Sunday, 25 October 2015

सहिष्णुता सचमुच हिंदुओं के ख़ून में है? @आकार पटेल

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अधिकांश भारतीय अपने देश और अपने बारे में जो दो सबसे बड़ी मान्यताएं मानते हैं, उन पर मैं बहुत पहले लिखना चाहता था.
कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू ने एक कार्यक्रम में इन धारणाओं को दोहराया था.
उन्होंने कहा था, “आजकल देश में हम नए तरह का ढर्रा देख रहे हैं. वो कहते हैं कि इस देश में सहिष्णुता में कमी आ रही है. भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां सहिष्णुता है, अगर यह सौ प्रतिशत नहीं है तो कम से कम 99 प्रतिशत तो है ही.”
भारतीय मंदिरImage copyrightCharukesi Ramadurai
नायडू ने आगे कहा, “अगर आप इतिहास पलटेंगे तो पाएंगे कि भारत कई विदेशी हुकूमतों के आक्रमण का शिकार रहा, लेकिन इस बात का एक भी उदाहरण नहीं है कि भारत ने किसी देश पर हमला किया हो. भारतीयों का व्यवहार भी इस तरह का नहीं है. हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं. यही भारत की महानता है. सहिष्णुता तो भारतीयों के ख़ून में है.”
दो धारणाएं ऐसी हैं, जिन्हें अधिकांश भारतीय मानते हैं. पहली, ये धारणा कि भारत केवल आक्रमण का शिकार रहा है और भारतीयों ने कभी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया. दूसरी ये कि भारतीय (इस संदर्भ में इसका मतलब हिंदू है) अनोखे हैं क्योंकि हममें सहिष्णुता है.
हमीं वो लोग हैं जो अपने विजेताओं के साथ रह रहे हैं.
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आइए दूसरी धारणा पर पहले नज़र डालते हैं. इस मामले में भारत अकेला देश नहीं है. हम ऐसे कई देशों को देख सकते हैं जहां इसी तरह की घटनाएं घटीं.
फ़्रांसीसियों ने 1066 में इंग्लैंड को जीता था, यह वही समय है जब मुसलमानों ने उत्तरी भारत को जीता था.
भारत से उलट, आज भी ब्रिटेन का अधिकांश उच्च कुलीन वर्ग विदेशी मूल का है.
ख़ुद महारानी एलिज़ाबेथ सैक्से-कोबर्ग गोथा के शाही ख़ानदान से हैं. जैसा कि नाम से ही पता चलता है, यह अंग्रेज़ी नहीं बल्कि जर्मन है.
जर्मन विरोधी भावनाओं के कारण विश्व युद्ध के दौरान इसका नाम बदलकर विंड्सर रख दिया गया था.
लेकिन ब्रिटेन का उच्च वर्ग अपनी विदेशी जड़ों को बड़े सम्मान के साथ रखता है और इसकी वजह से वो असंतुष्ट नहीं रहता.
दो सौ साल बाद, चीन को कुबलई ख़ान के नेतृत्व में मंगोलों ने जीत लिया और वो वहीं के होकर रह गए.
चंगेज़ ख़ानImage copyrightNational Palace Museum
चीन में यूवान का मंगोल वंश मशहूर है. उत्तर अफ़्रीका कई नस्लों के मिलने से बना है, जो कम से कम 450 ईसा पूर्व या शायद इससे भी पहले से घुल मिल गए थे (यह क़रीब वही समय है जब हैरोडोटस ने इतिहास की पहली किताब लिखी).
तुर्की को मध्य एशियाई तुर्कों ने जीता था. यहां ग्रीक समेत कई देशों के लोगों ने क़ब्ज़ा किया था. तुर्की को एनातोलिया कहा जाता है क्योंकि पूरब के लिए एनातोल का मतलब ग्रीक है.
इसी वजह से साइप्रस आधा टर्किश और आधा ग्रीक है. भारत और पाकिस्तान की तरह, दोनों लोग एक दूसरे के पड़ोस में बहुत शांति से रहते हैं.
हंगरी नाम हूण से बना है, जो मध्य एशिया का एक क़बीला है. इन्होंने यूरोप को जीता और उन्हीं में शामिल हो गए. हंगेरियन इंडो-यूरोपीय भाषा नहीं है.
क्लियोपैट्रा
ग्रीक लोगों ने मिस्र पर सदियों से राज किया और उन्हीं में घुल मिल गए. (मिस्र की अंतिम रानी क्लियोपैट्रा, असल में ग्रीक भाषी थी.)
ये कुछ उदाहरण भर हैं, जिन्हें मैं अपनी याददाश्त के आधार पर दे रहा हूँ. और कई उदारहण हैं.
इसलिए वैंकेया नायडू का यह कहना ग़लत है कि हिंदू कुछ मायनों में बहुत असाधारण या अनोखे हैं क्योंकि हमने उन लोगों को ‘बर्दाश्त’ करने या उनके साथ रहने का किसी तरह हुनर सीख लिया, जिन्होंने हमें जीता था.
अब इस दूसरे मिथक पर आते हैं कि भारतीयों ने कभी किसी दूसरे देश पर हमला नहीं बोला. इसके लिए हमें बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं है.
अपने शासन के अंतिम दिनों में भारतीय राजा रणजीत सिंह के जनरलों ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया था. यह स्वाभाविक है कि रणजीत सिंह ख़ुद को ‘भारतीय’ की बजाय पंजाबी के रूप में देखते थे क्योंकि भारत के राष्ट्र राज्य बनने के बहुत पहले की यह बात है, लेकिन यह एक मामूली बात है.
सम्राट अशोकImage copyrightBBC RADIO 4
सम्राट अशोक ने अपने मशहूर स्तंभ कंधार में लगाए थे और मुझे संदेह है कि इन्हें बड़े सम्मान के साथ रखा गया होगा: मुमकिन है कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया होगा या बात न मानने पर धमकी दी होगी.
कुछ लोग कहेंगे कि अफ़ग़ानिस्तान भी भारत का ही हिस्सा है.
इस पर मैं कहूँगा कि महमूद ग़ज़नी से लेकर इब्राहिम लोधी और शेर ख़ान सूरी तक उत्तर भारत पर अफ़ग़ानों की जीत का इतिहास देखें तो ये भी कहा जा सकता है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा है.
मेरा तर्क है कि ये विचार आधुनिक है कि हिंदू शांति प्रेमी और संयमी हैं.
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हमें अपने ही लोगों का ख़ून बनाने में कभी हिचक नहीं हुई. उदाहरण के लिए मराठों ने गुजरात पर क़ब्ज़ा कर लिया था और आज भी बड़ौदा पर वो ही क़ाबिज़ हैं.
यह कोई शांतिपूर्ण या लोकतांत्रिक क़ब्ज़ा नहीं था.
अशोक ने कलिंग को जीता और हज़ारों उड़िया लोगों का क़त्लेआम किया. कोई भी इससे इनकार नहीं करता है. ऐसा नहीं था कि सहिष्णुता ने उसे यही दुहराने के लिए चीन या बर्मा या ऑस्ट्रेलिया जाने से रोक लिया, बल्कि भौगोलिक सीमाओं ने उसका रास्ता रोका.
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उत्तरी भारत के राजवंशों के पास विदेशी ज़मीन यानी उपमहाद्वीप के बाहर इलाक़े जीतने में बहुत बड़ी बाधा भौगोलिक स्थितियां थीं.
दक्षिण में भी ऐसे ही उदाहरण हैं. उत्तर भारत में मुसलमानों के आक्रमण और इंग्लैंड पर फ़्रांस के आक्रमण के समय में ही चोल वंश के नेतृत्व तमिलों ने दक्षिण एशिया पर आक्रमण किया क्योंकि बाक़ी भारतीय राजवंशों के मुक़ाबले उनके पास ही सक्षमे नौसेना थी.
ये सब ज्ञात है और मैं कुछ भी नया नहीं बता रहा हूँ. लेकिन यह अहम है कि इसके बावजूद अधिकांश भारतीय और यहां तक कि केंद्रीय कैबिनेट के मंत्री तक ऐसे बचकाने मिथकों पर विश्वास करते हैं.

