Friday, 3 April 2015

ली कुआन की विरासत के सबक @एन के सिंह

ली कुआन यू की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए मैं पिछले दिनों सिंगापुर में था। सिंगापुर के संस्थापक पिता के रूप में वह हालिया इतिहास में सबसे लंबे समय तक (1959-1990) प्रधानमंत्री रहे। दो साल पहले तक, 89 साल की आयु में भी वह नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होकर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की महत्वपूर्ण सेवा की है। बल्कि रविवार को हमारे यहां भी राष्ट्रीय शोक घोषित था। हमारे इस व्यवहार ने सिंगापुर के नागरिकों के दिलो-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ा। सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज यू ने, जिनके साथ मैंने कुछ समय बिताया, मुझे बताया कि इस प्रतीकात्मक कदम ने उन सबके दिलों पर गहरा असर डाला है और वे इसके बड़े एहसानमंद हैं। मोदी का यह स्वनिर्णय उनके उच्च नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। नेता न सिर्फ अपने अनुभवों से उभरते हैं, बल्कि सही मौके की समझ भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। सही समय और सही अवसर को चुनना एक निर्णायक नेतृत्व की विशेषता है।

हर कोई जानता है कि इंदिरा गांधी और ली कुआन के कूटनीतिक संबंध गर्मजोशी से भरे नहीं थे। भारत के पास तिरस्कार का यह भाव था कि एक छोटे-से शहर जैसे देश के नेता को हम जैसे जटिल देश को आर्थिक उदारीकरण का पाठ नहीं पढ़ाना चाहिए। हम उनके परामर्श को संशय भरी निगाहों से देखते थे। खुद ली कुआन भी भारत को लेकर निराशा का भाव रखते थे, क्योंकि भारत उन अवसरों का फायदा नहीं उठा रहा था, जो उसकी तकदीर बदल सकते थे। 1990 के दशक में हमारे यहां उदारीकरण की नीति लागू होने के बाद ली कुआन के विचारों में कुछ-कुछ परिवर्तन आया। बीते 20 वर्षों में भारत-सिंगापुर की दोस्ती और साझेदारी सार्थक रूप से गहरी हुई है। भारत उनके लिए लोकतांत्रिक ढांचे के तहत एक बड़ी जनसांख्यिकी व विशाल मांग वाला देश था, जो प्रबंधकीय कौशल व प्रौद्योगिकी का एक बड़ा बाजार था।

यह कोई रहस्य नहीं है कि साल 1965 में मलयेशिया से सिंगापुर के बंटवारे के बाद यह तेजी से तीसरी दुनिया के देशों से विकसित अर्थव्यवस्था की कतार में आ गया। इसकी प्रति व्यक्ति आय, जो साल 1965 में 540 अमेरिकी डॉलर थी, वह साल 2014 में 54,040 डॉलर पर पहुंच गई। वह कारोबार के लिहाज से सबसे सुभीते वाले देशों की सूची में लगातार शीर्ष पर रहा है, साथ ही सफल सार्वजनिक-निजी भागीदारी का भी एक उदाहरण है। इसके बावजूद, कई लोग सिंगापुर को परिवार संचालित तंत्र मानते हैं। समयबद्ध चुनाव और सक्रिय पार्लियामेंट के बावजूद इसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को दबाया, मीडिया को अनुशासन में रहने को बाध्य किया। देश का युवा तबका इन नियंत्रणों के प्रति लगातार विरोध जताता रहा है। एक ऐसे देश में, जिसका कुल भौगोलिक दायरा 700 वर्ग किलोमीटर से अधिक नहीं है और जिसकी 50 लाख की जनसंख्या बूढ़ी हो रही है, निरंतर प्रवास ने सामाजिक बेचैनी को बढ़ाया है।

बेबाकी के साथ कहें, तो सिंगापुर की सफलता की कहानी में भारत के लिए चार सबक हैं। पहला,  सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को यदि भरपूर स्वायत्तता दी जाए, उन्हें उनसे संबंधित ज्ञान और उम्दा तकनीकी मुहैया कराया जाए, तो उत्पादकता को बढ़ाना और विकास करना संभव है। सिंगापुर एयरलाइंस, चांगी एयरपोर्ट और महत्वपूर्ण आधारभूत परियोजनाओं को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी टेमासेक संचालित करती है। सार्वजनिक क्षेत्र को सुचारु रूप में और सक्षम तरीके से चलाना तथा उसकी दक्षता बढ़ाते सिद्धांत व उत्पादकता सचमुच दोहराने के लायक हैं। दूसरा, सिंगापुर शहरी योजना और जल-प्रबंधन तंत्र के मामले में एक शानदार उदाहरण है। वहां एक बूंद पानी भी बरबाद नहीं होता। पानी की जितनी मात्र उपयोग में आती है, उसका रिसाइकिल किया जाता है और साथ ही, वर्षा-जल का प्रभावी परिशोधन होता है। जल संरक्षण तंत्र और शहरी योजना, दोनों हमारे लिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि हम पानी की कमी और अनियोजित शहरीकरण की समस्याओं से लगातार जूझ रहे हैं।

सिंगापुर सबसे स्मार्ट सिटी है। इस वास्तविकता को आंध्र पद्रेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तुरंत भांपा और राज्य की नई राजधानी अमरावती के निर्माण में सिंगापुर से मदद मांगी है। हम शहरों के लिए ऐसा कर सकते हैं और स्मार्ट शहरों को अधिक ठोस सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं। तीसरा,  नियंत्रित पूंजीवाद के लिए अक्सर चीन का उदाहरण पेश किया जाता है। इनोवेटिव संस्कृति में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन, प्रौद्योगिकी के उत्थान, बड़े प्रबंधकीय कौशल और सार्वजनिक संसाधनों से उनको जोड़ने की कला, ये सब मिलकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी का मॉडल तैयार करते हैं, जिसकी हमें जरूरत है। जोखिम-निर्धारण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के दुर्गंध को दूर करने व तमाम हितधारकों को पर्याप्त लाभ सुनिश्चित करने के संदर्भ में भारत अपने पीपीपी मॉडल को व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा है।

