Sunday, 31 May 2015

क्या हजरतबल से पैगंबर मोहम्मद के बाल की चोरी हुई थी? @पवन वर्मा

पचास साल पहले श्रीनगर की हजरतबल दरगाह से मू-ए-मुकद्दस (पैगंबर मोहम्मद का बाल) का चोरी होना और उसकी बरामदगी, दोनों ही आज तक रहस्य हैं.
आधुनिक भारत के रहस्यभारत सरकार के लिए कभी एक मिनट का समय इतना असमंजस भरा साबित नहीं हुआ होगा जितना छह फरवरी, 1964 को हुआ था. उस घटना के बारे में वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा लिखते हैं, ‘फिर मिराक शाह (जम्मू-कश्मीर के आध्यात्मिक नेता) आगे निकलकर आए और उन्होंने पवित्र अवशेष तकरीबन एक मिनट तक अपनी आंखों के सामने रखा. यह साठ सेकंड का सस्पेंस अल्फ्रेड हिचकॉक (सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों के प्रसिद्ध हॉलीवुड निर्देशक) को भी हैरानी में डाल सकता था. शाह ने अपना सिर हिलाया, फिर धीमी लेकिन साफ आवाज में कहा कि यही मू–ए-मुकद्दस है. इसके साथ वहां जुटी जनता में खुशी की लहर दौड़ गई. कश्मीर का एक संकट सुलझ गया था.’
नई दिल्ली की चिंता थी कि यदि मू-ए-मुकद्दस नहीं खोजा गया तो कहीं पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव न फैल जाए. इस बीच पश्चिम बंगाल से दंगों और आगजनी की खबरें आने लगीं
जम्मू-कश्मीर में आज भी छोटी से छोटी घटना बड़ा तूफान खड़ा कर सकती है और 1963 में तो श्रीनगर की हजरतबल दरगाह से मू-ए-मुकद्दस (पैगंबर मोहम्मद का बाल) चोरी हुआ था. राजनीतिक संवेदनशीलता को एक किनारे रख दिया जाए तो भी मू-ए-मुकद्दस की चोरी से बड़ा हंगामा मचना ही था. जम्मू कश्मीर में जो कुछ हुआ वह अपेक्षित था लेकिन इसका असर बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान ( आज का बांग्लादेश) में भी देखा जाएगा, यह किसी ने नहीं सोचा था. पूर्वी पाकिस्तान में तब कई मंदिरों पर हमले हुए और हिंदू समुदाय के कुछ लोग मारे भी गए. ऐसी ही घटनाएं पश्चिम बंगाल में भी हो रही थीं. तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा के लोकसभा में दिए एक वक्तव्य के मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान में भड़के दंगों में 29 लोग मारे गए थे. अखबारों की खबरो के मुताबिक बंगाल में उस समय करीब 200 लोग मारे गए थे जिनमें दोनों समुदाय के लोग शामिल थे. इसके अलावा 50 हजार से ज्यादा लोग बेघरबार हो गए थे. इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपने एक लेख में बताते हैं कि इस घटना से उपजे तनाव के बाद हिंदू शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से बंगाल आने लगे थे साथ ही यहां से मुसलमानों का पलायन शुरू हो गया था.
जो घटना कश्मीर से लेकर सुदूर बांग्लादेश तक सांप्रदायिक तनाव का कारण बन रही थी वह दिसंबर, 1963 की है. उस महीने की 26 तारीख की सुबह जब श्रीनगर के लोग उठे तो उन्होंने एक उड़ती-उड़ती खबर सुनी. खबर यह थी कि मू-ए-मुकद्दस चोरी हो गया. मू-ए-मुकद्दस यानी इस्लाम के पैगंबर हजरत मोहम्मद की दाढ़ी का बाल. पैगंबर के अवशेष दुनिया में गिनी-चुनी जगहों पर ही हैं और ये इस्लाम मानने वालों के लिए आस्था के सबसे बड़े प्रतीक हैं. दो-तीन घंटों के भीतर ही इस अफवाह के सच होने की पुष्टि हो गई. श्रीनगर पुलिस ने माना कि पैगंबर के पवित्र अवशेष दरगाह से चोरी हो गए हैं. यह खबर कुछ ही घंटों में आग की तरह पूरे राज्य में फैल गई और उसी दिन से श्रीनगर की सड़कों पर हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया.
जम्मू-कश्मीर के लिए वह वैसे भी काफी उथलपुथल भरा वक्त था. राज्य के पूर्व प्रधानमंत्री या वजीरे आजम शेख अब्दुल्ला जेल में थे. इसके बाद कुछ समय तक नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता बख्शी गुलाम मोहम्मद उनकी जगह सरकार के मुखिया थे. माना जाता है कि नई दिल्ली द्वारा गुलाम मोहम्मद की वजीरे आजम के पद पर नियुक्ति से जनता में नाराजगी थी. नेशनल कॉन्फ्रेंस में कश्मीर की आजादी के समर्थक धड़े ने गुलाम मोहम्मद के खिलाफ एक आंदोलन छेड़ा हुआ था. इन परिस्थितियों में उन्हें अक्टूबर, 1964 में इस्तीफा देना पड़ा. जाते-जाते उन्होंने सुनिश्चित किया कि इस पद पर उनके करीबी शम्सुद्दीन वजीरे आजम बन जाएं. कश्मीर में जनमत समर्थक धड़ा इससे और आक्रोशित हो गया.
