Friday, 23 June 2017

संजय गांधी के लिए नसबंदी अभियान इतना अहम क्यों बन गया था?

आपातकाल के दौरान संजय गांधी के सिर पर नसबंदी का ऐसा जुनून क्यों सवार हो गया था कि वे इस मामले में हिटलर से भी 15 गुना आगे निकल गए?

‘सबको सूचित कर दीजिए कि अगर महीने के लक्ष्य पूरे नहीं हुए तो न सिर्फ वेतन रुक जाएगा बल्कि निलंबन और कड़ा जुर्माना भी होगा. सारी प्रशासनिक मशीनरी को इस काम में लगा दें और प्रगति की रिपोर्ट रोज वायरलैस से मुझे और मुख्यमंत्री के सचिव को भेजें.’
यह टेलीग्राफ से भेजा गया एक संदेश है. इसे आपातकाल के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने अपने मातहतों को भेजा था. जिस लक्ष्य की बात की गई है वह नसबंदी का है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि नौकरशाही में इसे लेकर किस कदर खौफ रहा होगा.
आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने जोर-शोर से नसबंदी अभियान चलाया था. इस पर जोर इतना ज्यादा था कि कई जगह पुलिस द्वारा गांवों को घेरने और फिर पुरुषों को जबरन खींचकर उनकी नसबंदी करने की भी खबरें आईं. जानकारों के मुताबिक संजय गांधी के इस अभियान में करीब 62 लाख लोगों की नसबंदी हुई थी. बताया जाता है कि इस दौरान गलत ऑपरेशनों से करीब दो हजार लोगों की मौत भी हुई.
नसबंदी के पीछे हिटलर की सोच यह थी कि आनुवंशिक बीमारियां अगली पीढ़ी में नहीं जाएंगी तो जर्मनी इंसान की सबसे बेहतर नस्ल वाला देश बन जाएगा
1933 में जर्मनी में भी ऐसा ही एक अभियान चलाया गया था. इसके लिए एक कानून बनाया गया था जिसके तहत किसी भी आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की नसबंदी का प्रावधान था. तब तक जर्मनी नाजी पार्टी के नियंत्रण में आ गया था. इस कानून के पीछे हिटलर की सोच यह थी कि आनुवंशिक बीमारियां अगली पीढ़ी में नहीं जाएंगी तो जर्मनी इंसान की सबसे बेहतर नस्ल वाला देश बन जाएगा जो बीमारियों से मुक्त होगी. बताते हैं कि इस अभियान में करीब चार लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई थी.
लेकिन संजय गांधी के सिर पर नसबंदी का ऐसा जुनून क्यों सवार हो गया था कि वे इस मामले में हिटलर से भी 15 गुना आगे निकल गए? ऐसा कई चीजों के समय के एक मोड़ पर मिलने से मुमकिन हुआ था. इनमें पहली थी संजय की कम से कम समय में खुद को प्रभावी नेता के तौर पर साबित करने की महत्वाकांक्षा. दूसरी, परिवार नियोजन को और असरदार बनाने के लिए भारत पर अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से पड़ता दबाव. तीसरी, जनसंख्या नियंत्रण के दूसरे तरीकों की बड़ी विफलता और चौथी आपातकाल के दौरान मिली निरंकुश शक्ति.
25 जून 1975 को आपातकाल लगने के बाद ही राजनीति में आए संजय गांधी के बारे में यह साफ हो गया था कि आगे गांधी-नेहरू परिवार की विरासत वही संभालेंगे. संजय भी एक ऐसे मुद्दे की तलाश में थे जो उन्हें कम से कम समय में एक सक्षम और प्रभावशाली नेता के तौर पर स्थापित कर दे. उस समय वृक्षारोपण, दहेज उन्मूलन और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जोर था, लेकिन संजय को लगता था कि उन्हें किसी त्वरित करिश्मे की बुनियाद नहीं बनाया जा सकता.
राजनीति में नए-नए आए संजय गांधी एक ऐसे मुद्दे की तलाश में थे जो उन्हें कम से कम समय में एक सक्षम और प्रभावशाली नेता के तौर पर स्थापित कर दे
संयोग से यही वह दौर भी था जब दुनिया में भारत की आबादी का जिक्र उसके अभिशाप की तरह होता था. अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश मानते थे कि हरित क्रांति से अनाज का उत्पादन कितना भी बढ़ जाए, सुरसा की तरह मुंह फैलाती आबादी के लिए वह नाकाफी ही होगा. उनका यह भी मानना था कि भारत को अनाज के रूप में मदद भेजना समंदर में रेत फेंकने जैसा है जिसका कोई फायदा नहीं. ऐसा सिर्फ अनाज ही नहीं, बाकी संसाधनों के बारे में भी माना जाता था.
अपनी किताब द संजय स्टोरी में पत्रकार विनोद मेहता लिखते हैं, ‘अगर संजय आबादी की इस रफ्तार पर जरा भी लगाम लगाने में सफल हो जाते तो यह एक असाधारण उपलब्धि होती. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा होती.’ यही वजह है कि आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से लागू करवाना संजय गांधी का अहम लक्ष्य बन गया. इस दौरान उन्होंने देश को दुरुस्त करने के अपने अभियान के तहत सौंदर्यीकरण सहित कई और काम भी किए, लेकिन अपनी राजनीति का सबसे बड़ा दांव उन्होंने इसी मुद्दे पर खेला. उन्हें उम्मीद थी कि जहां दूसरे नाकामयाब हो गए हैं वहां वे बाजी मार ले जाएंगे.
25 जून 1975 से पहले भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर इस बात का दबाव बढ़ने लगा था कि भारत नसबंदी कार्यक्रम को लेकर तेजी दिखाए. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और एड इंडिया कसॉर्टियम जैसे संस्थानों के जरिये अपनी बात रखने वाले विकसित देश यह संदेश दे रहे थे कि भारत इस मोर्चे पर 1947 से काफी कीमती समय बर्बाद कर चुका है और इसलिए उसे बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने के लिए यह कार्यक्रम युद्धस्तर पर शुरू करना चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत में काफी समय से जनसंख्या नियंत्रण की कई कवायदें चल भी रही थीं. गर्भनिरोधक गोलियों सहित कई तरीके अपनाए जा रहे थे, लेकिन इनसे कोई खास सफलता नहीं मिलती दिख रही थी.
अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत में काफी समय से जनसंख्या नियंत्रण की कई कवायदें चल भी रही थीं, लेकिन उनसे कोई खास सफलता मिलती नहीं दिख रही थी
आपातकाल शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों का गुट और भी जोरशोर से नसबंदी कार्यक्रम लागू करने की वकालत करने लगा. इंदिरा गांधी ने यह बात मान ली. जानकारों के मुताबिक यह उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि वे खुद कुछ ऐसा करना चाह रही थीं जिससे लोगों का ध्यान उस अदालती मामले से भटकाया जा सके जो उनकी किरकिरी और नतीजतन आपातकाल की वजह बना. उन्होंने संजय गांधी को नसबंदी कार्यक्रम लागू करने की जिम्मेदारी सौंप दी जो मानो इसका इंतजार ही कर रहे थे.
इसके बाद कुछ महीनों तक इतने बड़े कार्यक्रम के लिए कामचलाऊ व्यवस्था खड़ी करने का काम हुआ. संजय गांधी ने फैसला किया कि यह काम देश की राजधानी दिल्ली से शुरू होना चाहिए और वह भी पुरानी दिल्ली से जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है. उन दिनों भी नसबंदी को लेकर कई तरह की भ्रांतियां थीं. मुस्लिम समुदाय के बीच तो यह भी धारणा थी कि यह उसकी आबादी घटाने की साजिश है. संजय गांधी का मानना था कि अगर वे इस समुदाय के बीच नसबंदी कार्यक्रम को सफल बना पाए तो देश भर में एक कड़ा संदेश जाएगा. यही वजह है कि उन्होंने आपातकाल के दौरान मिली निरंकुश ताकत का इस्तेमाल करते हुए यह अभियान शुरू कर दिया. अधिकारियों को महीने के हिसाब से टारगेट दिए गए और उनकी रोज समीक्षा होने लगी.
होना यह चाहिए था कि इतना बड़ा अभियान छेड़े जाने से पहले लोगों में इसको लेकर जागरूकता फैलाई जाती. जानकार मानते हैं कि इसे युद्धस्तर की बजाय धीरे-धीरे और जागरूकता के साथ आगे बढ़ाया जाता तो देश के लिए इसके परिणाम क्रांतिकारी हो सकते थे. लेकिन जल्द से जल्द नतीजे चाहने वाले संजय गांधी की अगुवाई में यह अभियान ऐसे चला कि देश भर में लोग कांग्रेस से और भी ज्यादा नाराज हो गए. माना जाता है कि संजय गांधी के नसबंदी कार्यक्रम से उपजी नाराजगी की 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर करने में सबसे अहम भूमिका रही.

