेक्जेंडर डूमास, अंतोन चेखव, ब्रैंडन थॉमस और बर्नार्ड शॉ से भी हमारा परिचय कराया.
यह बात सिर्फ अनुवाद और रूपांतरण तक ही सीमित नहीं थी. सबसे बड़ी चुनौती थी इनमें जान फूंकने की.
उन्होंने वर्ष 1957 में जोशीले नौजवान हबीब तनवीर के साथ मिलकर 'हिन्दुस्तानी थिएटर' नाम की अपनी कंपनी बनाकर यह काम शुरू किया.
लेकिन हबीब इंग्लैंड और जर्मनी चले गए तो उनकी जगह अमरीका से थिएटर सीख कर आईं मोनिका मिश्रा ने इसे संभाला.
पहला नाटक कालिदास लिखित 'शकुंतला' खेला गया.

प्रशंसक नेहरू

जवाहर लाल नेहरू
जानने वाले बताते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू खुद कई बार इसे देखने आए और कई विदेशी मेहमानों को भी इसे दिखाया.
लौटने पर जब हबीब साहब को पता चला कि उनकी जगह किसी और को दे दी गई है, तो उन्होंने बेगम और उस लड़की से काफ़ी झगड़ा किया.
लेकिन थोड़े ही दिनों में वो मोनिका मिश्रा- मोनिका मिश्रा तनवीर बन गईं और साथ ही पैदा हुआ छतीसगढ़ के नाचा कलाकारों के साथ शूद्रक के 'मृच्छ्कटिकम्' का नायाब अवतार 'मिट्टी की गाड़ी'.
इसने 'हिन्दुतानी थिएटर' ही नहीं पूरे देश के थिएटर की तस्वीर बदल कर रख दी.
बेग़म क़ुदसिया का अगला सपना था पहला आधुनिक पेशेवर थिएटर कंपनी बनाना.
और पहली अगस्त 1960 को हिंदुस्तानी थिएटर पूर्णकालिक थिएटर कंपनी बन गई.
कंपनी में तनख्वाह पाने वाले कलाकारों, निर्देशकों और तकनीशियनों ने महीनों लगातार नाटक किए.

लाहौर से दिल्ली

शकुंतला नाटक
नाटक 'शकुंतला' मोनिका मिश्रा के निर्देशन में खेला गया.
बेग़म क़ुदसिया ने इस्पात टाउन, कोयला व पत्थर खदान के इलाकों, औद्योगिक शहरों, रेलवे यार्ड और हर उस जगह नाटक किए जहां नए तरीक़े के नाटकों के दर्शक होते थे.
यह सब कुछ किया गया एक ऐसी महिला ने, जो आसानी से अपने घर में बेग़म की तरह आराम फरमा सकती थी.
सौ साल पहले, 23 दिसंबर 1914 को दिल्ली में कश्मीरी गेट के पास उम्त-उल-कुदूस अब्दुल्लाह का जन्म हुआ था.
माता-पिता की मृत्यु के बाद बाद, बेगम क़ुदसिया अपनी बहन ज़ुबेदा के पास लाहौर चली गईं.
वहीं किन्नार्ड कॉलेज में उनकी तालीम हुई. उनके बहनोई अहमद शाह बुख़ारी 'पत्रस' जाने माने अदीब और ड्रामा-निगार थे और ऑल इंडिया रेडियो की नीव रखने वालों में से एक थे.

नई पौध

हिंदुस्तानी थियेटर
वर्ष 1937 में रामपुर के दीवान और विद्वान् बशीर हुसैन ज़ैदी साहब से निकाह करके जब वो रामपुर आईं तो बच्चों के लिए तमाम कहानियाँ और नाटक लिखने में लग गईं.
उन्हीं में एक था, 'चचा छक्कन के कारनामे'.
रामपुर से दिल्ली आकर तो बेगम क़ुदसिया एक नए जोश के साथ थिएटर और सामाजिक कामों में जुट गईं.
दिल्ली नगर निगम में वो पार्षद थीं तो 'शंकर्स वीकली' के लिए लिखती थीं. एक तरफ़ जामिया के लोगों को जुटाने का काम कर रहीं थी तो दूसरी तरफ़ 'हिन्दुस्तानी थिएटर' को ज़माने में भी वो जुटी थीं.
आगे चल कर पूरे भारतीय रंगमंच और कला के क्षेत्र में जो कुछ बड़े नाम हुए, उनमें से कई बेगम क़ुदसिया ज़ैदी के हिन्दुस्तानी थिएटर की ही पैदावार थे. हबीब तनवीर, एमएस सथयू, यूनुस परवेज़, इरशात पंजातन, श्याम अरोरा और शिव शर्मा जैसे हज़ारों.