सीबीआई प्रमुख इस मामले की जांच पर पूरी नजर रखे हुए थे लेकिन हर दिन बीतने के साथ ऐसा लग रहा था कि यदि जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंची तो हालात विस्फोटक हो जाएंगे
मू-ए-मुकद्दस की चोरी इन परिस्थितियों में आग में घी डालने का काम कर रही थी. दो-तीन दिन के भीतर ही राज्य में हालात बेकाबू होने लगे. पाकिस्तानी मीडिया (पूर्वी पाकिस्तान में भी) में इस घटना की काफी आक्रामक रिपोर्टिंग हो रही थी. इधर नई दिल्ली की चिंता थी कि यदि मू-ए-मुकद्दस नहीं खोजा गया तो कहीं पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव न फैल जाए. इस बीच पश्चिम बंगाल से दंगों और आगजनी की खबरें आने लगीं. कश्मीर मामले पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने यह सबसे बड़े संकटों में से था. स्थानीय प्रशासन से मसला हल न होते देख प्रधानमंत्री ने भारतीय गुप्तचर एजेंसी के प्रमुख बीएन मलिक को जांच के लिए श्रीनगर रवाना कर दिया.
देश के बाकी हिस्सों में इस घटना पर सांप्रदायिक तनाव देखा जा रहा था लेकिन जम्मू-कश्मीर में शुरुआत में ऐसा नहीं था. श्रीनगर में जब विरोध प्रदर्शन हुए तो मुसलमानों के साथ-साथ हिंदू और सिख भी इनमें शामिल थे. केंद्र सरकार के लिए तात्कालिक रूप से बस यही राहत की बात थी. इस समय जम्मू कश्मीर में एक नए संगठन – आवामी एक्शन कमेटी (एएसी) का भी गठन किया गया. इसके नेता 19 साल के मीरवाइज मौलवी फारुक थे जो हुर्रियत कॉन्फरेंस के नरमपंथी धड़े के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारुख के पिता थे. एएसी ने अपने गठन के साथ ही पूरे आंदोलन की कमान संभाल ली.
सीबीआई प्रमुख इस मामले की जांच पर पूरी नजर रखे हुए थे लेकिन हर दिन बीतने के साथ ऐसा लग रहा था कि यदि जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंची तो हालात विस्फोटक हो जाएंगे. कश्मीर का माहौल बिगाड़ने में पाकिस्तान कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा था. वहां के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान रेडियो पाकिस्तान पर दोहरा रहे थे कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.
‘सभी को पता था कि हजरतबल के खादिम को बलि का बकरा बनाया गया है. यह माना जाता है और बाद में इस बात की पुष्टि भी हुई कि पवित्र अवशेष को गायब करवाने के पीछे कोई साजिश नहीं थी’
अब तक इस घटना को नौ दिन बीत चुके थे. माहौल लगातार तनावपूर्ण बना हुआ था लेकिन चार जनवरी को अचानक सबकुछ बदल गया. दोपहर में रेडियो कश्मीर पर एक विशेष प्रसारण हुआ. राज्य के प्रधानमंत्री शमसुद्दीन ने आम जनता को संबोधित करते हुए कहा, ‘आज हमारे लिए ईद है. मैं आपको यह बताते हुए बहुत खुश हूं कि पवित्र अवशेष बरामद कर लिया गया है.’ यह बरामदगी किसी दूसरी जगह से नहीं हुई थी. मू-ए-मुकद्दस दरगाह में जहां से चोरी हुआ वहीं वापस रख दिया गया है. इसके बाद कुछ समय तक लोगों को इससे मतलब नहीं रहा कि पैगंबर का अवशेष वापस कैसे आया. लोगों के लिए उसकी वापसी की खबर ही सबसे बड़ी थी. शहर में तुरंत मिठाई बांटी जाने लगी. राज्य में उस दिन ईद जैसा माहौल बन गया.
लेकिन संकट पूरी तरह टला नहीं था. अब सवाल यह था कि पुलिस जिस मू-ए-मुकद्दस को खोजने का दावा कर रही है वह असली है कि नहीं इसकी जांच कैसे हो? एएसी की मांग थी कि सार्वजनिक रूप से इसकी शिनाख्त की जाए. ऐसा न होने पर उसने राज्य में विरोध प्रदर्शन जारी रखने की धमकी दी. सरकार इस विवाद को अब और आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी. दोनों पक्षों के बीच तकरीबन एक महीने तक गतिरोध जारी रहा.