Saturday, 24 October 2015

अब रामराज्य नहीं, चीन हमारा सपना @प्रीतीश नंदी

मैं अपनी बात एक फिल्म के नाम से शुरू करता हूं, जिसे अब तक की बेहतरीन फिल्मों में शामिल किया जाता है। ऋत्विक घटक की जुटकी, तार्को, गोप्पो। तर्क दें, बहस करें, अपनी बात कहें। मैं जिस दौर में बड़ा हुआ, उसकी खासियत यही भावना थी। स्कूल में वाद-विवाद प्रतियोगिताएं बहुत लोकप्रिय होती थीं। हमें एक-दूसरे के खिलाफ तर्क रखना और दलीलें देना सिखाया जाता था। अगर हम अच्छा प्रदर्शन करते तो हमें दूसरे स्कूलों में वहां वाद-विवाद की श्रेष्ठ प्रतिभाओं से मुकाबला करने भेजा जाता था। जब हम कॉलेज में पहुंचे तो वाद-विवाद की लोकप्रियता कई गुना बढ़ चुकी थी। अब मुद्‌दे भी बहुत जटिल और ज्यादा उत्तेजक हो गए थे। ध्यान रहे कि यह साठ का दशक था। दुनिया कई अद्‌भुत तरीकों से बदल रही थी और हम सबको लगता था कि हम उस बदलाव के हिस्से हैं और इस बदलाव में हमारी भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

तब राजनीति चुनाव जीतने का मामला भर नहीं था। इसका अर्थ था आपके विचार ऐसे हैं, जिनका लोग आदर करते हैं। और उन दिनों लोगों की राय आमतौर पर प्रतिरोधी होती थी। भारत को चीन द्वारा धोखा देने की बात हो या वियतनाम के खिलाफ अमेरिका का युद्ध हो या यूरोप में विद्यार्थियों की बगावत हो, जहां (पहली बार) हमने युवा शक्ति के सामने कुछ बहुत ही ताकतवर सरकारों को डगमगाते देखा। हवा में बदलाव को महसूस किया जा सकता था और हम मुद्‌दों की चीर-फाड़ और बहस करना बहुत पसंद करते थे। हर किसी के पास भिन्न दृष्टिकोण होता, फिर चाहे उस विषय पर हम सबमें सहमति होती। और हमारे बीच जो भी बहस होती उसमें नए विचार सामने आते। उन दिनों मुद्‌दों को लेकर कोई लड़ने या हाथापाई करने पर उतर नहीं पड़ता था। हम एक-दूसरे के खिलाफ जितने भी हथियारों का इस्तेमाल करते, उनमें सबसे तीखा होता था विट यानी हाजिरजवाबी और हमारा जुनून ही यकीन दिलाने का सबसे अच्छा माध्यम।