संजय गांधी के इंदिरा गांधी को थप्पड़ मारने के पीछे की कहानी

इस थप्पड़ की खबर देने वाले पत्रकार लुईस एम सिमंस इसके पीछे की कहानी और इस पर इंदिरा और राजीव गांधी की प्रतिक्रिया के बारे में बता रहे हैं

जब आपातकाल की घोषणा हुई तो पुलित्जर पुरस्कार विजेता पत्रकार लुईस एम सिमंस द वाशिंगटन पोस्ट के संवाददाता के रूप में दिल्ली मे तैनात थे. उन्हीं दिनों अमेरिका के इस प्रतिष्ठित अखबार में सिमंस की यह खबर छपी कि एक डिनर पार्टी के दौरान संजय गांधी ने अपनी मां और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कई थप्पड़ मारे. स्क्रोलडॉटइन को ईमेल पर दिए एक साक्षात्कार में सिमंस याद करते हैं कि उन्हें यह खबर कैसे मिली और जब आपातकाल हटने के बाद वे सोनिया, राजीव और इंदिरा गांधी से मिले तो इसपर उनकी प्रतिक्रिया क्या थी. इस साक्षात्कार के संपादित अंश :
द वाशिंगटन पोस्ट में आपकी एक खबर छपी थी जिसमें एक सूत्र ने दावा किया था कि एक डिनर पार्टी के दौरान संजय गांधी ने अपनी मां इंदिरा गांधी को छह बार थप्पड़ मारे. यह घटना आपातकाल का ऐलान होने के कितने दिन बाद हुई थी और संजय ने ऐसा क्यों किया था? 
थप्पड़ वाली घटना आपातकाल लगने से पहले एक निजी डिनर पार्टी में हुई थी. मैंने तुरंत इसके बारे में नहीं लिखा जैसा कि अमूमन पत्रकार किया करते हैं. मैंने इस खबर को बाद के लिए बचा लिया. अब तो मुझे याद भी नहीं कि क्या मेरे पास ऐसी कोई जानकारी थी कि संजय ने ऐसा क्यों किया.
इस बात को 40 साल हो गए हैं. क्या जिन लोगों से आपको यह जानकारी मिली उन्होंने इस घटना के बारे में बताने के लिए ही आपसे संपर्क किया था या फिर किसी सामान्य बातचीत के दौरान इस घटना का जिक्र हुआ?
दूसरी वाली बात सही है. दरअसल मेरे दो सूत्र थे. ये दो लोग थे जो एक दूसरे को जानते थे और जो इस पार्टी में मौजूद थे. इनमें से एक सज्जन आपातकाल से एक दिन पहले मेरे घर पर थे और उन्होंने मुझसे और मेरी पत्नी से हुई बातचीत में यह किस्सा सुनाया. दूसरे सूत्र ने इसकी पुष्टि की. बात संजय और उनकी मां के रिश्ते पर हो रही थी और उसी दौरान यह बात भी निकल आई.
वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर ने अपनी एक हालिया किताब द इमरजेंसी : अ पर्सनल हिस्ट्री में लिखा है कि यह खबर जंगल में आग की तरह फैली थी. सेंसरशिप की वजह से किसी भारतीय अखबार ने इस खबर पर कुछ नहीं लिखा था. इसे देखते हुए खबर के इस कदर असर से क्या आपको हैरानी हुई थी?
मुझे हैरानी नहीं हुई थी क्योंकि मैं जानता हूं कि भारतीयों को चटखारे लेना खूब पसंद है. इस खबर को दूसरे विदेशी मीडिया समूहों ने भी खूब चलाया. न्यूयॉर्कर मैगजीन ने इस पर प्रतिष्ठित पत्रकार वेद मेहता का एक लेख भी छापा था.
कपूर का कहना है कि इस खबर की सच्चाई पर संदेह है. शायद इसकी वजह यह हो कि सूत्रों का नाम जाहिर नहीं किया गया था और किसी ने सार्वजनिक रूप से इस खबर की पुष्टि नहीं की. क्या आपके हिसाब से ये सूत्र विश्वसनीय थे? क्या उस डिनर पार्टी में मौजूद किसी और शख्स ने भी इस खबर की आपसे पुष्टि की? क्या आपको कभी यह खबर लिखने का अफसोस हुआ?
सूत्रों की विश्वसनीयता बेदाग थी और है. मैंने किसी और मेहमान का साक्षात्कार नहीं लिया. और जहां तक अफसोस की बात है तो इस खबर को लिखने का मुझे कोई अफसोस न था और न है. मुझे लगता है कि इसने एक ऐसे वक्त में मां और बेटे के बीच के अजीब रिश्ते पर रोशनी डाली जब यह रिश्ता भारत के लोगों पर एक बड़ा असर डाल रहा था.
क्या आप आपातकाल हटने और 1977 में इंदिरा गांधी के सत्ता से बाहर होने के बाद भी अपने सूत्रों से मिले. अगर हां तो उनसे हुई बातचीत कैसी थी? 
मैं उनसे आपातकाल के पहले, इसके दौरान और बाद में बहुत बार उनसे मिला.
क्या ये सूत्र अब भी हैं? 
हां.
आपको थप्पड़ वाली इस घटना की खबर लिखने के चलते देश छोड़ने को कहा गया था. क्या आपको अंदेशा था कि ऐसा होगा? 
मुझे देश छोड़ने के लिए कहा नहीं गया था बल्कि आदेश दिया गया था. मुझे पांच घंटे का नोटिस मिला था. और इसकी वजह थप्पड़ वाली खबर नहीं थी क्योंकि तब तक मैंने इसे लिखा ही नहीं था. इसकी वजह एक दूसरी खबर थी जिसमें भारतीय सेना के कई अधिकारियों ने मुझे बताया था कि कैसे उन्हें आपातकाल लगाने का फैसला और इस तक पहुंचने के दौरान इंदिरा गांधी का व्यवहार ठीक नहीं लगा था. मुझे बिना नोटिस के गिरफ्तार कर लिया गया था. बंदूकें लिए पुलिस मेरे घर आई थी और मुझे इमिग्रेशन दफ्तर ले जाया गया था.
वहां एक अधिकारी था जिससे मैं बीते कई साल के दौरान मिलता रहा था. इस अधिकारी ने मुझे बताया कि दिल्ली से निकलने वाली पहली फ्लाइट से मुझे रवाना कर दिया जाएगा. जब मैंने उससे वजह पूछी तो उसने पहले दोनों हाथ अपनी आंखों पर रखे, फिर कानों पर और आखिर में मुंह पर. पांच घंटे बाद मुझे अमेरिका दूतावास का एक अधिकारी एयरपोर्ट ले गया. वहां एक कस्टम अधिकारी ने करीब दर्जन भर नोटबुक्स जब्त कर लीं. इन्हें कई महीने बाद लौटाया गया. इनमें जहां-जहां भी किसी का नाम लिखा हुआ था उसके नीचे एक लाल लकीर खींच दी गई थी. बाद में मुझे पता चला कि इनमें से कई लोगों को जेल भेज दिया गया था. इस अनुभव से मुझे सबक मिला कि जब आप कोई संवेदनशील खबर कर रहे हो तो नाम कभी मत लिखो. मुझे बैंकाक जाने वाली एक फ्लाइट में बिठा दिया गया. वहीं होटल के एक कमरे में मैंने थप्पड़ वाली घटना के बारे में लिखा.
क्या आप श्रीमती गांधी या संजय गांधी या फिर गांधी परिवार के किसी और सदस्य से कभी मिले? उन्हें मिलकर आपको क्या लगा? 
आपातकाल के बाद मैं श्रीमती गांधी से मिला था जब वे सत्ता से बाहर हो गई थीं. मोरारजी देसाई सरकार ने मुझे वापस बुलाया था. मेरे कुछ समय बाद एक ब्रिटिश पत्रकार को भी भारत से निकाल दिया गया था. जब मैंने श्रीमती गांधी का साक्षात्कार लिया तो यह पत्रकार भी वहां मौजूद था. हमने उनसे पूछा कि उन्होंने हमें निष्कासित क्यों करवाया था. उन्होंने जवाब दिया कि इसमें उनका कोई हाथ नहीं था. मैंने उनसे थप्पड़ वाली घटना के बारे में नहीं पूछा. मुझे लगता है कि मैं हिम्मत नहीं कर पाया. आपातकाल के बाद मैं एक निजी डिनर पार्टी में गया था. वहां राजीव गांधी और उनकी पत्नी सोनिया भी आए हुए थे. एक दर्जन मेहमान और थे. इस दौरान किसी टेबल पर मौजूद शख्स ने सबके बीच ऐलान किया कि मैं ही वह पत्रकार हूं जिसने वह थप्पड़ वाली खबर लिखी थी. राजीव ने अपना सिर हिलाया और मुस्करा दिए. सामने बैठे राजीव से मैंने पूछा, ठीक है? उन्होंने सिर हिलाया और फिर मुस्कराए. उन्होंने कहा कुछ नहीं. सोनिया गुस्से में लग रही थीं. उन्होंने भी कुछ नहीं कहा. संजय गांधी से मेरी मुलाकात कभी नहीं हुई.

