Friday, 6 March 2015

पाकिस्तानी जेलों से भागने वाले पायलटों की कहानी @रेहान फ़ज़ल

पाकिस्तान से लौटा भारतीय पायलटों का दल
पाकिस्तान से लौटा भारतीय पायलटों का दल.
हाल ही में विंग कमांडर धीरेंद्र एस जाफ़ा की पुस्तक प्रकाशित हुई है 'डेथ वाज़ंट पेनफ़ुल' जिसमें उन्होंने 1971 के युद्ध के बाद भारतीय पायलटों की पाकिस्तानी युद्धबंदी कैंप से निकल भागने की अद्भुत कहानी बताई है.
जब फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट दिलीप पारुलकर का एसयू-7 युद्धक विमान, 10 दिसंबर, 1971 को मार गिराया गया तो उन्होंने इस दुर्घटना को अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मुहिम बना दिया.
13 अगस्त, 1972 को पारुलकर, मलविंदर सिंह गरेवाल और हरीश सिंह जी के साथ रावलपिंडी के युद्धबंदी कैंप से भाग निकले.
इस पुस्तक में बताया गया है कि किस तरह अलग अलग रैंक के 12 भारतीय पायलटों ने एकांतवास, जेल जीवन की अनिश्चतताओं और कठिनाइयों का दिलेरी से सामना किया और इन तीनों पायलटों को जेल ने निकल भागने की दुस्साहसी योजना में मदद की.

पढ़िये रेहान फ़ज़ल की विवेचना

‘रेड वन, यू आर ऑन फ़ायर ’… स्क्वाड्रन लीडर धीरेंद्र जाफ़ा के हेडफ़ोन में अपने साथी पायलट फ़र्डी की आवाज़ सुनाई दी.
दूसरे पायलट मोहन भी चीख़े, ‘बेल आउट रेड वन बेल आउट.’ तीसरे पायलट जग्गू सकलानी की आवाज़ भी उतनी ही तेज़ थी, ‘ जेफ़ सर... यू आर.... ऑन फ़ायर.... गेट आउट.... फ़ॉर गॉड सेक.... बेल आउट..’
जाफ़ा के सुखोई विमान में आग की लपटें उनके कॉकपिट तक पहुंच रही थीं. विमान उनके नियंत्रण से बाहर होता जा रहा था. उन्होंने सीट इजेक्शन का बटन दबाया जिसने उन्हें तुरंत हवा में फेंक दिया और वो पैराशूट के ज़रिए नीचे उतरने लगे.
विंग कमांडर धीरेंद्र एस जाफ़ा
विंग कमांडर धीरेंद्र एस जाफ़ा.
जाफ़ा बताते हैं कि जैसे ही वो नीचे गिरे नार-ए-तकबीर और अल्लाह हो अकबर के नारे लगाती हुई गाँव वालों की भीड़ उनकी तरफ़ दौड़ी.
लोगों ने उन्हें देखते ही उनके कपड़े फाड़ने शुरू कर दिए. किसी ने उनकी घड़ी पर हाथ साफ़ किया तो किसी ने उनके सिगरेट लाइटर पर झपट्टा मारा.
सेकंडों में उनके दस्ताने, जूते, 200 पाकिस्तानी रुपए और मफ़लर भी गायब हो गए. तभी जाफ़ा ने देखा कि कुछ पाकिस्तानी सैनिक उन्हें भीड़ से बचाने की कोशिश कर रहे हैं.
एक लंबे चौड़े सैनिक अफ़सर ने उनसे पूछा, ‘तुम्हारे पास कोई हथियार है?’ जाफ़ा ने कहा, ‘मेरे पास रिवॉल्वर थी, शायद भीड़ ने उठा ली.’

‘क्या जख़्मी हो गए हो?’

बीबीसी हिंदी के स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ विंग कमांडर एमएस गरेवाल
बीबीसी हिंदी के स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ विंग कमांडर एमएस गरेवाल.
‘लगता है रीढ़ की हड्डी चली गई है. मैं अपने शरीर का कोई हिस्सा हिला नहीं सकता.’ जाफ़ा ने कराहते हुए जवाब दिया.
उस अफ़सर ने पश्तो में कुछ आदेश दिए और जाफ़ा को दो सैनिकों ने उठा कर एक टेंट में पहुंचाया.
पाकिस्तानी अफ़सर ने अपने मातहतों से कहा, इन्हें चाय पिलाओ.
जाफ़ा के हाथ में इतनी ताक़त भी नहीं थी कि वो चाय का मग अपने हाथों में पकड़ पाते.
एक पाकिस्तानी सैनिक उन्हें अपने हाथों से चम्मच से चाय पिलाने लगा. जाफ़ा की आखें कृतज्ञता से नम हो गईं.