नाटक करते करते...

बेग़म क़ुदसिया ज़ैदी
महज 46 साल की उम्र में बेग़म क़ुदसिया ज़ैदी का निधन हो गया.
27 दिसंबर 1960 में जब उनकी कंपनी बुरकुंडा के मज़दूरों के लिए अपना खेल दिखा रही थीं, तो एक तरफ़ दर्शक तालियां बजा रहे थे और उधर बेगम क़ुदसिया ज़ैदी अपनी आखिरी सासें ले रहीं थीं.
इस वर्ष उनकी जन्मशती पर एनएसडी ने उन्हें श्रद्धांजलि के तौर पर 'ख़ालिद की खाला' का मंचन किया.
बेग़म क़ुदसिया ज़ैदी जन्मशती महोत्सव
इसके बाद दानिश इक़बाल और डॉ. सईद आलम ने 'चाचा छक्कन के कारनामे' और टॉम आल्टर ने 'मुद्राराक्षस' को मंचित किया.
मैंने मुंबई विश्वविद्यालय के एकेडमी ऑफ़ थिएटर आर्ट्स में 'आज़ार का ख़्वाब' का मंचन किया.

चीन: दीवारों पर पेंटिग से सरकार असहज! जॉन सडवर्थ बीबीसी न्यूज़, शंघाई


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चीन में विकास के लिए पुरानी इमारतों को हटाना का मुद्दा अक्सर राजनीतिक रूप से काफ़ी संवेदशील विषय रहा है लेकिन ये इन दिनों अपनी ख़ास वजह से चर्चा में है.
चीन के दूसरे शहरों की तुलना में शंघाई में बहुत सारे पुराने वास्तुशिल्प के नमूने बचे हुए हैं लेकिन आर्थिक विकास की बढ़ती गति ने दबे पांव इसके एक बड़े हिस्से में सेंध लगा दी है.
कुछ महीने पहले ऐसे ही दो निर्माण स्थलों पर मलबे के बीच अचानक मर्मस्पर्शी रंगीन पेंटिग्स दिखाई दी.
ये पेंटिग्स भित्तिचित्र कलाकार जूलियन मलांड और चीनी कलाकार शी झेंग के है.

वायरल

बहुत हद तक संभव है कि उनपर किसी का ध्यान नहीं गया होगा लेकिन कुछ दिन पहले जब एक चीनी अख़बार में इनकी तस्वीरें प्रकाशित हुई तो सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं.
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इन पेंटिंग्स में चीन में दशकों से चल रहे निर्माण कार्य को लेकर हो रहे निराशा की अभिव्यक्ति है.
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इन पेंटिग्स में ज़्यादातर बच्चों का चित्रांकन किया गया है.
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तस्वीरों में बच्चों को अपने छोटे से घर के साथ दिखाया गया है.
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इन पेंटिंग्स की बढ़ रही लोकप्रियता के कारण इन निर्माण स्थलों पर देखने वालों और फ़ोटोग्राफरों का तांता लगा हुआ है.
शादी करने वाले जोड़े इन पेंटिग्स का इस्तेमाल अपनी शादी की तस्वीर में बैकग्राउंड के तौर पर करना चाह रहे हैं.

निरंकुश सरकार

इसने ज़िला प्रशासन के कान खड़े कर दिए. उन्होंने सुरक्षा का हवाला देते हुए इन पेंटिग्स को तुरंत साफ़ करने का आदेश दिया जिसे फ़ौरन अमल में भी लाया गया.
लेकिन कई इंटरनेट यूजर्स सुरक्षा के इस तर्क से सहमत नहीं नज़र आ रहे हैं.
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वे सवाल खड़ा कर रहे हैं कि इतनी जल्दबाज़ी में इन पेंटिग्स को क्यों नष्ट किया जा रहा है.
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ये कलाकृतियां निश्चित तौर पर राजनीतिक नहीं थी लेकिन ये चीन की विकास संबंधी जल्दबाज़ी को संवेदनशील तरीक़े से रेखांकित करती है.
और इन्हें हटाना इस दौरान निरंकुश सरकार को होने वाली परेशानियों को दर्शाता है.