Saturday, 27 June 2015

कैच मी इफ़ यू कैन: सुब्रमण्यम स्वामी @रेहान फ़ज़ल

जयप्रकाश नारायण के साथ सुब्रमण्यम स्वामी
जयप्रकाश नारायण के साथ सुब्रमण्यम स्वामी.
25 जून, 1975 को रामलीला मैदान में जेपी की ऐतिहासिक सभा से लौटने के बाद सुब्रमण्यम स्वामी गहरी नींद में थे कि अचानक चार बजे सुबह उनके फ़ोन की घंटी बजी. दूसरे छोर पर ग्रेटर कैलाश पुलिस स्टेशन का एक सब इंस्पेक्टर था.
उसने कहा, "क्या आप घर पर हैं? क्या मैं आपसे मिलने आ सकता हूँ?" स्वामी ने उसे आने के लिए हाँ कर दिया.
लेकिन उनका माथा ठनका कि पुलिस किसी के यहाँ जाने से पहले ये नहीं बताती कि वो उससे मिलने आ रही है. ज़ाहिर था कोई उन्हें टिप ऑफ़ कर रहा था कि समय रहते आप अपने घर से निकल कर ग़ायब हो जाइए.
स्वामी ने वही किया. तड़के साढ़े चार बजे वो गोल मार्केट में रह रहे अपने दोस्त सुमन आनंद के घर चले गए.

पढ़िए विवेचना विस्तार से

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सुब्रमण्यम स्वामी, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, नानाजी देशमुख, राजनारायण
पुलिस ने स्वामी को हर जगह ढूंढ़ा, लेकिन वो उसके हाथ नहीं आये. एक दिन जहाँ वो रह रहे थे, दरवाज़े की घंटी बजी.
उनके दोस्त ने बताया कि आरएसएस के कोई साहब आपसे मिलने आए हैं.
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उन्होंने स्वामी को संदेश दिया कि अंडरग्राउंड चल रहे जनसंघ के बड़े नेता नानाजी देशमुख उनसे मिलना चाहते हैं.
वो उसी आरएसएस कार्यकर्ता के स्कूटर पर बैठकर राजेंद्र नगर के एक घर पहुंचे जहाँ नानाजी देशमुख उनका इंतज़ार कर रहे थे.
नानाजी ने उनसे मज़ाक किया, "डॉक्टर क्या अब तुम अमरीका भाग जाना नहीं चाहते?"
डॉक्टर स्वामी भारत आने से पहले हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हुआ करते थे और उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पॉल सैमुअलसन के साथ एक शोध पत्र पर काम किया था.

सिख का वेश बनाया

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सिख के वेश में सुब्रमण्यम स्वामी.
इसके बाद स्वामी और नानाजी अक्सर मिलने लगे. इस बीच स्वामी ने पगड़ी और कड़ा पहन कर एक सिख का वेश धारण कर लिया ताकि पुलिस उन्हें पहचान न सके. उनका अधिकतर समय गुजरात और तमिलनाडु में बीता, क्योंकि वहाँ कांग्रेस का शासन नहीं था.
गुजरात में स्वामी वहाँ के मंत्री मकरंद देसाई के घर रुका करते थे. उन दिनों आरएसएस की तरफ़ से एक व्यक्ति उन्हें देसाई के घर छोड़ने आया करता था. उस शख़्स का नाम था नरेंद्र मोदी, जो चार दशक बाद भारत के प्रधानमंत्री बने.
इस बीच आरएसएस ने ये तय किया कि स्वामी को आपातकाल के ख़िलाफ़ प्रचार करने के लिए विदेश भेजा जाए. अमरीका और ब्रिटेन में स्वामी के बहुत संपर्क थे, क्योंकि वो पहले वहाँ रह चुके थे.

लंदन में बीके नेहरू से मुलाक़ात

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बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ सुब्रमण्यम स्वामी.
स्वामी ने मद्रास से कोलंबो की फ़्लाइट पकड़ी और फिर वहाँ से दूसरा जहाज़ पकड़कर लंदन पहुंचे. लंदन में स्वामी के पास ब्रिटेन में उस समय भारत के उच्चायुक्त बीके नेहरू का फ़ोन आया.
उन्होंने स्वामी को मिलने अपने दफ़्तर बुलाया. स्वामी वहाँ जाने में झिझक रहे थे क्योंकि उन्हें डर था कि नेहरू उन्हें गिरफ़्तार करवा देंगे. बहरहाल उनकी नेहरू से मुलाकात हुई और उन्होंने सलाह दी कि वो भारत वापस जाकर आत्मसमर्पण कर दें.
दो दिन बाद ही स्वामी के पास फ़ोन आया कि उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया है. जब स्वामी अमरीका पहुंचे तो भारतीय अधिकारियों ने अमरीका पर दबाव बनाया कि स्वामी को उन्हें सौंप दिया जाए क्योंकि वो भारत से भागे हुए हैं और उनका पासपोर्ट रद्द किया जा चुका है.

किसिंजर से सिफ़ारिश

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अमरीकी राष्ट्रपति गेरॉल्ड फोर्ड के साथ विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर
लेकिन इस बीच स्वामी के हार्वर्ड के कुछ प्रोफ़ेसर दोस्त अमरीका के विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर से उनकी सिफ़ारिश कर चुके थे.
अमरीका ने भारतीय अधिकारियों से कहा कि भारत ये दावा ज़रूर कर रहा है कि स्वामी का पोसपोर्ट रद्द कर दिया गया है. लेकिन उनके पासपोर्ट पर इसकी मोहर कहीं नहीं लगी है और अमरीकी सरकार भारत के लिए पुलिस की भूमिका नहीं निभा सकती.
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हारवर्ड यूनिवर्सिटी में गणित की क्लास लेते सुब्रमण्यम स्वामी.
स्वामी अमरीका में कई महीनों तक रहे और वहाँ के 24 राज्यों में जाकर उन्होंने आपातकाल के ख़िलाफ़ प्रचार किया.