केंद्र सरकार की तरफ से इस विवाद को निपटाने जिम्मेदारी लालबहादुर शास्त्री को सौंप दी गई. उन्होंने इस मसले पर सभी पक्षों से बातचीत की जिसके बाद सरकार ने एएसी की मांग मान ली. छह फरवरी को जनता के सामने मू-ए-मुकद्दस के आम दीदार का कार्यक्रम आयोजित किया गया. उस दिन दरगाह के सामने सैकड़ों की संख्या में लोग जमा थे. सभी पक्षों की सहमति से जम्मू-कश्मीर के आध्यात्मिक नेता मिराक शाह कशानी को मू-ए-मुकद्दस की शिनाख्त के लिए चुना गया और जैसा हमने इस लेख की शुरुआत में बताया कि किस तरह शिनाख्त के पहले का वह एक मिनट राज्य और केंद्र दोनों के लिए काफी महत्वपूर्ण हो गया था.
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व वजीरे आजम, पंडित नेहरू के बेहद करीबी थे इसलिए उनको इस पूरे प्रकरण से बचाया गया
अब यह तो निश्चित हो गया कि सीबीआई और पुलिस ने असली मू-ए-मुकद्दस ही बरामद किया था. उसे वापस दरगाह में स्थापित भी कर दिया गया. लेकिन कुछ सवाल अभी भी अनुत्तरित थे. मू-ए-मुकद्दस अपनी जगह वापस कैसे आया? यह चोरी किसने की थी और उसका मकसद क्या था?
गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने फरवरी, 1964 में लोकसभा में जो जानकारी दी उसके मुताबिक दरगाह के एक खादिम (दरगाह की देखरेख करने वाला व्यक्ति) ने यह पवित्र अवशेष चोरी किया था. इसमें उसके एक रिश्तेदार ने उसकी मदद की थी. नंदा के मुताबिक एक और व्यक्ति जो इस साजिश में शामिल था, वह पाकिस्तान आता-जाता रहता था. बाद में इन तीनों लोगों पर मुकदमा चलाया गया. नंदा ने यह भी बताया कि जब खादिम दरगाह में वह पवित्र अवशेष दोबारा रखने के बाद भाग रहा था तब उसे हिरासत में लिया गया. यह सरकार का पक्ष था जिसे एएसी ने कभी नहीं माना. इसकी भी एक वाजिब वजह थी. दरअसल यह बात स्पष्ट नहीं की जा रही थी कि चोरी के पीछे इन लोगों का मकसद क्या था.
उस समय लोगों की आम राय थी कि पवित्र अवशेष बख्शी गुलाम मोहम्मद ने गायब करवाया था. यह भी कहा जाता है कि मू-ए-मुकद्दस चोरी नहीं हुआ था बल्कि कुछ समय के लिए दरगाह से बाहर ले जाया गया. इंदर मल्होत्रा द इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं, ‘लगभग सभी को पता था कि हजरतबल के खादिम को बलि का बकरा बनाया गया है. यह माना जाता है और बाद में इस बात की पुष्टि भी हुई कि पवित्र अवशेष को गायब करवाने के पीछे कोई साजिश नहीं थी बल्कि बख्शी परिवार की एक मरणासन्न महिला इसका दीदार करना चाहती थी और इसीलिए इसे गायब किया गया.’ सरकार और सीबीआई ने कभी बख्शी गुलाम मोहम्मद को इस प्रकरण में शामिल नहीं बताया. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व वजीरे आजम, पंडित जवाहरलाल नेहरू के बेहद करीबी थे इसलिए उनको इस पूरे प्रकरण से बचाया गया.
कुछ लोग मानते हैं कि पवित्र अवशेष गायब करवाने में नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक धड़े का हाथ था. वह इसके जरिये शमसुद्दीन सरकार और उनके जरिए बख्शी गुलाम मुहम्मद को कमजोर करना चाहता था
जानकारों का एक धड़ा यह भी कहता है कि पवित्र अवशेष गायब करवाने में नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक गुट का हाथ था. वह इसके जरिये शमसुद्दीन सरकार और उनके जरिए बख्शी गुलाम मोहम्मद को कमजोर करना चाहता था. बाद में हुआ भी यही. शमसुद्दीन को इस घटना के बाद वजीरे आजम का पद छोड़ना पड़ा.
इस पूरी जांच और उसके नतीजे पर आज तक रहस्य इसलिए भी बना है कि खुद बीएन मलिक ने पवित्र अवशेष की बरामदगी के बारे कुछ नहीं कहा. वे अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘यह एक खुफिया अभियान था…पवित्र अवशेष अपनी जगह पर वापस कैसे आया इस वाकये को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता.’ बीएन मलिक की अब मृत्यु हो चुकी है. यदि हम उनकी आत्मकथा की इन पंक्तियों को उनका सबसे विश्वसनीय बयान मानें तो मू-ए-मुकद्दस की चोरी और उसकी बरामदगी के रहस्य से अब शायद ही कभी पर्दा हटे.