फ़िरोज गांधी को आप भूल तो नहीं गए हैं? @रेहान फ़ज़ल

आज अगर लोगों के सामने फ़िरोज़ गांधी का ज़िक्र किया जाए तो ज़्यादातर लोगों के मुंह से यही निकलेगा- 'फ़िरोज़ गाँधी कौन?'
बहुत कम लोग फ़िर इस बात को याद कर पाएंगे कि फ़िरोज़ गांधी न सिर्फ़ जवाहरलाल नेहरू के दामाद, इंदिरा गांधी के पति और राजीव और संजय गाँधी के पिता थे.
फ़िरोज़ - द फ़ॉरगॉटेन गाँधी के लेखक बर्टिल फ़ाल्क, जो इस समय दक्षिणी स्वीडन के एक गाँव में रह रहे हैं, बताते हैं, "जब मैंने 1977 में इंदिरा गांधी का इंटरव्यू किया तो मैंने देखा उनके दो पुत्र और एक पौत्र और पौत्री थे. मैंने अपने आप से पूछा, 'इनका पति और इनके बच्चों का बाप कहाँ हैं?"
जब मैंने लोगों से ये सवाल किया, तो उन्होंने मुझे बताया कि उनका नाम फ़िरोज़ था, और उनकी कोई ख़ास भूमिका नहीं थी. लेकिन जब मैंने और खोज की जो मुझे पता चला कि वो न सिर्फ़ भारतीय संसद के एक अहम सदस्य थे, बल्कि उन्होंने भ्रष्टाचार को जड़ से ख़त्म करने का बीड़ा उठाया था.

मेरे विचार से उनको बहुत अनुचित तरीके से इतिहास के हाशिए में ढ़केल दिया गया था. इस जीवनी के लिखने का एक कारण और था कि कोई दूसरा ऐसा नहीं कर रहा था.

दुनिया में ऐसा कौन सा शख़्स होगा जिसका ससुर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पहला प्रधानमंत्री हो और बाद में उसकी पत्नी और उसका पुत्र भी इस देश का प्रधानमंत्री बना हो.
नेहरू परिवार पर नज़दीकी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई बताते हैं, "इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले 1960 में फ़िरोज का निधन हो गया और वो एक तरह से गुमनामी में चले गए. लोकतंत्र में ऐसे बहुत कम शख़्स होंगे जो खुद एक सांसद हों, जिनके ससुर देश के प्रधानमंत्री बने, जिनकी पत्नी देश की प्रधानमत्री बनीं और उनका बेटा भी प्रधानमंत्री बना."
"इसके अलावा उनके परिवार से जुड़ी हुई मेनका गाँधी केंद्रीय मंत्री हैं, वरुण गाँधी सांसद हैं और राहुल गाँधी कांग्रेस के उपाध्यक्ष हैं. इन सबने लोकतंत्र में इतनी बड़ी लोकप्रियता पाई. तानाशाही और बादशाहत में तो ऐसा होता है लेकिन लोकतंत्र में जहाँ जनता लोगों को चुनती हो, ऐसा बहुत कम होता है. जिस नेहरू गांधी डाएनेस्टी की बात की जाती है, उसमें फ़िरोज़ का बहुत बड़ा योगदान था, जिसका कोई ज़िक्र नहीं होता और जिस पर कोई किताबें या लेख नहीं लिखे जाते."
फ़िरोज़ गांधी का आनंद भवन में प्रवेश इंदिरा गांधी की माँ कमला नेहरू के ज़रिए हुआ था. एक बार कमला नेहरू इलाहाबाद के गवर्नमेंट कालेज में धरने पर बैठी हुई थीं. बर्टिल फ़ाक बताते हैं, "जब कमला ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ नारे लगा रही थीं, तो फ़िरोज़ गाँधी कालेज की दीवार पर बैठ कर ये नज़ारा देख रहे थे. वो बहुत गर्म दिन था. अचानक कमला नेहरू बेहोश हो गईं."

"फ़िरोज़ दीवार से नीचे कूदे और कमला के पास दौड़ कर पहुंच गए. सब छात्र कमला को उठा कर एक पेड़ के नीचे ले गए. पानी मंगवाया गया और कमला के सिर पर गीला कपड़ा रखा गया. कोई दौड़ कर एक पंखा ले आया और फ़िरोज़ उनके चेहरे पर पंखा करने लगे. जब कमला को होश आया, तो वो सब कमला को ले कर आनंद भवन गए. इसके बाद कमला नेहरू जहाँ जाती, फ़िरोज़ गांधी उनके साथ ज़रूर जाते."
इसकी वजह से फ़िरोज़ और कमला के बारे में अफ़वाहें फैलने लगीं. कुछ शरारती लोगों ने इलाहाबाद में इनके बारे में पोस्टर भी लगा दिए. जेल में बंद जवाहरलाल नेहरू ने इस बारे में खोजबीन के लिए रफ़ी अहमद किदवई को इलाहाबाद भेजा.
किदवई ने इस पूरे प्रकरण को पूरी तरह से बेबुनियाद पाया. बर्टिल फ़ाक बताते हैं कि एक बार स्वतंत्र पार्टी के नेता मीनू मसानी ने उन्हें एक रोचक किस्सा सुनाया था. "तीस के दशक में मीनू मसानी आनंद भवन में मेहमान थे. वो नाश्ता कर रहे थे कि अचानक नेहरू ने उनकी तरफ़ मुड़ कर कहा था, मानू क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि कोई मेरी पत्नी के प्रेम में भी फंस सकता है? मीनू ने तपाक से जवाब दिया, मैं ख़ुद उनके प्रेम में पड़ सकता हूँ. इस पर कमला तो मुस्कराने लगीं, लेकिन नेहरू का चेहरा गुस्से से लाल हो गया."

बहरहाल फ़िरोज़ का नेहरू परिवार के साथ उठना बैठना इतना बढ़ गया कि ये बात उनकी माँ रतिमाई गांधी को बुरी लगने लगी. बर्टिल फ़ाक बताते हैं कि जब महात्मा गाँधी मोतीलाल नेहरू के अंतिम संस्कार में भाग लेने इलाहाबाद आए तो रतीमाई उनके पास गईं और उनसे गुजराती में बोलीं कि वो फ़िरोज़ को समझाएं कि वो ख़तरनाक कामों में हिस्सा न ले कर अपना जीवन बरबाद न करें. गांधी ने उनको जवाब दिया, "बहन अगर मेरे पास फ़िरोज़ जैसे सात लड़के हो जाए तो मैं सात दिनों में भारत को स्वराज दिला सकता हूँ."
1942 में तमाम विरोध के बावजूद इंदिरा और फ़िरोज़ का विवाह हुआ. लेकिन साल भर के अंदर ही दोनों के बीच मतभेद होने शुरू हो गए. इंदिरा गाँधी ने फ़िरोज़ के बजाए अपने अपने पिता के साथ रहना शुरू कर दिया.. इस बीच फ़िरोज़ का नाम कई महिलाओं के साथ जोड़ा जाने लगा.
रशीद किदवई बताते हैं, "इसमें उनके एकाकीपन की भूमिका ज़रूर रही होगी, क्योंकि इंदिरा गांधी दिल्ली में रहती थीं, फ़िरोज़ लखनऊ में रहते थे. दोनों के बीच एक आदर्श पति पत्नी का संबंध कभी नहीं पनप पाया. फ़िरोज़ गांधी स्मार्ट थे. बोलते बहुत अच्छा थे. उनका सेंस ऑफ़ ह्यूमर बहुत अच्छा था. इसलिए महिलाएं उनकी तरफ़ खिंची चली आती थी. नेहरू परिवार की भी एक लड़की के साथ जो नेशनल हेरल्ड में काम करती थी, उनके संबंधों की अफवाह उड़ी."