राजनीतिक भाषण भी विचारों के उसी स्रोत से निकलते। उन दिनों सभाओं में उतनी भीड़ शायद ही कभी होती थी, जितनी आज होती है, क्योंकि किसी को भी खरीदे हुए श्रोताओं को ट्रकों में भर-भरकर लाने की जरूरत नहीं महसूस होती थी। उम्मीदों से भरे हम युवा वे भाषण सुनने जाते, क्योंकि वे उस नए भारत से संबंधित होते, जिसका हम सपना देख रहे थे। आजादी तो जैसे हवा में बहता हुआ कोई गीत था। और उस दौर के सारे युवाओं की तरह हम उस स्वतंत्रता से संतुष्ट नहीं थे, जिसके लिए हमारे पूर्वज लड़े और जीते। हम इसके आगे बहुत कुछ पाने के लिए बेचैन थे। हमारे सपने भी अधिक सामाजिक न्याय, अधिक समानता से संबंधित थे। एक नए राष्ट्र का निर्माण हो रहा था और हम सबको लगता कि इसमें हमारी भी भूमिका है। इस नए राष्ट्र में जाति व समुदाय समान अवसरों के लिए रास्ता खुला करेंगे।

वे ऐसे दशक थे, जहां दुनिया विचारों पर झगड़ रही थी, जब युवा छात्र शक्तिशाली सरकारों को भी अपने अन्यायी युद्धों पर फिर गौर करने के लिए मजबूर कर सकते थे। जब कवि, रॉक स्टार और दार्शनिक नेताओं को जमीनी राजनीति के प्रलोभनों से दूर रहकर जवाबदारी के अधिक बोध, अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित कर पाते थे। एलन जिन्सबर्ग ने ‘हाउल!’ कविता लिखी थी, जो अमेरिकी युवा का गीत बन गया, जिसमें उन्होंने अमेरिका से कहा था कि वह अपना एटम बम लेकर भाड़ में जाए और किसी ने एक क्षण के लिए भी यह नहीं सोचा कि उनका यह कृत्य किसी मायने में देशभक्ति से जरा भी कम है। जॉन लेनन और योको ओनो अपना म्यूजिक कॅरिअर छोड़कर युद्ध विरोधी कार्यकर्ता बन गए। किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। वे रातोरात और भी बड़े सितारे बन गए।

वामपंथियों को नव-वामपंथी चुनौती दे रहे थे। दक्षिणपंथी खुद को इतनी अति पर पा रहे थे कि खुद उन्हें सही नहीं लगता था। पूरी राजनीति के केंद्र में असहमति और बहस होती थी। युवा छात्र हर राष्ट्र की आवाज हुआ करते थे। कोई भी उन्हें बेअदब या अप्रासंगिक नहीं कहता जैसा आज हम प्राय: कहते हैं। और कोई भी यह नहीं मानता था कि सरकार या इसकी एजेंसियां ही सारी बुद्धिमत्ता की तिजोरी हंै (यही कारण है कि जब लोग यह दलील देते हैं कि एफटीआईआई में सी-ग्रेड स्टार को चेयरमैन के रूप में इनकार करके छात्र मूर्खता कर रहे हैं। उनकी दलील इस मूर्खतापूर्ण विश्वास से निकली कि किसी भी संस्थान में सरकार ही एकमात्र दावेदार है, क्योंकि वही सारे बिल चुकाती है।)

आज असली बहस प्राय: उन लोगों द्वारा पटरी से उतार दी जाती है, जो अपने विरोधियों की देशभक्ति पर सवाल उठाने लगते हैं। किसी बहस व दलील को खत्म करने के लिए आक्रोश भड़काया जाता है, क्योंकि उसका बचाव या विरोध करने लायक बौद्धिक चतुराई तो किसी में है नहीं। इसलिए विचारक अब बहिष्कृत प्रजाति है। तर्कवादी आसान निशाना है। और जो लोग दूसरा दृष्टिकोण अपनाने की दलील देते हैं उन्हें चिल्लाकर चुप कर दिया जाता है, क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल के पास खुद का बचाव कर सकने लायक बौद्धिक क्षमता नहीं है। इसलिए विद्वान भी अब अछूत हो गए हैं। एक समय समाज के गौरव समझे जाने वाले थॉट लीडर चुपचाप आत्म-निर्वासन में चले गए। यही हाल कवि, शास्त्रीय गायक, दार्शनिक और लेखक का हुआ। वे अपने अवॉर्ड लौटाएं तो उनका स्वागत है। भविष्य में अवॉर्ड तो केवल उन्हें दिए जाएंगे, जो हां में हां मिलाएंगे। अब हमारे सामने सिर्फ सामाजिक दर्जे से वंचित अचानक धनी बने लोगों का समूह और ऐसा राष्ट्र है, जो किसी भी कीमत पर आगे बढ़ना चाहता है। अब न तो रामराज्य और न यूटोपिया (आदर्श राज्य) हमारा सपना है। अब चीन हमारा सपना है।