Saturday, 30 May 2015

कहानी भारत के 'Most Wanted' दाऊद इब्राहिम की

भारत की व्यावसायिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में तक़रीबन 20 साल पहले एक के बाद एक हुए बम धमाकों में 257 लोगों की मौत हो गई थी और 700 से ज़्यादा घायल हुए थे.

मुकदमे के दौरान सरकार की ओर से रखे गए पक्ष में दलील दी गई कि संभवत: इन धमाकों को मुंबई में साल भर पहले हुए दंगो की प्रतिक्रिया के तौर पर अंजाम दिया गया.

साल 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में हुए दंगो में बड़ी संख्या में मुस्लिमों की मौत हुई थी. इन दंगो के सिलसिले में मुंबई और पास के इलाक़ों के मज़बूत दक्षिणपंथी राजनीतिक संगठन शिव सेना का नाम लिया जाता रहा है.

अमरीका में भी चर्चा

दाऊद इब्राहिम धमाकों से पहले ही भारत छोड़ चुके थे. भारत सरकार बार-बार आरोप लगाती रही है कि उन्होंने पाकिस्तान में शरण ले रखी है लेकिन पाकिस्तान इससे इंकार करता है.

अमरीका की सरकार ने दाऊद इब्राहिम को विश्वस्तरीय आतंकवादियों के समर्थकों की सूची में डाल रखा है. साल 2003 में तैयार लिस्ट के मुताबिक़ "एक पुलिस कांस्टेबल के बेटे, दाऊद इब्राहिम पिछले दो दशकों में भारतीय अंडरवर्ल्ड के सबसे बड़े अपराधियों में से एक हैं."

इस सूचना में कहा गया है कि वो नशीली दवाओं की तस्करी में शामिल रहे हैं, और उन्होंने "भारत विरोधी इस्लामी चरमपंथी समूह लश्करे तैबा को आर्थिक सहायता पहुंचाई है."

अमरीकी वित्त मंत्रालय के मुताबिक़ दाऊद इब्राहिम और पूर्व अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के बीच लेन-देने भी हुआ था, और मुंबई अपराध सरग़ना में 1990 के दशक में तालिबान की देख-रेख में अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा भी की थी.

करीम लाला के गैंग से शुरुआत

भारतीय जांच अधिकारियों के मुताबिक़ दाऊद इब्राहिम का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी शहर में हुआ था.

भारतीय जांच एजेंसी सीबीआई का कहना है कि पांच फूट चार इंच के अपराध सरग़ना के 'बाईं भौं पर तिल है' और वो फिरौती, जालसाज़ी और धोखाधड़ी के अपराधों में भी शामिल रहे हैं.

हालांकि उनके शुरुआती जीवन के बारे में बहुत कुछ मालूम नहीं है, लेकिन पुलिस के मुताबिक़ दाऊद इब्राहिम ने स्कूल स्तर पर ही पढ़ाई छोड़ दी थी.

अपराध के जीवन के प्रारंभिक दिनों में वो मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला के गैंग के लिए काम करते थे.

लेकिन 1980 के दशक में उनका नाम मुंबई अपराध जगत में बहुत तेज़ी से उभरा और कहा जाता था कि उनकी पहुंच फिल्म जगत से लेकर सट्टे और शेयर बाज़ार तक पहुंच गई.

हालांकि बाद में वो भारत छोड़कर भाग गए, लेकिन पुलिस के मुताबिक दाऊद इब्राहिम विदेश में बैठे हुए भी, भारत में कई वारदातों को अंजाम देने का हुक्म देते रहे हैं. उनका नाम किसी न किसी शक्ल में, कुछ समय बाद सामने आता ही रहा है.

अग्रज, पत्रकार, मित्र श्रीकांत इस सप्‍ताह अखबार की कलर्की से मुक्‍त हुए हैं, श्रीकांतजी के बहाने - कुछ संस्‍मरण @कुमार मुकुल

श्रीकांत के साथ रहकर मैंने जाना कि पत्रकारिता एक ठीम वर्क है और इस रूप में वह सत्‍ता है , जन की सत्‍ता, किसी भी सत्‍ता के मुकाबिल एक ठोस सत्‍ता। पत्रकार कोई सर्वज्ञानी शख्सियत तो है नहीं कि वह सारी दुनिया की खबर रखें हां अपने इस टीमवर्क की बदौलत वह सबको काबू में रखता है। वह जनता के पत्रों को आकार देता है, वह पत्रकार है। इस रूप में वह जन से जुड़ी तमाम विरादरियों से जुड़ा होता है। श्रीकांत से जुड़ी उस विरादरी से जुडकर अनजाने ही मैं भी जनता की उस ताकत का हिस्‍सेदार हो गया, अब मेरी आवाज में भी दम आने लगा,बातों की विश्‍वसनीयता बढने लगी।

जेपी यादव,के बालचन,प्रियरंजन भारती,अजय कुमार,प्रबल महतो और अन्‍य दर्जन भर पत्रकार इस टीम के हिस्‍से थे। यह टीम खबरों का चरित्र तय करती थी। इसके लिए मार तमाम बहसें होती थीं। किसी भी खबर को दबा पाना संभव नहीं था क्‍योंकि एक जगह अगर संपादक खबर दबा दे तो दूसरी जगह उसका आना तय होता था फिर उस अखबार को भी अगले दिन उस खबर को जगह देनी होती थी जिसे वह अपने निजी आग्रह में कम आंक रहा था। इस टीम वर्क के चलते जन की सामान्‍य खबरें भी बडी हो जाती थीं और बाजार में उछाली जा रही खबरों का कद यह टीम छोटा कर देती थी।

श्रीकांत जब लालू प्रसाद को हीरो बना रहे होते थे तो दरअसल वे लालू के पीछे की जनता को जगह दे रहे होते थे। लालू प्रसाद के नाटक में जो जनता की छवियां थीं उसे ही वे आगे बढाते थे। राजनीतिकों को यह भरम हो सकता है कि वे बडे अदाकार है पर जनता सबसे बडी अदाकारा है इसे वह बराबर उन्‍हें महसूस कराती रहती है। पर जब मूल्‍यांकन करना होता था तो वहां श्रीकांत जन की ओर झुक जाते थे। इस तरह वे अपनी राजनीतिज्ञों से जुडी छवि को बराबर साफ करते रह पाते थे। नतीजा जब उन्‍हें लालू प्रसाद से सबसे जुडा देखा जा रहा था तभी उनकी पहली किताब आई,बिहार में चुनाव -जाति बूथ लूट और हिंसा, इस किताब के कुछ पन्‍ने पटना हाई कोर्ट ने उदाहरण के तौर पर लालू प्रसाद की सरकार के खिलाफ दिए गए एक फैसले में उद्धत किए थे।