चौथा, श्रम कानूनों को बनाने में सिंगापुर का पारदर्शी प्रशासकीय तंत्र भारत के लिए सीख है। यहां पर अब श्रम-कानूनों में सुधार के मुद्दे ने नीति-नियंताओं का ध्यान आकृष्ट किया है। इसके अलावा, जहां भारत में मजदूर संगठनों की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति निवेश घटाती है, वहीं सिंगापुर इस शक्ति का इस्तेमाल शिक्षा और अन्य सामाजिक सेवाओं को सुधारने के लिए करता है। आखिर में,  सिंगापुर और उसके महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर जोर, मानव संसाधन विकास में निवेश, कौशल-शिक्षा प्रदान करना व भ्रष्टाचार निवारण के लिए नौकरशाहों को ऊंची तनख्वाहें देना, ये हमारे लिए महत्वपूर्ण सीख हैं। यह सच है कि सिंगापुर एक शहरीकृत देश है। इससे भी बड़ा सच यह है कि इसके पास न तो जनसंख्या संबंधी लाभ हैं और न ही वहां भाषा, जाति और धर्म के जटिल संघर्ष है, हमारे जैसे तंत्र में ये हैं। हां, छोटा हमेशा सुंदर नहीं होता, लेकिन सिंगापुर जैसे छोटे शहरीकृत देश के पास हमारे लिए कई सारी सीखें हैं।

ली कुआन की विरासत भारत को उसके चूके अवसरों की याद दिलाती रहेगी, और इस बात की भी कि हमारे नेताओं के अहंकार व उनकी अक्षमता ने हमारे आर्थिक और सामाजिक सुधारों को तब तक टाले रखा, जब तक कि हमारी आर्थिक बदहाली ने उसके लिए हमें मजबूर नहीं कर दिया। वैसे सीखने के लिए कोई देरी नहीं होती। आखिरकार हमने भी सफलतापूर्वक सुधार की राह पकड़ी। सिंगापुर के साथ गहरी साझेदारी को बढ़ावा देकर हम उसके संस्थापक पिता की विरासत से सही सीखों को अपना रहे हैं। 

ली कुआन की विरासत के सबक @एन के सिंह

ली कुआन यू की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए मैं पिछले दिनों सिंगापुर में था। सिंगापुर के संस्थापक पिता के रूप में वह हालिया इतिहास में सबसे लंबे समय तक (1959-1990) प्रधानमंत्री रहे। दो साल पहले तक, 89 साल की आयु में भी वह नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होकर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की महत्वपूर्ण सेवा की है। बल्कि रविवार को हमारे यहां भी राष्ट्रीय शोक घोषित था। हमारे इस व्यवहार ने सिंगापुर के नागरिकों के दिलो-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ा। सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज यू ने, जिनके साथ मैंने कुछ समय बिताया, मुझे बताया कि इस प्रतीकात्मक कदम ने उन सबके दिलों पर गहरा असर डाला है और वे इसके बड़े एहसानमंद हैं। मोदी का यह स्वनिर्णय उनके उच्च नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। नेता न सिर्फ अपने अनुभवों से उभरते हैं, बल्कि सही मौके की समझ भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। सही समय और सही अवसर को चुनना एक निर्णायक नेतृत्व की विशेषता है।

हर कोई जानता है कि इंदिरा गांधी और ली कुआन के कूटनीतिक संबंध गर्मजोशी से भरे नहीं थे। भारत के पास तिरस्कार का यह भाव था कि एक छोटे-से शहर जैसे देश के नेता को हम जैसे जटिल देश को आर्थिक उदारीकरण का पाठ नहीं पढ़ाना चाहिए। हम उनके परामर्श को संशय भरी निगाहों से देखते थे। खुद ली कुआन भी भारत को लेकर निराशा का भाव रखते थे, क्योंकि भारत उन अवसरों का फायदा नहीं उठा रहा था, जो उसकी तकदीर बदल सकते थे। 1990 के दशक में हमारे यहां उदारीकरण की नीति लागू होने के बाद ली कुआन के विचारों में कुछ-कुछ परिवर्तन आया। बीते 20 वर्षों में भारत-सिंगापुर की दोस्ती और साझेदारी सार्थक रूप से गहरी हुई है। भारत उनके लिए लोकतांत्रिक ढांचे के तहत एक बड़ी जनसांख्यिकी व विशाल मांग वाला देश था, जो प्रबंधकीय कौशल व प्रौद्योगिकी का एक बड़ा बाजार था।

यह कोई रहस्य नहीं है कि साल 1965 में मलयेशिया से सिंगापुर के बंटवारे के बाद यह तेजी से तीसरी दुनिया के देशों से विकसित अर्थव्यवस्था की कतार में आ गया। इसकी प्रति व्यक्ति आय, जो साल 1965 में 540 अमेरिकी डॉलर थी, वह साल 2014 में 54,040 डॉलर पर पहुंच गई। वह कारोबार के लिहाज से सबसे सुभीते वाले देशों की सूची में लगातार शीर्ष पर रहा है, साथ ही सफल सार्वजनिक-निजी भागीदारी का भी एक उदाहरण है। इसके बावजूद, कई लोग सिंगापुर को परिवार संचालित तंत्र मानते हैं। समयबद्ध चुनाव और सक्रिय पार्लियामेंट के बावजूद इसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को दबाया, मीडिया को अनुशासन में रहने को बाध्य किया। देश का युवा तबका इन नियंत्रणों के प्रति लगातार विरोध जताता रहा है। एक ऐसे देश में, जिसका कुल भौगोलिक दायरा 700 वर्ग किलोमीटर से अधिक नहीं है और जिसकी 50 लाख की जनसंख्या बूढ़ी हो रही है, निरंतर प्रवास ने सामाजिक बेचैनी को बढ़ाया है।