पुलिस का क़हर

इस बीच प्रवर्तन निदेशालय के लोगों ने स्वामी के दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित निवास और उनके ससुर जमशेद कापड़िया के मुंबई के नेपियन सी रोड वाले मकान पर दबिश दी.
रिटायर्ड आईसीएस ऑफ़िसर कापड़िया के लिए ये बहुत बड़ा धक्का था कि छोटे मोटे अफ़सर न सिर्फ़ उनसे अनाप-शनाप सवाल पूछकर उन्हें तंग कर रहे थे बल्कि बहुत बेअदबी से भी पेश आ रहे थे.
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बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ सुब्रमण्यम स्वामी की पत्नी रौक्शना स्वामी.
स्वामी की पत्नी रौक्शना बताती हैं कि उनके घर की एक-एक चीज़ ज़ब्त कर ली गई. कार, एयरकंडीशनर, फर्नीचर सभी पुलिस ले गई. वो मकान पर भी ताला लगाना चाहते थे, लेकिन घर रौक्शना के नाम था.
उनके दोस्त अहबाबों ने उनसे मिलना छोड़ दिया. जो भी उनसे मिलने आता, उसके घर रेड हो जाती और जिनसे ये लोग मिलने जाते, उनके पीछे भी पुलिस वाले लग जाते.
इस बीच स्वामी के मन में आ रहा था कि वो ऐसा कुछ करें जिससे पूरे देश में तहलका मच जाए. संसद का कानून है कि अगर कोई सांसद बिना अनुमति के लगातार 60 दिनों तक अनुपस्थित रहता है तो उसकी सदस्यता अपने आप निरस्त हो जाती है.
स्वामी ने तय किया कि वो भारत वापस लौटेंगे और राज्यसभा की उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तख़त करेंगे. उन्होंने पैन-एम की फ़्लाइट से लंदन-बैंकॉक का हॉपिंग टिकट ख़रीदा. चूंकि वो बैंकॉक जा रहे थे, इसलिए दिल्ली उतरने वाले लोगों की सूची में उनका नाम नहीं था.

टिकट बैंकॉक का, उतरे दिल्ली में

फ़्लाइट सुबह तीन बजे दिल्ली पहुंची. स्वामी के पास एक बैग के सिवा कोई सामान नहीं था. उस ज़माने में हवाई अड्डों पर इतनी कड़ी सुरक्षा नहीं होती थी.
उन्होंने ऊंघते हुए सुरक्षा गार्ड को अपना राज्यसभा का परिचय पत्र फ़्लैश किया. उसने उन्हें सेल्यूट किया और वो बाहर आ गए. वहाँ से उन्होंने टैक्सी पकड़ी और सीधे राजदूत होटल पहुंचे.
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रौक्शना स्वामी के साथ सुब्रमण्यम स्वामी
वहाँ से उन्होंने अपनी पत्नी को एक अंग्रेज़ की आवाज़ बनाते हुए फ़ोन किया कि आपकी मौसी ने इंग्लैंड से आपके लिए एक तोहफ़ा भेजा है. इसलिए उसे लेने के लिए एक बड़ा बैग ले कर आइए. पहले से तय इस कोड का मतलब था कि वो उनके लिए सरदार की एक पगड़ी, नकली दाढ़ी और एक शर्ट पैंट लेकर पहुंच जाएं.
उनकी पत्नी रौक्शना ने ऐसा ही किया. उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि वो शाम को एक टेलीविज़न मकैनिक का वेश बना कर घर पर आएंगे. शाम को स्वामी ने अपने ही घर का दरवाज़ा खटखटा कर कहा कि मैं आपका टेलीविज़न ठीक करने आया हूँ.
वो अपने घर में घुसे और फिर पांच दिनों तक वहाँ से बाहर ही नहीं निकले. बाहर तैनात पुलिस को पता ही नहीं चला कि स्वामी अपने घर पहुंच चुके हैं.
इस बीच रौक्शना ये पता लगाने कई बार संसद भवन गईं कि मुख्य भवन से बाहरी गेट तक आने में कितने कदम और कितना समय लगता है. 10 अगस्त, 1976 को रौक्शना ने स्वामी को अपनी फ़िएट कार से संसद के गेट नंबर चार पर छोड़ा और चर्च ऑफ़ रेडेंप्शन के पास अपनी गाड़ी पार्क की.

'प्वाएंट ऑफ ऑर्डर'

स्वामी बिना किसा रोकटोक के संसद में घुसे. उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तख़त किए. तभी कम्युनिस्ट सांसद इंद्रजीत गुप्त उनसे टकरा गए. उन्होंने पूछा तुम यहाँ क्या कर रहे हो?
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मोरारजी देसाई के साथ सुब्रमण्यम स्वामी
स्वामी ज़ोर से हंसे और उनका हाथ पकड़े हुए राज्यसभा में घुसे. इससे पहले रौक्शना ने आस्ट्रेलिया ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के संवाददाता को पहले से बता दिया था कि वो संसद में एक दिलचस्प घटना देखने के लिए मौजूद रहें.
स्वामी की टाइमिंग परफ़ेक्ट थी. उस समय राज्यसभा में दिवंगत हुए सांसदों के शोक प्रस्ताव पढ़े जा रहे थे. जैसे ही सभापति बासप्पा दानप्पा जत्ती ने अंतिम शोक प्रस्ताव पढ़ा, स्वामी तमक कर उठ खड़े हुए.
उन्होंने चिल्लाकर कहा, "प्वाएंट ऑफ़ ऑर्डर सर.... आपने दिवंगत लोगों में भारत के जनतंत्र को शामिल नहीं किया है.." पूरे कक्ष में सन्नाटा छा गया.

'बुक पब्लिश्ड'

गृहराज्य मंत्री घबरा कर मेज़ के नीचे छिपने की कोशिश करने लगे. उन्हें डर था कि स्वामी के हाथ में बम तो नहीं है.
हतप्रभ जत्ती ने स्वामी को गिरफ़्तार करने का आदेश देने की बजाए सांसदों को दिवंगत सांसदों के सम्मान में खड़े होकर दो मिनट का मौन रखने के लिए कहा.
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राजघाट पर एकजुटता की शपथ लेते जनता पार्टी के नेता.
इस अफ़रातफ़री का फ़ायदा उठाते हुए स्वामी चिल्लाए कि वो वॉक आउट कर रहे हैं. वो तेज़ कदमों से संसद भवन के बाहर आए और चर्च के पास पहुंचे जहाँ रौक्शना ने पहले से कार पार्क कर चाबी कार्पेट के नीचे रख दी थी.
वहाँ से वो कार चलाकर बिरला मंदिर गए, जहां उन्होंने कपड़े बदलकर सफेद कमीज़-पैंट पहनी और अपने सिर पर गांधी टोपी लगाई. बिरला मंदिर से वो ऑटो से स्टेशन पहुंचे और आगरा जाने वाली गाड़ी में बैठ गए.
वो मथुरा में ही उतर गए और नज़दीक के टेलीग्राफ़ ऑफ़िस से उन्होंने रौक्शना को तार भेजा, 'बुक पब्लिश्ड.' यह पहले से तय कोड था जिसका अर्थ था कि वो सुरक्षित दिल्ली से बाहर निकल गए हैं.
मथुरा से उन्होंने जीटी एक्सप्रेस पकड़ी और नागपुर उतरकर गीतांजलि एक्सप्रेस से मुंबई के लिए रवाना हो गए. तब मुंबई में वो आजकल मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री पीयूष गोयल के पिता प्रकाश गोयल के यहाँ ठहरे थे.