मेरी युवावस्था के हीरो में से एक पिछले दिनों गुजर गए। वे हिंदू धर्म के विशेषज्ञ थे, संस्कृत व वैदिक विद्वान, गांधीवादी, सुधारक और तार्किक चिंतन के धुरंधर। उन्होंने मराठी में पहले एनसाइक्लोपीडिया और धर्मकोश की रचना का नेतृत्व किया, जिसमें उन्होंने वैदिक ऋचाओं का संग्रह किया। किंतु इस सबसे ऊपर लक्ष्मणशास्त्री जोशी व्यावहारिक व्यक्ति थे, जिन्हें तर्क और बहस सबसे अधिक प्रिय थे। उन्होंने साठ के दशक की भावना को वर्तमान की खोई सांस्कृतिक पहचान की तड़प से जोड़ा। वे हमारे अंतिम तर्कतीर्थ थे। और फिर भी वे जुटकी, तार्को और गोप्पो के लिए हमेशा लालायित रहते थे।

Friday, 23 October 2015

'भारत में आरएसएस के 10 योगदान' @ज्ञानेंद्र नाथ बरतरिया

आर एस एसImage copyrightsunita zade
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 साल का हो चुका है. 1925 में दशहरे के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी.
सांप्रदायिक हिंदूवादी, फ़ासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ को कम से कम 7-8 दशक हो चुके हैं.
दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी. वह भी बिना किसी आधार के. संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है.
कोई शक नहीं कि आज भी कई लोग संघ को इसी नेहरूवादी दृष्टि से देखते हैं.
हालांकि ख़ुद नेहरू को जीते-जी अपना दृष्टि-दोष ठीक करने का एक दुखद अवसर तब मिल गया था, जब 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था. तब देश के बाहर पंचशील और लोकतंत्र वग़ैरह आदर्शों के मसीहा जवाहरलाल न ख़ुद को संभाल पा रहे थे, न देश की सीमाओं को.
लेकिन संघ अपना काम कर रहा था. संघ के कुछ उल्लेखनीय कार्य

1) कश्मीर सीमा पर निगरानी, विभाजन पीड़ितों को आश्रय

संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी. यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार. उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे. विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे.
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2) 1962 का युद्ध

सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा. स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी – सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता. जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा. परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए. निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया.”

3) कश्मीर का विलय

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कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार तो - हम क्या करें वाली मुद्रा में - मुंह बिचकाए बैठी थी. सरदार पटेल ने गुरु गोलवलकर से मदद मांगी.
गुरुजी श्रीनगर पहुंचे, महाराजा से मिले. इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया. क्या बाद में महाराजा हरिसिंह के प्रति देखी गई नेहरू की नफ़रत की एक जड़ यहां थी?

4) 1965 के युद्ध में क़ानून-व्यवस्था संभाली

पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था. शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके. घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे. युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था.

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5) गोवा का विलय

दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी. 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई. संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया. संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे. गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला. हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ.

6) आपातकाल

1975 से 1977 के बीच आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताज़ा है. सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना शुरु किया. आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं –नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने संभाला. जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं.
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7) भारतीय मज़दूर संघ

1955 में बना भारतीय मज़दूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मज़दूर आंदोलन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था. कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही शुरू किया था. आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन है.

8) ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा

जहां बड़ी संख्या में ज़मींदार थे उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं. संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने.
भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना. विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है. केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं. संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं.

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अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज़्यादा काम कर रहा है. लगभग 35 हज़ार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज़्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं. उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू बच्चे हैं.

9) सेवा कार्य

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1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक - संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है. भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में.

90 साल में भी युवा संघ @प्रो. राकेश सिन्हा

नब्बे वर्ष की आयु में स्वाभाविक वृद्धावस्था होती है। लेकिन यदि अपवाद स्वरूप इस आयु में स्वस्थ, चंचल, बलशाली, युवा हो तो विरोधाभास लगता है। संस्थाएं बनती हैं और बुढ़ी होकर इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। इसके अनगिनत उदाहरण हैं। इनमें पूर्व सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर भारत का साम्यवादी और समाजवादी आंदोलन शामिल है। स्वयं कांग्रेस पार्टी 100 वर्ष पूरा करते-करते पतझड़ का सामना करने लगी थी। इन साक्ष्यों के बीच एक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी है जिसने अपना चरित्र बदल लिया। मूल पिंड को छोड़कर वह परकाया में प्रवेश कर जीवित है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई। नब्बे साल में इसकी ऊर्जा और इसके सामने चुनौतियां दोनों ही इसकी युवावस्था को प्रतिबिम्बित करती हैं। इसकी भूमिका इतिहास बनती रही है परन्तु यह स्वयं वर्तमान का हिस्सा बना रहता है। आखिर ऐसी कौन सी संजीवनी है जो इसे ऊर्जावान और प्रगतिमान बनाए रखती है? इस प्रश्‍न का उत्तर न तो जटिल है न ही कठिन। यह भारतीय राष्ट्रवाद के साथ जुड़ा हुआ है। राष्ट्रवाद को परिभाषित और परिष्कृत करना ही इसका बुनियादी सिद्धांत है।