"उसके बाद उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ मुस्लिम मंत्री की बेटी के साथ भी फ़िरोज़ गांधी का नाम जुड़ा. नेहरू इससे बहुत विचलित हो गए. उन्होंने केंद्र में मंत्री रफ़ी अहमद किदवई को लखनऊ भेजा. रफ़ी अहमद किदवई ने उन मंत्री, उनकी बेटी और फ़िरोज़ को बहुत समझाया, ऐसा भी सुनने में आया है कि उस समय फ़िरोज़ गांधी इंदिरा गाँधी से अलग होकर उस लड़की से शादी भी करने को तैयार थे. लेकिन वो तमाम मामला बहुत मुश्किल से सुलझाया गया."
"लेकिन फ़िरोज़ गाँधी के दोस्तों का कहना है कि फ़िरोज़ गाँधी इन सब मामलों में बहुत गंभीर नहीं थे. वो एक मनमौजी किस्म के आदमी थे. उन्हें लड़कियों से बात करना अच्छा लगता था. नेहरू कैबिनेट में एक मंत्री तारकेश्वरी सिन्हा से भी फ़िरोज़ गांधी की काफ़ी नज़दीकियाँ थीं."
"तारकेश्वरी सिन्हा का खुद का कहना था कि अगर दो मर्द अगर चाय काफ़ी पीने जाएं और साथ खाना खाएं तो समाज को कोई आपत्ति नहीं होती. लेकिन अगर एक महिला और पुरुष साथ भोजन करें तो लोग तरह तरह की टिप्पणियाँ करते हैं. उनका कहना था कि लोग हमेशा महिला और पुरुष की दोस्ती को शकोशुबहे की नज़र से देखते हैं."
बर्टिल फ़ाक का कहना है कि फ़िरोज के दोस्त सैयद जाफ़र ने उन्हें बताया था कि फ़िरोज़ अपने अफ़ेयर्स को जितना छिपाने की कोशिश करते थे, उतना ही वो बाहर आ जाते थे. एक बार सैयद जाफ़र उनके घर गए तो उन्होंने देखा कि वहाँ आम की एक पेटी रखी हुई है. उन्होंने कहा मुझे भी कुछ आम खिलाइए. फ़िरोज़ का जवाब था, नहीं ये पंतजी के लिए है.

बर्टिल फ़ाक बताते हैं, "उसी शाम फ़िरोज़ अपनी एक महिला मित्र के यहाँ गए. संयोग से सैयद जाफ़र भी वहाँ मौजूद थे. वहाँ पर वही आम की पेटी रखी हुई थी. जाफ़र ने कहा, पेटी तो गोविंदवल्लभ पंत के यहाँ भेजी जानी थी. ये यहाँ कैसे है? फ़िरोज़ बोले, चुप भी रहो. इस बारे में बात मत करो."
इस बीच इंदिरा गाँधी कांग्रेस की अध्यक्ष बन गईं और उनकी पहल पर केरल में नंबूदरीपाद की सरकार बर्ख़्वास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. इस मुद्दे पर इंदिरा और फ़िरोज़ के बीच गहरे राजनीतिक मतभेद भी पैदा हो गए.
कुछ साल पहले मशहूर पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने बीबीसी से बात करते हुआ कहा था, "1959 में जब इंदिरा ने केरल में कम्यूनिस्ट सरकार को ग़ैरसंवैधानिक तरीके से गिराया तो मियाँ बीवी में ज़बरदस्त झगड़ा हुआ. उस शाम को फ़िरोज़ मुझसे मिले. उन्होंने कहा कि इससे पहले कि लोग तुम्हें बताएं, मैं तुम्हें बताता हूँ कि हमारे बीच तेज़ झगड़ा हुआ है और आज के बाद मैं कभी प्रधानमंत्री के घर पर नहीं जाउंगा. उसके बाद वो वहाँ कभी नहीं गए. जब उनकी मौत हुई तब ही उनके पार्थिव शरीर को तीन मूर्ति ले जाया गया."
इस बीच फ़िरोज़ गांधी अपने भाषणों से सबका ध्यान खींच रहे थे. मूंदड़ा कांड पर उन्होंने अपने ही ससुर की सरकार पर इतना ज़बरदस्त हमला बोला कि नेहरू के बहुत करीबी, तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.
ये कहा जाने लगा कि कांग्रेस में रहते हुए भी फ़िरोज़ विपक्ष के अनऑफ़िशियल नेता हैं. फ़िरोज़ के नज़दीक रहे ओंकारनाथ भार्गव याद करते हैं, "मुझे अच्छी तरह याद है फ़िरोज़ के निधन के बाद मैं संसद भवन गया था. वहाँ के सेंट्रल हाल में एक लॉबी थी जो फ़िरोज़ गाँधी कार्नर कहलाता था. वहाँ फ़िरोज़ गांधी और दूसरे सांसद बैठ कर बहस की रणनीति बनाते थे. आज की तरह नहीं कि बात- बात पर शोर मचाना शुरू कर दिया."

"फ़िरोज़ गाँधी का सबसे बड़ा योगदान ये है कि उन्होंने संसदीय बहस के स्तर को बहुत ऊँचा किया है. मैं बर्टिल फ़ाक के इस कथन से सहमत नहीं हूँ कि फ़िरोज़ गांधी को भुला दिया गया है. जैसे- जैसे भारतीय प्रजातंत्र परिपक्व होगा, फ़िरोज़ गांधी को बेहतरीन संसदीय परंपराएं शुरू करने के लिए याद किया जाने लगेगा."
फ़िरोज़ को हर चीज़ की गहराई में जाना पसंद था. 1952 में वो रायबरेली से बहुत बड़े अंतर से जीत कर लोकसभा पहुंचे थे. 1957 के चुनाव के दौरान उन्हें पता चला कि उनके पुराने प्रतिद्वंदी नंद किशोर नाई के पास चुनाव में ज़मानत भरने के लिए भी पैसे नहीं हैं. उन्होंने नंदकिशोर को बुला कर उन्हें अपनी जेब से ज़मानत के पैसे दिए.
ओंकारनाथ भार्गव बताते हैं, "वो हमारे सांसद तो थे ही. सोने पर सुहागा ये था कि उनका संबंध जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी से था. वो अपने क्षेत्र में बराबर घूमते थे. कहीं लाई चना खा लेते थे. कहीं चाट खाते थे. कहीं किसी की चारपाई पर जा कर बैठ जाते थे. इससे ज़्यादा सादा शख़्स कौन हो सकता है."
कहा जाता है कि राजीव गांधी और संजय गांधी में वैज्ञानिक सोच पैदा करने में फ़िरोज़ गाँधी का बहुत बड़ा योगदान था.

रशीद किदवई बताते हैं, 'फ़िरोज़ गाँधी एक अलग किस्म के बाप थे.. उन्हें बच्चों को खिलौने देने में यकीन नहीं था. अगर कोई उन्हें तोहफ़े में खिलौने दे भी देता था, तो वो कहते थे कि इन्हें तोड़ कर फिर से जोड़ो. राजीव और संजय दोनों का जो टैक्निकल बेंड ऑफ़ माइंड था, वो फ़िरोज़ गाँधी की ही देन था. संजय ने बाद में जो मारुति कार बनाने की पहल की, उसके पीछे कहीं न कहीं फ़िरोज़ गाँधी की भी भूमिका थी."
फ़िरोज़ बागबानी और बढ़ई का काम करने के भी शौकीन थे. उन्होंने ही इंदिरा गाँधी को शियेटर और पश्चिमी संगीत का चस्का लगाया था.
बर्टिल फ़ाक बताते हैं, "उन्होंने इंदिरा गाँधी को बीतोवन सुनना सिखाया. लंदन प्रवास के दौरान वो इंदिरा और शाँता गाँधी को ऑपेरा और नाटक दिखाने ले जाया करते थे. बाद में इंदिरा गांधी ने लिखा, मेरे पिता ने कविता के प्रति मेरे मन में प्यार पैदा किया, लेकिन संगीत के लिए मेरे मन में प्रेम फ़िरोज़ की वजह से जगा.

एक बार डॉम मोरेस ने इंदिरा गांधी से पूछा था-आपको सबसे ज़्यादा तकलीफ़ किसकी मौत से हुई. इंदिरा का जवाब था, "मेरे पति फ़िरोज़ क्योंकि वो अचानक इस दुनिया से चले गए थे. उनके शब्द थे- मैं शायद फ़िरोज़ को पसंद नहीं करती थी, लेकिन मैं उन्हें प्यार करती थी."