यही पत्रकारिता की कला थी। जिसके श्रीकांत महारथी थे। इस तरह यह टीम अपने समय की राजनीति को तय भी करती थी जनता के पक्ष में। इस टीम वर्क के कई मजेदार परिणाम आते थे। तब मैं अमर उजाला के लिए पटना से रपटें लिखा करता था। एक बार जब अखबार के कानपुर एडीशन के संपादक और अग्रज कवि वीरेन डंगवाल ने मुझे कानपुर बुलाया तो मुझे यह देख हैरत हुई कि वहां के रिपोर्टर मुझे लेकर उत्‍साहित थे,वे पूछ रहे थे कि मैंने पटना में रहते हुए कलकत्‍ता में पकडे गए चारा घोटाले से जुडे एक आइएएस की गिरफतारी की खबर कलकत्‍ता के रिपोर्टर से पहले कैसे लिखा दी थी। तो यह था टीम वर्क का नतीजा। टीम वर्क के चलते हमारी खबरें खाली और अश्‍लील नहीं हाती थीं और हम जनता का सही चेहरा दिखा पाते थे और ऐसा नहीं कर पाने वालों को कवि आलोक धन्‍वा की तरह उंगली दिखाते हुए टोक पाते थे - वे नील के किनारे किनारे चल कर यहां तक आयी थीं ...कौन मक्‍कार उन्‍हें जंगल की तरह दिखाता है ...।

मेरे घर में मेरी बेरोजगारी को लेकर हमेशा मुझे नीचा दिखाया जाता था निकम्‍मा...। तो वही दौर था कि मैं भी कुछ कंपटीशन आदि क्‍यों नहीं कंपीट करता। इसी दौरान बीपीएससी का प्रश्‍नपत्र अगले दिन मेंरे हाथ लगा। देखा तो उसमें दर्जनों गलतियां थीं। मैंने तब नवभारत में संवाददाता रहे प्रबल से इसकी चर्चा की तो उन्‍होंने झटके सो कहा कल लिखकर दो तो -जरा देखें। तब मैं किसी अखबार में नहीं था। फीचर लिखा करता था पर खबरों के लिए तो किसी अखबार से जुडना होता था। पर प्रबल के कहने पर मैंने बीपीएससी के प्रश्‍नपत्र की गलतियां लिखकर रपट के रूप में दे दीं प्रबल को और अगले दिन मुझे यह देखकर हैरत हुयी कि अखबार के पहले पन्‍ने पर बाटम लीड के रूप में वह खबर छपी थी और बाईलाइन में मेरा नाम चस्‍पॉं था। मैं तो भीतर से गदगद हो गया। बाद में पता चलाकि उस खबर के आधार पर बीपीएससी ने हिन्‍दी माध्‍यम से परीक्षा देने वालों को कुछ नंबर एक्‍स्‍ट्रा दिए। तो यह था टीम वर्क का नतीजा।

एकदम खतमें हैं आप

पिछले पांच सालों से मैं दिल्‍ली में हूं ,और छठे छमाही ही पटना जा पाता हूं। पटना में मेरी दिनचर्या की शुरूआत हाती है श्रीकांतजी के घर से। जगते ही मुंह-हाथ धोकर आशियाना नगर की राह लेता हूं। इधर धूल उड़ाती स्‍कूल बसों ने सुबह का निकलना भी मुहाल कर रखा है तो बचता बचाता डेढ किलोमीटर के अपने पडोस में पहुंचता हूं श्रीकांतजी के यहां। दरवाजा खोलकर झांकते हुए आवाज देता हूं ...तो आवाज आती है आ जाइए इधर कमरे में ही। देखिए तो कुछ पुराने दस्‍तावेज फैलाए वे बैठे हैं। मिलते ही लगेंगे उसकी तफसीलें बताने।

बिहार में चुनाव-जाति,बूथ लूट और हिंसा नामक अपनी पहली किताब के आने के बाद मैं जब भी श्रीकांत जी के यहां गया तो उन्‍हें इसी तरह दस्‍तावेजों में सिर खपाते पाया। पहली किताब में चुनाव और जाति के दर्जनों आंकड़ें उन्‍होंने मुझसे भी सीधे करवाये थे। हिसाब किताब से मुझे शुरू से एलर्जी है सो भीतर से मैं कुढता रहता पर काम करता जाता। अक्‍सर गलतियां करता तो बोलते वे - एकदम खतमें हैं आप,एगो काम नहीं कर सकते हैं ठीक से। मैं हंसता रहता ।

फिर तो पहली किताब की ही जो धूम रही कि दस्‍तावेज तलाशने की अध्‍ययन और खोज-पडताल में लगे रहने की उन्‍हें बीमारी सी हो गयी। पर नतीजे में हर साल एक जरूरी किताब सामने ले आते वे बिहार के दलितों के विषय पर हो या 1857 पर।
मिलने पर वे कथा की शक्‍ल में बात शुरू करते। आप लोग क्‍या कविता करते हैं , इ देखिए कविता ... गोप के । जनेउ आंदोलन के समय की है यह कविता ... आदि आदि।