यूरोप की थोपी गई परिभाषा भारतीय राष्ट्रवाद को शक्तिहीन और अस्मिताविहीन बनाता है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इस सत्य को सिद्धांत बना दिया कि भारत एक सभ्यता का वाहक है। कल तक सभ्यता राष्ट्र की पालना थी आज राष्ट्र सभ्यता को अपने गर्भ में नवजात शिशु की तरह पोषित कर रही है। इसी सभ्यताई राष्ट्र को डॉ. हेडगेवार ने हिन्दू राष्ट्र कहा। जिनका विखंडित भारत और अहिन्दूकरण ही लक्ष्य है वे संघ और इसके सिद्धांत के सभ्यताई मिशन को साम्प्रदायिक करार देते रहे हैं। यह नई बात नहीं है। स्थापना के मात्र पांच वर्षों के बाद 1930 में साम्राज्यवादी सरकार ने इसमें ‘आतंकी खतरे’ का बीज देखना शुरू किया था और 1932-33 में इसे ‘साम्प्रदायिक’ व ‘फासीवादी’ कहकर इस पर प्रतिबंध लगाने का जोखिम उठाया था। कारण था संघ का महत्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भागीदारी। ब्रिटिश खुफिया दस्तावेज के अनुसार इस भागीदारी ने विदर्भ में मृत आंदोलन में जान फूंकने का काम किया था। लेकिन साम्राज्यवादी सरकार को तब मुंह की खानी पड़ी जब 1934 में मध्य प्रांत (तब महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का संयुक्त नाम था) विधान परिषद में गैर सरकारी पक्ष के जिन 14 सदस्यों ने सरकार के इस कदम पर बहस में हिस्सा लिया सबने इसका विरोध किया। संघ का प्रतिनिधि विधान परिषद में नहीं था परन्तु संघ के राष्ट्रवाद की छाया वहां थी। अंततः सरकार को अपने कदम खींचने पड़े।
1942 के आंदोलन के दौरान स्वयंसेवकों का दमन इस हद तक बढ़ गया कि उनके पत्रों को भी जब्त किया जाने लगा और उनके कारण उनके परिवार को प्रताडि़त किया जाने लगा। ऐसा सैंकड़ो उदाहरण हैं। मद्रास में रेलवे क्लर्क और संघ के मुख्य शिक्षक लक्ष्मीनारायण मूर्ति का पत्र जब्त किया गया और उनके परिवार पर कहर ढाया गया।
संघ की बढ़ती शक्ति के साथ ही इसके सामने राजनीतिक चुनौतियां भी आई। आजादी से पूर्व हिन्दू महासभा संघ शक्ति का उपयोग अपने राजनीतिक मिशन के लिए करना चाहती थी। परन्तु उसे निराशा हाथ लगी। इसका राष्ट्रवाद व्यक्ति से समूह तक की परिकल्पना है। अर्थात् नीचे से ऊपर की ओर न कि ऊपर से नीचे की ओर। अतः व्यक्ति अहम हो जाता है। व्यक्ति के चिंतन, सोच-समझ और दायरे में परिवर्तन का अभियान किसी एक पीढ़ी से शुरू होकर दूसरी पीढ़ी तक समाप्त नहीं होता है। भविष्य जिसका लक्ष्य हो पीढि़यों के साथ संवाद जिसकी उत्कंठा हो वह दीर्घायु तो होगा परन्तु वृद्धावस्था को प्राप्त नहीं करेगा। इस पूरी प्रक्रिया को डॉ. हेडगेवार ने ‘संगठन के लिए संगठन’ कहा।
स्वतंत्रता के पश्चात् विमर्श की प्रकृति में एक नया आयाम आया। यद्यपि संघ अपेक्षाकृत छोटा संगठन था परन्तु इसका वैचारिक प्रभाव इसकी तुलना में कई गुणा अधिक था। समय और संदर्भ के अनुसार इसकी भूमिका बदलती है परन्तु हिन्दू राष्ट्र का वैचारिक अधिष्ठान सरसंघचालक मोहन भागवत के अनुसार अपरिवर्तनीय बना रहता है। नये विमर्श ने संघ-विरोधवाद को जन्म दिया। संघ से मतान्तर रखने वाले राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ताकतें तीनों हैं जो इसे अपने प्रतिकूल पाती है। इन ताकतों ने धारणा की राजनीति शुरू की। इसका पहला कदम था संघ के साथ संवाद समाप्त करना। इसे वैचारिक अछूत बनाकर रखना। लेकिन संघ इससे विचलित नहीं हुआ। इसके तर्क की ताकत इसे प्रभावी बनाती गयी। सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों से उपजी ऊर्जा का प्रभाव भारत के राजनीतिक और वैचारिक जीवन दोनों में हुआ। संघ की प्रेरणा से राजनीतिक हस्तक्षेप 1950 से शुरू हुआ। देश का राजनीतिक व्याकरण सहज रूप में रहा है। साथ ही धर्मनिरपेक्षता पुनर्परिभाषित हो रही है। कल्पना कीजिए अगर संघ की स्थापना नहीं हुई होती तो समकालीन भारत का स्वरूप क्या होता? विमर्श कैसा होता? भारत की संस्कृति, सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को किस रूप में देखा जाता? हीन भावना ग्रंथी को मिटाकर ‘मैं कौन हूं’ को स्पष्टता से परिभाषित करने का काम संघ करता है।
सभ्यता के दौर में परिष्कार का कार्य कभी विराम नहीं लेता है न ही प्रदूषण का खतरा कभी कम होता है। समाज, संस्कृति और राजनीति तीनों को नए-नए प्रदूषण के कारकों एवं ताकतों से सामना करना पड़ता है। यह व्यक्तिवाद से लेकर अराजकतावाद, हिंसा से लेकर संस्कृति क्षरण, आर्थिक-सामाजिक असमानता से लेकर बाजारवाद के खतरे हैं। जो संस्था राष्ट्र से साक्षात्कार करती है वह प्रतिदिन नयेपन के साथ चीजों को देखती है और चुनौतियों से जुझती है। संघ का कार्य परिष्कार करना है जो कभी नहीं समाप्त होने वाला कार्य है। निराशावाद से यह कभी ग्रस्त नहीं हुआ। अबतक संघ सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों से रूबरू होता रहा। अब इसके सामने वे आर्थिक व राजनीतिक प्रश्न हैं जिससे देश की दीर्घकालिक चरित्र प्रभावित होता है। इसे दलित विमर्श से लेकर नवउदारवाद के प्रश्नों को समाधानात्मक रूप से देखना है। संवाद और संघर्ष इसका माध्यम है। इस नये संदर्भ में संघ का नया रूप आता है। इसलिए यह सतत् अजीवन बना रहता है। जब इसके संस्थापक डॉ. हेडगेवार की मृत्यु हुई तब यह भय उत्पन्न हुआ कि संघ बिखर जाएगा, इसकी गति धीमी हो जाएगी। परन्तु ऐसे लोगों को निराशा हाथ लगी। समाचारपत्र ‘मराठा’ ने 23 अगस्त जुलाई, 1940 को मुख्य पृष्ठ पर शीर्षक दिया “हेडगेवार का संघ अब भी मजबूत होता जा रहा है।” 2015 में हम यह कह सकते हैं कि डॉ. मोहन भागवत का संघ प्रबल होता जा रहा है।