हवा में स्टंट करते हुए गिरा था संजय गाँधी का विमान @रेहान फ़ज़ल

राजीव और संजय गाँधी दोनों को गति और मशीनों से गहरा लगाव था. एक ओर जहाँ राजीव विमानन नियमों का पालन करते थे, वहीं संजय विमान को कार की तरह चलाया करते थे. तेज़ हवा में कलाबाज़ियां खाना उनका शौक हुआ करता था.
1976 में उन्हें हल्के विमान उड़ाने का लाइसेंस मिला था, लेकिन इंदिरा गाँधी के सत्ता से हटते ही जनता सरकार ने उनका लाइसेंस छीन लिया था. इंदिरा गांधी के सत्ता में दोबारा वापस आते ही उनका लाइसेंस भी उन्हें वापस मिल गया था.
1977 से ही इंदिरा परिवार के नज़दीकी धीरेंद्र ब्रह्मचारी एक ऐसा टू सीटर विमान 'पिट्स एस 2ए' आयात करवाना चाह रहे थे, जिसे ख़ासतौर पर हवा में कलाबाज़ियां खाने के लिए बनाया गया हो. मई 1980 में जाकर भारत के कस्टम विभाग ने उसे भारत लाने की मंज़ूरी दी.
आनन-फानन में उसे असेंबल कर सफ़दरजंग हवाई अड्डे स्थित दिल्ली फ़्लाइंग क्लब में पहुंचा दिया गया. संजय पहले ही दिन उस विमान को उड़ाना चाह रहे थे, लेकिन पहला मौका फ़्लाइंग क्लब के इंस्ट्रक्टर को मिला. संजय ने पहली बार 21 जून 1980 को नए पिट्स पर अपना हाथ आज़माया.

रिहायशी इलाक़े पर पिट्स के तीन लूप और...

दूसरे दिन यानी 22 जून को अपनी पत्नी मेनका गाँधी, इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को लेकर उन्होंने उड़ान भरी और 40 मिनट तक दिल्ली के आसमान पर विमान उड़ाते रहे.
अगले दिन यानी 23 जून को माधवराव सिंधिया उनके साथ पिट्स की उड़ान भरने वाले थे. लेकिन संजय गाँधी सिंधिया के बजाए दिल्ली फ़्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के घर जा पहुँचे जो सफ़दरजंग हवाई अड्डे के बगल में ही रहते थे.
उन्होंने कैप्टन सक्सेना से कहा कि वह उनके साथ फ़्लाइट पर चलें. संजय अपनी कार पार्क करने चले गए और सुभाष अपने एक सहायक के साथ फ़्लाइंग क्लब के मुख्य भवन में पहुंचे.
कैप्टन सक्सेना बहुत जल्दी में नहीं थे और शायद इसीलिए उन्होंने एक चाय का भी ऑर्डर कर दिया.

विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया

अभी उन्होंने चाय का एक घूंट ही लिया था कि उनका चपरासी दौड़ता हुआ आया और बोला कि संजय गाँधी विमान में बैठ चुके हैं और उन्हें तुरंत बुला रहे हैं.
कैप्टन सक्सेना ने अपने सहायक को यह कहकर घर भेज दिया कि वो 10-15 मिनट में वापस लौट आएंगे. कैप्टन सक्सेना पिट्स के अगले हिस्से में बैठे और संजय ने पिछले हिस्से में बैठकर कंट्रोल संभाला.
ठीक सात बजकर 58 मिनट पर उन्होंने टेक ऑफ़ किया. संजय ने सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाके के ऊपर ही तीन लूप लगाए. वो चौथी लूप लगाने ही वाले थे कि कैप्टन सक्सेना के सहायक ने नीचे से देखा कि विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया है.
पिट्स तेज़ी से मुड़ा और नाक के बल ज़मीन से जा टकराया.

ज़मीन पर था मुड़ा-तुड़ा विमान, गहरा काला धुआँ

कंट्रोल टॉवर में बैठे विमान को देख रहे लोगों के मुँह खुले के खुले रह गए. जब उन्होंने देखा कि पिट्स अशोका होटल के पीछे एकदम से गुम हो गया. सक्सेना के सहायक ने भी तेज़ी से विमान को नीचे गिरते हुए देखा.
उसने अपनी साइकिल पकड़ी और पागलों की तरह चलाता हुआ सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचा. बिल्कुल नया पिट्स टू सीटर मुड़ी हुई धातु में बदल चुका था. उसमें से गहरा काला धुंआ निकल रहा था, लेकिन उसमें आग नहीं लगी थी.
रानी सिंह अपनी किताब 'सोनिया गाँधी: एन एक्सट्राऑर्डिनरी लाइफ़' में लिखती हैं, "सक्सेना के सहायक ने देखा कि संजय गाँधी का शव विमान के मलबे से चार फ़ीट की दूरी पर पड़ा था. कैप्टेन सक्सेना के शरीर का निचला हिस्सा विमान के मलबे में दबा हुआ था लेकिन सिर बाहर निकला हुआ था."

"ठीक उसी समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह एक, अकबर रोड पर बैठे इंदिरा गाँधी से मिलने का इंतज़ार कर रहे थे. अचानक वीपी सिंह ने सुना कि इंदिरा गाँधी के सहायक आरके धवन कह रहे हैं कि बहुत बड़ा हादसा हो गया है. बिखरे हुए बालों में इंदिरा गाँधी बाहर निकलीं और धवन के साथ एम्बेस्डर कार में घटनास्थल के लिए रवाना हो गईं."
"उनके पीछे पीछे वीपी सिंह भी वहां पहुंचे. इंदिरा गाँधी के पहुंचने से पहले ही फ़ायर ब्रिगेड ने विमान के मलबे से दोनों शव निकाल लिए थे और उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस में रखा जा रहा था."

ग़म के बावजूद असम की चिंता

रानी सिंह अपनी किताब में लिखती हैं, "इंदिरा गाँधी खुद एंबुलेंस में चढ़ गईं और राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचीं. वहां डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया."
"सबसे पहले अस्पताल पहुंचने वालों में अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर थे. इंदिरा गांधी ने अपनी आंखों और भावनाओं को छिपाने के लिए काला चश्मा लगा रखा था."
पुपुल जयकर अपनी किताब 'इंदिरा गाँधी' में लिखती हैं कि उनको अकेले खड़े देख वाजपेयी ने आगे बढ़कर कहा, "इंदिरा जी इस कठिन मौके पर आपको बहुत साहस से काम लेना होगा. उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन वाजपेयी की तरफ इस अंदाज़ से देखा मानो यह कह रही हों कि आप कहना क्या चाह रहे हैं?"

"वाजपेयी थोड़े से विचलित हुए और सोचने लगे कि उन्होंने इंदिरा से यह कहकर कोई ग़लती तो नहीं कर दी. इसके बाद इंदिरा चंद्रशेखर की तरफ मुड़ीं और उन्हें एक तरफ ले जाकर बोलीं कि मैं कई दिनों से आपसे असम के बारे में बात करना चाह रही थी. वहां हालात बहुत गंभीर हैं."
"चंद्रशेखर ने कहा कि इसके बारे में बाद में बात करेंगे. इंदिरा ने जवाब दिया कि नहीं-नहीं, ये मामला बहुत महत्वपूर्ण है."
"आश्चर्यचकित चंद्रशेखर की समझ में ही नहीं आया कि कि एक माँ जिसके बेटे का शव बग़ल के कमरे में पड़ा हुआ है, कैसे असम के बारे में बात कर सकती है?"

वीपी सिंह को निर्देश, मेनका को ढाढस

पुपुल जयकर की किताब के मुताबिक, "शाम को जब अटलबिहारी वाजपेई, चंद्रशेखर और हेमवती नंदन बहुगुणा आपस में मिले तो वाजपेयी ने टिप्पणी की, 'या तो उन्होंने दुख को आत्मसात कर लिया है और या फिर वो पत्थर की बनीं हैं. वो शायद यह सिद्ध करना चाह रही हैं कि इस कठिन घड़ी में भी वह असम और भारत की समस्याओं के बारे में सोच रही हैं."
अस्पताल में उनके पीछे-पीछे पहुंचे विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी देखकर उन्होंने कहा कि आप तुरंत लखनऊ लौटिए क्योंकि वहां पर इससे बड़े मसले हल करने के लिए पड़े हैं.
जब तक डॉक्टर संजय के क्षत-विक्षत शव को ठीक करने की कोशिश करते रहे, इंदिरा गाँधी उसी कमरे में खड़ी रहीं.