नेपाल के महाराजा ने की मदद

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नेपाल के महाराजा वीरेंद्र.
कुछ दिन भूमिगत रहने के बाद स्वामी ने आरएसएस नेता भाऊराव देवरस के ज़रिए नेपाल के प्रधानमंत्री तुलसी गिरि से संपर्क किया. उन्होंने उनसे कहा कि वो नेपाल के महाराजा वीरेंद्र से मिलना चाहते हैं, जोकि हार्वर्ड के विद्यार्थी रह चुके थे.
तुलसी गिरि ने उन्हें बताया कि वो रॉयल नेपाल एयरलाइंस के ज़रिए, उन्हें काठमांडू नहीं ला सकते, क्योंकि अगर इंदिरा गाँधी को इसके बारे में पता चल गया तो वो नाराज़ हो जाएंगी.
महाराज वीरेंद्र ने उन्हें गिरि के ज़रिए संदेश भिजवाया कि अगर स्वामी किसी तरह नेपाल पहुंच जाएं तो उन्हें अमरीका भिजवाने की ज़िम्मेदारी उनकी होगी.
स्वामी गोरखपुर के रास्ते काठमांडू पहुंचे, जहाँ तुलसी गिरि ने उन्हें रॉयल नेपाल एयरलाइंस के विमान के ज़रिए बैंकॉक भेजने की व्यवस्था कराई. बैंकॉक से स्वामी ने अमरीका के लिए दूसरी फ़्लाइट पकड़ी.

शानदार घर वापसी

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इंदिरा गांधी से क्रिकेट ट्रॉफी लेते सुब्रमण्यम स्वामी.
दो महीने बाद इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा कर दी. स्वामी ने दोबारा भारत आने का फ़ैसला किया, हालांकि उनके खिलाफ़ गिरफ्तारी का वारंट बरकरार था और करीब एक दर्जन मामलों में उनका नाम था.
जब वो मुंबई के साँताक्रूज़ हवाई अड्डे पर पहुंचे तो पुलिस नें उन्हें हवाई अड्डे से बाहर नहीं आने दिया. आधे घंटे बाद दिल्ली से संदेश गया कि स्वामी के गिरफ्तार नहीं किया जाए. दो दिन बाद स्वामी राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली लौटे. प्लेटफॉर्म पर हज़ारों लोग उनके स्वागत में मौजूद थे. नारे लगाती भीड़ ने उन्हें ज़मीन पर पैर नहीं रखने दिया.
वो लोगों के कंधों पर बैठकर स्टेशन से बाहर आए. उनकी दो साल की बेटी और आजकल हिंदू अखबार की विदेशी मामलों की संवाददाता सुहासिनी हैदर ज़ोर-ज़ोर से रो रही थीं, क्योंकि उस शोर-शराबे के दौरान उनकी रबर की चप्पल कहीं खो गई थी.
स्वामी ने वर्ष 1977 में मुंबई से लोकसभा का चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत कर सदन में पहुंचे.

Friday, 26 June 2015

संविधान संशोधन जिसने देश से गणतंत्र और लोकतंत्र होने का अधिकार ही छीन लिया था @राहुल कोटियाल