पाकिस्तानी जेल में राष्ट्र गान

जाफ़ा की कमर में प्लास्टर लगाया गया और उन्हें जेल की कोठरी में बंद कर दिया गया. रोज़ उनसे सवाल जवाब होते.
जब उन्हें टॉयलेट जाना होता तो उनके मुंह पर तकिये का गिलाफ़ लगा दिया जाता ताकि वो इधर उधर देख न सकें. एक दिन उन्हें उसी बिल्डिंग के एक दूसरे कमरे में ले जाया गया.
एयर वाइस मार्शल बनी कोएलहो
एयर वाइस मार्शल बनी कोएलहो.
जैसे ही वो कमरे के पास पहुंचे, उन्हें लोगों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं. जैसे ही वो अंदर घुसे, सारी आवाज़े बंद हो गई.
अचानक ज़ोर से एक स्वर गूंजा, ‘जेफ़ सर!’… और फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट दिलीप पारुलकर उन्हें गले लगाने के लिए तेज़ी से बढ़े.
उन्हें दिखाई ही नहीं दिया कि जाफ़ा की ढीली जैकेट के भीतर प्लास्टर बंधा हुआ था. वहाँ पर दस और भारतीय युद्धबंदी पायलट मौजूद थे.
इतने दिनों बाद भारतीय चेहरे देख जाफ़ा की आँखों से आंसू बह निकले. तभी युद्धबंदी कैंप के इंचार्ज स्क्वाड्रन लीडर उस्मान हनीफ़ ने मुस्कराते हुए कमरे में प्रवेश किया.
उनके पीछे उनके दो अर्दली एक केक और सबके लिए चाय लिए खड़े थे. उस्मान ने कहा, मैंने सोचा मैं आप लोगों को क्रिसमस की मुबारकबाद दे दूँ.
वो शाम एक यादगार शाम रही. हँसी मज़ाक के बीच वहाँ मौजूद सबसे सीनियर भारतीय अफ़सर विंग कमांडर बनी कोएलहो ने कहा कि हम लोग मारे गए अपने साथियों के लिए दो मिनट का मौन रखेंगे और इसके बाद हम सब लोग राष्ट्र गान गाएंगे.
जाफ़ा बताते हैं कि 25 दिसंबर, 1971 की शाम को पाकिस्तानी जेल में जब भारत के राष्ट्र गान की स्वर लहरी गूंजी तो उनके सीने गर्व से चौड़े हो गए.

दीवार में छेद

दिलीप पारुलकर
एयर फोर्स मार्शल अर्जन सिंह से वायु सेना पदक लेते विंग कमांडर दिलीप पारुलकर.
इस बीच भारत की नीति नियोजन समिति के अध्यक्ष डीपी धर पाकिस्तान आ कर वापस लौट गए, लेकिन इन युद्धबंदियों के भाग्य का कोई फ़ैसला नहीं हुआ.
उनके मन में निराशा घर करने लगी. सबसे ज़्यादा मायूसी थी फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट दिलीप पारुलकर और मलविंदर सिंह गरेवाल के मन में.
1971 की लड़ाई से पहले एक बार पारुलकर ने अपने साथियों से कहा था कि अगर कभी उनका विमान गिरा दिया जाता है और वो पकड़ लिए जाते हैं, तो वो जेल में नहीं बैठेंगे. वो वहाँ से भागने की कोशिश करेंगे. और यही उन्होंने किया.
बाहर भागने की उनकी इस योजना में उनके साथी थे- फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट गरेवाल और हरीश सिंहजी.

हरा पठानी सूट

तय हुआ कि सेल नंबर 5 की दीवार में 21 बाई 15 इंच का छेद किया जाए जो कि पाकिस्तानी वायु सेना के रोज़गार दफ़्तर के अहाते में खुलेगा और उसके बाद 6 फुट की दीवार फलांग कर वो माल रोड पर कदम रखेंगे.
हरीश सिंहजी
पाकिस्तानी जेल से भागने वाले तीसरे भारतीय पायलट हरीशसिंहजी.
इसका मतलब था करीब 56 इंटों को उसका प्लास्टर निकाल कर ढीला करना और उससे निकलने वाले मलबे को कहीं छिपाना.
कुरुविला ने एक इलेक्ट्रीशियन का स्क्रू ड्राइवर चुराया. गरेवाल ने कोको कोला की बोतल में छेद करने वाले धारदार औज़ार का इंतेज़ाम किया.
रात में दिलीप पारुलकर और गरेवाल दस बजे के बाद प्लास्टर खुरचना शुरू करते और हैरी और चाटी निगरानी करते कि कहीँ कोई पहरेदार तो नहीं आ रहा है. इस बीच ट्रांज़िस्टर के वॉल्यूम को बढ़ा दिया जाता.
भारतीय कैदियों को जेनेवा समझौते की शर्तों के हिसाब से पचास फ़्रैंक के बराबर पाकिस्तानी मुद्रा हर माह वेतन के तौर पर मिला करती थी जिससे वो अपनी ज़रूरत की चीज़े ख़रीदते और कुछ पैसे बचा कर भी रखते.
इस बीच पारुलकर को पता चला कि एक पाकिस्तानी गार्ड औरंगज़ेब दर्ज़ी का काम भी करता है.
उन्होंने उससे कहा कि भारत में हमें पठान सूट नहीं मिलते हैं. क्या आप हमारे लिए एक सूट बना सकते हैं?
औरंगज़ेब ने पारुलकर के लिए हरे रंग का पठान सूट सिला. कामत ने तार और बैटरी की मदद से सुई को मेगनेटाइज़ कर एक कामचलाऊ कंपास बनाया जो देखने में फ़ाउंटेन पेन की तरह दिखता था.

आँधी और तूफ़ान में जेल से निकले

विंग कमांडर एमएस गरेवाल
विंग कमांडर एमएस गरेवाल.
14 अगस्त को पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस था. पारुलकर ने अंदाज़ा लगाया कि उस दिन गार्ड लोग छुट्टी के मूड में होंगे और कम सतर्क होंगे.
12 अगस्त की रात उन्हें बिजली कड़कने की आवाज़ सुनाई दी और उसी समय प्लास्टर की आख़िरी परत भी जाती रही.
तीन लोग छोटे से छेद से निकले और दीवार के पास इंतज़ार करने लगे. धूल भरी आँधी के थपेड़े उनके मुँह पर लगना शुरू हो गए थे.
नज़दीक ही एक पहरेदार चारपाई पर बैठा हुआ था, लेकिन जब उन्होंने उसकी तरफ़ ध्यान से देखा तो पाया कि उसने धूल से बचने के लिए अपने सिर पर कंबल डाला हुआ था.
कैदियों ने बाहरी दीवार से माल रोड की तरफ़ देखा. उन्हें सड़क पर ख़ासी हलचल दिखाई दी. उसी समय रात का शो समाप्त हुआ था.
तभी आँधी के साथ बारिश भी शुरू हो गई. चौकीदार ने अपने मुंह के ऊपर से कंबल उठाया और चारपाई समेत वायुसेना के रोज़गार दफ़्तर के बरामदे की तरफ़ दौड़ लगा दी.
जैसे ही उसमे अपने सिर पर दोबारा कंबल डाला तीनों कैदियों ने जेल की बाहरी दीवार फलांग ली. तेज़ चलते हुए वो माल रोड पर बांए मुड़े और सिनेमा देख कर लौट रहे लोगों की भीड़ में खो गए.
थोड़ी दूर चलने के बाद अचानक फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट हरिश सिंह जी को एहसास हुआ कि वो पाकिस्तान की सबसे सुरक्षित समझी जाने वाली जेल से बाहर आ गए हैं... वो ज़ोर से चिल्लाए..’आज़ादी !’
फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट मलविंदर सिंह गरेवाल का जवाब था, ‘अभी नहीं.’

