Tuesday, 2 June 2015

जब-जब 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर गरमाई राजनीति

प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने मंत्रि परिषद के विस्तार के बाद दिल्ली में नीतीश कुमार को एक धर्मनिरपेक्ष नेता बताया और नीतीश कुमार की 'बाँछें खिल उठीं'. उन्होंने प्रधानमंत्री को इसके लिए धन्यवाद भी दिया.
नरेंद्र मोदी का भारतीय जनता पार्टी में रुतबा बढ़ा तो जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में 'तलाक' हो गया. इसके बाद 'धर्मनिरपेक्षता' चर्चा में आ गई.
पल-पल बदलते राजनीतिक परिवेश में 'धर्मनिरपेक्षता' क्या है, इससे बड़ा सवाल अब यह हो गया है कि कौन-कौन धर्मनिरपेक्ष हैं.
संविधान के मुताबिक भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन आजाद भारत के इतिहास में ऐसे कई मौके आए, जब धर्म ने राजनीति और सरकारों के फैसलों को प्रभावित किया है.
एक नज़र ऐसे कुछ ऐतिहासिक मौकों पर -

राजेंद्र प्रसाद ने किया सोमनाथ मंदिर का उदघाटन

सोमनाथ मंदिर
राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना की
भारत की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल न उठे इसलिए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के नवीनीकरण और पुनर्स्थापना का काम देख रही कमेटी से खुद को अलग कर लिया था.
पंडित नेहरू ने सौराष्ट्र (गुजरात राज्य के गठन से पहले सौराष्ट्र संविधान के तहत राज्य था) के तत्कालीन मुख्यमंत्री को मंदिर के निर्माण और उदघाटन में सरकारी पैसा खर्च न करने का निर्देश दिया था.
नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से मंदिर का उदघाटन न करने का आग्रह किया था. उनका तर्क था कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उदघाटन से बचना चाहिए.
हालांकि नेहरू का आग्रह दरकिनार कर राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना की थी.
रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' में लिखा है, प्रधानमंत्री (नेहरू) सोचते थे कि सरकारी अधिकारियों को सार्वजनिक जीवन में धर्म या धर्मस्थलों से नहीं जुड़ना चाहिए. वहीं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि उन्हें सभी धर्मों के प्रति बराबर और सार्वजनिक सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए.
सोमनाथ मंदिर के उदघाटन के वक्त 1951 में राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि 'भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन नास्तिक राष्ट्र नहीं है'.

नेहरू ने पारित करवाया हिंदू कोड बिल

पंडित जवाहर लाल नेहरू
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि का काफ़ी ध्यान रखा
जब प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू हिंदुओं के पारिवारिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए हिंदू आचार संहिता विधेयक लाने की कोशिश में थे, तब तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद इसके खुले विरोध में थे.
राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि लोगों के जीवन और संस्कृति को प्रभावित करने वाला कानून न बनाया जाए.
हिंदू महासभा और अन्य हिंदूवादी संगठनों ने भी इसका कड़ा विरोध किया था, लेकिन विरोध को दरकिनार करते हुए सरकार ने हिंदू आचार संहिता विधेयक पारित किया.
विधेयक का विरोध करने वालों ने तब तत्कालीन क़ानून मंत्री बीआर अंबेडकर के बारे में जातिसूचक टिप्पणियां की थीं और कहा था कि एक दलित को ब्राह्मणों के मामले में दखल नहीं देना चाहिए.

शाहबानो केस पर सियासत

धर्म के राजनीति पर असर का एक बडा़ उदाहरण शाहबानो केस भी है.
मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली पांच बच्चों की मां शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी अपने पति से हर्जाना नहीं मिल सका. कारण था मुस्लिम मामलों को लेकर हुई राजनीति.
मुस्लिम धर्मगुरुओं को पारिवारिक और धार्मिक मामलों में अदालत का दख़ल मुस्लिम अधिकारों के लिए खतरा लगा.
1973 में बने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरज़ोर विरोध किया.
आखिरकार 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया.
हालांकि बिल पारित होने के बाद हिंदूवादी संगठनों ने राजीव गांधी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाया था.

सिख दंगों पर राजीव गांधी का बयान

1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी. इसके बाद देशभर में सिख विरोधी दंगे हुए. दिल्ली समेत देश के कई इलाकों में हुए इन दंगों में हजारों सिखों की हत्या कर दी गई थी.
इंदिरा के जन्मदिवस 19 नवंबर 1984 को दिल्ली के बोट क्लब पर उनकी याद में रखी गई सभा में राजीव गांधी ने कहा था, 'इंदिराजी की हत्या के बाद देश के कुछ हिस्सों में दंगे हुए हैं. हम जानते हैं कि लोग बहुत गुस्से में थे और कुछ दिनों तक ऐसा लग रहा था जैसे पूरा भारत हिल गया हो. किसी बड़े पेड़ के गिरने के बाद उसके आसपास की धरती का हिलना स्वाभाविक है.'
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इस बयान को दंगों को जायज़ ठहराने की कोशिश के बतौर देखा जाता रहा है. इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने हिंदुओं के इकतरफा समर्थन के कारण 411 सीटें जीतीं.

बाबरी विध्वंस

आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी
छह दिसंबर 1992 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और शिवसेना जैसे हिंदुत्ववादी संगठनों के कारसेवकों ने अयोध्या की भूमि पर 16वीं शताब्दी से खड़ी बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया.
बाबरी विध्वंस से पहले और बाद में भीषण दंगे हुए, जिनमें कई हजार लोगों की जान गई.
जिस वक़्त बाबरी मस्जिद गिराई गई, उस वक़्त उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी.
छह दिसंबर को ही अयोध्या में इकट्ठे लाखों कारसेवकों को लालकृष्ण आडवाणी और संघ परिवार के कई अन्य नेताओं ने संबोधित किया था.
रैली से पहले आयोजकों ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया था कि मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा.
बाबरी विध्वंस की जांच के लिए गठित लिब्राहन आयोग ने 16 साल की पड़ताल के बाद जून 2009 में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बाबरी विध्वंस पूर्व नियोजित था.