इस बीच हादसे की ख़बर सुनकर संजय गाँधी की पत्नी मेनका गाँधी भी अस्पताल पहुंच गई थीं. इंदिरा उस कमरे से बाहर निकलीं, जहां संजय का शव ठीक करने की कोशिश हो रही थी.
उन्होंने मेनका को दिलासा दिया और कहा कि वह बगल वाले कमरे में बैठकर इंतज़ार करें. उन्होंने कैप्टन सक्सेना की पत्नी और माँ को भी दिलासा दिया.
संजय के शव को ठीक करने में डॉक्टरों को तीन घंटे लग गए. जब उन्होंने अपना काम पूरा कर लिया तो इंदिरा ने उनसे कहा कि अब आप मुझे अपने बेटे के पास कुछ मिनटों के लिए अकेला छोड़ दीजिए.
वो थोड़ा झिझके, लेकिन इंदिरा ने उन्हें सख़्ती से बाहर जाने के लिए कहा. ठीक चार मिनट बाद वह कमरे से बाहर निकलीं. उस कमरे में गईं जहाँ मेनका बैठी हुई थीं और उन्हें बताया कि संजय अब इस दुनिया में नहीं हैं.

इससे पहले जब डाक्टर संजय के पार्थिव शरीर को पैच कर रहे थे, तो वो एक बार फिर उस जगह गईं जहाँ संजय का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था.
बाद में अफ़वाह फैल गई कि इंदिरा वहाँ संजय की घड़ी और चाबियों का गुच्छा ढ़ूढ़ने गई थीं. लेकिन इन अफवाहों में सच्चाई नहीं थी. उनको संजय के निजी सामान में कोई रुचि नहीं थी.
वो वास्तव में संजय को ढ़ूंढ़ रही थी. धातु के जले हुए मुड़े तुड़े टुकड़ों को देख कर उन्हें अहसास हुआ कि संजय अब कभी वापस नहीं आएंगे. उस जहाज़ के गिरते ही उनके सारे सपने और संजय के बारे में भविष्य की योजनाएं हमेशा के लिए चकनाचूर हो गई थीं.

'अजीब किस्म की राहत'

वो अपनी देखरेख में संजय के शव को एक अकबर रोड लाईं, जहाँ उसे बर्फ़ की सिल्लियों पर एक प्लेटफॉर्म पर रखा गया. उनकी एक आंख और सिर पर अभी भी पट्टी बंधी हुई थी और नाक बुरी तरह से कुचली हुई थी.
अगले दिन संजय के अंतिम संस्कार के समय इंदिरा पूरे समय मेनका का हाथ अपने हाथ में लिए रहीं. जैसे ही चिता में आग देने के लिए राजीव ने हाथ आगे बढ़ाया, इंदिरा ने इशारे से उनसे रुकने के लिए कहा.
उन्होंने बताया कि संजय के शरीर से लिपटे कांग्रेस का झंडा हटाया नहीं गया है. शव के ऊपर रखी लकड़ियों को फिर से हटाया गया और झंडे को हटाकर संजय का अंतिम संस्कार किया गया.

25 जून को संजय की अस्थियों को घर लाकर एक अकबर रोड के लॉन में रखा गया. तब पहली बार इंदिरा अपने को रोक नहीं पाईं. उनकी आखों से आंसू बह निकले.
पहली बार उन्हें सब के सामने खुलेआम रोते हुए देखा गया. राजीव गाँधी ने अपने हाथों से उनके कंधों को सहारा दिया.
चार दिनों के अंदर यानी 27 जून को इंदिरा साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर में फ़ाइलों पर दस्तख़त कर रही थीं जैसे कुछ हुआ ही न हो.

राज थापर ने अपनी किताब 'ऑल दीज़ इयर्स' में लिखा है, "संजय की मौत पर लोग रोए और पूरा देश ग़मगीन हो गया क्योंकि यह दुखद घटना तो थी ही. लेकिन इसे विडंबना ही कहिए कि इसके साथ ही लोगों में एक अजीब किस्म की राहत भी थी जिसे पूरे भारत में महसूस किया गया.."
सालों बाद इंदिरा के चचेरे भाई और अमरीका में भारत के राजदूत रहे बीके नेहरू ने भी अपनी किताब 'नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड' में भी कमोबेश इसी भावना का इज़हार किया.
लेकिन अगर इंदिरा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो 1977 की हार के बाद संजय अकेले शख़्स थे जो उनके साथ खड़े हुए थे. बकौल उनके अगर संजय नहीं होते तो 1980 में उनकी राजनीतिक वापसी कभी नहीं हो सकती थी.

संजय की मौत से उबरने में इंदिरा गाँधी को बहुत समय लगा. कुछ राजनीतिक विष्लेष्कों की राय में वो इस सदमें से कभी उबरी ही नहीं.
पुपुल जयकर इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखती हैं, 'कई दिनों तक इंदिरा बीच रात में उठकर संजय को ढ़ूढ़ने लगतीं. कुछ ही दिनों में उनका हमेशा खिला रहने वाला चेहरा बूढ़ा दिखाई देने लगा और उनकी आँखों के चारों ओर काले गड्ढ़े बन गए.'