ईसाई नाम

1 दिसम्बर 1972 को दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर उतरते भारतीय पायलट बनी कोएलहो, धीरेंद्र एस जाफ़ा, तेजवंत सिंह, हरीश सिंहजी
1 दिसम्बर 1972 को दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर उतरते भारतीय पायलट बनी कोएलहो, धीरेंद्र एस जाफ़ा, तेजवंत सिंह, हरीशसिंहजी.
लंबे चौड़ क़द के गरेवाल ने दाढ़ी बढ़ाई हुई थी. उनके सिर पर बहुत कम बाल थे और वो पठान जैसे दिखने की कोशिश कर रहे थे. उनकी बग़ल में चल रहे थे फ़्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप पारुलकर. उन्होंने भी दाढ़ी बढ़ाई हुई थी और इस मौके के लिए ख़ास तौर पर सिलवाया गया हरे रंग का पठान सूट पहना हुआ था.
सबने तय किया कि वो अपने आप को ईसाई बताएंगे क्योंकि उनमें से किसी को नमाज़ पढ़नी नहीं आती थी. वो सभी ईसाई स्कूलों में पढ़े थे और उन्होंने भारतीय वायु सेना में काम कर रहे ईसाइयों को नज़दीक से देखा था.
उन्हें ये भी पता था कि पाकिस्तानी वायु सेना में भी बहुत से ईसाई काम करते थे. दिलीप का नया नाम था फ़िलिप पीटर और गरेवाल ने अपना नया नाम रखा था अली अमीर.
ये दोनों लाहौर के पीएएफ़ स्टेशन पर काम कर रहे थे. सिंह जी का नया नाम था हारोल्ड जैकब, जो हैदराबाद सिंध में पाकिस्तानी वायु सेना में ड्रमर का काम करते थे.
पूछे जाने पर उन्हें बताना था कि उनकी इन दोनों से मुलाकात लाहौर के लाबेला होटल में हुई थी.

पेशावर की बस

ग्रुप कैप्टन दिलीप पारुलकर
ग्रुप कैप्टन दिलीप पारुलकर.
भीगते हुए वो तेज़ कदमों से चल कर बस स्टेशन पहुंच गए. वहाँ पर एक कंडक्टर चिल्ला रहा था, ‘पेशावर जाना है भाई? पेशावर! पेशावर!’ तीनों लोग कूद कर बस में बैठ गए.
सुबह के छह बजते बजते वो पेशावर पहुंच गए. वहाँ से उन्होंने जमरूद रोड जाने के लिए तांगा किया. तांगे से उतरने के बाद उन्होंने पैदल चलना शुरू कर दिया.
फिर वो एक बस पर बैठे. उसमें जगह नहीं थी तो कंडक्टर ने उन्हें बस की छत पर बैठा दिया. जमरूद पहुंच कर उन्हें सड़क पर एक गेट दिखाई दिया. वहाँ पर एक साइन बोर्ड पर लिखा था, ‘आप जनजातीय इलाके में घुस रहे हैं. आगंतुकों को सलाह दी जाती है कि आप सड़क न छोड़ें और महिलाओं की तस्वीरें न खीचें.’
फिर एक बस की छत पर चढ़ कर वो साढ़े नौ बजे लंडी कोतल पहुंच गए. अफ़गानिस्तान वहाँ से सिर्फ़ 5 किलोमीटर दूर था. वो एक चाय की दुकान पर पहुंचे. गरेवाल ने चाय पीते हुए बगल में बैठे एक शख़्स से पूछा... यहाँ से लंडीखाना कितनी दूर है. उसको इस बारे में कुछ भी पता नही था.
दिलीप ने नोट किया कि स्थानीय लोग अपने सिर पर कुछ न कुछ पहने हुए थे. उन जैसा दिखने के लिए दिलीप ने दो पेशावरी टोपियाँ ख़रीदी.
एक टोपी गरेवाल के सिर पर फ़िट नहीं आई तो दिलीप उसे बदलने के लिए दोबारा उस दुकान पर गए.

तहसीलदार के अर्ज़ीनवीस को शक हुआ

जब वो वापस आए तो चाय स्टाल का लड़का ज़ोर से चिल्लाने लगा कि टैक्सी से लंडीखाना जाने के लिए 25 रुपए लगेंगे. ये तीनों टैक्सीवाले की तरफ़ बढ़ ही रहे थे कि पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी.
एक प्रौढ़ व्यक्ति उनसे पूछ रहा था क्या आप लंडीखाना जाना चाहते हैं ? उन्होंने जब 'हाँ' कहा तो उसने पूछा आप तीनों कहाँ से आए हैं?
दिलीप और गैरी ने अपनी पहले से तैयार कहानी सुना दी. एकदम से उस शख़्स की आवाज़ कड़ी हो गई. वो बोला, ‘यहाँ तो लंडीखाना नाम की कोई जगह है ही नहीं... वो तो अंग्रेज़ों के जाने के साथ ख़त्म हो गई.’
उसे संदेह हुआ कि ये लोग बंगाली हैं जो अफ़गानिस्तान होते हुए बांगलादेश जाना चाहते हैं. गरेवाल ने हँसते हुए जवाब दिया, ‘क्या हम आप को बंगाली दिखते हैं? आपने कभी बंगाली देखे भी हैं अपनी ज़िंदगी में?’
बहरहाल तहसीलदार के अर्ज़ीनवीस ने उनकी एक न सुनी. वो उन्हें तहसीलदार के यहाँ ले गया. तहसीलदार भी उनकी बातों से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने कहा कि हमें आप को जेल में रखना होगा.