गुजरात दंगों पर नारायणन की नसीहत

2002 के गुजरात दंगे
केआर नारायणन का मानना था कि केंद्र सरकार चाहती तो गुजरात के दंगों को रोक सकती थी
गुजरात दंगों के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को कई पत्र लिखे थे.
हालांकि इन पत्रों को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया.
सूचना के अधिकार के तहत केंद्रीय सूचना आयोग ने इन पत्रों को सार्वजनिक करने का आदेश दिया था लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने जुलाई 2012 में सूचना आयोग के आदेश पर रोक लगा दी थी.
रेडिफ डॉट कॉम को 2005 में दिए एक साक्षात्कार में पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन ने माना था कि गुजरात दंगों में सरकार और प्रशासन ने मदद की थी.
नारायणन के मुताबिक उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को कई पत्र लिखकर और मुलाकात करके दंगे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के लिए कहा था लेकिन 'सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही.'
नारायणन का कहना था कि केंद्र सरकार के पास सेना भेजकर दंगे रोकने का संवैधानिक अधिकार और जिम्मेदारी थी.
नारायणन के मुताबिक केंद्र सरकार ने दंगों के दौरान देश के तमाम नागरिकों को सुरक्षा देने के अपने राजधर्म का पालन नहीं किया था.

जिन्ना पर आडवाणी की टिप्पणी

लालकृष्ण आडवाणी
कभी हिंदुत्व की आवाज रहे आडवाणी को जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताना काफ़ी महँगा पड़ा
भारतीय जनता पार्टी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 2005 की अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता बताया था. उन्होंने पाकिस्तान के क़ायद-ए-आज़म जिन्ना के मजार पर रखी गेस्टबुक में लिखा था, "बहुत कम लोग होते हैं जो इतिहास बनाते हैं. क़ायद-ए-आज़म उन चुनिंदा लोगों में से एक हैं. सरोजिनी नायडू ने उन्हें हिंदू मुस्लिम एकता का दूत बताया था. उनका संबोधन एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की सशक्त सहभागिता है, जिसमें हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार हो. देश नागरिकों के धर्म के आधार पर कोई फर्क नहीं करेगा. मैं इस महान व्यक्तित्व को सलाम करता हूं."
आडवाणी के इस बयान का भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कड़ा विरोध किया था. आडवाणी ने सफाई भी दी, लेकिन वो बेकार गई.
अंततः उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा, जिसे बाद में वापस ले लिया गया. इस विवाद से आडवाणी की छवि पर इतना असर हुआ कि उन्हें आख़िर पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ना ही पड़ा.

संजय गाँधी, पिट्स विमान और वो हादसा जिसने उनकी जान ली @रेहान फ़ज़ल

राजीव और संजय गाँधी दोनों को गति और मशीनों से गहरा लगाव था. एक ओर जहाँ राजीव विमानन नियमों का पालन करते थे वहीं संजय विमान को कार की तरह चलाया करते थे.
तेज़ हवा में कलाबाज़ियां खाना उनका शौक हुआ करता था. 1976 में उन्हें हल्के विमान उड़ाने का लाइसेंस मिला था, लेकिन इंदिरा गाँधी के सत्ता से हटते ही जनता सरकार ने उनका लाइसेंस छीन लिया था.
इंदिरा गाँधी के सत्ता में दोबारा वापस आते ही उनका लाइसेंस भी उन्हें वापस मिल गया था. 1977 से ही इंदिरा परिवार के नज़दीकी धीरेंद्र ब्रह्मचारी एक ऐसा टू सीटर विमान ‘पिट्स एस 2ए’ आयात करवाना चाह रहे थे, जिसे ख़ासतौर पर हवा में कलाबाज़ियां खाने के लिए बनाया गया हो.
मई 1980 में जाकर भारत के कस्टम विभाग ने उसे भारत लाने की मंज़ूरी दी. आनन-फानन में उसे असेंबल कर सफ़दरजंग हवाई अड्डे स्थित दिल्ली फ़्लाइंग क्लब में पहुंचा दिया गया.
संजय पहले ही दिन उस विमान को उड़ाना चाह रहे थे, लेकिन पहला मौका फ़्लाइंग क्लब के इंस्ट्रक्टर को मिला. संजय ने पहली बार 21 जून 1980 को नए पिट्स पर अपना हाथ आज़माया.
दूसरे दिन यानी 22 जून को अपनी पत्नी मेनका गाँधी, इंदिरा गाँधी के विशेष सहायक आर के धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को लेकर उन्होंने उड़ान भरी और 40 मिनट तक दिल्ली के आसमान पर विमान उड़ाते रहे.

रिहायशी इलाक़े पर पिट्स के तीन लूप और..

इंदिरा गाँधी, सोनिया गाँधी
अगले दिन यानी 23 जून को माधवराव सिंधिया उनके साथ पिट्स की उड़ान भरने वाले थे, लेकिन संजय गाँधी सिंधिया के बजाए दिल्ली फ़्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के घर जा पहुँचे जो सफ़दरजंग हवाई अड्डे के बगल में ही रहते थे.
उन्होंने कैप्टन सक्सेना से कहा कि वह उनके साथ फ़्लाइट पर चलें. संजय अपनी कार पार्क करने चले गए और सुभाष अपने एक सहायक के साथ फ़्लाइंग क्लब के मुख्य भवन में पहुंचे.
कैप्टन सक्सेना बहुत जल्दी में नही थे और शायद इसीलिए उन्होंने एक चाय का भी ऑर्डर कर दिया. अभी उन्होंने चाय का एक घूंट ही लिया था कि उनका चपरासी दौड़ता हुआ आया और बोला कि संजय गाँधी विमान में बैठ चुके हैं और उन्हें तुरंत बुला रहे हैं.
कैप्टन सक्सेना ने अपने सहायक को यह कहकर घर भेज दिया कि वो 10-15 मिनट में वापस लौट आएंगे. कैप्टन सक्सेना पिट्स के अगले हिस्से में बैठे और संजय ने पिछले हिस्से में बैठकर कंट्रोल संभाला.
ठीक सात बजकर 58 मिनट पर उन्होंने टेक ऑफ़ किया. संजय ने सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाके के ऊपर ही तीन लूप लगाए.
वो चौथी लूप लगाने ही वाले थे कि कैप्टन सक्सेना के सहायक ने नीचे से देखा कि विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया है. पिट्स तेज़ी से मुड़ा और नाक के बल ज़मीन से जा टकराया.