इसी संशोधन के कारण संविधान को ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा‘ कहा जाने लगा था. इसके जरिये भारतीय संविधान की प्रस्तावना तक में बदलाव कर दिए गए थे.
भारतीय संविधान में हुए कुल संशोधनों का यदि औसत निकाला जाए तो यह लगभग दो संशोधन प्रति वर्ष होता है. कानून के जानकारों के अनुसार इन संशोधनों ने संविधान को समय के साथ मजबूत ही किया है. लेकिन इस सफ़र में एक दौर ऐसा भी आया था जब संविधान पूरी तरह से निजी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया था. यह दौर था इंदिरा गांधी द्वारा लागू किये गए आपातकाल का. इस दौरान संविधान में इस हद तक बदलाव कर दिए गए थे कि इसे अंग्रेजी में ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ की जगह ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था. इस दौर में संविधान में क्या परिवर्तन हुए, इन परिवर्तनों के क्या परिणाम हुए और कैसे संविधान को उसके मूल रूप में वापस लाया गया? इन सवालों के जवाब जानने की शुरुआत उन परिस्थितियों से करते हैं जिनके कारण संविधान से खिलवाड़ का दौर शुरू हुआ.
19 मार्च 1975 को इंदिरा गांधी पहली ऐसी भारतीय प्रधानमंत्री बनीं जिसे न्यायालय में गवाही देने आना पड़ा हो. यह मामला उनके खिलाफ दर्ज की गई चुनाव याचिका की सुनवाई का था. मार्च 1975 का यही वह समय भी था जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में दिल्ली की सड़कों पर लगभग साढ़े सात लाख लोगों की भीड़ इंदिरा गांधी के खिलाफ नारे लगा रही थी. आजादी के बाद यह पहला मौका था जब किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ इतनी बड़ी रैली निकाली गई थी. ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ और ‘जनता का दिल बोल रहा है, इंदिरा का आसन डोल रहा है’ जैसे नारों से सारा देश गूंज उठा था.
आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किये. 40वें और 41वें संशोधन के जरिये संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संशोधन पास किया गया.
इसके कुछ समय बाद ही 12 जून 1975 का वह ऐतिहासिक दिन भी आया जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 15 नंबर कमरे में हुए एक फैसले ने इंदिरा गांधी के चुनाव को गलत बताते हुए उसे रद्द कर दिया. इसी महीने 25 जून को देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया. इसके बाद शुरू हुआ संविधान में ऐसे संशोधनों का दौर जिन्होंने भारतीय गणतंत्र की आत्मा को ही बदलकर रख दिया.
आपातकाल में हुए संशोधनों में सबसे पहला था भारतीय संविधान का 38वां संशोधन. 22 जुलाई 1975 को पास हुए इस संशोधन के द्वारा न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया. इसके लगभग दो महीने बाद ही संविधान का 39वां संशोधन लाया गया. यह संविधान संशोधन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद को बनाए रखने के लिए किया गया था. इलाहाबाद उच्च न्यायालय इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर चुका था. लेकिन इस संशोधन ने न्यायपालिका से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का अधिकार ही छीन लिया. इस संशोधन के अनुसार प्रधानमंत्री के चुनाव की जांच सिर्फ संसद द्वारा गठित की गई समिति ही कर सकती थी. आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किये. 40वें और 41वें संशोधन के जरिये संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संशोधन पास किया गया. इसी संशोधन के कारण संविधान को ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था. इसके जरिये भारतीय संविधान की प्रस्तावना तक में बदलाव कर दिए गए थे.
42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था – मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना. इस प्रावधान के कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों तक से वंचित किया जा सकता था. इसके साथ ही इस संशोधन ने न्यायपालिका को पूरी तरह से बौना कर दिया था. वहीँ विधायिका को अपार शक्तियां दे दी गई थी. अब केंद्र सरकार को यह भी शक्ति थी कि वह किसी भी राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी भी सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी. साथ ही राज्यों के कई अधिकारों को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया.
42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था – मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना.
42वें संशोधन का एक और कुख्यात प्रावधान ‘संविधान में संशोधन’ के सम्बंध में भी था. हालांकि आपातकाल से कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए संविधान में संशोधन करने के पैमाने तय कर दिए थे. लेकिन 42वें संशोधन ने इन पैमानों को भी दरकिनार कर दिया. इस संशोधन के बाद विधायिका द्वारा किए गए ‘संविधान-संशोधनों’ को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. साथ ही सांसदों एवं विधायकों की सदस्यता को भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. किसी विवाद की स्थिति में उनकी सदस्यता पर फैसला लेने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को दे दिया गया और संसद का कार्यकाल भी पांच वर्ष से बढाकर छह वर्ष कर दिया गया.
आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान में कुछ संशोधन ऐसे भी हुए जिन्हें सकारात्मक नजरिये से देखा जा सकता है. संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ जैसे शब्दों का जुड़ना और संविधान में मौलिक कर्तव्यों का शामिल होना कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं. यही कारण है कि ये बदलाव आज भी हमारे संविधान का हिस्सा हैं. लेकिन इन चुनिंदा सकारात्मक प्रावधानों से कभी भी आपातकाल और उसकी आड़ में हुए संविधान संशोधनों की क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती थी.
आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान में कुछ संशोधन ऐसे भी हुए जिन्हें सकारात्मक नजरिये से देखा जा सकता है. संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ जैसे शब्दों का जुड़ना और संविधान में मौलिक कर्तव्यों का शामिल होना कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं.
आपातकाल के बाद हुए चुनावों में इंदिरा गांधी को अपनी सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा. 1977 में पहली बार भारत में एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार ने आते ही संविधान को सुधारने का काम शुरू किया. इसकी मुख्य जिम्मेदारी तत्कालीन कानून मंत्री शांति भूषण को दी गई. संशोधनों से क्षतिग्रस्त हुए संविधान को संवारने के लिए कुछ और संशोधनों की जरूरत थी. जनता पार्टी ने सबसे पहले 43वें संशोधन के जरिये सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों को उनके अधिकार वापस दिलाए. इसके बाद संविधान का 44वां संशोधन हुआ जिसके जरिये संविधान फिर से अपनी मूल अवस्था में आ गया. 42वे संशोधन से जो क्षति संविधान की हुई थी उसे ठीक करने का सबसे ज्यादा श्रेय जनता पार्टी द्वारा किये गए 44वें संशोधन को ही जाता है. इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने भी 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए संविधान को उसका मूल स्वरुप लौटाया है.
न्यायपालिका को दुबारा मजबूत करने और 42वें संशोधन के दोषों को दूर करने के साथ ही 44वें संशोधन ने संविधान को पहले से भी ज्यादा मजबूत करने का काम भी किया है. इस संशोधन ने संविधान में कई ऐसे बदलाव किये जिससे 1975 के आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो. आपातकाल सम्बन्धी प्रावधानों में ‘आतंरिक अशांति’ के स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द जोड़ा गया. इसके साथ ही इस संशोधन ने मौलिक अधिकारों को भी मजबूती दी.
जनता पार्टी की सरकार ज्यादा समय तक नहीं चली. सत्ता में आने के कुछ समय बाद से ही इसमें कई विभाजन होने लगे थे. सुप्रसिद्ध लेखक राम चन्द्र गुहा ने अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में जनता पार्टी के बारे में लिखा है कि ‘जहां कांग्रेस ने अपने उसूलों को बर्बाद करने में तीस साल लगाए, वहीँ जनता पार्टी ने यह काम एक साल में ही कर दिया.’ जनता पार्टी भले ही अपने इस कार्यकाल के बाद पूरी तरह बिखर गई हो लेकिन उसने निश्चित ही भारतीय संविधान को बिखरने से बचाया है