Friday, 16 October 2015

नेताजी की मृत्यु अब रहस्य नहीं! @कृपा शंकर चौबे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिजनों के साथ बैठक के बाद नेताजी से जुड़ी गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने की जो घोषणा की है, वह बेहद तात्पर्यपूर्ण है. जो काम पंडित नेहरू और उनके बाद की सरकारें नहीं कर पायीं, उसे मोदी सरकार करने जा रही है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस 70 वर्ष से मृत्यु रहस्य के नायक बने हुए हैं. मानव सभ्यता के इतिहास में नेताजी पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने जन्म लिया किंतु मरे नहीं.
 
असाधारण जीवन की तरह असाधारण मृत्यु ने नेताजी के इर्द-गिर्द रहस्यों का जाल-सा बुन दिया है. नेताजी के नायकत्व के सम्मान की जगह जड़ प्रतिमाओं के देवत्व ने ले ली है. जांच आयोगों की भूलभुलैया में गोया नेताजी किसी जासूसी कथा के चरित्र बना कर रख दिये गये हैं. 
 
18 अगस्त, 1945 को ताईहोकू में विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई थी या नहीं, इसे लेकर लंबे समय से विवाद है. तीन-तीन जांच आयोग भी इस रहस्य को नहीं सुलझा सके. 1954 में बने शाहनवाज जांच आयोग और 1970 में बने खोसला जांच आयोग ने अपने-अपने निष्कर्ष में कहा था कि उक्त विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हुई थी, लेकिन 1999 में बने मुखर्जी जांच आयोग ने इन निष्कर्षों को मानने से इनकार कर दिया. मुखर्जी आयोग ने 2006 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपते हुए यह आरोप भी लगाया था कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों ने बार-बार मांगे जाने के बावजूद कई दस्तावेज उसे नहीं मुहैया कराये. 
 
अब तक दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं किये जाने का आशय स्पष्ट था कि सरकार नेताजी की मृत्यु के सच से पर्दा नहीं उठाना चाहती थी. आखिर सरकार नेताजी के जीवन एवं उनके गायब होने से जुड़े दस्तावेजों को क्यों दबाये रखना चाहती थी? सभी दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं किये जाने और जांच आयोगों से सहयोग नहीं किये जाने के कारण ही नेताजी की मृत्यु का रहस्य आज भी कायम है.
पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी से जुड़ी 64 फाइलों को पिछले माह सार्वजनिक कर केंद्र सरकार पर यह दबाव बढ़ा दिया था कि वह अपने अधीन नेताजी के संबंधित 130 फाइलों को सार्वजनिक करे. बंगाल में सार्वजनिक हुई फाइलों से इसका खुलासा होता है कि आजादी के बाद भी नेताजी के परिजनों की जासूसी होती रही. यह सवाल पहले भी बार-बार उठता रहा है कि कांग्रेस सरकार ने नेताजी के परिवार वालों की जासूसी करवायी है. केंद्र सरकार की फाइलों के सार्वजनिक होने से ही इसका भी पता चलेगा कि नेताजी के परिजनों व रिश्तेदारों की जासूसी के पीछे ब्रिटिश सरकार और नेहरू के बीच क्या संधि हुई थी?
 