ज़मीन पर था मुड़ा-तुड़ा विमान, गहरा काला धुआँ

इंदिरा गाँधी
कंट्रोल टॉवर में बैठे विमान को देख रहे लोगों के मुँह खुले के खुले रह गए. जब उन्होंने देखा कि पिट्स अशोका होटल के पीछे एकदम से गुम हो गया. सक्सेना के सहायक ने भी तेज़ी से विमान को नीचे गिरते हुए देखा.
उसने अपनी साइकिल पकड़ी और पागलों की तरह चलाता हुआ सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचा. बिल्कुल नया पिट्स टू सीटर मुड़ी हुई धातु में बदल चुका था. उसमें से गहरा काला धुंआ निकल रहा था, लेकिन उसमें आग नहीं लगी थी.
रानी सिंह अपनी किताब 'सोनिया गाँधी: एन एक्सट्राऑर्डिनरी लाइफ़' में लिखती हैं, "सक्सेना के सहायक ने देखा कि संजय गाँधी का शव विमान के मलबे से चार फ़ीट की दूरी पर पड़ा था. कैप्टेन सक्सेना के शरीर का निचला हिस्सा विमान के मलबे में दबा हुआ था लेकिन सिर बाहर निकला हुआ था."
"ठीक उसी समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह एक, अकबर रोड पर बैठे इंदिरा गाँधी से मिलने का इंतज़ार कर रहे थे. अचानक वीपी सिंह ने सुना कि इंदिरा गाँधी के सहायक आरके धवन कह रहे हैं कि बहुत बड़ा हादसा हो गया है. बिखरे हुए बालों में इंदिरा गाँधी बाहर निकलीं और धवन के साथ एम्बेस्डर कार में घटनास्थल के लिए रवाना हो गईं."
"उनके पीछे पीछे वीपी सिंह भी वहां पहुंचे. इंदिरा गाँधी के पहुंचने से पहले ही फ़ायर ब्रिगेड ने विमान के मलबे से दोनों शव निकाल लिए थे और उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस में रखा जा रहा था."

ग़म के बावजूद असम की चिंता

रानी सिंह अपनी किताब में लिखती हैं, "इंदिरा गाँधी खुद एंबुलेंस में चढ़ गईं और राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचीं. वहां डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया."
"सबसे पहले अस्पताल पहुंचने वालों में अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर थे.इंदिरा गाँधी ने अपनी आंखों और भावनाओं को छिपाने के लिए काला चश्मा लगा रखा था."
पूपुल जयकर अपनी किताब 'इंदिरा गाँधी' में लिखती हैं कि उनको अकेले खड़े देख वाजपेयी ने आगे बढ़कर कहा, "इंदिरा जी इस कठिन मौके पर आपको बहुत साहस से काम लेना होगा. उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन वाजपेयी की तरफ इस अंदाज़ से देखा मानो यह कह रही हों कि आप कहना क्या चाह रहे हैं?"
"वाजपेयी थोड़े से विचलित हुए और सोचने लगे कि उन्होंने इंदिरा से यह कहकर कोई गलती तो नहीं कर दी. इसके बाद इंदिरा चंद्रशेखर की तरफ मुड़ीं और उन्हें एक तरफ ले जाकर बोलीं कि मैं कई दिनों से आपसे असम के बारे में बात करना चाह रही थी. वहां हालात बहुत गंभीर हैं."
"चंद्रशेखर ने कहा कि इसके बारे में बाद में बात करेंगे. इंदिरा ने जवाब दिया कि नहीं-नहीं, ये मामला बहुत महत्वपूर्ण है."
"आश्चर्यचकित चंद्रशेखर की समझ में ही नहीं आया कि कि एक माँ कैसे असम के बारे में बात कर सकती है जबकि उसके बेटे का शव बगल के कमरे में पड़ा हुआ है."

वीपी सिंह को निर्देश, मेनका को ढाढस

पूपुल जयकर की किताब के मुताबिक, "शाम को जब अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर और हेमवती नंदन बहुगुणा मिले तो वाजपेयी ने टिप्पणी की, 'या तो उन्होंने दुख को आत्मसात कर लिया है और या फिर वो पत्थर की बनीं हैं. वो शायद यह सिद्ध करना चाह रही हैं कि इस कठिन घड़ी में भी वह असम और भारत की समस्याओं के बारे में सोच रही हैं."
अस्पताल में उनके पीछे-पीछे पहुंचे विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी देखकर उन्होंने कहा कि आप तुरंत लखनऊ लौटिए क्योंकि वहां पर इससे बड़े मसले हल करने के लिए पड़े हैं. जब तक डॉक्टर संजय के क्षत-विक्षत शव को ठीक करने की कोशिश करते रहे, इंदिरा गाँधी उसी कमरे में खड़ी रहीं.
इस बीच हादसे की ख़बर सुनकर संजय गाँधी की पत्नी मेनका गाँधी अस्पताल पहुंच गई थीं. इंदिरा उस कमरे से बाहर निकलीं, जहां संजय का शव ठीक करने की कोशिश हो रही थी.
उन्होंने मेनका को दिलासा दिया और कहा कि वह बगल वाले कमरे में बैठकर इंतज़ार करें. उन्होंने कैप्टन सक्सेना की पत्नी और माँ को भी दिलासा दिया.
संजय के शव को ठीक करने में डॉक्टरों को तीन घंटे लग गए. जब उन्होंने अपना काम पूरा कर लिया तो इंदिरा ने उनसे कहा कि अब आप मुझे अपने बेटे के पास कुछ मिनटों के लिए अकेला छोड़ दीजिए.
वो थोड़ा झिझके, लेकिन इंदिरा ने उन्हें सख़्ती से बाहर जाने के लिए कहा. ठीक चार मिनट बाद वह कमरे से बाहर निकलीं. उस कमरे में गईं जहाँ मेनका बैठी हुई थीं और उन्हें बताया कि संजय अब इस दुनिया में नहीं हैं.

'अजीब किस्म की राहत'

वो अपनी देखरेख में संजय के शव को एक अकबर रोड लाईं, जहाँ उसे बर्फ़ की सिल्लियों पर एक प्लेटफॉर्म पर रखा गया. उनकी एक आंख और सिर पर अभी भी पट्टी बंधी हुई थी और नाक बुरी तरह से कुचली हुई थी.
अगले दिन संजय के अंतिम संस्कार के समय इंदिरा पूरे समय मेनका का हाथ अपने हाथ में लिए रहीं. जैसे ही चिता में आग देने के लिए राजीव ने हाथ आगे बढ़ाया, इंदिरा ने इशारे से उनसे रुकने के लिए कहा.
उन्होंने बताया कि संजय के शरीर से लिपटे कांग्रेस का झंडा हटाया नहीं गया है. शव के ऊपर रखी लकड़ियों को फिर से हटाया गया और झंडे को हटाकर संजय का अंतिम संस्कार किया गया.
25 जून को संजय की अस्थियों को घर लाकर एक अकबर रोड के लॉन में रखा गया. तब पहली बार इंदिरा अपने को रोक नहीं पाईं. उनकी आखों से आंसू बह निकले. राजीव गाँधी ने अपने हाथों से उनके कंधों को सहारा दिया.
चार दिनों के अंदर यानी 27 जून को इंदिरा साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर में फ़ाइलों पर दस्तख़त कर रही थीं जैसे कुछ हुआ ही न हो.
राज थापर ने अपनी किताब 'ऑल दीज़ इयर्स' में लिखा है, "संजय की मौत पर लोग रोए और पूरा देश ग़मगीन हो गया क्योंकि यह दुखद घटना तो थी ही. लेकिन इसे विडंबना ही कहिए कि इसके साथ ही लोगों में एक अजीब किस्म की राहत भी थी जिसे पूरे भारत में महसूस किया गया.."
सालों बाद इंदिरा के चचेरे भाई और अमरीका में भारत के राजदूत रहे बीके नेहरू ने भी अपनी किताब 'नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड' में भी कमोबेश इसी भावना का इज़हार किया.