बेबाकी के साथ कहें, तो सिंगापुर की सफलता की कहानी में भारत के लिए चार सबक हैं। पहला,  सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को यदि भरपूर स्वायत्तता दी जाए, उन्हें उनसे संबंधित ज्ञान और उम्दा तकनीकी मुहैया कराया जाए, तो उत्पादकता को बढ़ाना और विकास करना संभव है। सिंगापुर एयरलाइंस, चांगी एयरपोर्ट और महत्वपूर्ण आधारभूत परियोजनाओं को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी टेमासेक संचालित करती है। सार्वजनिक क्षेत्र को सुचारु रूप में और सक्षम तरीके से चलाना तथा उसकी दक्षता बढ़ाते सिद्धांत व उत्पादकता सचमुच दोहराने के लायक हैं। दूसरा, सिंगापुर शहरी योजना और जल-प्रबंधन तंत्र के मामले में एक शानदार उदाहरण है। वहां एक बूंद पानी भी बरबाद नहीं होता। पानी की जितनी मात्र उपयोग में आती है, उसका रिसाइकिल किया जाता है और साथ ही, वर्षा-जल का प्रभावी परिशोधन होता है। जल संरक्षण तंत्र और शहरी योजना, दोनों हमारे लिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि हम पानी की कमी और अनियोजित शहरीकरण की समस्याओं से लगातार जूझ रहे हैं।

सिंगापुर सबसे स्मार्ट सिटी है। इस वास्तविकता को आंध्र पद्रेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तुरंत भांपा और राज्य की नई राजधानी अमरावती के निर्माण में सिंगापुर से मदद मांगी है। हम शहरों के लिए ऐसा कर सकते हैं और स्मार्ट शहरों को अधिक ठोस सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं। तीसरा,  नियंत्रित पूंजीवाद के लिए अक्सर चीन का उदाहरण पेश किया जाता है। इनोवेटिव संस्कृति में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन, प्रौद्योगिकी के उत्थान, बड़े प्रबंधकीय कौशल और सार्वजनिक संसाधनों से उनको जोड़ने की कला, ये सब मिलकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी का मॉडल तैयार करते हैं, जिसकी हमें जरूरत है। जोखिम-निर्धारण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के दुर्गंध को दूर करने व तमाम हितधारकों को पर्याप्त लाभ सुनिश्चित करने के संदर्भ में भारत अपने पीपीपी मॉडल को व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा है।

चौथा, श्रम कानूनों को बनाने में सिंगापुर का पारदर्शी प्रशासकीय तंत्र भारत के लिए सीख है। यहां पर अब श्रम-कानूनों में सुधार के मुद्दे ने नीति-नियंताओं का ध्यान आकृष्ट किया है। इसके अलावा, जहां भारत में मजदूर संगठनों की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति निवेश घटाती है, वहीं सिंगापुर इस शक्ति का इस्तेमाल शिक्षा और अन्य सामाजिक सेवाओं को सुधारने के लिए करता है। आखिर में,  सिंगापुर और उसके महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर जोर, मानव संसाधन विकास में निवेश, कौशल-शिक्षा प्रदान करना व भ्रष्टाचार निवारण के लिए नौकरशाहों को ऊंची तनख्वाहें देना, ये हमारे लिए महत्वपूर्ण सीख हैं। यह सच है कि सिंगापुर एक शहरीकृत देश है। इससे भी बड़ा सच यह है कि इसके पास न तो जनसंख्या संबंधी लाभ हैं और न ही वहां भाषा, जाति और धर्म के जटिल संघर्ष है, हमारे जैसे तंत्र में ये हैं। हां, छोटा हमेशा सुंदर नहीं होता, लेकिन सिंगापुर जैसे छोटे शहरीकृत देश के पास हमारे लिए कई सारी सीखें हैं।

ली कुआन की विरासत भारत को उसके चूके अवसरों की याद दिलाती रहेगी, और इस बात की भी कि हमारे नेताओं के अहंकार व उनकी अक्षमता ने हमारे आर्थिक और सामाजिक सुधारों को तब तक टाले रखा, जब तक कि हमारी आर्थिक बदहाली ने उसके लिए हमें मजबूर नहीं कर दिया। वैसे सीखने के लिए कोई देरी नहीं होती। आखिरकार हमने भी सफलतापूर्वक सुधार की राह पकड़ी। सिंगापुर के साथ गहरी साझेदारी को बढ़ावा देकर हम उसके संस्थापक पिता की विरासत से सही सीखों को अपना रहे हैं। 

Wednesday, 1 April 2015

'मैंने देखा...लोग घास और सांप खा रहे थे'

बंगाल अकाल
वर्ष 1943 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर था, तब बंगाल में भारी अकाल पड़ा था जिसमें लाखों लोग मारे गए थे.
प्रोफ़ेसर रफ़ीकुल इस्लाम तब 10 साल के थे और ढाका में रहते थे. वह कहते हैं, "जब भी मैं उन दिनों के बारे में सोचता हूं, मैं खो जाता हूं. वर्ष 1943 में बंगालियों को जिस आपदा का सामना करना पड़ा, वह विश्व के इतिहास की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक है."
बीबीसी के कार्यक्रम विटनेस के लिए फ़रहाना हैदर ने मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बंगाल में पड़े भीषण अकाल के बारे में प्रोफ़ेसर रफ़ीकुल इस्लाम से बात की.

पढ़ें विस्तार से

बंगाल अकाल
प्रोफ़ेसर इस्लाम को अब भी याद है कि परेशान लोग खाने की तलाश में मारे-मारे फिरते थे.
वे बताते हैं, "लोग भूखे मर रहे थे क्योंकि ग्रामीण भारत में खाने-पीने की चीज़ें उपलब्ध नहीं थीं. इसलिए लोग कोलकाता, ढाका जैसे बड़े शहरों में खाने और आश्रय की तलाश में पहुंचने लगे. लेकिन वहां न खाना था, न रहने की जगह. उन्हें रहने की जगह सिर्फ़ कूड़ेदानों के पास ही मिल रही थी, जहां उन्हें कुत्ते-बिल्लियों से संघर्ष करना पड़ता था ताकि कुछ खाने को मिल जाए."
वो कहते हैं, "कोलकाता, ढाका की सड़कें कंकालों से भर गई थीं. इंसानी ढांचे जो कई दिन से भूखे थे और सिर्फ़ मरने के लिए ही बंगाल के कस्बों और शहरों में पहुंचे थे."
बंगाल का अकाल जापान के बर्मा पर कब्ज़ा कर लेने के बाद ही आया था. भारत पर काबिज़ अंग्रेज़ सरकार ने देश के अन्य क्षेत्रों से सूखा प्रभावित हिस्से तक अनाज पहुंचने पर रोक लगा दी थी.
इसका उद्देश्य एक तो इसे विरोधियों के हाथों में पड़ने से रोकना था और दूसरा यह कि स्थानीय लोगों को ठीक से खाना मिले.
बंगाल अकाल
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "यह प्राकृतिक आपदा नहीं थी, यह मानवनिर्मित आपदा थी. ग्रामीण इलाकों में खाद्य पदार्थ सिर्फ़ इसलिए नहीं थे क्योंकि फ़सल बर्बाद हो गई थी बल्कि इसलिए भी क्योंकि अनाज को एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाने दिया जा रहा था. उन्हें डर था कि यह जापानियों के हाथों में न पड़ जाएं."
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि यह फ़ैसला मित्र राष्ट्रों के नेतृत्व का था. कोलकाता में सेना के लिए खाद्य पदार्थों का अतिरिक्त स्टॉक था. लेकिन ग्रामीण इलाकों में खाने को कुछ भी नहीं था. और किसी को इसकी परवाह भी नहीं थी."