एडीसी उस्मान को फ़ोन

डाक टिकट
पाकिस्तान की सरकार ने वर्ष 1971 के युद्ध में भारतीय सेना के सामने हथियार डालने वाले अपने 90,000 सैनिकों को याद करते हुए वर्ष 1973 में एक विशेष डाक टिकट जारी किया था.
अचानक दिलीप ने कहा कि वो पाकिस्तानी वायुसेना के प्रमुख के एडीसी स्क्वाड्रन लीडर उस्मान से बात करना चाहते हैं. ये वही उस्मान थे जो रावलपिंडी जेल के इंचार्ज थे और भारतीय युद्धबंदियों के लिए क्रिसमस का केक लाए थे. उस्मान लाइन पर आ गए.
दिलीप ने कहा, ‘सर आपने ख़बर सुन ही ली होगी. हम तीनों लंडीकोतल में हैं. हमें तहसीलदार ने पकड़ रखा है. क्या आप अपने आदमी भेज सकते हैं?’
उस्मान ने कहा कि तहसीलदार को फ़ोन दें. उन्होंने कहा कि ये तीनों हमारे आदमी हैं. इन्हें बंद कर दीजिए, हिफ़ाज़त से रखिए लेकिन पीटिए नहीं.
दिलीप पारुलकर ने बीबीसी को बताया कि ये ख़्याल उन्हें सेकेंडों में आया था. उन्होंने सोचा कि वो इसका ज्यूरिस्डिक्शन इतनी ऊपर तक पहुंचा देंगे कि तहसीलदार चाह कर भी कुछ नहीं कर पाएगा.
उधर 11 बजे रावलपिंडी जेल में हड़कंप मच गया. जाफ़ा की कोठरी के पास गार्डरूम में फ़ोन की घंटी सुनाई दी. फ़ोन सुनते ही एकदम से हलचल बढ़ गई. गार्ड इधर उधर बेतहाशा भागने लगे. बाकी बचे सातों युद्धबंदियों को अलग कर अँधेरी कोठरियों में बंद कर दिया गया.
एक गार्ड ने कहा, ’ये सब जाफ़ा का करा धरा है. इसको इस छेद के सामने डालो और गोली मार दो. हम कहेंगे कि ये भी उन तीनों के साथ भागने की कोशिश कर रहा था.’
जेल के उप संचालक रिज़वी ने कहा, ‘दुश्मन आख़िर दुश्मन ही रहेगा. हमने तुम पर विश्वास किया और तुमने हमें बदले में क्या दिया.’

रिहाई और घरवापसी

इंदिरा गांधी, ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो
शिमला में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का स्वागत करते हुए इंदिरा गांधी.
फिर सब युद्धबंदियों को लायलपुर जेल ले जाया गया. वहाँ भारतीय थलसेना के युद्धबंदी भी थे. एक दिन अचानक वहाँ पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो पहुंचे.
उन्होंने भाषण दिया, ‘आपकी सरकार को आपके बारे में कोई चिंता नहीं है. लेकिन मैंने अपनी तरफ़ से आपको छोड़ देने का फ़ैसला किया है.’
पालम हवाई अड्डे पर धीरेंद्र एस जाफ़ा को गले लगाती उनकी मां प्रकाशवती
पालम हवाई अड्डे पर धीरेंद्र एस जाफ़ा को गले लगाती उनकी मां प्रकाशवती.
एक दिसंबर, 1972 को सारे युद्धबंदियों ने वाघा सीमा पार की. उनके मन में क्षोभ था कि उनकी सरकार ने उन्हें छुड़ाने के लिए कुछ भी नहीं किया. भुट्टो की दरियादिली से उन्हें रिहाई मिली.
लेकिन जैसे ही उन्होंने भारतीय सीमा में कदम रखा वहाँ मौजूद हज़ारों लोगों ने मालाएं पहना और गले लगा कर उनका स्वागत किया. पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह खुद वहाँ मौजूद थे.
वाघा से अमृतसर के 22 किलोमीटर रास्ते में इनके स्वागत में सैकड़ों वंदनवार बनाए गए थे. लोगों का प्यार देखकर इन युद्धबंदियों का गुस्सा जाता रहा.
अगले दिन दिल्ली में राम लीला मैदान में इनका सार्वजनिक अभिनंदन किया गया.

स्वीट कैप्टीविटी

गरेवाल को बरेली में तैनात किया गया. उन्होंने अपनी एक साल की तन्ख़्वाह से 2400 रुपए में एक फ़ियेट कार ख़रीदी.
फ़ाउंटेन पेननुमा कंपास
दिलीप ने वायु सेना प्रमुख पीसी लाल को एक फ़ाउंटेन पेन भेंट किया जो कि वास्तव में एक कंपास था जिसे जेल से भागने में मदद देने के लिए उनके साथियों ने तैयार किया था.
दिलीप पारुलकर के माता पिता ने तुरंत उनकी शादी का इंतज़ाम किया.
भारत वापस लौटने के पाँच महीने बाद हुई उनकी शादी पर उन्हें अपने पाकिस्तानी जेल के साथी स्क्वाड्रन लीडर एवी कामथ का टेलीग्राम मिला, ‘नो इस्केप फ्रॉम दिस स्वीट कैप्टीविटी !’