जब इंदिरा गांधी ने दिया भारत को शॉक ट्रीटमेंट @रेहान फ़ज़ल

25 जून 1975 की सुबह पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के फ़ोन की घंटी बजी. उस समय वह दिल्ली में ही बंग भवन के अपने कमरे में अपने बिस्तर पर लेटे हुए थे.
दूसरे छोर पर इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आरके धवन थे जो उन्हे प्रधानमंत्री निवास पर तलब कर रहे थे. जब राय 1 सफ़दरजंग रोड पहुँचे तो इंदिरा गांधी अपनी स्टडी में बड़ी मेज़ के सामने बैठी हुई थीं जिस पर ख़ुफ़िया रिपोर्टों का ढ़ेर लगा हुआ था.
अगले दो घंटों तक वो देश की स्थिति पर बात करते रहे. इंदिरा का कहना था कि पूरे देश में अव्यवस्था फैल रही है. गुजरात और बिहार की विधानसभाएं भंग की जा चुकी हैं. इस तरह तो विपक्ष की मांगों का कोई अंत ही नहीं होगा. हमें कड़े फ़ैसले लेने की ज़रूरत है.

'शॉक ट्रीटमेंट'

इंदिरा ने ये भी कहा कि वो अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की हेट लिस्ट में सबसे ऊपर हैं और उन्हें डर है कि कहीं उनकी सरकार का भी सीआई ए की मदद से चिली के राष्ट्रपति सालवडोर अयेंदे की तरह तख़्ता न पलट दिया जाए.
बाद में एक इंटरव्यू में भी इंदिरा ने स्वीकार किया किया कि भारत को एक ‘शॉक ट्रीटमेंट’ की ज़रूरत थी. इंदिरा ने सिद्धार्थ को इसलिए बुलाया था क्योंकि वह संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ माने जाते थे.
मज़े की बात ये थी कि उन्होंने तब तक अपने कानून मंत्री एच आर गोखले से इस बारे में कोई सलाह मशविरा नहीं किया था. राय ने कहा कि मुझे वापस जाकर संवैधानिक स्थिति को समझने दीजिए. इंदिरा राज़ी हो गईं लेकिन यह भी कहा कि आप ‘जल्द से जल्द’ वापस आइए.
राय ने वापस आकर न सिर्फ़ भारतीय बल्कि अमरीकी संविधान के संबद्ध हिस्सों पर नज़र डाली. वो दोपहर बाद तीन बज कर तीस मिनट पर दोबारा 1 सफ़दरजंग रोड पहुँचे और इंदिरा को बताया कि वो आंतरिक गड़बड़ियों से निपटने के लिए धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर सकतीं हैं.
इमरजेंसी के घोषणा के दिन दिल्ली की बिजली काटे जाने के ख़िलाफ़ थीं इंदिरा
इंदिरा ने राय से कहा कि वो आपातकाल लगाने से पहले मंत्रिमंडल के सामने इस मामले को नहीं लाना चाहतीं. इस पर राय ने उन्हें सलाह दी कि वो राष्ट्रपति से कह सकतीं हैं कि मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने के लिए पर्याप्त समय नहीं था.

फ़ख़रुद्दीन अली अहमद

इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर राय से कहा कि वो इस प्रस्ताव के साथ राष्ट्रपति के पास जाएं. कैथरीन फ़्रैंक अपनी किताब इंदिरा में लिखती हैं कि इसका राय ने ये कह कर विरोध किया कि वो पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री हैं, प्रधानमंत्री नहीं.
हाँ उन्होंने ये पेशकश ज़रूर कर दी कि वो उनके साथ राष्ट्रपति भवन चल सकते हैं. ये दोनों शाम साढ़े पांच बजे वहाँ पहुंचे. सारी बात फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को समझाई गई. उन्होंने इंदिरा से कहा कि आप इमरजेंसी के कागज़ भिजवाइए.
जब राय और इंदिरा वापस 1 सफ़दरजंग रोड पहुँचे तब तक अंधेरा घिर आया था. राय ने इंदिरा के सचिव पीएन धर को ब्रीफ़ किया. धर ने अपने टाइपिस्ट को बुला कर आपातकाल की घोषणा के प्रस्ताव को डिक्टेट कराया. सारे कागज़ों के साथ आर के धवन राष्ट्रपति भवन पहुँचे.

सुबह 6 बजे कैबिनेट की बैठक

इंदिरा ने निर्देश दिए कि मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों को अगली सुबह 5 बजे फ़ोन कर बताया जाए कि सुबह 6 बजे कैबिनेट की बैठक बुलाई गई है. जब तक आधी रात होने को आ चुकी थी लेकिन सिद्धार्थ शंकर राय अभी भी 1 सफ़दरजंग रोड पर मौजूद थे. वो इंदिरा के साथ उस भाषण को अंतिम रूप दे रहे थे जिसे इंदिरा अगले दिन मंत्रिमंडल की बैठक के बाद रेडियो पर देश के लिए देने वाली थीं.
बीच बीच में संजय उस कमरे में आ जा रहे थे. एक दो बार उन्होंने 10-15 मिनटों के लिए इंदिरा गांधी को कमरे से बाहर भी बुलाया. उधर आर के धवन के कमरे में संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बना रहे थे जिन्हें गिरफ़्तार किया जाना था. उस लिस्ट के अनुमोदन के लिए इंदिरा को बार बार कमरे से बाहर बुलाया जा रहा था.
ये तीनों लोग इस बात की भी योजना बना रहे थे कि अगले दिन कैसे समाचारपत्रों की बिजली काट कर सेंसर शिप लागू की जाएगी. जब तक इंदिरा ने अपने भाषण को अंतिम रूप दिया सुबह के तीन बज चुके थे.