हड्डियों के ढांचे

बंगाल अकाल
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "मैं राहत कर्मियों के एक छोटे से दल के साथियों के साथ हल्दी नदी पर स्थित टेरेपेकिया बाज़ार पहुंचा. वहां मैंने निर्वस्त्र, करीब-करीब कंकाल बन चुके करीब 500 महिला-पुरुषों को देखा."
वो कहते हैं, "उनमें से कुछ आने-जाने वालों से भीख मांग रहे थे तो कुछ कोने में पड़े थे, अपनी मौत का इंतज़ार करते. उनमें सांस लेने की शक्ति भी नहीं बची थी और दुर्भाग्य से मैंने आठ लोगों को अंतिम सांसे लेते देखा. इससे मैं अंदर तक हिल गया."
जंग की वजह से कीमतें आसमान छू रही थीं और जापानी आक्रमण को लेकर अनिश्चितता की वजह से शहरी इलाकों में जमाखोरी हो रही थी.
इसके फलस्वरूप देहात में चीज़ें बेहद महंगी हो गईं और जब लोग मरने लगे तो भारी संख्या में शहरों की ओर इस उम्मीद में पलायन होने लगा कि वहां राहत दी जा रही होगी.
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "त्रासदी यह है कि कस्बों, शहरों में रहने वाले लोगों की उन बदकिस्मत लोगों से ज़रा भी सहानुभूति नहीं थी. इनमें से ज़्यादातर लोग उन्हीं सड़कों, शहरों में रह गए, वह कभी वापस गांव नहीं लौटे. गांव का ढांचा ही बर्बाद हो गया और बंगाल कभी भी उससे उबर नहीं पाया."
प्रोफ़ेसर इस्लाम के अनुसार उन्हें एक अकाल पीड़ित ने बताया, "मैं अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ा था और जिंदा रहने के लिए दिहाड़ी मज़दूरी किया करता था. मैंने अपने पिता को गांव में छोड़ा और भाई-बहनों को कोलकाता ले आया. उनके पास बस आटा था. हम हर उस जगह जाते जहां खाना बंट रहा होता."
बंगाल अकाल
अकाल पीडि़त ने बताया, "उस दौरान मैंने बहुत-कुछ देखा. लोग घास और सांप तक खा रहे थे. मेरी दो बहनों उस दौरान मारी गईं."

'सबसे ख़ुश इंसान'

बर्मा पर जापानी कब्ज़े से भारत में भारी दहशत फैल गई. बड़ी संख्या में नागरिक और सैनिक सीमापार कर भारत आ गए.
प्रोफ़ेसर इस्लाम बताते हैं, "मेरे पिता रेलवे में डॉक्टर थे और ढाका आने से पहले हम लालमुनि हाट में रहते थे जो बड़ा रेलवे जंक्शन था और जिसे गेटवे ऑफ़ असम कहा जाता था. वहां हमने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को देखा. सैकड़ों-हज़ारों शरणार्थी उस रास्ते बर्मा से भारत आ रहे थे. मैंने उस दौरान एंबुलेंस, ट्रेन, सैन्य अस्पतालों में युद्ध के नुक़सान को भी देखा."
बंगाल तब खाद्य पदार्थ आयात किया करता था जिसमें बर्मा के चावल शामिल थे लेकिन जापान के कब्ज़ा करने के बाद वह रुक गया.
बंगाल अकाल
उसी समय ब्रितानी शासकों ने भी बंगाल के तट को अलग-थलग करने की नीति पर अमल शुरू कर दिया ताकि जापान की बढ़त को रोका जा सके.
इसी समय, 1943 के पूरे साल भारत से ब्रिटेन और ब्रितानी फौजों को खाद्य सामग्री भेजा जाना जारी रहा. आमतौर पर इस बात पर सहमति है कि 1943 का बंगाल अकाल गलत नीतियों और लापरवाही का नतीजा था.
ब्रितानी इतिहासकारों के अनुमानों के अनुसार इसमें 15 लाख लोग मारे गए थे जबकि भारतीय इतिहासकार यह संख्या 60 लाख तक बताते हैं.
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं कि जो बच गए उनका हिसाब रखा जाना भी ज़रूरी है. वो कहते हैं, "एक किस्सा मुझे अब भी याद है जब हमने एक परिवार की मदद करने की कोशिश की थी. पति-पत्नी और दो बच्चे रोज़ शाम हमारे दरवाज़े पर आ जाया करते और मेरी मां थोड़ा भात और दाल उनके लिए बचा लिया करती. हमने उस परिवार को ज़िंदा रखा."

bengal famine picture people lined up for food
वो बताते हैं, "फिर एक दिन वह हमसे विदा लेने आए. वह गांव वापस लौट रहे थे. उस दिन मेरी मां दुनिया की सबसे ख़ुश महिला थी क्योंकि वह कम से कम एक परिवार को ज़िंदा रखने में कामयाब रही थी."

'लिखूं कैसे?'