पहली बार श्रींकांत जी के यहां अग्रज कथाकार मित्र प्रेम कुमार मणि लेकर गये थे जो उनके पडोंस में ही रहते हैं। हम पहूंचे तो श्रीकांतजी एक चौकी को लेकर परेशान थे जो उनके आंगन में पड़ी थी और जिसे उपर छत पर चढाना था। घर की गोल सीढियां ऐसी थीं कि चोकी को उपर ले जाना संभव ना था। तब मैंने कहा कि एक मोटी रस्‍सी का इंतजाम कीजिए। फिर रस्‍सी से बांध कर चौकी को खींच कर हमलोगों ने उपर किया। अब उस पर बैठकर धूप खाने का मजा लेने लगे थे हमलोग सुबह सुबह। वहीं चाय नाश्‍ता आता रहता। गप्‍प चलता रहता मार दुनिया जहान का।

सहरसा में महाप्रकाश जी,पटना में राजूजी ,अजय और श्रीकांत जी के घर का जितना अन्‍न खाया है मैने उसका क्‍या कहना...। श्रीकांत जी का पेट हमेशा खराब रहता और भाभी जी इतना अच्‍छा नाश्‍ता खाना बनातीं कि वहां कुछ देर बैठते ही भूख लग जाती। खाते खाते ही बीच में श्रीकांत जी टोकेंगे चल जल्‍दी से ओराव तनी घूम आवल जाए। फिर मणि जी, सुरेन्‍द्र किशोर,चेतकर झा या आस पास के दर्जनों लोग जो पढने लिखने में रूचि रखते हों उन्‍हें तलाश कर हम बहस-मु‍बाहिसा का एक दौर चला लेते।

लौटते तो बारह बज रहे होते । मैं उनकी ओर देखता कि अब चलूं तो बोलते अरे कहां जाइएगा चलिए एगो प्रेस कांफ्रेंस कर लिया जाए या किसी नेता के यहां हो लिया जाए। वह पत्रकारिता सीखने का मेरा आरंभिक दौर था। उन्‍हीं के साथ खाकर मैं चल देता।

अखबार में इंट्रो कैसे लिखा जाता है यह पहले पहल उन्‍होंने ही बताया था। कहते एकदम बुरबके हैं एतना बडका बडका बात करते हैं और इंट्रो लिखना नहीं जानते। देखिए इ एके पैरा में सब प्रमुख बात को रख देना होता है इंट्रो में...। समीक्षा आदि ही उस समय तक लिखता था मैं। पहला फीचर उनके कहने पर ही लिखा था मैंने। पटना चिडिया खाने में एक आदमी बाघ के पिजडें में चला जात था उसे दुलारता नहलाता आदि। तो उसी पर मैंने लिखा- शेरों का चरवाहा ...। लीड के रूप में छपा वह फीचर। फिर तो हिन्‍दुस्‍तान में लगातार लिखने लगा मैं।

एक मजेदार वाकया है। श्रीकांत जी हमेशा मुझे लिखने को उकसाते कि इस पर लिखो उस पर लिखो। फीचर इंचार्ज नागेन्‍द्र जी को जब तब कह देते कि मुकुल से लिखवाइए। जबकि वे खुद मुझे छापते रहते थे। तो एक बार जब श्रीकांत जी ने उनसे कहा कि मुकुल से कुछ लिखवाइए तो वे चिढ गए और बोले कि खुद आप क्‍यों नहीं लिखवा लेते। अगले दिन जब मैंने अखबार देखा तो एक फीचर नुमा खबर मेरे नाम से छपी थी। चूंकि उस खबर को लेने जब वे गए थे तो मैं भी उनके साथ था तो मैंने सोचा कि ऐसे ही मेरे नाम से दे दिए होंगे श्रीकांत जी पर जब मैंने अखबार पलटा तो आगे चार और फीचर मेरे नाम से था। तब मुझे याद आया पिछले दिन का वाकया जब फीचर इंचार्ज ने उन पर व्‍यंग्‍य किया था कि खुद क्‍यों नहीं छाप देते मुकुल को...।

अखबार की पहली नौकरी मुझे श्रीकांत जी ने ही दिलवायी थी जहां मैंने पहली बार एक अखबारी दफ़तर में काम करने के तौर तरीके सीखे , यूं मात्र डेढ महीने ही वहां टिक सका था मैं, तो यह तो अपनी फितरत रही है,1993-2005 के बीच दर्जन भर अखबारों पत्र- पत्रिकाओं में काम किया मैंने और अब अपने मित्र डॉ.विनय कुमार की पत्रिका मनोवेद के साथ जीता हुआ अपनी लड़ाइयां जारी रखे हूं।

तो पहली नौकरी का किस्‍सा यह था कि तब पटना के सबसे बड़े दैनिक हिन्‍दुस्‍तान में लगातार लिखने लगा था मैं छोटे फीचरों से लेकर पूरे पेज के आलेखों तक मार तमाम विषयों पर लिखकर मेरी छपास पुष्‍ट हो चुकी थी। तो एक दिन मेरे साथी दीपक गुप्‍ता ने मेरे घर आकर सूचना दी कि वह नौकरी पर बनारस जा रहा है। अब घर पहुंचते ही अपनी आभा जी ने मेरी खबर ली बडा पत्रकार बनते हैं , दीपक गये नौकरी पर, आप टापते रहिए यहां की गलियां। तो उसी शाम जब मैं हिन्‍दुस्‍तान गया तो श्रीकांत जी ने सीधे पूछा- नौकरी करनी है। मैंने पूछा- कहां। वे खिसिया गये - कहां क्‍या, करनी है कि नहीं , मन मसोस कर मैंने कहा - हां करनी है। तब उन्‍होंने बताया कि बनारस से एक हिन्‍दी साप्‍ताहिक निकल रहा है आइडियल एक्‍सप्रेस उसमें आपके त्रिलोचन जी सलाहकार संपादक हैं। त्रिलोचन जी का नाम सुनना था कि मैंने हां कर दी। और अगली ही शाम अपना बोरिया-बिस्‍तर ले मैं बनारस जा पहुंचा।