जोश की 'सनक', जिससे नेहरू भी नहीं बच पाए @रेहान फ़ज़ल

जोश मलीहाबादी, जवाहर लाल नेहरू के साथ
एक मुशायरे की सदारत करते हुए जवाहर लाल नेहरू. बाएं से तीसरे बैठे हैं जोश मलीहाबादी.
जोश मलीहाबादी को क्रांति का शायर कहा जाता था. जहाँ एक ओर वो रिवाज तोड़ने वाले बाग़ी थे तो दूसरी ओर सामाजिक न्याय के पक्ष में आवाज़ उठाने वाले कवि भी.
उन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई अपनी क़लम से लड़ी. लेकिन कुछ चीजों को लेकर वो बड़े पाबंद थे, ख़ासकर उर्दू लिखने और बोलने के तरीके को लेकर.
उर्दू शब्दों का ग़लत उच्चारण करने पर उन्होंने बड़े-बड़ों को नहीं बख़्शा.
उनकी 120वीं वर्षगांठ पर उनके जीवन से जुड़े कई पहलुओं पर रोशनी इस बार विवेचना में.

पढ़िए विस्तार से विवेचना

भारत से पाकिस्तान जा बसने के बाद जोश मलीहाबादी तीन बार भारत आए थे. एक बार मौलाना आज़ाद की मौत पर, दूसरी बार जवाहरलाल नेहरू के मरने पर और तीसरी बार 1967 में.
तीसरी बार वो पुरानी दिल्ली के आज़ाद हिंद होटल में ठहरे थे. उन्होंने दो कमरे लिए थे. एक कमरे में वो और उनके भाई रह रहे थे और दूसरा कमरा उनकी पत्नी के हवाले था.
उसी होटल में उनके बग़ल के कमरे में उन दिनों स्टेट्समैन के रिपोर्टर और बाद में उसके समाचार संपादक बने आरवी स्मिथ भी रह रहे थे.
स्मिथ याद करते हैं, "सूरज ढलते ही जोश स्कॉच पीना शुरू करते थे. उनके लिए दरियागंज के मोतीमहल रेस्तरॉं के मालिक खाना भिजवाते थे मुर्ग़, नान, बिरयानी और कबाब. वो जल्दी सोने जाते थे, लेकिन सुबह चार बजे उठ कर लिखना शुरू कर देते थे और साढ़े छह बजे तक लिखते रहते थे."
आरवी स्मिथ
स्मिथ कहते हैं, "फिर वो करीम से नहारी मंगवा कर खाते थे. इसके बाद वो नहा धो कर अपने दोस्त अहबाबों से मिलने जाते थे. दो या तीन बार वो इंदिरा गांधी से मिलने गए और हर बार उन्होंने वापस आ कर उनकी तारीफ़ की."
स्मिथ ने बताया, "एक शाम वो अकेले बैठे लोगों को पतंग उड़ाते देख रहे थे. उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा, मेरे दोस्त तुम क्या करते हो? मैंने कहा मैं एक पत्रकार हूँ. उन्होंने पूछा किस रिसाले के लिए लिखते हो? मैंने कहा स्टेट्समैन. यह सुनते ही वो दहाड़े, ये तो अंग्रेज़ी का अख़बार है. एक ज़माने में यहाँ सिर्फ़ अंग्रेज़ काम किया करते थे. ये बताओ तुम पढ़ते क्या हो और लिखते क्या हो? क्योंकि आजकल तो नौजवानों का अच्छे पढ़ने लिखने से कोई वास्ता ही नहीं है."

उनत्तीस और उनतीस का फ़र्क

जोश मलीहाबादी और उनके पीछे खड़े हैं प्रेम मोहन कालरा
जोश मलीहाबादी और उनके पीछे खड़े हैं प्रेम मोहन कालरा
स्मिथ याद करते हैं कि जब मैंने देखा कि जोश बात करने के मूड में हैं तो मैंने उनका इंटरव्यू लेना शुरू कर दिया. मैंने उनसे पूछा कि आजकल की उर्दू शायरी के बारे में आपकी क्या राय है.
जोश बोले, "पाकिस्तान में तो वो मर रही है, लेकिन कम से कम भारत में उससे दिखावटी इश्क किया जा रहा है."
स्मिथ साहब को याद है कि उस होटल के मालिक को भी शायरी का छोटामोटा शौक़ था. जोश ने उनसे सवाल किया कि आप कब से शायरी कर रहे हैं. उनका जवाब था उनत्तीस सालों से. जोश ने फ़ौरन उन्हें सही करते हुए कहा था, "सही लफ़्ज़ है उनतीस यानि एक कम तीस."
जोश के पोते फ़र्रुख़ जमाल लिखते हैं कि एक बार पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खाँ ने उन्हें ख़ुश करने के लिए कहा कि आप बहुत बड़े आलम हैं. जोश ने फ़ौरन जवाब दिया सही लफ़्ज़ आलिम है न कि आलम. इस पर अयूब नाराज़ हो गए और उन्होंने आदेश दिया कि जोश को दी गई सीमेंट एजेंसी उनसे वापस ले ली जाए और ऐसा ही हुआ.
भाषा को लेकर उनकी सनक इस हद तक थी कि एक बार उन्होंने सरेआम साहिर लुधियानवी को उनकी मशहूर नज़्म 'ताजमहल' में एक शब्द ग़लत उच्चारित करने के लिए टोका था.
जवाहरलाल नेहरू को जब उन्होंने अपनी एक किताब दी तो उन्होंने कहा,"मैं आपका मशकूर हूँ." जोश ने उन्हें फ़ौरन टोका, "आपको कहना चाहिए था शाकिर हूँ."