यह एक ऐसी भयावह मानवीय त्रासदी है जिससे कम ही याद किया जाता है. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बंगाल के अकाल में ब्रितानी राज में सबसे ज़्यादा लोग मारे गए थे.
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "साल 1943 के अकाल के दौरान मैंने जो कुछ देखा वह मेरी यादों में इतना साफ़-साफ़ दर्ज है कि मैं उसे कभी भूल ही नहीं सकता."
वो कहते हैं, "कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि आप अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखते. सच कहूं तो मैं कैसे उस तकलीफ़, मानवीय त्रासदी को बयां कर पाऊंगा जो मैंने उस कमउम्र में देखी थी? मैं उसे लिख कैसे पाऊंगा?"
बंगाल अकाल
बंगाल के अकाल के दौरान हुए अनुभवों का प्रोफ़ेसर इस्लाम पर क्या असर पड़ा?
वो कहते हैं, "इंसान को बगैर किसी वजह या अपराध के इस तकलीफ़ का सामना क्यों करना पड़ा? और इंसान इतना क्रूर कैसे हो गया कि उनकी मदद नहीं की. इंसान को भगवान की सबसे शानदार रचना कहा जाता है लेकिन मेरे हिसाब से अकाल या युद्ध के दौरान यह भगवान की सबसे बुरी रचना बन गया था."
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "उस दौरान हम जानवर बन गए थे.

मोहम्मद यूनुस थे पहले 'प्रधानमंत्री'! @मनीष शांडिल्य

मोहम्मद यूनुस
मोहम्मद यूनुस अपने रिश्तेदार मुज़्ज़फ़र इमाम के साथ लंदन में.
भारत की आज़ादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू बने, लेकिन आज़ादी से पहले भी देश में कई प्रधानमंत्री हुए.
उनमें से पहले प्रधानमंत्री थे मोहम्मद यूनुस. ये बिहार के प्रधानमंत्री थे. अब आप सोच रहे होंगे कि बिहार में प्रधानमंत्री का पद कैसे?
1935 में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट’ पारित किया था.
इतिहासकार और खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर डॉक्टर इम्तियाज़ अहमद बताते हैं, "एक्ट में प्रधानमंत्री का पदनाम प्रांतीय सरकार के प्रधान के लिए था, लेकिन व्यवहार में वो पद वही था जो आज मुख्यमंत्री का है."

पढ़ें, विस्तार से

मोहम्मद यूनुस
इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, "इस एक्ट के तहत 1937 में भारत में प्रांत स्तर पर चुनाव हुए. इस चुनाव में बिहार सहित सभी प्रांतों में कांग्रेस की भारी बहुमत से जीत हुई."
तब प्रांतीय सरकार में गवर्नर के हस्तक्षेप के सवाल पर कांग्रेस ने सभी जगह सरकार बनाने से इनकार कर दिया था.
अहमद बताते हैं कि कांग्रेस के इनकार के बाद बिहार में मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी के मोहम्मद यूनुस ने सरकार बनाई.
यूनुस से साथ और तीन लोग भी सरकार का हिस्सा बने थे जिसमें दो ग़ैर-मुस्लिम थे.
एक अप्रैल, 1937 को वे बिहार ही नहीं सभी प्रातों में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले पहले शख्स बने. यूनुस 19 जुलाई 1937 तक अपने पद पर रहे.

कांग्रेस से अलग

मोहम्मद यूनुस
मोहम्मद यूनुस (बाएं से तीसरे)
यूनुस का जन्म 4 मई 1884 को बिहार में पटना के करीब पनहरा गांव में हुआ था. उनके पिता मौलवी अली हसन मुख्तार मशहूर वकील थे और उन्होंने लंदन से वकालत पढ़ी थी.
यूनुस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी, लेकिन बाद में वे महात्मा गांधी की असहयोग नीति और दूसरे राजनीतिक कारणों से कांग्रेस से अलग हो गए.
फिर उन्होंने 1937 के चुनाव के समय मौलाना सज्जाद के साथ मिलकर मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी बनाई.
आज़ादी के बाद बने किसान मजदूर प्रजा पार्टी के गठन में भी मोहम्मद यूनुस ने अहम भूमिका निभाई थी.
1952 में 13 मई को मोहम्मद यूनुस का इंतकाल हुआ.

चार माह का कार्यकाल

मोहम्मद यूनुस
सामाजिक-राजनीतिक योगदान के आधार पर भूतपूर्व सांसद और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ शिवानंद तिवारी मोहम्मद यूनुस को एक स्टेट्समैन करार देते हैं.
शिवानंद कहते हैं, "अपने चार महीने के कार्यकाल में यूनुस ने आश्चर्यजनक कार्य किए. उन्होंने ज़मीन और किसानों की समस्याएं सुलझाने और क़ौमी एकता बनाने रखने में विशेष पहल की. साथ ही उन्होंने बिहार विधानमंडल और पटना हाईकोर्ट जैसी इमारतों की नींव भी रखी."
एक वकील और राजनेता के साथ-साथ यूनुस एक सफल उद्यमी, बैंकर और प्रकाशक भी थे. उनके द्वारा पटना में बनाया गया ग्रैंड होटल तब के बिहार का पहला आधुनिक होटल था.
इसी होटल के एक हिस्से में मोहम्मद यूनुस रहा करते थे. साथ ही तब यह होटल उस दौर का महत्त्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र हुआ करता था.
यूनुस के परपोते और बैरिस्टर मोहम्मद यूनुस मेमोरियल कमेटी के अध्यक्ष क़ासिफ़ यूनुस बताते हैं, "ग्रैड होटल में ठहरने वालों में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, मौलाना आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे बड़े नेता शामिल थे."

उपेक्षा

बिहार विधानसभा की वेबसाइट
युनूस के परिजनों और शिवानंद तिवारी जैसे राजनेताओं का मानना है कि आज़ाद भारत में, ख़ासकर सरकार के स्तर पर मोहम्मद यूनुस को वैसा सम्मान और पहचान नहीं मिली, जिसके वो हक़दार थे.
जैसा कि क़ासिफ़ यूनुस कहते हैं, "आज़ादी के पहले के रिकार्ड्स में तो उनके नाम हैं, लेकिन बाद में सरकारी अभिलेखागारों से भी उनका नाम हटा दिया गया."
क़ासिफ़ के मुताबिक़ यह एक ‘अपराध’ है. ऐसा इस कारण भी हुआ क्योंकि आज़ादी के बाद लंबे समय तक बिहार में ऐसी सरकारें रहीं, जिनकी विचारधारा यूनुस की राजनीतिक विचारधारा से अलग थीं.
हालाँकि हाल के वर्षों में यूनुस के योगदान को सरकारी स्तर पर स्वीकार करने की शुरुआत हुई है.