सेंसरशिप

सेंसरशिप की घोषणा के पीछे संजय गांधी के सिपहसलारों की भूमिका अहम थी
राय ने इंदिरा से विदा ली लेकिन गेट तक पहुंचते पहुंचते वो ओम मेहता से टकरा गए. उन्होंने उन्हें बताया कि अगले दिन अख़बारों की बिजली काटने और अदालतों को बंद रखने की योजना बना ली गई है. राय ने तुरंत इसका विरोध किया और कहा, "ये बेतुका फ़ैसला है. हमने इसके बारे में तो बात नहीं की थी. आप इसे इस तरह से लागू नहीं कर सकते."
राय वापस मुड़े और धवन के पास जा कर बोले कि वो इंदिरा से फिर मिलना चाहते हैं. धवन ने कहा कि वो सोने जा चुकीं हैं. राय ने ज़ोर दिया,’मेरा उनसे मिलना ज़रूरी है.’
बहुत झिझकते हुए धवन इंदिरा गांधी के पास गए और उन्हें ले कर बाहर आए. राय ने कैथरीन फ़्रैंक को बताया कि जब उन्होंने इंदिरा को बिजली काटने वाली बात बताई तो उनके होश उड़ गए.
उन्होंने राय से इंतज़ार करने के लिए कहा और कमरे से बाहर चली गईं. इस बीच धवन के दफ़्तर से संजय ने बंसी लाल को फ़ोन किया कि राय बिजली काटने की योजना का विरोध कर रहे हैं.
बंसी लाल ने जवाब दिया, "राय को निकाल बाहर करिए... वो खेल बिगाड़ रहे हैं. वो अपने आपको बहुत बड़ा वकील समझते हैं लेकिन उन्हें कुछ आता जाता नहीं."(जग्गा कपूर, वाट प्राइस पर्जरी: फ़ैक्ट्स ऑफ़ शाह कमीशन)
जब राय इंदिरा का इंतेज़ार कर रहे थे तो ओम मेहता ने उन्हें बताया कि इंदिरा सेंसरशिप तो चाहती हैं लेकिन अख़बारों की बिजली काटने और अदालतें बंद करने का आइडिया संजय का है.
जब इंदिरा वापस लौटीं तो उनकी आंखें लाल थीं. उन्होंने राय से कहा, "सिद्धार्थ बिजली रहेगी और अदालतें भी खुलेंगीं." राय इस ख़ुशफ़हमी में वापस लौटे कि सब कुछ ठीक हो गया है.

जेपी की गिरफ़्तारी

जब तक 26 जून को तड़के इंदिरा सोने गईं, गिरफ़्तारियों शुरू हो चुकीं थी. सबसे पहले जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई को हिरायत में लिया गया.इंदिरा गांधी ने सिर्फ तीन लोगों की गिरफ़्तारी की अनुमति नहीं दी थी. वो थे तमिलनाडु के नेता कामराज, बिहार के समाजवादी नेता और जयप्रकाश नारायण के साथी गंगासरन सिन्हा और पुणे के एक और समाजवादी नेता एसएम जोशी.
दिल्ली के बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर जब अख़बार प्रिंट के लिए जा रहे थे, तभी उनकी बिजली काट दी गई. अगले दिन सिर्फ हिंदुस्तान टाइम्स और स्टेट्समैन ही छप पाए क्योंकि उनके प्रिंटिंग प्रेस बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर नहीं थे.
इंदिरा उस रात बहुत कम सो पाईं लेकिन जब वो तड़के सुबह कैबिनेट की बैठक में आईं तो बिल्कुल भी थकी हारी नहीं लग रहीं थीं. आठ कैबिनेट मंत्रियों और पांच राज्य मंत्रियों ने बैठक में हिस्सा लिया.( नौ मंत्री दिल्ली से बाहर थे.)
जैसे ही ये लोग बैठक में आए उन्हें आपातकाल उद्घोषणा और गिरफ़्तार किए गए नेताओं की लिस्ट दी गई. इंदिरा ने बताया कि आपात काल लगाने की ज़रूरत क्यों हुई.

स्वर्ण सिंह का सवाल

सिर्फ़ एक मंत्री ने सवाल पूछा. वो थे रक्षा मंत्री स्वर्ण सिंह. उनका सवाल था,’किस कानून के तहत गिरफ़्तारियां हुई हैं?’ इंदिरा ने उनको संक्षिप्त जवाब दिया जिसे वहाँ मौजूद बाकी लोग नहीं सुन पाए.
कोई मतदान नहीं हुआ, कोई मंत्रणा नहीं हुई. पीएन धर ने अपनी किताब इंदिरा गांधी, द इमरजेंसी एंड इंडियन डेमोक्रेसी में लिखा कि भारत में इंमरजेंसी को मंज़ूरी देने वाली ये बैठक मात्र आधे घंटे में ख़त्म हो गई.
आपातकाल को किसी ने चुनौती नहीं दी. कुछ महीनों बाद संपादकों को साथ एक बैठक में इंदिरा ने बिल्कुल सही फ़रमाया,’ वेन आई इंपोज़्ड द इमरजेंसी नॉट ईविन ए डॉग बार्क्ड.

इंदिरा गांधी और लोकतंत्र @कमलेश्वर


इंदिरा गांधी
इंदिरा गांधी
इंदिरा गाँधी एक बहुत बड़ा व्यक्तित्व हैं. मात्र राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय भी. उनके बारे में हज़ारों लोगों को कहने-बताने और बोलने का अधिकार है. मेरे पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है.

मैं उनके निकटतमों और अंतरंगों का हिस्सा नहीं हूँ लेकिन वे सत्ता से वीतराग अपने आदर्शों, सपनों और मूल्यों को पहचानने वालों को पहचानती थीं. शायद यही कारण था जयप्रकाश जी के आपातकाल-विरोधी, सम्पूर्ण-क्रांति आंदोलन को सहमति देने वाले व्यक्ति को उन्होंने अछूत या विरोधी नहीं माना था बल्कि उस दौर के पूरे तूफ़ान को झेलने के बाद जब वो दोबारा 1980 में सत्ता में आई थीं, तो उन्होंने मुझे बुलाकर भारतीय दूरदर्शन का दायित्व सौंपा था.

यह एक नितांत आश्चर्यजनक स्थिति थी क्योंकि मैं ही उस 'आंधी' फ़िल्म का लेखक था, जिसे आपातकाल में 'इंदिरा विरोधी' घोषित करके मुझे बहुत परेशान किया गया था. तब मुंबई में मेरी गिरफ़्तारी का वारंट भी जारी हो गया था, जिससे मैं भूमिगत होकर बचा था.

बहरहाल तो, जब मैंने भारतीय दूरदर्शन के एडीशनल डायरेक्टर जनरल (प्रोग्राम) के रूप में काम संभाला तो इंदिरा गाँधी ने विशेष तौर पर मुझे दस मिनट मिलने का समय दिया था. मैं उनसे प्रधानमंत्री कार्यालय में उपस्थित होकर मिला था.