पर डेढ माह बार जब पहली छुटटी पर पटना आया तो वहां से पाटलिपुत्र टाइम्‍स फिर से निकलने वाला था। तो कई युवा साथी उसमें जा रहे थे तो मैं भी पटना रूक गया। अब फिर पटना की तो एक ही दिनचर्या थीं। जब भी फुरसत हो श्रीकांतजी के साथ लग जाना। अपने साथ रखते वे हमेशा ख्‍याल रखते कि मैं कहीं पान आदि पर भी एक भी पैसा खर्च ना करूं,अगर कभी मैं ऐसा करने की कोशिश करता तो वे नराज हो जाते - हमारे साथ घूमना है तो यह फंटूसी नहीं चलेगी।

फिर तो उनका साथ ही साथ था। आगे जब अमर उजाला की रिपोर्टिंग करनी थी तब तक उनके साथ घूम घूम कर मेरी अच्‍छी ट्रेनिंग हो चुकी थी। उनसे जो समय बचता वह उनके छोटे भाई अजय कुमार , जो अभी प्रभात खबर में संपादक है उनकी मोटरसाइकिल पर घूमते बीतता। बाद में अजय के साथ मेरा घूमना बढता गया।

श्रीकांत ने बिहार के तमाम चोटी के नेताओं से मेरा घरेलू परिचय कराया , यह अपनी कमजोरी रही कि आज उनमें से किसी से भी मेरे संबंध जीवित नहीं रहे। हालांकि उनमें एकाध अभी भी जब मिलजाते हैं तो टोक देते हैं।

लालू प्रसाद हो या नीतिश कुमार या जगदानंद सिंह या मंगनी लाल मंडल या सरयू राय, या सुशील मोदी या शिवानन्‍द तिवारी सबसे उनका घरेलू रिश्‍ता था, जहां भी जाते हम खाते पीते घर की तरह घूमते और चले आते। इनमें एक मंगनी लाल मंडल को छोड बाकी में मेरी रूचि नहीं रही हालांकि मंडल जी के यहां भी कभी गया नहीं मैं अकेले, पर वे अच्‍छे लगे। इसका कारण यह था कि उनकी किताबों में रूचि थी और उनसे मिलने हम किताबों के लिए ही गए थे और उन्‍होंने नौकरों से चाय नाश्‍ता मंगवाने के बदले खुद अपने हाथों से आत्‍मीयता से खिलाने पिलाने की कोशिश की थी। दूसरी बार जब दिल्‍ली में उनसे मिला तब भी वे बदले नहीं थे।

नहीं तो एकाध राजनीतिज्ञों के यहां तो मैंने जाना इसलिए छोड दिया क्‍यों कि अपने मातहतों को वे जिस बुरी आवाज में डांटते थे कि मुझे अच्‍छा नहीं लगता था और मैं उनसे बचता था। पहली बार जब लालू प्रसाद के यहां उनके साथ गया था तो नाश्‍ते की टेबल पर वहां फूलन देवी मौजूद थीं,सादे कपडों में बेहद सीधी सादी महिला लगीं वह।

लालू प्रसाद का रवैया बहुत मजेदार होता। एकबार रात के बारह बजे अचानक एक खबर के संदर्भ में पहुंचे हमलोग , शायद बिहार में राष्‍ट्रपति शासन लगने वाला था तब। पत्रकारों का काफिला खबरों की टोह में वहां जमा था। ऐसे मौकों पर मैं अक्‍सर तटस्‍थ रह माहौल आंकता रहता, खबरों में मेरी रूचि कम ही रहती तो जमात में किसी न किसी से मिल ही जाती। हम भी अपनी खबरे शेयर करते। आखिर पत्रकारिता एक टीमवर्क है।

तो वह चांदनी रात थी , कुछ ऐसा हुआ कि लालू प्रसाद और राबड़ी देवी अकेले रह गए और सारे पत्रकार भीतर टीवी पर खबरें सुनने चले गए। तो पहले लालू प्रसाद ने पूछा कि - कवना अखबार से बाड़..। जब जाना कि अमर उजाला से हूं तो मूडी हिलायी फिर कुछ देर बाद वे चांदनी रात सामने लगे धान के पौधों और गरई मछली की चर्चा करने लगे। मैं समझ गया - खबरें बनाने का उनका तरीका अच्‍छा था यह। इसी तरह वे कभी मछली बनाते तो कभी आलू दिखाते खबरों में बने रहते।