सम्मान

नीतीश कुमार
2013 से यूनुस की जयंती राजकीय सम्मान के साथ आयोजित की जाती है. इसकी घोषणा 2012 में बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की थी.
लेकिन अब भी यूनुस कई जगहों पर उपेक्षित दिखाई देते हैं, जैसे कि बिहार विधानसभा की वेबसाइट.
वेबसाइट पर मौजूद बिहार के प्रीमियर और मुख्यमंत्रियों की सूची मोहम्मद यूनुस नहीं, बल्कि उनके ठीक बाद बिहार के प्रधानमंत्री बनने बाले श्रीकृष्ण सिंह से शुरू होती है.
इस ओर ध्यान दिलाने पर बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदयनारयण चौधरी कहते हैं, "यूनुस के बारे में जानकारी एकत्र कर जल्द ही इस सूची को ठीक करने की दिशा में पहल की जाएगी.

विलक्षण व्यक्तित्व का सम्मान @पवन के वर्मा

चूंकि अटल जी एक गंठबंधन की सरकार का नेतृत्व कर रहे थे, व्यावहारिकता की मांग थी कि राष्ट्रीय मामलों पर वे ऐसा रवैया अपनायें, जिससे उनके गंठबंधन के सहयोगी अलग-थलग न हों. लेकिन, दक्षिणपंथी पार्टी में स्वभाव से ही वे मध्यमार्गी थे. वे मानसिक रूप से उन लोगों से खुद को नहीं जोड़ सकते थे, जो धार्मिक घृणा की विभाजक और भड़काऊ भाषा बोलते थे.
शुक्रवार, 27 मार्च को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी शालीनतापूर्वक अटल बिहारी वाजपेयी के निवास पर उन्हें राष्ट्र का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान करने गये थे. इससे भारत गौरवान्वित हुआ है. अगर यह सम्मान यूपीए सरकार द्वारा पहले दिया जाता, तो मुङो व्यक्तिगत रूप से अधिक प्रसन्नता होती. कुछ मामले दलगत राजनीति से परे होते हैं. अटली जी का कद ऐसा है कि उन्हें भारत रत्न दिये जाने के लिए भाजपा के सत्ता में आने का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए था.
मुङो अटल जी को उनके प्रधानमंत्री रहते जानने का सौभाग्य और गौरव प्राप्त हुआ था. चूंकि मैं उस समय विदेश मंत्रलय में कार्यरत था, इस कारण कूटनीतिक मसलों पर उनके साथ विचार-विमर्श का अवसर भी प्राप्त हुआ था. लेकिन जिस कारण मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से मिला और अकसर मिलता रहा, उसका कूटनीति से कोई लेना-देना नहीं था. अटल जी की इच्छा थी कि मैं उनकी कविताओं का अंगरेजी में अनुवाद करूं. इस संबंध में बातचीत करने के लिए प्रधानमंत्री निवास पर हुई बैठक को मैं कभी नहीं भूल सकता. रात के करीब आठ बजे थे, वे अपने चिर-परिचित पोशाक धोती-कुरते में औपचारिक अतिथि कक्ष में बैठे थे. जब उन्होंने अपना निवेदन रखा, तो मैंने कहा कि मुङो यह करने में बड़ी प्रसन्नता होगी, पर मेरी तीन शर्ते हैं. उन्होंने कहा, ‘कहिये’, और उनकी आंखें उस चमत्कारिक तरीके से चमक उठीं, जिसे उनसे मिलनेवाला कभी विस्मृत नहीं कर सकता.
मैंने कहा कि मैं उनकी ‘राजनीतिक’ कविताएं अनुदित करना पसंद नहीं करूंगा; दूसरा, बची हुई कविताओं में चयन मैं करूंगा; और अंतिम यह कि उन्हें तुरंत ‘हां’ नहीं करना चाहिए और निर्णय से पहले मेरे कुछ अनुवादों को देख लेना चाहिए. फिर, उनकी आंखों में चमक उभरी, और चेहरे पर मुस्कान लिये उन्होंने बस यही कहा, ‘मंजूर है’. और हुआ यह कि हिंदी में ‘इक्यावन कविताएं’ शीर्षक की मूल पुस्तक पेंग्विन द्वारा अंगरेजी संस्करण में ‘21 पोएम्स’ के नाम से छपी. पुस्तक के विमोचन के अवसर पर उन्होंने मेरी प्रति में अपने हाथों से लिखा : ‘पवन ने मेरी कविताओं का अनुवाद किया और उन्हें अधिक अर्थपूर्ण बना दिया’.
अटल जी के व्यक्तिगत संपर्क में आये लगभग हर किसी के पास उनके व्यक्तित्व की असाधारण गर्मजोशी के बारे में एक-दो कहानियां बताने के लिए जरूर होंगी. लगाव, परिहास, हाजिरजवाबी, हास्य, व्यंग्य और सुलभता के उनके गुण संयुक्त रूप से उन्हें उल्लेखनीय तौर पर आकर्षक व्यक्ति बनाते थे. परंतु, भारत रत्न पर उनका दावा इनसे अधिक ठोस कारणों पर आधारित है. पहला, वे अत्यंत उत्कृष्ट सांसद थे. भारत के लोकतांत्रिक वाद-विवाद के विकास में पांच दशकों तक उन्होंने जिस तरह से योगदान दिया, उसकी तुलना में बहुत कम उदाहरण मिलते हैं.
जब वे बोलते थे, तो सदन- और राष्ट्र- सुनता था, क्योंकि वे संतुलन और सत्व के साथ बोलते थे तथा जान-बूझ कर तीक्ष्ण और सतही दलीय भावना को दबा जाते थे, जो कि अब संसदीय बहसों की मुख्य विशेषता बनती जा रही है. अर्थभरे ठहरावों और महीन भाषिक दक्षता से लबरेज उनकी वक्तृत्व कला किसी भी श्रोता को मंत्रमुग्ध कर सकती थी. पहले जनसंघ, और फिर भारतीय जनता पार्टी के नेता के तौर पर वे मजबूत आलोचक हुआ करते थे.
लेकिन उन्होंने मसलों के गुण-दोषों के आधार पर अपना पक्ष रखा, और जब भी उन्हें लगा कि कोई मसला देशहित में है, तो उन्होंने सरकार का समर्थन किया. उन्होंने 1971 में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध में उनके नेतृत्व के लिए इंदिरा गांधी की प्रशंसा की जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ था. उन्होंने नरसिम्हा राव और डॉ मनमोहन सिंह का समर्थन किया, जब वे 1991 में आर्थिक सुधारों की ओर उन्मुख हो रहे थे. वे एक ऐसे नेता थे, जिनके लिए राष्ट्र पहले था, और राजनीतिक लाभ बाद में.
दूसरा, प्रधानमंत्री के रूप में, अटल जी की ऐतिहासिक भूमिका इस कोशिश में थी कि भाजपा को मुख्यधारा में लाया जाये. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विस्तृत संघ परिवार के रूढ़िवादी तत्वों को नियंत्रण में रखा, जिसके व्यावहारिक और ठोस कारण थे. चूंकि वे एक गंठबंधन की सरकार का नेतृत्व कर रहे थे, व्यावहारिकता की मांग थी कि राष्ट्रीय मामलों पर वे ऐसा रवैया अपनायें, जिससे उनके गंठबंधन के सहयोगी अलग-थलग न हों. लेकिन, दक्षिणपंथी पार्टी में स्वभाव से ही वे मध्यमार्गी थे. वे मानसिक रूप से उन लोगों से खुद को नहीं जोड़ सकते थे, जो धार्मिक घृणा की विभाजक और भड़काऊ भाषा बोलते थे.
यह सही है कि वे लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राम जन्मभूमि अभियान शुरू किये जाने के निर्णय में शामिल थे, किंतु यह बहस का विषय है कि वे बाबरी मसजिद के विध्वंस के पक्ष में थे या नहीं. इसी तरह 2002 में गुजरात नरसंहार के समय उन्होंने नरेंद्र मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह दी थी, हालांकि बाद में उन्होंने दबाव के कारण उनके मुख्यमंत्री बने रहने पर सहमति दे दी थी. आलोचक कह सकते हैं कि उन्हें झुकना नहीं चाहिए था, पर कुछ ही लोग इस पर संदेह करेंगे कि राजधर्म निभाने की उनकी सलाह सही थी.
तीसरा, एक स्तर पर, अटल जी की क्षमता यह थी कि वे अपनी पार्टी और संघ को पार कर सके थे. यह क्षमता विद्रोह में परिणत नहीं हुई, पर यह प्रतिबद्धता के उनके व्यक्तिगत साहस को भी न बुझा सकी. हल्के-फुल्के अंदाज में एक और व्यक्तिगत संस्मरण सुनाने की अनुमति लेते हुए बताना चाहूंगा कि एक बार गुनु (उनकी दत्तक पुत्री) कहीं मुझसे मिलीं और कहा कि बाप जी (अटल जी के लिए संबोधन) कह रहे थे कि ‘पवन जी तो अब हमारी स्पीच लिखते नहीं हैं. शायद वो हमारी पार्टी से नाराज हैं. तो उनसे कहना कि  हम अपनी पार्टी से कौन-सा बहुत खुश हैं!’ उनकी विनोदप्रियता, उनकी प्रतिबद्धता और उन्हें छोट दिखानेवाले लोगों की तुलना में उनके निश्चित बड़प्पन पर आधारित उनकी ऐसी टिप्पणियां उन्हें बाकियों से मजबूती से ऊंचे स्तर पर स्थापित करती हैं.
अटल जी की कविताओं को अनुदित करने के दौरान मुङो साइप्रस में उच्चायुक्त के रूप में पदस्थापित कर दिया गया. जाने से पहले मैं उनसे विदा लेने गया, तो उन्होंने रहस्यात्मक अंदाज में कहा : ‘आप चलिए, मैं आता हूं.’ मैंने तब उनकी टिप्पणी को गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन अगले वर्ष न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की बैठक में जाते हुए अटल जी साइप्रस की राजकीय यात्रा पर आये. जब मैंने उनकी आगवानी की, तो उन्होंने बड़ी मुस्कुराहट के साथ कहा : ‘मैंने अपना वादा पूरा किया’. अटल जी को भारत रत्न का सम्मान देकर राष्ट्र ने उनसे किया हुआ अपना विलंबित वादा पूरा किया है.