संजय गांधी के लिए नसबंदी अभियान इतना अहम क्यों बन गया था? @विकास बहुगुणा


आपातकाल के दौरान संजय गांधी के सिर पर नसबंदी का ऐसा जुनून क्यों सवार हो गया था कि वे इस मामले में हिटलर से भी 15 गुना आगे निकल गए?
‘सबको सूचित कर दीजिए कि अगर महीने के लक्ष्य पूरे नहीं हुए तो न सिर्फ वेतन रुक जाएगा बल्कि निलंबन और कड़ा जुर्माना भी होगा. सारी प्रशासनिक मशीनरी को इस काम में लगा दें और प्रगति की रिपोर्ट रोज वायरलैस से मुझे और मुख्यमंत्री के सचिव को भेजें. ‘
यह टेलीग्राफ से भेजा गया एक संदेश है. इसे आपातकाल के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने अपने मातहतों को भेजा था. जिस लक्ष्य की बात की गई है वह नसबंदी का है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि नौकरशाही में इसे लेकर किस कदर खौफ रहा होगा. आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने जोर-शोर से नसबंदी अभियान चलाया था. इस पर जोर इतना ज्यादा था कि कई जगह पुलिस द्वारा गांवों को घेरने और फिर पुरुषों को जबरन खींचकर उनकी नसबंदी करने की भी खबरें आईं. जानकारों के मुताबिक संजय गांधी के इस अभियान में करीब 62 लाख लोगों की नसबंदी हुई थी. बताया जाता है कि इस दौरान गलत ऑपरेशनों से करीब दो हजार लोगों की मौत भी हुई.
नसबंदी के पीछे हिटलर की सोच यह थी कि आनुवंशिक बीमारियां अगली पीढ़ी में नहीं जाएंगी तो जर्मनी इंसान की सबसे बेहतर नस्ल वाला देश बन जाएगा
1933 में जर्मनी में भी ऐसा ही एक अभियान चलाया गया था. इसके लिए एक कानून बनाया गया था जिसके तहत किसी भी आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की नसबंदी का प्रावधान था. तब तक जर्मनी नाजी पार्टी के नियंत्रण में आ गया था. इस कानून के पीछे हिटलर की सोच यह थी कि आनुवंशिक बीमारियां अगली पीढ़ी में नहीं जाएंगी तो जर्मनी इंसान की सबसे बेहतर नस्ल वाला देश बन जाएगा जो बीमारियों से मुक्त होगी. बताते हैं कि इस अभियान में करीब चार लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई थी.
सवाल उठता है कि संजय गांधी के सिर पर नसबंदी का ऐसा जुनून क्यों सवार हो गया था कि वे इस मामले में हिटलर से भी 15 गुना आगे निकल गए. दरअसल ऐसा कई चीजों के समय के एक मोड़ पर मिलने से मुमकिन हुआ था. इनमें पहली थी संजय की कम से कम समय में खुद को प्रभावी नेता के तौर पर साबित करने की महत्वाकांक्षा. दूसरी, परिवार नियोजन को और असरदार बनाने के लिए भारत पर अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से पड़ता दबाव. तीसरी, जनसंख्या नियंत्रण के दूसरे तरीकों की बड़ी विफलता और चौथी आपातकाल के दौरान मिली निरंकुश शक्ति.
25 जून 1975 को आपातकाल लगने के बाद ही राजनीति में आए संजय गांधी के बारे में यह साफ हो गया था कि आगे गांधी-नेहरू परिवार की विरासत वही संभालेंगे. संजय भी एक ऐसे मुद्दे की तलाश में थे जो उन्हें कम से कम समय में एक सक्षम और प्रभावशाली नेता के तौर पर स्थापित कर दे. उस समय वृक्षारोपण, दहेज उन्मूलन और शिक्षा जैसे मुद्दों पर जोर था, लेकिन संजय को लगता था कि उन्हें किसी त्वरित करिश्मे की बुनियाद नहीं बनाया जा सकता.
राजनीति में नए-नए आए संजय गांधी एक ऐसे मुद्दे की तलाश में थे जो उन्हें कम से कम समय में एक सक्षम और प्रभावशाली नेता के तौर पर स्थापित कर दे.
संयोग से यही वह दौर भी था जब दुनिया में भारत की आबादी का जिक्र उसके अभिशाप की तरह होता था. अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश मानते थे कि हरित क्रांति से अनाज का उत्पादन कितना भी बढ़ जाए, सुरसा की तरह मुंह फैलाती आबादी के लिए वह नाकाफी ही होगा. उनका यह भी मानना था कि भारत को अनाज के रूप में मदद भेजना समंदर में रेत फेंकने जैसा है जिसका कोई फायदा नहीं. ऐसा सिर्फ अनाज ही नहीं, बाकी संसाधनों के बारे में भी माना जाता था.
अपनी किताब द संजय स्टोरी में पत्रकार विनोद मेहता लिखते हैं, ‘अगर संजय आबादी की इस रफ्तार पर जरा भी लगाम लगाने में सफल हो जाते तो यह एक असाधारण उपलब्धि होती. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा होती.’ यही वजह है कि आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से लागू करवाना संजय गांधी का अहम लक्ष्य बन गया. इस दौरान उन्होंने देश को दुरुस्त करने के अपने अभियान के तहत सौंदर्यीकरण सहित कई और काम भी किए, लेकिन अपनी राजनीति का सबसे बड़ा दांव उन्होंने इसी मुद्दे पर खेला. उन्हें उम्मीद थी कि जहां दूसरे नाकामयाब हो गए हैं वहां वे बाजी मार ले जाएंगे.
25 जून 1975 से पहले भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर इस बात का दबाव बढ़ने लगा था कि भारत नसबंदी कार्यक्रम को लेकर तेजी दिखाए. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और एड इंडिया कसॉर्टियम जैसे संस्थानों के जरिये अपनी बात रखने वाले विकसित देश यह संदेश दे रहे थे कि भारत इस मोर्चे पर 1947 से काफी कीमती समय बर्बाद कर चुका है और इसलिए उसे बढ़ती आबादी पर लगाम लगाने के लिए यह कार्यक्रम युद्धस्तर पर शुरू करना चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत में काफी समय से जनसंख्या नियंत्रण की कई कवायदें चल भी रही थीं. गर्भनिरोधक गोलियों सहित कई तरीके अपनाए जा रहे थे, लेकिन इनसे कोई खास सफलता नहीं मिलती दिख रही थी.
अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत में काफी समय से जनसंख्या नियंत्रण की कई कवायदें चल भी रही थीं, लेकिन उनसे कोई खास सफलता मिलती नहीं दिख रही थी.
आपातकाल शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों का गुट और भी जोरशोर से नसबंदी कार्यक्रम लागू करने की वकालत करने लगा. इंदिरा गांधी ने यह बात मान ली. जानकारों के मुताबिक यह उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि वे खुद कुछ ऐसा करना चाह रही थीं जिससे लोगों का ध्यान उस अदालती मामले से भटकाया जा सके जो उनकी किरकिरी और नतीजतन आपातकाल की वजह बना. उन्होंने संजय गांधी को नसबंदी कार्यक्रम लागू करने की जिम्मेदारी सौंप दी जो मानो इसका इंतजार ही कर रहे थे.
इसके बाद कुछ महीनों तक इतने बड़े कार्यक्रम के लिए कामचलाऊ व्यवस्था खड़ी करने का काम हुआ. संजय गांधी ने फैसला किया कि यह काम देश की राजधानी दिल्ली से शुरू होना चाहिए और वह भी पुरानी दिल्ली से जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है. उन दिनों भी नसबंदी को लेकर कई तरह की भ्रांतियां थीं. मुस्लिम समुदाय के बीच तो यह भी धारणा थी कि यह उसकी आबादी घटाने की साजिश है. संजय गांधी का मानना था कि अगर वे इस समुदाय के बीच नसबंदी कार्यक्रम को सफल बना पाए तो देश भर में एक कड़ा संदेश जाएगा. यही वजह है कि उन्होंने आपातकाल के दौरान मिली निरंकुश ताकत का इस्तेमाल करते हुए यह अभियान शुरू कर दिया. अधिकारियों को महीने के हिसाब से टारगेट दिए गए और उनकी रोज समीक्षा होने लगी.
होना यह चाहिए था कि इतना बड़ा अभियान छेड़े जाने से पहले लोगों में इसको लेकर जागरूकता फैलाई जाती. जानकार मानते हैं कि इसे युद्धस्तर की बजाय धीरे-धीरे और जागरूकता के साथ आगे बढ़ाया जाता तो देश के लिए इसके परिणाम क्रांतिकारी हो सकते थे. लेकिन जल्द से जल्द नतीजे चाहने वाले संजय गांधी की अगुवाई में यह अभियान ऐसे चला कि देश भर में लोग कांग्रेस से और भी ज्यादा नाराज हो गए. माना जाता है कि संजय गांधी के नसबंदी कार्यक्रम से उपजी नाराजगी की 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर करने में सबसे अहम भूमिका रही.