लोकतंत्र का सम्मान

कमलेश्वर से इंदिरा गांधी ने कहा
 आप देखिए और तय कीजिए कि अपने देश में लोकतंत्र जीवित रहे. मेरे ऊपर आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को बाधित करने का बड़ा इल्ज़ाम है, लेकिन वह मेरी मजबूरी थी क्योंकि जयप्रकाश जी के साथ हिंदू सांप्रदायिक ताकतें शामिल हो गई थीं. संजय की वजह से कुछ गलतियाँ-ज़्यादतियाँ हुईं, वह पार्टीशन के बाद की नाज़ुक सच्चाइयों को नहीं समझता था
 
तब दूरदर्शन भारत का एक मात्र टीवी चैनल था. मैं उनसे निर्देश लेकर कार्यभार संभालना बेहतर समझता था. इस पर उन्होंने कहा था- "आप देखिए और तय कीजिए कि अपने देश में लोकतंत्र जीवित रहे. मेरे ऊपर आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को बाधित करने का बड़ा इल्ज़ाम है, लेकिन वह मेरी मजबूरी थी क्योंकि जयप्रकाश जी के साथ हिंदू सांप्रदायिक ताकतें शामिल हो गई थीं. संजय की वजह से कुछ गलतियाँ-ज़्यादतियाँ हुईं, वह पार्टीशन के बाद की नाज़ुक सच्चाइयों को नहीं समझता था."

यह उन्होंने कहा तो नहीं, पर उनकी बात का संकेत साफ़ था कि यदि वे संजय की सोच से सहमत होतीं तो दमनकारी इमरजेंसी को जारी रख सकती थीं, पर इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खतरा था, इसीलिए संजय से असहमत होकर, उससे बगैर पूछे या बात किए उन्होंने आपातकाल ख़त्म करके आम चुनावों की घोषणा की थी.
मेरे लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का इतना दिशा-निर्देश काफ़ी था. उन्होंने इतना ही कहा, "लोकतंत्र जीवित रहेगा तो भारत की सही विविधतावादी संस्कृति भी जीवित रहेगी. आप इसी की रक्षा कीजिए". तब चलते-चलते मैंने उन्हें बताया, "मैडम, मैं वही कमलेश्वर हूँ जिसने 'आंधी' फ़िल्म लिखी थी, इसलिए आपको मेरे बारे में कोई ग़लतफहमी नहीं होनी चाहिए. इससे पहले की कोई आपको मेरे बारे में बतलाए, मैंने यह बता देना अपना कर्त्तव्य समझा."

उन्होंने जो कहा वह आज भी मेरे दिलो-दिमाग पर अंकित है.

उन्होंने कहा, "डेमोक्रेसी में ज़िम्मेदाराना मतभेद भी होता है, उसको सुनना ज़रूरी है, अब आपके दूरदर्शन के मतभेद को भी मैं सुनूंगी. आप जाइए, ज्वाइन कीजिए और अपने को बात कहने के लिए आज़ाद समझिए."
तो मेरे अनुभवों की सच्चाइयों के बीच ऐसी थीं इंदिरा गाँधी

अस्तित्व के लिए जूझता वामपंथ @बलबीर पुंज

व्यक्तिगत जीवन की तरह कई बार राजनीतिक परिदृश्य में भी विडंबनाएं होती हैं। जिस वामपंथी विचारधारा ने मजहब के नाम पर देश के रक्तरंजित विभाजन में सक्रिय भूमिका निभाई हो, वह आज अपने आप को सांप्रदायिक सद्भाव का पुरोधा मानता है और उसके मापदंड तय करने का दावा भी करता है। भारतीय जनता पार्टी नीत राजग सरकार की एक साल की उपलब्धियां देश के साथ साझा करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मस्थान दीनदयाल धाम का चयन किया था। इसे मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा बता रही है। उसके अनुसार इसके पीछे सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अयोध्या, मथुरा और काशी को मुक्त कराने का एजेंडा है। मा‌र्क्सवादी पार्टी का आरोप है कि इसी संदेश को जनता के बीच पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात की सीट त्याग कर वाराणसी सीट से सांसद बनना स्वीकार किया।

दीनदयाल जी संघ के आदर्श स्वयंसेवक होने के साथ ही श्रेष्ठ राष्ट्रचिंतक और विचारक थे। 'एकात्म मानववाद' के सिद्धांत का प्रतिपादन कर पं. दीनदयाल जी ने आधुनिक राजनीति, अर्थव्यवस्था और राजनीति के लिए मानव कल्याण का एक भारतीय वैचारिक अधिष्ठान प्रस्तुत किया। दीनदयाल जी मानवीय मूल्यों पर आधारित आर्थिक प्रगति की वकालत करते थे। उनका कहना था, 'हम इस भारत की कर्मभूमि में कर्म करने के लिए पैदा हुए हैं। अगर देश में एक व्यक्ति भी दरिद्र, भूखा और उपेक्षित है तो उस समाज को विकसित और सभ्य नहीं कहा जा सकता है। इसलिए जिनके सामने रोजी और रोटी का सवाल है, जिन्हें न रहने के लिए मकान है और न तन ढकने के लिए कपड़ा, गांवों और शहरों के इन करोड़ों निराश भाई-बहनों को सुखी बनाना ही हमारा व्रत और कर्तव्य है।' प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार विकास से वंचित समाज के उत्थान में जुटी है। इसलिए 'अंत्योदय' की प्रेरणा देने वाले दीनदयाल उपाध्याय की जन्मभूमि से बेहतर स्थान उस उद्देश्य के लिए और कौन हो सकता था? मथुरा में सांसद हेमा मालिनी ने प्रधानमंत्री को श्रीकृष्ण की प्रतिमा भेंट की थी। धर्म को जनता की अफीम बताने वाले मा‌र्क्सवादियों के लिए यह भी सांप्रदायिक सद्भाव के खिलाफ है। मा‌र्क्सवाद के प्रारंभिक प्रचारक जब भारत आए तो कुंभ मेले में जन-सैलाब को देखकर उन्हें बड़ी मायूसी हुई थी और उन्होंने तब ही यह मान लिया था कि इस अध्यात्म प्रधान देश में साम्यवाद का पल्लवित होना मुश्किल काम है। आश्चर्य नहीं कि जन्म के करीब सौ साल बाद भी इस विशाल देश के मात्र तीन राज्यों में ही पार्टी अपना सीमित असर बना पाई है। किंतु विकृत सेक्युलरवाद को पोषित कर वे समाज में अपनी उपस्थिति बनाए रखने की जुगत में रहते हैं।