55 साल पहले... ऐसा ही कानून हुआ था निरस्त

सुप्रीम कोर्ट ने 55 साल बाद अभिव्यक्ति की आजादी से संबंधित किसी कानून को निरस्त किया है। इससे पहले 1960 में दिग्गज समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया की पहल पर यूपी विशेष अधिकार एक्ट की धारा 3 को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया था।
मामला : 1954 में उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने किसानों द्वारा खेतों में सिंचाई के लिए सरकारी नहरों से लिए जाने वाले पानी की दरों को बढ़ा दिया। उस वक्त फायरब्रांड समाजवादी नेता और कांग्रेस के मुखर विरोधी राम मनोहर लोहिया ने इसका विरोध शुरू किया। सोशलिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेट्री लोहिया फर्रुखाबाद पहुंचे। उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया और किसानों से बढ़ी हुई सिंचाई दरों को अदा करने से मना कर दिया। इस तरह के सविनय अवज्ञा आंदोलन से निपटने के लिए अंग्रेजों ने संयुक्त प्रांत विशेष अधिकार एक्ट की धारा 3 को पास किया था। इसके तहत यदि कोई व्यक्ति देनदारी को चुकाने से मना करने के लिए यदि उकसाता है तो वह आपराधिक मामला माना जाएगा। 1932 में कांग्रेस पार्टी द्वारा टैक्स अदायगी से मना करने वाले आंदोलनों को रोकने के लिए अंग्रेजों ने यह कानून बनाया था। 1954 में उत्तर प्रदेश की जीबी पंत सरकार ने लोहिया के खिलाफ इसी कानून का इस्तेमाल किया।
आरोप-प्रत्यारोप : लोहिया ने इसके खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा कि एक्ट की धारा 3 असंवैधानिक है क्योंकि यह उनकी अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करती है। सरकार ने तर्क दिया कि यह जनहित में संविधान द्वारा 19(2) के तहत दी गई ‘तार्किक प्रतिबंध’ के दायरे में आता है। उनके भाषणों के कारण कानून व्यवस्था बिगड़ने का खतरा है और अशांति फैलने के साथ हिंसक प्रदर्शन हो सकते हैं।
फैसला : 1960 में सुप्रीम कोर्ट ने लोहिया के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि इस तरह के काल्पनिक विचारों के आधार पर व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। साथ ही कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि धारा 3 के तहत लागू किए जाने वाले प्रतिबंध का कानून व्यवस्था से कोई संबंध या करीबी लेना-देना भी नहीं है। इसलिए 19 (2) के तहत यह तार्किक प्रतिबंध लागू किए जाने की श्रेणी में नहीं आता और विवादित धारा 3 को असंवैधानिक ठहरा दिया गया।