Wednesday, 31 May 2017

चंपारण में इस तरह भी देखे गए गांधी @रामचंद्र गुहा

गांधी की सक्रियता को लेकर जब बहुत से लोगों के मन में गुस्सा था, तब कई यूरोपीय उन्हें आदर्शवादी, कट्टर और क्रांतिकारी मान रहे थे। 
पिछले आलेख में मैंने 1917 की गरमियों में गांधीजी का चंपारण प्रवास और वहां उनको हुए अनुभवों के संदर्भ में उनकी व्याख्या की थी। इस बार चर्चा उन लोगों की, जो गांधी के प्रयासों व उनकी दृढ़ता के विरोधी थे। यह दिखाता है कि चंपारण के अंग्रेजों ने अपने जीवन में अचानक आए इस ‘अवांछित घुसपैठिए’ को किस तरह देखा-समझा।
चंपारण में गांधी से नाराज रहने वाले यूरोपियंस में सबसे ज्यादा नील बागानों के मालिक थे। गांधी के चंपारण प्रवास से सबसे ज्यादा नुकसान भी उन्हीं को हुआ। इनमें ज्यादातर वकीलों, सैन्य अफसरों और पादरियों के बेटे हुआ करते थे। भारतीय प्रशासनिक सेवा के लोगों के सामने इनकी हैसियत भले ही कुछ न रही हो, पर रहन-सहन के मामले में इनका रुतबा गजब का था। नील बागान के मैनेजर वेतन के अलावा फैक्ट्री के मुनाफे में भी हिस्सा पाते थे। तेल, ईंधन फ्री मिलता था। अनाज और सब्जियां तक नहीं खरीदनी पड़ती थीं। सब पर रुतबा गांठते थे सो अलग।
19वीं सदी के उत्तरार्ध में जब जर्मनी सिंथेटिक डाई बनाने लगा, तो उसका असर यहां से प्राकृतिक नील की मांग पर पड़ा। लेकिन 1914 में जब ब्रिटेन व जर्मनी के बीच युद्ध छिड़ा और दोनों के बीच आर्थिक संबंध पूरी तरह खत्म हो गए, तो बिहार के नील की फिर से मांग होने लगी। इसका उत्पादन तेजी से बढ़ाना पड़ा और दाम तीन गुना से भी ज्यादा चढ़ गए। हाल यह हुआ कि 1914 में जिस नील की खेती 8,100 एकड़ में सिमट गई थी, दो साल बाद ही वह 21,900 एकड़ तक पहुंच गई।
अप्रैल 1917 में गांधी के चंपारण आगमन के साथ ही सवाल उठने लगा कि नील के बूते रईसी गांठने वालों के दिन अब लदने वाले हैं, क्योंकि गांधी जी नील की खेती के लिए किसानों पर जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ थे। उनके चंपारण आने के चंद दिनों के अंदर ही बिहार प्लांटर्स एसोसिएशन ने कमिश्नर को चिट्ठी लिखकर अपने गुस्से का इजहार भी कर दिया। यूरोपीय डिफेंस एसोसिएशन की स्थानीय शाखा ने तो प्रस्ताव पारित कर दिया कि जिले में गांधी की मौजूदगी का मतलब ‘अशांति और अपराध’ है और ‘क्षेत्र में उनकी लगातार मौजूदगी चंपारण की प्रगति में बाधक है।’उन दिनों इलाके का सबसे बड़ा बागान मालिक बेतिया राज हुआ करता था। इसके मैनेजर ने भी गांधी को खतरे की घंटी माना। दक्षिण अफ्रीका से विजयी भाव में लौटे गांधी यूं भी आशातीत आत्म-विश्वास से लबरेज थे। अंग्रेज बागान मालिक अब मानने लगे थे कि यह दुबला-पतला इंसान अपने विचारों के साथ किसी भी सीमा तक जा सकता है। वे मानते थे कि इसे शहीद भले बना दिया जाए, लेकिन आसानी से दबाया नहीं जा सकता है। चंपारण के बागान मालिकों में डब्ल्यू एस इर्विन गांधी के प्रति बुरी तरह पूर्वाग्रही थे। इर्विन बेतिया राज के मुखौटा अखबारों में लगातार लिख रहे थे कि यूरोपीय बागान मालिकों ने किस तरह अच्छे काम किए और यह भी कि ‘आंदोलनकारी गांधी’ के आने से पहले तक चंपारण के किसान कितने संतुष्ट थे। यहां तक लिख दिया कि ‘गांधी जिस तरह की नाटकीय प्रविधियों का सहारा ले रहे हैं, उससे उनके ‘चंपारण मिशन’ पर संदेह होता है।’ वह लिखते हैं कि, ‘इंग्लैंड और अन्य देशों में रह चुका यह इंसान जिस तरह चंपारण में न्यूनतम पाश्चात्य सुविधाओं के साथ सिर ढंकने और जूते पहनने का विरोधी है, जमीन पर बैठता है, भोजन खुद बनाता है, और 2000 साल पूर्व के परोपकारी व्यक्ति (बुद्ध) के नक्शेकदम पर चलने की बात करता है, उससे इस पर संदेह होता है।’
1917 के बाद वाले महीनों में गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा भी चंपारण आ गईं। इर्विन इससे भी नाराज हो गए और स्टेट्समैन अखबार को नाराजगी भरा पत्र लिखा कि गांधी ने तो कमिश्नर से वायदा किया था कि वह सार्वजनिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे, लेकिन अब वह गो-वध और हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर लगातार विवादित भाषण देते फिर रहे हैं। इर्विन ने लिखा कि ‘जहां गांधी मौजूद नहीं होते, उनकी पत्नी मोर्चा संभालती हैं। इधर तो उन्होंने एक स्कूल और देहात क्षेत्र में एक बाजार भी शुरू करा दिया है, जिसका सीधा-सीधा मकसद फैक्ट्री द्वारा संचालित दो बाजारों को बंद कराना है।’गांधी जी ने भी स्टेट्समैन को जवाब लिखा, पर अपने रोचक अंदाज में। उन्होंने लिखा कि ‘उनके भाषणों का मकसद धार्मिक समुदायों के बीच भेदभाव कम करके सौहार्द बढ़ाना है। इस नेक काम के लिए उन्होंने बागान मालिकों का भी सहयोग मांगा था।’ कस्तूरबा का जिक्र करते हुए लिखा कि ‘उनको तो पता भी नहीं है और शायद कभी चलेगा भी नहीं कि आपके संवाददाता ने उनके साथ कितना गलत किया है। यदि डब्ल्यू एस इर्विन को कस्तूरबा से मिला दिया जाए, तो उन्हें जल्द पता चल जाएगा कि श्रीमती गांधी कितनी सहज व सरल हैं। लगभग अशिक्षित, जिसे उन बाजारों के बारे में कुछ भी नहीं पता, जिनकी चर्चा इर्विन कर रहे हैं।’ गांधी आगे लिखते हैं, ‘श्रीमती गांधी (कस्तूरबा) तो अभी तक भाषण देने या अखबारों को चिट्ठी लिखने की कला सीख ही नहीं पाई हैं?
चंपारण के बागान मालिकों में गांधी के प्रति खूब जहर भरा था। हालांकि वे अफसर, जिनका गांधी से अक्सर साबका पड़ता, उन्हें समझने लगे थे। चंपारण आने के दो हफ्ते बाद ही बेतिया के उपायुक्त ने लिखा, बागान मालिकों ने गांधी को अपना स्वाभाविक दुश्मन मान लिया है, पर जब यूरोपीय लोग उन्हीं के फॉमरूले से गांधी को एक आदर्शवादी, विचारों के प्रति कट्टर या क्रांतिकारी मानने लगें’ और ‘रैयतों के लिए वह असाधारण शक्तियों वाला मुक्तिदाता’ बन जाएं, तो बात अलग हो जाती है।गांधी के चंपारण प्रवास में वहां के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने उन्हें बखूबी समझा था। डीएम गांधी व उनकी कार्यशैली से खासा प्रभावित रहा। उसे उनके दक्षिण अफ्रीका प्रवास की भी ठीक-ठाक जानकारी थी। उसने लिखा,‘गांधी पूर्व व पश्चिम का रोचक मिश्रण लगते हैं। वह टॉलस्टॉय और रस्किन, खासकर टॉलस्टॉय से ज्यादा प्रभावित हैं। इसके मेल से वह एक योगी का रूप धर लेते हैं। उनके विचार भले ही पूरब के हों, पर यह पश्चिम का असर ही है कि वह इतने बड़े सामाजिक सुधारक बनकर सामने आते हैं।’गांधी, उनके मिशन और उनकी कार्यपद्धति पर किसी पश्चिमी व्यक्ति का यह सटीक विश्लेषण था। इस अफसर को बहुत पहले ही भुला दिया गया, पर आज चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने पर उसकी याद जरूरी है। डब्ल्यू बी हेकॉक नाम के इस अफसर को इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि यह गोरा इंसान अपनी जमात के क्रोधी, दंभी व अहंकारी लोगों से बिल्कुल अलग था।