देश चाहता है कि नेताजी अब और अधिक दिनों तक मृत्यु रहस्य के नायक न रहें. खुलासा होना चाहिए कि नेताजी की मौत कैसे हुई थी. परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर कहा जाता रहा है कि नेताजी 18 अगस्त, 1945 को हुई कथित विमान दुर्घटना के बाद भी जीवित थे और वे इस दौरान रूस में कैद थे. राष्ट्रीय अभिलेखागार के दस्तावेज में बताया गया है कि नेताजी की मौत 18 अगस्त, 1945 को ताईवान में हुई, लेकिन ताईवान के सरकारी रिकाॅर्ड में 18 अगस्त, 1945 को किसी विमान हादसे की घटना का उल्लेख ही नहीं है.
 
मोदी सरकार ने नेताजी से जुड़ी गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया 23 जनवरी, 2016 से प्रारंभ किये जाने की घोषणा की है. यही क्या, विदेशों में भी मौजूद नेताजी से जुड़ी फाइलों को भी सार्वजनिक किये जाने के लिए भारत सरकार ने प्रयास करने का ऐलान किया है. उम्मीद है कि यह प्रक्रिया संपन्न होने के बाद नेताजी के जीवन का अंतिम सच सामने आ सकेगा और इस तथ्य से भी पर्दा हट सकेगा कि नेताजी को दान की गयी विपुल संपत्ति का क्या हुआ. 
 
नेताजी की अपील पर प्रवासी भारतीयों ने आजाद हिंद फौज को खुल कर दान किया था. आजाद हिंद फौज को दान में मिले करोड़ों रुपये की संपत्ति को किसने हड़प लिया? 1947 से लेकर 1955 के बीच पंडित नेहरू को चार कूटनीतिज्ञों ने नेताजी की संपत्ति के बारे में बताया, किंतु नेहरू मौन रहे. क्या आजाद हिंद फौज की संपत्ति को बैंक में किसी प्रभावशाली कांग्रेस नेता ने अपने नाम से जमा कराया था? 
 
विदेशों से आइएनए (इंडियन नेशनल आर्मी) की संपत्ति यह कह कर भारत लायी गयी कि एक ट्रस्ट बनाया जायेगा, किंतु किया गया ठीक उसके उलटा. उसे निजी एकाउंट में जमा कर दिया गया. इंडियन ओवरसीज बैंक में डेढ़ लाख पाउंड मूल्य का सोना जमा कराये जाने की बात कही जाती है. इस धन के रहस्य के साथ नेताजी की मृत्यु के रहस्य में क्या रिश्ता रहा है, इसे भी सुलझाने में केंद्र के पास मौजूद गोपनीय फाइलें मददगार हो सकती हैं

Thursday, 15 October 2015

सुल्ताना डाकू

सुल्ताना डाकू बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी| उसे पकडने के लिए सेना के 300 जवान लगे…लंदन से एक खास अधिकारी फ्रायड यंग बुलाए गए| जिम कार्बेट भी इस काम में लगे थे| सुल्ताना को पकड़ लिया गया औऱ फांसी दे दी गयी..लेकिन वो आज भी किस्सों कहानियों में है…उस पर बन नौटकी शायद सबसे लोकप्रिय रही|यह सुल्ताना की दुर्लभ तस्वीर है जिसमें उसे बेड़ियों से जकड़ा हुआ है| आज भी सुल्ताना लोकजीवन में जीवित है| अगर जिम कार्बेट के नाम पर राष्ट्रीय अभयारण्य है तो नजीबाबाद के नवाब के बनाए किले को सुल्ताना का किला कहा जाता है|

Wednesday, 14 October 2015

गो हत्या पर प्रतिबंध के खिलाफ थे नेहरू!

देश के तमाम बड़े राज्यों में जब गो हत्या पर प्रतिबंध लगा, तो उस वक्त वहां कांग्रेस की सरकारें थीं. मसलन असम और पश्चिम बंगाल में 1950 में, तत्कालीन बंबई प्रांत में 1954 में, तो उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार में 1955 में गो हत्या प्रतिबंध संबंधी कानून बनाये गये, उस वक्त वहां कांग्रेस की सरकारें थीं. इसी तरह तमिलनाडु में 1958 में, मध्यप्रदेश में 1959 में, ओडीशा में 1960 में तो कर्नाटक में 1964 में संबंधित कानूनों को लागू किया गया. उस वक्त भी उन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं.

सिर्फ राजस्थान और दिल्ली जैसे कुछ राज्यों में बीजेपी की तरफ से गो हत्या प्रतिबंध को लेकर कड़े कानून बनाने की नौबत कई दशक बाद आई, जब पार्टी का राजनीतिक आधार बढ़ा. मसलन राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत के मुख्यमंत्री रहते हुए 1995 में इसे लेकर कानून बना, तो दिल्ली में 1994 में मदनलाल खुराना के मुख्यमंत्री रहते हुए कानून बना.

गो संवर्धन या गो हत्या पर प्रतिबंध के मामले में आजादी के बाद जिस तरह से राज्यों में तेजी से कानून बने, उसके मुकाबले केंद्रीय कानून इसलिए नहीं बनाये गये, क्योंकि संविधान के अंदर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अधिकारों का जो वितरण है, उसमें गौ संवर्धन या फिर गो हत्या पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून बनाने की जिम्मेदारी मूल तौर पर राज्यों की है. हालांकि संविधान के निर्माता गो रक्षा को लेकर कितने संवेदनशील थे, इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि राज्य के नीति-निर्देशक तत्व, जिसकी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 48 में है, उसमें गो हत्या पर प्रतिबंध की बात की गई है.