अटलजी को भारत रत्‍न : देशकाल से ऊपर सरल अटल @PRASHANT MISHRA

त्रिकालदर्शियों, मनीषियों और भारत के विधिवेत्ताओं ने जब भी 'भारत रत्न" के लिए सोचा होगा तो उनके मनोमस्तिष्क में अटल बिहारी वाजपेयी जरूर रहे होंगे। वाजपेयी का व्यक्तित्व वास्तव में अब 'भारत रत्न" से कहीं ज्यादा विराट हो गया है। वे दल विशेष, क्षेत्र विशेष, वर्ग विशेष, जाति या धर्म के राजनेता मात्र नहीं रहे। वे देश या काल विशेष के नेता हो गए हैं। वे जितने कोमल, सरल, सरस, सहृदय हैं, समय आने पर उतने ही दृढ़ और सख्त भी दिखे।
वाजपेयी आजीवन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर रहे। अपने दल और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता को उन्होंने कभी भी दलगत या विरोधी के प्रति द्वेष की सियासत में तब्दील नहीं होने दिया। इसीलिए वे सर्वस्वीकार्य नेता और अजातशत्रु के तौर पर जाने गए। स्वीकार्य क्यों न भी हों, जो व्यक्ति बलरामपुर की तपती दोपहरी से लेकर ग्वालियर की कड़कड़ाती ठंड में साइकिल पर निकल पड़ता हो, जिसने भारत की आत्मा को आत्मसात किया हो, चेन्न्ई में मरीना बीच में उसी जोश से, उसी भावात्मा के साथ मिलता हो, उसके लिए भारत में कोई बंधन नहीं था।
वह जितने वज्र रहे हैं, उतने ही सरस भी। जब दृढ़ता की जरूरत पड़ी तो पोखरण-2 था। उनको मालूम था कि प्रतिबंध आएंगे। मगर डरे नहीं। कश्मीर गए तो उन्होंने कहा कि इंसानियत से ही काम चलेगा। वास्तव में लोकतंत्र के असली वाहक वे ही हैं। लोकतंत्र उन्हीं जैसी जिजीविषा शक्ति का परिचायक है। नेता और राजनेता तो बहुत हैं, लेकिन अटल जैसा व्यक्तित्व पैदा करने में नियति को भी युग लगेंगे।
उनकी सदाशयता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। वाजपेयी की इस विरासत को शायद कोई भी हासिल नहीं कर सकता। उनके ऊपर कोई प्रतिद्वंद्विता का प्रहार भी नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत संबंधों को भी सम्मान देने का सबसे बड़ा उदाहरण उनके धुरविरोधी रहे चंद्रशेखर के लिए बलिया सीट से कभी भाजपा प्रत्याशी न खड़ा करना है। दोस्तों के वे दोस्त हैं, यह बात सभी दलों के नेता बिना किसी हिचक के कहते हैं।
राष्ट्रीय मुद्दों पर कभी उन्होंने दल या विचार को आड़े नहीं आने दिया। यही कारण था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या जनसंघ के विरोधी रहे देश् के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरूहों या फिर इंदिरा गांधी या फिर नरसिंह राव, सभी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब देश के प्रतिनिधित्व की बात आई तो अटल को अनदेखा कभी नहीं किया। यहां तक कि अब जब केंद्र में भाजपा की ही सरकार है तो उसको भी आईना दिखाने के लिए विरोधी दल सिर्फ अटलजी से ही तुलना करते हैं। यह सब इस बात का द्योतक है कि गैरभाजपा दलों के नेताओं के दिलों में भी अटल बिहारी वाजपेयी कितने गहरे उतरे हुए हैं।
वाकपटु और बिना किसी आक्रामकता के राजनीतिक मुद्दों पर संसद से लेकर सड़क तक वाजपेयी जितने प्रभावशाली और शक्तिशाली वार करते थे, उसकी मिसाल हर दल का सियासतदां देता है। ओजस्वी वक्ता होने के साथ-साथ उनके 'वन लाइनर" यानी एक लाइन में ही बड़ी-बड़ी बातें कह देने की उनकी अद्वितीय क्षमता और अदा का पूरा हिंदुस्तान ही नहीं, दुनिया कायल रही है। जटिल या तनावपूर्ण हालात में भी तर्कशील और कम शब्दों में दिल तक पैवस्त करने वाली उनकी पंक्तियां पूरा माहौल बदलने की क्षमता रखती थीं।
कारगिल युद्ध के अरसे बाद भारतीय क्रिकेट टीम जब पाकिस्तान में टेस्ट और वनडे श्रृंखला खेलने जा रही थी तो दोनों ही देशों के बीच भावनाएं चरम पर थीं। मगर वाजपेयी ने अपने दो जुमलों से ही पूरा माहौल हल्का कर दिया। उन्होंने खुद से मिलने आई भारतीय टीम से कहा कि 'क्रिकेट खेलने जा रहे हैं, युद्ध के मैदान में नहीं। मैच भी जीतो, दिल भी जीतो।"
उनके विशाल हृदय और साफगोई का गवाह मैं खुद भी हूं। पहली बार जब 13 दिन की सरकार बनी तो मैंने अपने आईएनएस दफ्तर से उनको फोन किया। मैंने कहा कि 'बधाई और मिठाई..।" वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि अटल ने इसे पूरा किया 'बधाई, मिठाई और विदाई..।" कुल मिलाकर वे इस ताजपोशी का अंजाम जानते थे और उससे जरा-भी चिंतित नहीं थे। ऐसे कई क्षणों के मेरे समेत तमाम लोग गवाह बने हैं। इसीलिए, जब मोदी सरकार उनको 'भारत रत्न" दे रही है तो लगता है कि वास्तव में 'भारत रत्न" का ही सम्मान हो रहा है।