जोश का इंटरव्यू

जोश मलीहाबादी और अन्य
बाईं ओर बैठे हैं जोश मलीहाबादी, दाईं ओर किशनलाल कालरा, बीच में पंडित जवाहर लाल नेहरू. किशनलाल कालरा के बराबर नीचे बैठे हैं उनके बेटे प्रेम मोहन कालरा.
जोश अपनी आत्मकथा 'यादों की बारात' में लिखते हैं कि 1948 में उन्होंने सब्ज़ियाँ बेचने का ख़्याल छोड़ कर दिल्ली आने का फ़ैसला किया. वो सीधे जवाहरलाल नेहरू से मिलने गए.
नेहरू ने उनसे कहा कि वो सूचना मंत्रालय में सचिव अज़ीम हुसैन से मिल लें. अजीम हुसैन ने 'आजकल' पत्रिका के संपादक की नौकरी के लिए मुझे एक इंटरव्यू में बुलाया. जब मैं वहाँ पहुंचा तो देखा कि वहाँ बहुत सारे लोग इंटरव्यू देने आए हैं.
जोश लिखते हैं, "जब मैं कमरे में घुसा तो देखा कि वहाँ अज़ीम हुसैन और अजमल खाँ के अलावा पाँच और लोग मेरा इंटरव्यू लेने बैठे हैं. मैंने अपने आप को सहज करने के लिए अपना पानदान निकाला. तभी वहाँ एक मदरासी से दिखने वाले शख़्स ने अंग्रेज़ी में कहा कि आप यहाँ पान नहीं खा सकते."
मैंने जवाब दिया, "हम एक आज़ाद मुल्क में रह रहे हैं और आपके लिए अब भी अंग्रेज़ों के बनाए तौर तरीक़े मायने रखते हैं. पान खाना मेरे लिए साँस लेने जैसा है. अगर आप को ये मंज़ूर नहीं है तो मैं चला जाता हूँ."
मैं ऐसा करने ही वाला था कि अज़ीम हुसैन और अजमल खाँ ने हस्तक्षेप किया और कहा कि आप पान खा सकते हैं. फिर अजमल खाँ बोले जोश मलीहाबादी का क्या इंटरव्यू लिया जाए! चलिए आप निज़ाम के ख़िलाफ़ लिखी गई अपनी नज़्म ही सुना दीजिए.
मैंने जवाब दिया, "इससे फ़ायदा क्या. मेरी नज़्म का उन लोगों के लिए कोई मतलब नहीं जो अब भी अंग्रेज़ों के बनाए तौर तरीक़ों से चलते हैं." इस पर वो सब एक स्वर में बोले, "आप अपनी नज़्म कहिए. हम सब आप के प्रशंसक हैं."
मैंने नज़्म पढ़ी और उसके बाद इंटरव्यू आगे बढ़ने का कोई सवाल ही नहीं था.

फ़िराक़ के गुरु

जोश फ़िराक़ गोरखपुरी से एक साल छोटे थे, लेकिन तब भी फ़िराक उन्हें अपना गुरु मानते थे. फ़िराक़ ने एक बार एक टेलिविजन इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि उन्हें अपनी ग़ज़ल पूरी करने के लिए एक शब्द नहीं मिल रहा था. वो बहुत झिझकते हुए जोश के पास गए थे. जोश के मुंह से वो शब्द एक रत्न की तरह बाहर आया था.
फिराक़ गोरखपुरी
एक बार जोश मलीहाबादी पाकिस्तान में मशहूर आर्टिस्ट ज़िया मोहिउद्दीन और कराची के जल विभाग के प्रमुख के साथ एक टीवी शो कर रहे थे. ज़िया ने उनसे सवाल किया, "जोश साहब, आपके इलाक़े में पानी की तो कोई समस्या नहीं है?
जोश बोले, "भाई पानी तो कभी-कभी आता है, लेकिन बिल बाक़ाएदगी से हर माह की पहली को आ जाता है. उस्मान साहब (बिजली विभाग के प्रमुख) का बस चले तो करबला में इमाम हुसैन को भी पानी का बिल दे देते."
जमात-ए-इस्लामी के अमीर मौलाना मौदूदी से उनके धार्मिक मतभेद थे, लेकिन इसके बावजूद वो उन्हें अपना दोस्त मानते थे.
एक बार जोश अस्पताल में चेकअप के लिए जा रहे थे तो अस्पताल के गेट पर उन्हें मौदूदी मिल गए. उन्होंने मौलाना से पूछा, "आप यहाँ किसलिए?" मौलाना ने कहा, "गुर्दे में पथरी आ गई है, उसी का इलाज कराने आया हूँ." जोश का जवाब था, "मौलाना मेरे ख़्याल से अल्ला मियाँ तुम्हें अंदर से संगसार कर रहा है."

मोतीमहल रेस्तराँ की न्यू इयर पार्टी

स्मिथ साहब को याद है कि 1968 के नव वर्ष की पूर्व संध्या पर जोश रिक्शे पर बैठकर मोतीमहल रेस्तरां गए थे. वहाँ पर दिल्ली और आसपास के नामी शायर मौजूद थे. मैकश अकबराबादी ने अपना कलाम सुनाया था.
मैकश का अर्थ होता है पियक्कड़. मज़े की बात थी कि उन्होंने पूरी ज़िंदगी शराब को हाथ तक नहीं लगाया था. थोड़ी देर बार स्कॉच के तीन पैग और तंदूरी मुर्ग़ के बाद जोश ने अपना गला साफ़ किया था.
'जब चीन ने अंगड़ाई ली' सुनाने के बाद उन्होंने अपनी नज़्म का आख़िरी शेर पढ़ा था-
"तोड़ कर तौबा नदामत तो होती है मुझे ऐ जोश
क्या करूँ नीयत बदल जाती है साग़र देख कर."