उन्नीस अंधेरे महीनों के बाद रौशनी

नई दुनिया और नवभारत टाइम्स के संपादक रहे मूर्धन्य पत्रकार राजेंद्र माथुर ने यह आलेख 23 मार्च, 1977 को जनता पार्टी की जीत की घोषणा के ठीक बाद लिखा था.
रविवार रात दो-ढाई बजे खबर आई कि रायबरेली में दोबारा मतदान और मतगणना की अर्जियां मतदान अधिकारी ने नामंजूर कर दी हैं. रात साढ़े तीन बजे के करीब कार्यवाहक राष्ट्रपति वासप्पा दानप्पा जत्ती ने आपातकाल हटा लेने की घोषणा कर दी.
आपातकाल की समाप्ति का एक नतीजा यह हुआ है कि संविधान की धारा 19 में वर्णित जो बुनियादी आजादियां खत्म कर दी गई थीं, वे दोबारा कायम हो गई हैं. मीसा की वे धाराएं भी अपने-आप गायब हो गई हैं, जो सरकार को बिना कारण गिरफ्तारी के अपार अधिकार देती थीं. अत: मीसा बंदियों को गिरफ्तार रखना अब संभव नहीं होगा.
नवंबर, 1976 में लोकसभा कार्यकाल एक साल और बढ़वा लिया गया था. संजय गांधी चाहते थे कि जब तक उनका संगठन भारत-भर में न फैल जाए तब तक चुनाव रुके रहें
आपातकाल 26 जून, 1975 को लगाया गया था. उसका कारण यह बताया गया कि प्रतिपक्ष ने अंदरूनी उपद्रव द्वारा सरकार का कामकाज असंभव बना दिया है. लेकिन 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला देकर रायबरेली से श्रीमती गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था. उम्मीद थी कि इस फैसले के तुरंत बाद श्रीमती गांधी इस्तीफा दे देंगी. लेकिन कांग्रेस कार्यकारिणी, संसदीय दल, वरिष्ठ नेता, और चौराहे की आयोजित भीड़ें- सब एक स्वर से यह कहते पाए गए कि श्रीमती गांधी में उन्हें विश्वास है.
श्रीमती गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की. न्यायालय ने उन्हें अंतिम फैसला होने तक वोट के अधिकार से वंचित व्यक्ति की तरह लोकसभा की कार्रवाई में भाग लेने की इजाजत दी. उधर प्रतिपक्ष ने उनके इस्तीफे के लिए बुलंद आवाज उठाई, और 25 जून को जयप्रकाश नारायण ने रामलीला मैदान में एक लड़ाकू भाषण दिया.
25-26 जून की दरम्यानी रात को जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई तथा हजारों प्रतिपक्षी नेता तथा कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिए गए. सुबह रेडियो पर एक भाषण देते हुए श्रीमती गांधी ने आपातकाल का ऐलान कर दिया, और कहा कि वह बहुत कम अरसे के लिए होगा.
आपातकाल के 19 महीनों तक देश में अजीब-सी खामोशी रही, जिससे श्रीमती गांधी को लगा कि प्रतिपक्ष एक फिजूल का गुब्बारा था, जिसे अखबारों और आंदोलनकारियों ने हवा भर-भरकर फुला दिया है
आपातकाल के एक हफ्ते के अंदर एक जुलाई को प्रधानमंत्री ने एक 20 सूत्री आर्थिक कार्यक्रम का ऐलान  किया. विनोबा ने तब आपातस्थिति को अनुशासन-पर्व बताया. लेकिन जब श्रीमती गांधी ने फरवरी, 1976 में चुनाव कराने से इनकार कर दिया तो विनोबा भी श्रीमती गांधी से खिन्न हो गए.
आपातकाल के कदमों को भारतीय राजनीति का स्थायी अंग बनाने के लिए श्रीमती गांधी की सरकार ने नवंबर, 1976 में संविधान का 42वां संशोधन मंजूर किया, जिसने इस किताब की शक्ल बदल दी. एक प्रेस कानून भी पास हुआ जो अखबारों को दंडित करने का स्थायी अधिकार सरकार को देता है. लेकिन इस दौरान इंडियन एक्सप्रेस और स्टेट्समैन जैसे पत्रों ने जोखिम उठाकर सरकार की ज्यादती के खिलाफ लगातार संघर्ष किया.
आपातकाल के दौरान स्वाधीन भारत के इतिहास में पहली बार सेंसरशिप लागू हुई. संसद की कार्रवाई को रिपोर्ट करने पर भी पाबंदी लगाई. कई मुख्यमंत्रियों के बयान भी नहीं छपने दिए गए; मसलन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का यह वक्तव्य कि खेती को संविधान की समवर्ती सूची में रखने का वे विरोध करते हैं.
आपातकाल संजय गांधी की सलाह से लगाया गया था. संकट के समय संजय की सलाह से प्रभावित होकर श्रीमती गांधी अपने पुत्र के प्रति ममता और कृतज्ञता से भर गईं. दबाव डालकर उनके नाम अखबारों के पहले पन्ने पर छपवाए जाने लगे, और मुख्यमंत्री उनकी राजकुमार की तरह अगवानी करने लगे. सारे देश को लगा कि श्रीमती गांधी अपने पुत्र को भावी प्रधानमंत्रित्व के लिए तैयार कर रही हैं.
विनोबा ने तब आपातस्थिति को अनुशासन-पर्व बताया. लेकिन जब श्रीमती गांधी ने फरवरी, 1976 में चुनाव कराने से इनकार कर दिया तो विनोबा भी श्रीमती गांधी से खिन्न हो गए
संजय गांधी को युवक कांग्रेस का काम सौंपा गया. उन्होंने अपने वफादारों की एक नई सेना संगठित की; जिसका बड़ा जलसा गुवाहाटी में अभी नवंबर में हुआ. उसी समय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन भी वहीं हो रहा था. प्रधानमंत्री ने तब हर्ष के साथ कहा कि कांग्रेस की काफी गरज युवक कांग्रेस ने छीन ली है. गुवाहाटी के बाद इरादा यह था कि पुरानी कांग्रेस का कायाकल्प करके उसे संजय गांधी का राजतिलक करने वाली कांग्रेस बना दिया जाए.