विचारधारा कोई भी दर्शन बघारे, उसका मूल्यांकन उसके परिणाम से होता है। दुनिया के जिस भाग में साम्यवादियों की सरकार आई, वहां साधारण नागरिक के अधिकार भी छिन गए और जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए लोगों को तरसना पड़ा। नब्बे के दशक तक विश्व में समाजवाद का मुलम्मा उतर गया था। सोवियत संघ में तो समाजवादी ढांचे के कारण बदहाली और तंगहाली का आलम यह था कि लोगों को अपनी हर जरूरत के लिए लाइन पर लगना होता था। सोवियत-आर्थिक ढांचे से प्रेम के कारण ही अपने देश में भी यही स्थिति आई और 1991 में देश को अपनी अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को पूरा करने के लिए अपना स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा था। चीन में साम्यवाद का अस्तित्व बना हुआ है तो उसका कारण यह है कि वहां माओ के बाद के शासकों ने समय रहते खतरे की आहट भांप ली और वामपंथी अधिनायकवाद के नीचे एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना की।

मुस्लिम लीग को छोड़कर मा‌र्क्सवादियों का ही वह अकेला राजनीतिक कुनबा था, जिसने मजहब आधारित पाकिस्तान के सृजन को न्यायोचित ठहराया। मोहम्मद अली जिन्ना को मा‌र्क्सवादियों ने ही वे सारे तर्क-कुतर्क उपलब्ध कराए, जो उसे अलग पाकिस्तान के निर्माण के लिए चाहिए थे। आजादी के बाद केरल में कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री ईएमएस नंबूदरीपाद ने मुस्लिम बहुल एक नए जिले-मल्लपुरम का सृजन किया। वह चाहे सद्दाम हुसैन का मसला हो या फलस्तीन-ईरान का-मा‌र्क्सवादी एक समुदाय विशेष के मजहबी जुनून में हमेशा शरीक होते आए। विदेशी विचारधारा से प्रेरित और विदेशी धन से पोषित वामपंथी न कभी अपने आप को भारत से जोड़ सके, न ही उसे समझा। कम्युनिस्टों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत का साथ दिया। अंग्रेजों के लिए जासूसी की। गांधीजी और सुभाष चंद्र बोस को गालियां दीं। आजादी के बाद उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता को मानने से इंकार किया। वस्तुत: कम्युनिस्टों ने भारत की एकता के बजाए उसे टुकड़ों में बांटे रखने की हरसंभव कोशिश की। इसी कारण केएम अशरफ और हिरेन मुखर्जी जैसे कामरेडों ने भारत को राष्ट्र न मानकर उसे राच्यों का समूह मात्र ही माना। 1948 में भारतीय सेना के खिलाफ हैदराबाद के रजकरों को इसी कारण कम्युनिस्टों ने अपनी पूरी मदद दी। जब नक्सली नेता चारू मजूमदार ने 'चीन का चेयरमैन माओ हमारा चेयरमैन' कहा, तब भी कम्युनिस्टों ने साथ-साथ नारे लगाए। 1962 के भारत-चीन युद्ध में मा‌र्क्सवादी चीन के साथ खड़े रहे। चीन और रूस ने जब परमाणु परीक्षण किया तो उन्होंने उसकी सराहना की, किंतु जब 1998 में अटलजी की सरकार ने पोखरण परमाणु परीक्षण किया तो उसे विश्व शांति के लिए खतरा बताने वाले मा‌र्क्सवादी ही थे। दुनियाभर में साम्यवाद के दिन लद गए हैं। गिनती के जिन देशों में अधिनायकवादी साम्यवाद है, वहां मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन होता है। देश बदहाली और कंगाली के कगार पर है। कार्ल मा‌र्क्स के शिष्य व अक्टूबर क्रांति के दूत व्लादिमीर इल्यानोविच लेनिन को उनके ही देश में गहरे दफन कर दिया गया है, लेकिन हमारे कामरेड अभी भी उस सड़-गल गई विचारधारा पर प्रयोग कर देश को खुशहाली व उन्नति के मार्ग पर ले जाने का दावा करते हैं। यह हास्यास्पद नहीं तो और क्या है?

मा‌र्क्सवादी अलगाववादी ताकतों का खुलेआम समर्थन करते हैं। नक्सलवादी हों या कश्मीर के अलगाववादी, मा‌र्क्सवादी उन्हें अपनी कुतर्को की ढाल देते आए हैं। माओ ने शिनजियांग के अलगाववादी उइगर मुसलमानों के साथ पूरी कठोरता बरती, जबकि पं. बंगाल में मा‌र्क्सवादी राज में अलगाववादी इस्लामी कट्टरता को खूब पोषित किया गया। बांग्लादेश से बड़ी संख्या में मुस्लिम घुसपैठिए पश्चिम बंगाल और असम के सीमांत क्षेत्रों में सुनियोजित तरीके से बसाए जा रहे हैं, जिन्हें मा‌र्क्सवदियों और सेक्युलरिस्टों का अभयदान प्राप्त है। भारत में पंथनिरपेक्षता संविधान के किसी अनुच्छेद के कारण नहीं है। यह राम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर और गुरु नानकदेव की प्रेरणा से स्वत: स्फूर्त है। यदि भारत में आज संविधान के दो पक्ष-लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता जीवंत और गतिमान हैं तो उसका श्रेय भारत की कालजयी सनातन संस्कृति को जाता है। मथुरा और श्रीकृष्ण उसी के प्रतीक हैं।

Monday, 1 June 2015

'जिन्हें इमरजेंसी याद है वे वीसी शुक्ल को नहीं भूल सकते' @प्रमोद जोशी

जिस रोज़ माओवादी हमले में विद्या चरण शुक्ल के घायल होने की ख़बर मिली, काफी लोगों की पहली प्रतिक्रिया थी, कौन से वीसी शुक्ल इमरजेंसी वाले. वीसी शुक्ल पर इमरजेंसी का जो दाग लगा वह कभी मिट नहीं सका.
विद्याचरण शुक्ल मध्यप्रदेश के ताकतवर राजनेताओं में गिने जाते थे. उनके परिवार की ताकत और सम्मान का लाभ उन्हें मिला, पर उन्हें जिस बात के लिए याद रखा जाएगा वो ये कि वो ज्यादातर सत्ता के साथ रहे. ख़ासतौर से जीतने वाले के साथ.
इमरजेंसी के बाद शाह आयोग की सुनवाई के दौरान चार नाम सबसे ज्यादा ख़बरों में थे. इंदिरा गांधी, संजय गांधी, वीसी शुक्ल और बंसी लाल. इमरजेंसी के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा और सज़ा भी मिली, पर इमरजेंसी ने ही उन्हें बड़े कद का राजनेता बनाया.
वीसी शुक्ल का राजनीतिक जीवन शानदार रहा. उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि शानदार थी. वे देश के सबसे कम उम्र के सांसदों में से एक थे. 28 साल की उम्र में वे लोकसभा के सदस्य बने, राजसी ठाठ से जुड़े 'विलासों' के प्रेमी.