पाकिस्तान जाने की कहानी

बीबीसी स्टूडियो में राजेश जोशी और रेहान फ़ज़ल के बीच बैठे हैं गुलज़ार देहलवी.
1956 में जोश बिना किसी को बताए पाकिस्तान चले गए. जाने से पहले वो नेहरू से सलाह मांगने गए. नेहरू ने कहा कि ये आपका निजी मामला है, लेकिन आप फिर भी मौलाना आज़ाद से सलाह ले लीजिए.
मौलाना ने कहा कि यूँ तो देशप्रेम की कोई क़ीमत नहीं होती, लेकिन अगर होती भी है तो भी आपको उसकी क़ीमत से कहीं ज़्यादा मिल चुका है.
बहरहाल जोश माने नहीं और पाकिस्तान चले गए. जोश के नज़दीकी गुलज़ार देहलवी इस समय 90 साल के हैं.
वो कहते हैं, "दरअसल जोश पर उनके बेटों का बहुत दबाव था. नेहरू ने उन्हें सलाह दी थी कि वो अपने बेटों को पाकिस्तान भेज दें और ख़ुद यहीं रहें, लेकिन उनकी पत्नी ने कहा कि वो अपने बेटों और पोतों के बिना यहाँ नहीं रह पाएंगी."
देहलवी के अनुसार, "फिर पाकिस्तान के लोगों ने भी उन्हें सब्ज़बाग दिखाए कि उनके पाकिस्तान पहुंचते ही उन्हें एक हवेली दे दी जाएगी. मौलाना आज़ाद इससे इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने कहा मेरे ज़िंदा रहते तुम भारत में क़दम नहीं रखना और ऐसा ही हुआ. मौलाना आज़ाद की मौत के बाद ही जोश पहली बार भारत वापस आए."

मौलाना आज़ाद से नाराज़गी

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू
एक बार जोश मौलाना आज़ाद से मिलने उनकी कोठी पर पहुंचे. वहाँ मुलाक़ातियों की भीड़ पहले से ही मौजूद थी. काफ़ी देर इंतज़ार के बाद भी जब मुलाक़ात के लिए जोश साहब की बारी नहीं आई तो उन्होंने उकताकर एक चिट पर ये शेर लिख कर चपरासी के हाथ मौलाना की ख़िदमत में भिजवा दिया-
नामुनासिब है ख़ून खौलाना
फिर किसी और वक्त मौलाना.
मौलाना शेर पढ़ कर मुस्कराए और उन्होंने फ़ौरन जोश को अंदर बुलवा लिया.
जोश मलीहाबादी शराब पीते समय सामने टाइमपीस रखते थे और हर तीस मिनट पर एक नया पैग बनाते थे.
एक बार उन्होंने पहला पैग हलक़ में उड़ेलने के बाद अपनी टाइमपीस की तरफ़ इशारा करते हुए मजाज़ से कहा, "देखो मजाज़ मैं कितनी बाक़ाएदगी से शराब पीता हूँ. अगर तुम भी घड़ी सामने रख कर पिया करो तो बदएतियाती से महफ़ूज़ रहोगे."
मजाज़ चहकते हुए बोले, "घड़ी तो क्या जोश साहब! मेरा बस चले तो घड़ा सामने रख कर पिया करूँ."

जब जोश की शेरवानी उतरवाई गई

प्रेम मोहन कालरा, रेहान फ़ज़ल
बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ प्रेम मोहन कालरा.
दिल्ली के मशहूर यूनाइटेड कॉफ़ी हाउस के मालिक प्रेम मोहन कालरा एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं.
एक बार उनके दोस्तों ने उन्हें यूनाइटेड कॉफ़ी हाउस कॉफ़ी पीने के लिए बुलाया. कॉफ़ी और सैंडविच खाने के बाद जोश शौचालय चले गए. जब वो वापस आए तो उनके सारे दोस्त नदारत हो चुके थे. बैरे ने बिल जोश के सामने पेश किया.
जोश के पास बिल देने लायक पैसे नहीं थे. मैनेजर ने कहा कि इसके एवज़ में आपको अपनी शेरवानी गिरवी रखनी पड़ेगी. जोश ने बहुत कहा, लेकिन मैनेजर नहीं माना. जोश को अपनी शेरवानी उतारनी पड़ी. इत्तेफ़ाक से उस दिन उन्होंने शेरवानी के नीचे कुछ नहीं पहना था.
वो सिर्फ़ बनियान और पायजामा पहने कॉफ़ी हाउस से बाहर निकल रहे थे कि उसके मालिक किशनलाल कालरा अंदर घुस रहे थे.
उन्होंने जोश को पहचाना और पूछा हुज़ूर आप यहाँ कैसे? उन्होंने किशनलाल को पूरी कहानी सुनाई. उन्होंने उनकी शेरवानी वापस दिलवाई और मैनेजर को बहुत डांटा.
वो उन्हें अपने घर ले गए और उनसे कहा कि वो जब तक चाहें वहाँ रह सकते हैं. हर दिसंबर को किशनलाल एक मुशायरे का आयोजन करते थे. उसमें जोश के अलावा फ़िराक़, साहिर लुधियानवी, महेंदर सिंह बेदी और कैफ़ी आज़मी जैसे शायर आते थे.
पंडित नेहरू उस मुशायरे में ज़रूर आते थे. मुशायरे के बाद चुनिंदा स्कॉच, शामी क़बाब और लज़ीज़ खाना खिलाया जाता था. किशनलाल कालरा का 2009 में निधन हो गया.

Wednesday, 4 March 2015

बड़े सुधार की जगह छोटे उपाय @नीलांजन मुखोपाध्याय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगभग हर काम को तामझाम और प्रचार के साथ करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हमेशा उस पुरानी कहावत पर यकीन किया है, जिसे बाद में सिगरेट के एक भारतीय ब्रांड ने लोकप्रिय विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल किया-लिव लाइफ किंग साइज। यहां तक कि पिछले लगभग नौ महीनों में, जब से वह प्रधानमंत्री हैं, उनका हर कदम नाटकीय और सभी घोषणाएं जोर-शोर से की गई हैं। इस पृष्ठभूमि में यह अजीब ही है कि मोदी सरकार का पहला पूर्ण बजट धमाकेदार और बड़े सुधार पर केंद्रित नहीं है। इसके बजाय, जैसा कि कई टिप्पणीकारों ने रेखांकित किया है, यह बजट कई छोटे-छोटे उपायों का समन्वित रूप है। नतीजतन यह बजट मोदी के समग्र व्यक्तित्व और कार्यशैली से अलग है। यह मोदी की कार्यशैली में आए बदलाव का भी संकेत देता है, जहां वह महसूस करते हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में अपनाए गए दृष्टिकोण की तुलना में केंद्र में काम करते हुए उसमें कुछ संशोधन किया जाना है।