संजय गांधी की नाराजगी के कारण श्रीमती गांधी के कई पुराने साथी अलग छिटक गए और उनका महत्व कम हो गया. नंदिनी सत्पथी और हेमवती नंदन बहुगुणा को जाना पड़ा. सिद्धार्थ शंकर राय को हटाने की कोशिश शुरू हुई. रजनी पटेल अलग कर दिए गए. गुवाहाटी में कांग्रेस अध्यक्ष बरुआ को एक युवक नेता ने खुलेआम भला-बुरा कहा.
सूचना और रेडियो मंत्री मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने आजादी के दीये बुझाने में उल्लेखनीय रोल अदा किया. फिल्मी गीतकारों और अभिनेताओं के उन्होंने सरकार की प्रशंसा में गीत गाने के लिए मजबूर किया और किशोर कुमार जैसे कलाकार ने जब इनकार कर दिया तो रेडियो से उनके गाने न बजाने के आदेश दे दिए गए. कई ख्यातिप्राप्त अखबार बंद हो गए, जैसे रमेश थापर का सेमिनार, साने गुरूजी का साधना, राजमोहन गांधी का हिम्मत, अंग्रेजी त्रैमासिक क्वेस्ट, एडी गोरवाला का ओपीनियन.
दिल्ली में कुलदीप नैयर ने, गुजरात में भूमिपुत्र ने और मीनू मसानी के फ्रीडम फर्स्ट ने न्यायालयों में ऐतिहासिक लड़ाइयां लड़ीं. लेकिन सरकार ने अदालतों के फैसलों को छापने पर भी पाबंदी लगा दी
सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले जजों के तबादले आपातकाल में शुरू हुए. दिल्ली में कुलदीप नैयर ने, गुजरात में भूमिपुत्र ने और मीनू मसानी के फ्रीडम फर्स्ट ने न्यायालयों में ऐतिहासिक लड़ाइयां लड़ीं. लेकिन सरकार ने अदालतों के फैसलों को छापने पर भी पाबंदी लगा दी. जनसंघ का अखबार मदरलैंड बंद हो गया और कम्यूनिस्टों के दैनिक पैट्रियट ने जब संजय गांधी की तसवीरें छापने से इनकार कर दिया तो सरकार ने उसके विज्ञापन बंद कर दिए. विद्याचरण शुक्ल ने बार-बार कहा कि पुरानी आजादी फिर कभी लौटने नहीं दी जाएगी.
आपातकाल के दौरान रेलें समय से चलीं, बोनस की मांगें या हड़तालें नहीं हुईं, पहली बार हुकूमत ने सख्ती से राज करने का आभास दिया. आर्थिक उत्पादन बढ़ा, अन्न का भंडार एक करोड़ 80 लाख टन हो गया और विदेशी मुद्रा से खजाना भरपूर हो गया. लेकिन सरकार यह कभी समझा नहीं सकी कि इन उपलब्धियों के लिए डेढ़ लाख लोगों को जेल में रखना क्यों जरूरी है, और इन लोगों ने क्या गद्दारी की है.
संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम के अंतर्गत नसबंदी का कोटा हर पटवारी, डॉक्टर, शिक्षक आदि को दिया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि खेतों, खलिहानों और शिविरों में जबरन पकड़-पकड़कर लोगों की नसबंदी की गई. कांग्रेस की हार का यह एक प्रमुख कारण रहा है.
आपातकाल के 19 महीनों तक देश में अजीब-सी खामोशी रही, जिससे श्रीमती गांधी को लगा कि प्रतिपक्ष एक फिजूल का गुब्बारा था, जिसे अखबारों और आंदोलनकारियों ने हवा भर-भरकर फुला दिया है. वे लगातार कहती रहीं कि हमने प्रजातंत्र के रास्ते को छोड़ा नहीं है, और चुनाव होंगे.
सरकार यह कभी समझा नहीं सकी कि उसने आपातकाल में जो उपलब्धियां हासिल की हैं उनके लिए डेढ़ लाख लोगों को जेल में रखना क्यों जरूरी है, और इन लोगों ने क्या गद्दारी की है
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद श्रीमती गांधी ने चुनाव कानूनों में परिवर्तन कर लिया, और राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री आम उम्मीदवार से अलग श्रेणी में रख दिए गए. इस नए कानून के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद के फैसले को रद्द कर दिया. सिर्फ मोहम्मद हमीदुल्ला बेग ने यह अनावश्यक टिप्पणी की कि नए कानून के बजाय हम पुराने कानूनों के आधार पर ही विचार करें तो भी श्रीमती गांधी मुकदमा जीतती हैं. श्री बेग आज भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं और श्री खन्ना की वरीयता की उपेक्षा कर उन्हें यह पद दिया गया है.
हेबियस कॉर्पस (गिरफ्तारी के बाद अदालत में सुनवाई) का अधिकार आपातकाल के दौरान सारी आजादियां स्थगित होने के बाद भी नागरिक को है या नहीं, इस विषय में एक ऐतिहासिक फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने दिया. उसने कहा कि जो अधिकार संविधान में ही नहीं है, वह मौजूद ही नहीं हो सकता. इसके विपरीत न्यायमूर्ति एचआर खन्ना ने कहा कि हेबियस कॉर्पस का अधिकार कानून के राज की बुनियाद है, और वह संविधान के बाहर स्थित एक अलिखित अधिकार है, जिस पर अदालतें अमल करवा सकती हैं.
18 जनवरी, 1977 को प्रधानमंत्री ने चुनाव की घोषणा की. इससे पहले कई लोग कह चुके थे कि चुनाव नहीं होंगे. नवंबर, 1976 में लोकसभा कार्यकाल एक साल और बढ़वा लिया गया था. संजय गांधी चाहते थे कि जब तक उनका संगठन भारत-भर में न फैल जाए तब तक चुनाव रुके रहें.
लेकिन जनवरी 1977 के बाद घटनाचक्र तेजी से घूमा. (23 जनवरी, 1977 को )चार दलों के विलय के बाद एक जनता पार्टी बनी. रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण को सुनने के लिए अभूतपूर्व सभा हुई. दो फरवरी को जगजीवन राम ने इस्तीफा दे दिया. जनता पार्टी का असर एक आंधी की तरह प्रबल होता गया. और अंत में नाराज तथा गुमसुम जनता ने अपना बदला ले ही लिया.