मौक़ापरस्त

नक्सलवादी
हाल ही में नक्सलवादियों ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला किया था
समय ने भी उनका हमेशा साथ दिया. साल 1962 के चुनाव में उन्होंने जनसंघ के खूबचंद बघेल को हराया. इसके ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट तक मुक़दमा गया. सुप्रीम कोर्ट ने उनका चुनाव अवैध घोषित किया. उनके छह साल तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी गई, पर चुनाव आयोग ने अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन पर लगी छह साल की पाबंदी हटा दी. 1964 में हुए चुनाव में पुरुषोत्तम कौशिक को हराकर वे फिर से लोकसभा में पहुँच गए.
इमरजेंसी की कथित धौंस-दपट और अखबारों की बिजली काटने, ताले डालने और संपादकों को कथित तौर पर जेल भेजने से ज्यादा वीसी शुक्ल को बेमिसाल मौकापरस्ती के लिए भी याद किया जाएगा. यह उनकी दूसरी पहचान थी.

प्री-सेंसरशिप के सूत्रधार

देश में इमरजेंसी लगने के ठीक पहले विद्याचरण शुक्ल रक्षा राज्यमंत्री थे. इंद्र कुमार गुजराल सूचना मंत्री थे. 20 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने दिल्ली के बोट क्लब पर रैली की. दूरदर्शन पर उसका लाइव कवरेज नहीं हो पाया. दिल्ली के अखबारों और मीडिया में रैली की फीकी कवरेज़ से इंदिराजी का ज़ायका बिगड़ गया.
पाँच दिन के भीतर गुजराल को राजदूत बनाकर मॉस्को भेज दिया गया. इमरजेंसी के साथ ही वीसी शुक्ल सूचना-प्रसारण मंत्री की कुर्सी पर बैठाए गए. मीडिया उनके नाम से घबराता था. बड़े-बड़े पत्रकारों को वे घास नहीं डालते थे.
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के गुडलिस्ट में थे विद्याचरण शुक्ल
राजेंद्र माथुर ने अपने लेख ‘उन्नीस महीनों के बाद रोशनी’ में लिखा है, "सूचना और प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ल ने आज़ादी का दीया बुझाने में उल्लेखनीय रोल अदा किया."

किशोर कुमार से बदला

फिल्मी गीतकारों और अभिनेताओं को उन्होंने सरकार की प्रशंसा के गीत गाने के लिए मज़बूर किया और उनके ही प्रदेश से जुड़े किशोर कुमार जैसे फक्कड़ गायक ने जब इंकार कर दिया, तो रेडियो से उनके गाने न बजाने के आदेश दे दिए गए. उनके घर पर आयकर छापे भी डाले गए. अंततः किशोर कुमार को झुकना पड़ा.
कई ख्याति प्राप्त अखबार बंद हो गए. जैसे रमेश थापर का 'सेमिनार', साने गुरुजी का साधना, राजमोहन गांधी का हिम्मत, अंग्रेज़ी त्रैमासिक क्वेस्ट, एडी गोरवाला का ओपीनियन....विद्याचरण शुक्ल ने बार-बार कहा कि पुरानी आज़ादी फिर कभी लौटने वाली नहीं है.
अखबारों पर प्री-सेंसरशिप के विरोध में कुछ संपादकों ने संपादकीय की जगह खाली छोड़ दी. इसपर 28 जून को उन्होंने संपादकों की बैठक बुलाकर उन्हें चेतावनी दी कि जगह खाली छोड़ना भी अपराध माना जाएगा.

किस्सा कुर्सी का

मशहूर गायक किशोर कुमार को उनका आदेश न मानने का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा था.
उन्हीं दिनों अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ रिलीज होने से रोक दी गई. उसके सारे प्रिंट भी नष्ट कर दिए गए. जनता-सरकार आने के बाद यह फिल्म फिर से रिलीज हुई.
इमरजेंसी के दौरान 'किस्सा कुर्सी का' ही सरकारी नाराज़गी की शिकार नहीं हुई. गुलज़ार की फिल्म ‘आंधी’ पर भी पाबंदी लगाई गई. फिल्म 'धर्मवीर' पर सरकारी एतराज के कारण उसकी रिलीज़ में पाँच महीने लग गए. फिल्म के संवादों में जहाँ-जहाँ जनता शब्द आया वहाँ प्रजा कराया गया.
वीसी शुक्ल की दूसरी पहचान मौका परस्ती की है. हालांकि वे शुरू से इंदिरा गांधी के करीबी थे, पर पहला मौका लगते ही उनका साथ छोड़ दिया. सन 1977 में पार्टी हारी, इंदिरा गांधी हारीं, वे खुद हारे. कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के कारण या शायद वक्त की नज़ाकत को देखते हुए वे किनारे हो गए.
1984 में राजीव गांधी ने उनका पुनरुद्धार किया, पर उन्होंने राजीव गांधी के खिलाफ बगावत का साथ दिया. विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ वे जनमोर्चा में चले गए.

जीतने वाले के साथ

वीपी सिंह के साथ मिलकर शुक्ल ने जनता दल बनाया और 1989-90 में उनकी नेशनल फ्रंट की सरकार में वे मंत्री बने
वीपी सिंह के साथ मिलकर उन्होंने जनता दल बनाया और 1989-90 में उनकी नेशनल फ्रंट की सरकार में वे मंत्री बने. जैसे ही 1990 में यह सरकार गिरी वे समाजवादी जनता पार्टी में चले गए और चन्द्रशेखर की कुछ महीनों की सरकार में मंत्री बने.
जब पीवी नरसिंह राव की सरकार बनी तो वे वापस कांग्रेस में आ गए. लेकिन 2000 में जब छत्तीसगढ़में सरकार बन रही थी तब मुख्यमंत्री की दावेदारी उनकी भी थी. कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं हुई. इसपर वीसी शुक्ल कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में चले गए.
2004 के चुनाव के ठीक पहले वे भाजपा में चले गए. महासमुंद सीट से वे फिर चुनावी मैदान में उतरे, पर अजीत जोगी ने उन्हें हरा दिया. बहरहाल उस चुनाव में एनडीए की पराजय हुई. शुक्ल साल 2007 में भाजपा छोड़कर फिर कांग्रेस में वापस आ गए.
इस महीने इमरजेंसी के 38 साल हो रहे हैं. जिन्हें वह दौर याद हैं, उन्हें वीसी शुक्ल भी याद रहेंगे.