Wednesday, 6 July 2016

कोहिनूर पर क्यों हैं कन्फ्यूज? @pushpranjan


अपने देश का संस्कृति मंत्रालय कुछ अजब-गजब है. सुप्रीम कोर्ट ने कोहिनूर की वापसी पर मोदी सरकार का पक्ष पूछा था, लेकिन जब बात पंजाब तक में बिगड़ने लगी, और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इसे आड़े हाथ लिया, तो तपाक से ‘टोपी’ पंडित नेहरू को पहना दी गयी.
संस्कृति मंत्रालय ने पलटी मारी और कहा कि हमने नहीं, 1956 में पंडित नेहरू ने बयान दिया था कि ब्रिटेन को ‘उपहार’ में दी गयी वस्तु की वापसी में परेशानी पैदा होगी, क्योंकि दलीप सिंह ने लाॅर्ड डलहौजी को कोहिनूर उपहार में दिया था. इस बयान के दूसरे दिन ‘पीआइबी’ के जरिये संस्कृति मंत्रालय ने सफाई में कहा कि साॅलिसीटर जनरल रणजीत कुमार ने पंडित नेहरू को ‘कोट’ किया था, सरकार तो कोहिनूर की वापसी का प्रयास करेगी.
सवाल है कि कोहिनूर हीरे पर क्या सुप्रीम कोर्ट ने पंडित नेहरू का विचार पूछा था? यह रिकाॅर्ड सरकार को पेश करने चाहिए. भारतीय मूल के ब्रिटिश सांसद कीथ वाज अरसे से कोहिनूर की वापसी की आवाज उठा रहे थे. वे भी हैरान हैं कि राष्ट्रवादी सरकार का यह कैसा ‘स्टैंड’ है!
कीथ की विवशता थी, सो थक-हार कर ब्रिटिश संसद में उन्होंने भारत सरकार के पक्ष का स्वागत किया. अब भारत सरकार बयान सुधारती रहे कि यह हमने नहीं कहा, ‘कश्मीर पर जनमतसंग्रह जैसी गलतबयानी’ करनेवाले उस पूर्व प्रधानमंत्री का वक्तव्य था, जिसने साठ साल पहले कोहिनूर पर अंगरेजों का साथ दिया था. हमारा संस्कृति मंत्रालय जिस तरह से नेहरू के बयानों को खोद कर निकालने में व्यस्त है, वैसी खुदाई मोहनजोदड़ो-हड़प्पा की भी नहीं हुई. कांग्रेस के नेताओं का आधा समय नेहरू के बयानों पर सफाई में निकल रहा है.
ब्रिटिश हाउस आॅफ काॅमन्स के दस्तावेज बताते हैं कि 1947 में देश की आजादी के तुरंत बाद कोहिनूर की वापसी की मांग की गयी. दूसरी मांग 2 जून, 1953 को की गयी, तब साम्राज्ञी एलिजाबेथ द्वितीय का राज्याभिषेक हो रहा था.
उस समय पंडित नेहरू इस देश के प्रधानमंत्री थे. 1990 में पत्रकार कुलदीप नैयर ने ब्रिटेन में भारत का उच्चायुक्त रहते कोहिनूर की वापसी के लिए ब्रिटिश सरकार से पत्राचार शुरू किया. जाहिर है, सरकार की सहमति के बगैर उच्चायुक्त ऐसे प्रयास नहीं करते. 1997 में कुलदीप नैयर राज्यसभा के सदस्य बने, मगर कोहिनूर की कसक से वे उबरे नहीं.
साल 2000 में कोई 50 सांसदों ने कोहिनूर की वापसी को लेकर एक प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर किया, उनमें नेता प्रतिपक्ष मनमोहन सिंह भी थे. तो क्या मनमोहन सिंह, पंडित नेहरू के लाइन के विरुद्ध जा रहे थे? कुलदीप नैयर ने 29 नवंबर, 2015 को ‘व्हाइ डिड पीएम मोदी नाॅट आस्क फाॅर द कोहिनूर’ में लिखा, ‘तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने मुझसे कहा था कि आप भारत और ब्रिटेन के बीच रिश्ते बिगाड़ रहे हैं.’ इसका अर्थ यही है कि ‘एनडीए’ सरकार नहीं चाहती थी कि कोहिनूर की वापसी हो.
विरासत वापसी की लड़ाई कई देश लड़ते रहे हैं. ब्रिटिश म्यूजियम लंदन में लगी, डेढ़ सौ साल पहले एथेंस के एक्रोपोलिस से उड़ायी ‘एल्गिन मार्बल’ की वापसी की लड़ाई यूरोपियन कोर्ट आॅफ जस्टिस, यूरोपीय संघ और यूनेस्को तक पहुंची हुई है.
इससे क्या ग्रीस और ब्रिटेन के संबंध बिगड़ गये? यूनेस्को के उस प्रस्तावना के आधार पर दुनिया के बहुत सारे देश बाध्य हो रहे हैं कि चोरी या धोखे से लायी गयी धरोहर उनके देश वापस की जाये. वायसराय डलहौजी ने दरअसल फ्राॅड किया था.
एक बारह साल के बालक दलीप सिंह से कोहिनूर हासिल करने के तरीके को आज की पुलिस, अदालत ठगी की श्रेणी में ही रखेगी.
‘टावर आॅफ लंदन’ में कोहिनूर देखने का मौका अगस्त 2006 में मुझे मिला था. कोहिनूर तो सिर्फ 105.6 कैरेट का है, मगर इस नायाब हीरे के इतिहास ने उसे बाकी सारे हीरों से महत्वपूर्ण और वजनदार बना दिया है. टावर आॅफ लंदन में ही 503.2 कैरेट का ‘कलिनम-1’ और 317.4 कैरेट का ‘कलिनम-2’ हीरा रखा हुआ है. दक्षिण अफ्रीका के खान से लाये कलिनम हीरे, कोहिनूर की तरह दर्शकों को विस्मृत नहीं करते. 410 कैरेट का ‘रीजेंट डायमंड’ पैरिस के लूव्र म्यूजियम में है. क्रेमलिन के खजाने में 300 कैरेट का ‘ओरलोफ डायमंड’ है.
सेंट्रल बैंक आॅफ ईरान की निगरानी में 182 कैरेट का ‘दरिया-ए-नूर’ और 67 कैरेट का ‘होप डायमंड’ वाशिंगटन के ‘अमेरिकन म्यूजियम आॅफ नेचुरल हिस्ट्री’ में रखे गये हैं. जर्मनी के द्रेसदेन में 41 कैरेट का ‘ग्रीन वाॅल्ट डायमंड’ है. ये सभी हीरे आंध्र प्रदेश के रायलसीमा जिले के गोलकुंडा और कोल्लुर खानों से निकले हैं. तो क्या हमें इन हीरों की वापसी का प्रयास नहीं करना चाहिए?

Wednesday, 1 June 2016

कनाडा के पीएम ने कोमागाटा मारू के लिए सिखों से माफी क्यों मांगी?

कनाडा के पीएम ने कोमागाटा मारू के लिए सिखों से माफी क्यों मांगी?
वैंकूवर म्यूजियम

कोमागाटा मारू

21 May 2016

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने बुधवार को कनाडा की संसद में कोमागाटा मारू जहाज पर सवार यात्रियों के वंशज और सिखों से माफी मांगी. ट्रूडो ने कहा कि जिस दर्द और पीड़ा से वो लोग गुजरे उसे कोई शब्द नहीं मिटा सकता.
आखिर करीब 102 साल पहले के लिए एक फैसले पर कनाडाई पीएम ने क्यों माफी मांगी? और क्या थी वो घटना?

कामागाटा मारू जहाज

कोमागाटा मारू कोयला ढोने वाला, भाप-इंजन से चलने वाला पानी का जहाज था. हॉन्गकॉन्ग में रहने वाले कारोबारी गुरदीत सिंह ने इसे यात्री जहाज में बदलवाया था. उस समय भारत और हॉन्गकॉन्ग दोनों ब्रितानी शासन के अधीन थे.
अप्रैल 1914 में ये जहाज कनाडा के लिए निकला. करीब एक महीने की यात्रा करके जहाज मई 1914 में कनाडा के वैंकूवर के एक बंदरगाह पर पहुंचा. जहाज में 376 यात्री सवार थे. जिनमें ज्यादातर सिख थे.

नया कानून और विवाद

कनाडा में 1908 में अप्रवासी भारतीयों की आमद को रोकने के लिए एक कानून बनाया गया था. इस कानून के अनुसार वही लोग कनाडा आ सकते थे जो अपने मूल देश से बीच में कहीं और रुके बिना सीधे कनाडा आए हों. उस समय समुद्री मार्ग से भारत से सीधे कनाडा जाना संभव नहीं था. अगर कोई भारतीय भारत से कनाडा सीधे जलमार्ग से पहुंच भी जाता तो इस कानून के अनुसार उन्हें 200 डॉलर प्रवेश शुल्क देना होता. जो उस जमाने में एक बड़ी राशि थी. ये कानून मुलतः नस्ली भेदभाव की भावना से प्रेरित था.
कनाडा के अधिकारियों ने कोमागाटा मारू को बंदरगाह से कुछ दूर समुद्र में ही रोक दिया. जहाज़ के डॉक्टर एवं उनके परिवार और 20 कनाडाई नागरिकों समेत कुल 24 लोगों को कनाडा में प्रवेश करने की इजाज़त दी गयी.
लगभग दो महीने के गतिरोध के बाद, जहाज़ को 23 जुलाई 1914 को कनाडाई नौसेना द्वारा बलपूर्वक वापस लौटा दिया गया.

भारत में अंग्रेजों की गोलाबारी

अमेरिका और कनाडा में 1913 में भारतीयों ने गदर पार्टी का गठन किया था. गदर पार्टी का मकसद भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाना था. बाबा गुरदीत सिंह गदर पार्टी से जुड़े हुए थे. अंग्रेजी सरकार को आशंका थी कि जहाज से गदर पार्टी के समर्थक भारत में आएंगे.
लंबी समुद्री यात्रा के बाद ये जहाज तत्कालीन कलकत्ता के बजबज बंदरगाह पर पहुंचा. 29 सितंबर 1914 को बाबा गुरदीत सिंह और अन्य नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए जहाज़ पर पुलिस भेजी गई. गिरफ्तारी का यात्रियों ने विरोध किया.
अंग्रेज़ी हुकमत यात्रियों पर गोली चलाने का आदेश दिया. गोलीबारी में 19 यात्री मारे गए. कइयों को बंदी बना लिया गया. हालांकि, बाबा गुरदीत सिंह कई अन्य लोगों के साथ भाग निकले.

क्यों मांगी माफी?

कनाडा में करीब पांच लाख सिख रहते हैं. कनाडा की राजनीति में सिखों का प्रभाव साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है.
जस्टिन ट्रूडो ने पिछले साल पीएम बनने के बाद चार सिखों को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी थी. जबकि उस समय भारतीय केंद्रीय मंत्रिमंडल में केवल दो सिख मंत्री थे.
कनाडा के सिख लंबे समय से देश की सरकार से कोमागाटा मारू की अमानवीय हरकत के लिए माफी मांगने की मांग कर रहे थे.
जस्टिन ट्रूडो को सिख अल्पसंख्यकों को  काफी समर्थन प्राप्त है. कोमागाटा मारू के लिए माफी मांग कर उन्होंने एक बार स्थायीन सिखों समेत पूरी दुनिया का दिल जीतने की कोशिश की है.
पिछले साल एक मई को कनाडा सरकार ने कोमागाटा मारू की याद में डाक टिकट जारी किया था.