आपातकाल पर मोदी की बात सही है तो आडवाणी की भी गलत नहीं है @प्रियदर्शन

लाल कृष्ण आडवाणी को आज आपातकाल का ख़तरा फिर से याद आ रहा है तो इसके पीछे भले उनकी राजनीतिक मायूसी हो, लेकिन यह इस समय का सच भी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिल्कुल दुरुस्त याद किया कि 40 साल पहले कैसे एक व्यक्ति की इच्छा के लिए पूरे देश को जेलखाने में बदल दिया गया था. आपातकाल की 19 महीने चली लंबी वह रात बहुत सारे लोगों के लिए एक दु;स्वप्न में बदल गई थी. लोगों के मौलिक अधिकार स्थगित थे, उन्हें जेलों में ठूंसा जा रहा था, संविधानेतर शक्तियां देश चला रही थीं, लोगों की ज़बरदस्ती नसबंदी की जा रही थी, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सलाखों के पीछे भेजे जा रहे थे, प्रेस पर सेंसरशिप लगी हुई थी और डरा हुआ देश देख रहा था कि किस तरह गुलामी का दौर लौट आया है.
लेकिन उन 19 महीनों के आधार पर इंदिरा गांधी को खलनायक बताने वाले लोग कई तथ्य जान-बूझ कर भूल जा रहे हैं. पहली बात तो यह कि 15 साल प्रधानमंत्री रहने वाली इंदिरा गांधी ने बेशक भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बड़ा ख़तरा पेश कर दिया, लेकिन अंततः रास्ता उन्होंने लोकतंत्र का ही चुना. उनको उनके द्वारा घोषित चुनावों से ही हटाया गया और उन्होंने बेझिझक जनमत को मंज़ूर किया. दूसरी बात यह कि महज तीन साल बाद वे लोकतंत्र के रास्ते से ही वापस भी लौटीं.
कांग्रेस की इमरजेंसी झेलने वाले लालू-नीतीश-शरद अब कांग्रेस के ही साथ खड़े हैं. उधर, इमरजेंसी के दौरान संविधानेतर सत्ता के सबसे बड़े सूत्रधारों में एक मेनका गांधी अपने बेटे के साथ बीजेपी में हैं.
दिलचस्प यह भी है कि आपातकाल के दौरान सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने इंदिरा गांधी को माफ़ी की कई चिट्ठियां लिखीं और आपातकाल का समर्थन किया. इन दिनों बीजेपी के सांसद और बड़े नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने तो सन 2000 में लिखे एक लेख में दावा किया है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने भी माफ़ी मांग ली थी और इसके बदले ज़्यादातर समय वे पेरोल पर आज़ाद रहे थे.
मगर इन सबसे ज़्यादा अहम बात दूसरी है. इन चालीस वर्षों में भारतीय राजनीति की गंगा-जमना और नर्मदा में इतना पानी बह गया है कि सारे पुराने समीकरण बदल गए हैं. कांग्रेस का आपातकाल जिन लोगों ने झेला, वे अब कांग्रेस के ही साथ खड़े हैं. लालू-नीतीश-शरद तीनों एक ही पाले में दिखते हैं. दूसरी तरफ़ इमरजेंसी के दौरान संविधानेतर सत्ता के सबसे बड़े सूत्रधारों में एक मेनका गांधी अपने बेटे के साथ बीजेपी में शामिल हैं. लेकिन बेशक, इसी कारण से यह कहना अन्याय होगा कि किसी को इमरजेंसी की आलोचना का हक़ है या नहीं है. मूल बात यह है कि आपातकाल की बात करते हुए हम सबको इन चालीस वर्षों के बदलावों पर भी नज़र रखनी होगी और ठहरावों पर भी, कुछ प्रवृत्तियों के ख़ात्मे पर भी और कुछ की वापसी पर भी.
क्योंकि वे कोई और दिन थे जब न जीवन में आज जैसी रफ़्तार थी, न पत्रकारिता में. राजनीति और दुनिया की कुछ हलचलों के बीच सोया-सोया सा समाज चलता था, मंथर गति से ख़बरें चलती थीं. वे हिंदुस्तान के धीरे-धीरे चलने और बनने के दिन थे. लेकिन वह सोई-सोई सी दुनिया फिर भी आज के मुक़ाबले ज़्यादा जागी हुई थी. वह अपने नेताओं को पहचानती भी थी, पूजती भी थी, लेकिन नाराज़ होने पर बदल डालने का हौसला भी रखती थी. यह सच है कि आपातकाल की पहली चोट के साथ वह सहम कर चुप हो गई. लेकिन आपातकाल के पहले और बाद इसी सोई-सोई दुनिया ने ऐसी अंगड़ाई ली थी, जिससे सत्ताएं थरथरा गई थीं. जैसे 1975 के देश को यक़ीन नहीं था कि इंदिरा गांधी इमरजेंसी लगा देंगी वैसे ही 1971 की इंदिरा गांधी ने सोचा नहीं होगा कि ये देश एक दिन उनका ताज उछाल देगा उनका तख़्त गिरा देगा.
लाल कृष्ण आडवाणी को आज आपातकाल का वह ख़तरा फिर से अगर याद आ रहा है तो इसके पीछे भले उनकी अपनी राजनीतिक मायूसी हो, लेकिन यह ज़माने का भी सच है.
1977 की जो ख़ामोश क्रांति हुई, उससे दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास का एक बेहतरीन दृश्य बना. ये अलग बात है कि महज तीन साल के भीतर उस जनक्रांति के साथ उसके नेताओं ने धोखा किया. उन नेताओं में से एक लाल कृष्ण आडवाणी को आज आपातकाल का वह ख़तरा फिर से अगर याद आ रहा है तो इसके पीछे भले उनकी अपनी राजनीतिक मायूसी हो, लेकिन यह ज़माने का भी सच है.
इस बात के बावजूद कि इन चालीस बरसों में हिंदुस्तान कछुए से खरगोश बन चुका है और मीडिया अपनी दैनिक या साप्ताहिक लय को पीछे छोड़कर बिल्कुल चौबीस घंटे चलने वाली ऐसी चक्की बन चुका है, जिसमें दुनिया पिसती रहती है और ख़बरें निकलती रहती हैं, हम एक ज़्यादा बेख़बर और असुरक्षित मुल्क हैं. सबकी फिक्र करने वाला, पास-पड़ोस का ख़याल रखने वाला, और देश और दुनिया को अपना फ़र्ज़ समझने वाला मध्यवर्ग ख़त्म हो चुका है और उसकी जगह एक ऐसा आक्रामक उपभोक्ता वर्ग पैदा हो चुका है जो सिर्फ अपने खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने की सोचता है और किसी भी तरह की हिंसा, गैरबराबरी और नाइंसाफ़ी की धूल अपनी त्वचा पर पड़ने नहीं देता.
इसी दौर में मीडिया पर पूंजी का कब्ज़ा पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत है और समांतर आवाज़ें पहले से ज़्यादा दबी हुई हैं. ऐसे समय में देशभक्ति का मतलब दुनिया में ताकतवर होने की हसरत भर है, विकास का मतलब कुछ लोगों के लिए समृद्धि भर है और नेतृत्व का मतलब आक्रामक तेवर में की गई बयानबाज़ी भर है.
विचारहीनता के इस दौर में फिर ऐसी व्यक्तिपूजा शुरू हो रही है जिसमें न उचित आलोचना की जगह है और न असहमति की. लोकतांत्रिक संस्थाएं या तो ख़त्म की जा रही हैं या बेमानी बनाई जा रही हैं
विचारहीनता के इस दौर में फिर ऐसी व्यक्तिपूजा शुरू हो रही है जिसमें न उचित आलोचना की जगह है और न असहमति की. लोकतांत्रिक संस्थाएं या तो ख़त्म की जा रही हैं या बेमानी बनाई जा रही हैं. दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यक लगातार किनारे किए जा रहे हैं और खुदकुशी और गरीबी के विकराल आंकड़े देखने को कोई भी तैयार नहीं है.
यही वे हालात होते हैं जिनमें कोई नेता ख़ुद को लोकतंत्र का पर्याय समझने लगता है. पहले वह उम्मीद जगाता है, फिर अपनी नाकामियां लोकतंत्र पर थोपता है और फिर अंत में आपातकाल लगाता है- ये अलग बात है कि अंत में वह भी मारा ही जाता है. लेकिन इतिहास की इस गलती को हम न दोहराएं इसके लिए ज़रूरी है कि अपने लोकतंत्र पर लगातार नज़र रखें, अपने नेताओं के हमेशा इम्तिहान लेते रहें.