देश की कई सरकारें देश की अर्थनीति का मोड़ घुमा देने वाले बजट के लिए जानी जाती हैं, जो समय के साथ उनकी स्थायी पहचान बन गया। पीवी नरसिंह राव ने अपनी सरकार में मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री के रूप में शामिल किया, हालांकि वह चंद्रशेखर के आर्थिक सलाहकार थे। इस तरह नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने 1991 के उस युगांतरकारी बजट की पटकथा लिखी, जिसने भारत में उदारीकरण की शुरुआत की। एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चे की सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर पी चिदंबरम ने अपना पहला बजट पेश किया, जिसे निर्विवाद रूप से 'ड्रीम बजट' कहा जाता है, जिसका प्रभाव ऐसा था कि वाजपेयी सरकार में यशवंत सिन्हा जब वित्त मंत्री बने, तो उन्होंने भी शुरुआती कुछ वर्षों में उसी का अनुकरण किया।

सिंडिकेट से मुकाबले के दौरान इंदिरा गांधी ने राजनीतिक रूप से खुद को मजबूत करने के लिए बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे आर्थिक उपायों का सहारा लिया था। ये सभी उदाहरण एक महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित करते हैं-हमारे देश में सरकारें अपने कार्यकाल के शुरुआती दौर में साहसिक कदम उठाती हैं। एक सर्वमान्य धारणा थी कि यदि मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक सुधार लाना है और निर्णायक ढंग से काम करना है, तो उसे कार्यकाल की शुरुआत में ही कुछ ठोस करना होगा। अगर बड़े आर्थिक सुधारों की पहल प्रारंभ में नहीं की गई, तो बाद में ऐसा करने की संभावना बहुत कम है।

मैंने पहले भी कहा था कि बजट सत्र मोदी के कार्यकाल के निर्णायक दौर की शुरुआत होगा। ऐसा सिर्फ बजट के कारण नहीं है, बल्कि इस सत्र में विकास और सुधार से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी राजनीतिक घमासान देखने को मिलेगा। यह बजट सत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण बन गया है, क्योंकि मोदी के प्रधानमंत्री काल में यह पहला मौका है, जब संसद का यह सत्र उन्हें लगे चुनावी और व्यक्तिगत झटके के बाद शुरू हुआ है। यह झटका सिर्फ दिल्ली की हार के कारण नहीं है, बल्कि पिछले कुछ हफ्तों में संघ परिवार के भीतर भी मोदी का नियंत्रण कमजोर हुआ है, क्योंकि संयम बरतने की उनकी अपील के बावजूद संघ के शीर्ष नेताओं ने लगातार भड़काऊ बयान दिए हैं। �
गौर करने लायक है कि भारतीय राजनीति में विगत दो दशक या उससे अधिक की अवधि में पहली बार किसी सरकार के पहले पूर्ण बजट में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा।

वर्ष 1991 में मनमोहन सिंह ने जब बजट पेश किया था, तब आर्थिक मुद्दों पर राजनीतिक वर्ग के बीच भी बहुत कम जागरूकता थी। लेकिन अब राजनीति काफी जटिल बन गई है और चूंकि आम लोग भी आर्थिक मुद्दों की गहन पड़ताल करते हैं, ऐसे में सरकार के पास चुनौतीपूर्ण सवालों से बचने का बहुत कम मौका होता है। इसे सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भी स्वीकार किया है। आर्थिक सर्वे, और बाद में मीडिया से बातचीत में भी उन्होंने बताया कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से वैश्विक स्तर पर बड़े आर्थिक सुधार बड़े संकट के दौरान या उसके बाद ही शुरू हुए हैं। हालांकि उनका यह भी कहना था कि चीन जैसे अधिनायकवादी तंत्र के विपरीत, जहां ऐसे सुधार बाध्यकारी हैं, लोकतंत्र में ऐसे सुधार ज्यादातर अपवादस्वरूप ही होते हैं। मसलन, 1991 में भारत भुगतान संतुलन के मोर्चे पर बड़े संकट से गुजर रहा था, इसीलिए नरसिंह राव सरकार ने उदार आर्थिक नीतियों की शुरुआत की। फिर पहले की तुलना में भारत में नियामक प्राधिकरणों की संख्या आज बहुत अधिक है, इसलिए भी शायद बड़ा कदम उठाने की बहुत जरूरत नहीं।

ऐसे में, कोई भी सरकार बजट में बड़ा कदम उठाने के बजाय छोटे-छोटे उपायों के जरिये अर्थव्यवस्था को गति देने का काम करना ज्यादा पसंद करती है; जैसे क्रिकेट में एक-एक रन लेकर स्कोरबोर्ड को गतिमान बनाए रखा जाता है। जाहिर है, यह बजट में चौके-छक्के मारने का समय नहीं है। ये ही छोटे-छोटे उपाय बड़े आर्थिक सुधारों का काम करते हैं। मोदी ने इसे माना है और राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के दौरान जोर देकर कहा भी कि शुरू से ही उनकी सरकार ने छोटे-छोटे कदम उठाने पर जोर दिया है। कई मायनों में यह वही तरीका है, जिसे मोदी ने गुजरात में अपनाया था। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सबसे पहले जो कदम उठाया, वह था ऊर्जा क्षेत्र में सुधार और मरणासन्न नौकरशाही में जान फूंकना।

बिना धूम-धड़ाके वाला यह बजट यह संकेत भी है कि मोदी शांत प्रशासक की अपनी पुरानी शैली में लौट रहे हैं। मोदी की सफलता उनके व्यक्तित्व के इन दोनों पहलुओं को नियंत्रित रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी। यदि वह अगले चुनाव तक अपनी सरकार को सुरक्षित रखना चाहते हैं, और अगला कार्यकाल भी चाहते हैं, तो उन्हें प्रशासक की शांत छवि को तड़क-भड़क वाली राजनेता की छवि से अलग रखना होगा।