सवाल ये उठता है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू खुद गो हत्या पर प्रतिबंध के बारे में क्या सोचते थे. ये जानना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के ज्यादातर बड़े राज्यों में उनके प्रधानमंत्री रहते हुए ही गो हत्या पर प्रतिबंध संबंधी कानून बनाये गये थे.

वर्ष 1947 से लेकर अपनी मौत यानी 1964 तक देश की कमान बतौर प्रधानमंत्री संभालने वाले नेहरू निजी तौर पर गो हत्या प्रतिबंध संबंधी कानूनों के खिलाफ थे. इसका अंदाजा खुद नेहरू के भाषणों और पत्रों से लग जाता है. नेहरू को लेकर सबसे मशहूर और प्रमाणिक पुस्तक ही नहीं, बल्कि आधिकारिक तौर पर उनकी जीवनी लिखने वाले सर्वेपल्ली गोपाल अपनी पुस्तक ‘जवाहरलाल नेहरू-एक जीवनी’ (पृष्ठ 220, भारतीय ज्ञानपीठ) में बताते हैं कि नेहरू की इच्छा नहीं थी कि गो-हत्या पर प्रतिबंध का उल्लेख राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में हो. दरअसल नेहरू गो हत्या पर प्रतिबंध को हिंदू पुनरुत्थानवाद का प्रतीक मानते थे.

नेहरू की इस मुद्दे पर सोच क्या थी, इसका एक अंदाजा 2 अप्रैल, 1955 को लोकसभा में दिये गये उनके भाषण से भी लग जाता है. नेहरू ने कहा था – “मैं प्रारंभ में ही साफ कर देना चाहूंगा कि मैं गो-वध बंदी विधेयक के सर्वथा विरुद्ध हूं और इस सदन से कहना चाहता हूं कि इस विधेयक को बिल्कुल रद्द कर दें. --- राज्य सरकारों से मेरा अनुरोध है कि ऐसे विधेयक (हिन्दू महासभा के अध्यक्ष, संसद सदस्य निर्मलचंद्र चटर्जी द्वारा प्रस्तुत विधेयक) पर न तो विचार करें, न कोई कार्यवाही.”

जैसा गोपाल ने इशारा किया है, नेहरू के लिए गो हत्या पर प्रतिबंध लगाने का मामला कुछ वैसा ही था, जैसा देश में राष्ट्रभाषा के तौर पर हिंदी को लागू करना या फिर आजादी के बाद सोमनाथ के मंदिर का निर्माण. इन सभी मुद्दों को नेहरू हिंदू पुनरुत्थान का प्रतीक मानते थे, जिससे जुड़ना उन्हें मंजूर नहीं था.

सवाल ये उठता है कि इस मामले में इतने कड़े विचार रखने के बावजूद नेहरू कांग्रेस की राज्य सरकारों की तरफ से ही बनाये गये गो हत्या प्रतिबंध वाले कानूनों को रोक क्यों नहीं पाए. ये मसला वैसा ही था, जैसा देश के राष्ट्रपति के तौर पर राजेंद्र प्रसाद का चुनाव, सोमनाथ मंदिर का नये सिरे से निर्माण या फिर हिंदी को राजभाषा के तौर पर संवैधानिक स्वीकृति दिलाने की कोशिश. देश को आजादी मिलने के शुरुआती वर्षों में कांग्रेस पर नेहरू का ऐसा प्रभुत्व नहीं था कि वो अपनी मनमानी कर सकते थे. यही वजह थी कि उनकी इच्छा के विरुद्ध जहां राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने, वही सोमनाथ मंदिर का नये सिरे से निर्माण भी हुआ.

यही बात राज्यों में बने गो हत्या प्रतिबंध संबंधी कानूनों पर लागू होती है. जिस वक्त ये कानून बने, उस समय उत्तर प्रदेश में जहां गोविंद वल्लभ पंत मुख्यमंत्री थे, तो पश्चिम बंगाल में विधानचंद्र राय और बिहार में श्रीकृष्ण सिन्हा. तत्कालीन बंबई प्रांत के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई हुआ करते थे, तो मध्यप्रदेश में कैलाशनाथ काटजू, कर्नाटक में एस निजलिंगप्पा, ओडीशा में हरेकृष्ण मेहताब और तमिलनाडु में के कामराज. ये सभी कांग्रेसी नेता ऐसे थे, जो नेहरू की इच्छा के खिलाफ जाकर काम करने का साहस कर सकते थे, उनके मुंह पर जवाब दे सकते थे. विधानचंद्र राय की वरिष्ठता और ताकत तो इस कदर थी कि वो नेहरू को जवाहर के तौर पर संबोधित करते थे. यही वजह थी कि नेहरू के न चाहते हुए भी देश के तमाम बड़े राज्यों में गो हत्या पर प्रतिबंध जैसे कानून बने. उसके बाद इंदिरा गांधी के दौर में जब स्थानीय क्षत्रप कमजोर पड़े, तब जाकर प्रधानमंत्री के आगे हाथ बांधकर कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के लाइन लगाने का सिलसिला शुरु हुआ. अगर नेहरू को भी ऐसी परिस्थिति हासिल हुई होती, तो शायद देश के ज्यादातर राज्यों में गो हत्या पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून नहीं बने होते, वो भी कांग्रेस की सरकारों के रहते.