अपनी पहली प्रेस कांफ्रेस में मैं श्रीकांत जी के साथ ही पहुंचा था। गांधी मैदान के पास के बडे होटल ,शायद मगध, में मायावती औरकांशी राम ठहरे थे। प्रेस कांफ्रेंस में अक्‍सर मैं देखता कि लोग चुप रहते और राजनीतिज्ञ खबरे लिखाते , सवाल उन खबरों पर ही होते । स्‍वतंत्र सवाल कम ही किये जाते। वहां भी वही हो रहा था। मैं नया मुल्‍ला था तो ज्‍यादा प्‍याज खाना ही था - सो मैंने मायावती से एक सवाल पूछा- कि जब गांधी को इस देश में गांधिवदियों ने ही अप्रासंगिक बना डाला है तो फिर उनका विरोध वे क्‍यों करती रहती हैं। इस सवाल में अप्रासंगिक शब्‍द मायावती जी की समझ में नहीं आया , पर अंग्रेजी के पत्रकारों ने पलक झपकते इसका तर्जुमा करते कहा कि इनका मतलब गांधी के इर्रेलिवेंट हो जाने से है, तब जाकर मायावती ने जवाब दिया कि यह हमार स्‍टैंड है ,न कि अंध विरोध कर रहे हैं हम।

लोहिया और रंगीन समाजों की अवरुद्ध क्रांतियाँ @कुमार मुकुल

नवंबर 1958 में मैनकाइंड में छपे अपने आलेख 'राष्ट्रपति नासर का राजनैतिक दर्शन' में लोहिया ने मिस्र की क्रांति के बहाने, क्रांति के विभिन्न आयामों पर विस्तार से विचार किया है। नासर का ख्याल था कि व्यक्तियों और वर्गों के संघर्ष से दूर रहकर जनता के दिलों से ली गई शक्ति के सहारे देश की सेना, जिसके पास पर्याप्त भौतिक संसाधन हों, क्रांति का सूत्रपात कर सकती है।

यहाँ लोहिया सवाल करते हैं कि क्या सेना को एकमात्र शक्ति मानने वाले नासर सही हैं या पार्टी को एकमात्र ताकत मानने वाले माओ सही हैं या रंगीन जातियों के वे संत व राजनेता सही हैं जो खुद को ऐसे तर्क-वितर्क से परे रखना चाहते हैं। इन सबको लोहिया अस्थायी व गलत समाधान बताते हैं। लोहिया को लगता है कि रंगीन जातियों जब तक अपनी बीमारी को नहीं पहचानती, जो कमोबेश गोरी जातियों की भी बीमारी है, तब तक उनकी क्रांतियाँ ऐसी ही अवरुद्ध होती रहेंगी जैसे राजनैतिक और सामाजिक क्रांतियों के दो पाटों के बीच फंसकर रूसी क्रांति अवरुद्ध हुई या भारतीय क्रांति अवरुद्ध हुई।

नासर का तर्क है कि राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में एक साथ क्रांति से मिस्र में अभूतपूर्व बदलाव संभव हुआ। लोहिया यहाँ अमरीका, फ्रांस और चीन का उदाहरण देते हैं जहाँ दोनों क्रांतियाँ एक साथ हुईं, कि मिस्र कोई अनोखा उदाहरण नहीं है? रूसी और भारतीय क्रांति के अवरुद्ध होने को लोहिया क्रांति की स्थायी विफलता नहीं मानते हैं। लोहिया सोचते हैं कि अगर इन क्रांतियों की अस्थायी अवरुद्धता के कारणों का रंगीन समाजों को बोध हो तो मानव-जाति के नए युग का आरंभ हो जाएगा।

नासिर द्वारा सेना की भूमिका को रेखांकित किए जाने के संदर्भ में लोहिया देखते हैं कि अफ्रीकी-एशियाई देशों में सैनिक या अन्य किस्म की तानाशाहियाँ लोकप्रिय होती जा रही हैं। काहिरा से जकार्ता और पीकिंग तक की कई मिसाले हैं और पाकिस्तान इसकी हालिया मिसाल है। पीकिंग के पार्टी आधारित समाधान और काहिरा के सेना आधारित समाधान में वे परिणाम की भिन्नता पाते हैं पर उनका मानना है कि दोनों की भावना एक है।

सेना के शासन या अन्य तानाशाहियों के भीतर हो रहे चुनावों की भूमिका पर भी वे विचार करते हैं, ''चुनाव निश्चय ही महत्त्वपूर्ण होते हैं खासकर अगर विचार और संगठन की स्वतंत्रता और आलोचना की योजना का हिस्सा होते हैं।'' पर जिस तरह, स्टालिन के रूस और हिटलर के जर्मनी में चुनावों को वे नियंत्रित देखते हैं, वहां वे उसे प्रायहीन पाते हैं। एशियायी मुल्कों की इस प्रवृत्ति पर भी वे ध्यान दिलाते हैं जब जनता के स्वतंत्र सोचने की क्षमता क्षीण हो जाती है और निर्णय की अपनी जिम्मेदारी वह किसी एक नेता, पार्टी या सेना को सौंप देती है। भारत में इंदिरा गांधी को चुनाव द्वारा सौंपी गई ताकत और आगे, उसके तानाशाही में बदलने की घटनाओं को हम इसके उदाहरण के रूप में देख सकते हैं। लोहिया भविष्य के गर्भ में छिपी इन घटनाओं का आकलन पहले ही कर चुके थे, वे 1958 में ही लिख रहे थे, ''जिन क्षेत्रों में जनता ने अभी निर्णायक जिम्मेदारी किसी नेता, सेना आदि को सौंपने की संवैधानिक व्यवस्था नहीं की है, जैसे भारत में, वहां पर प्रक्रिया चलने लगी है।'' ऐसी स्थिति में सेना की बजाय पार्टी को जनता द्वारा मिली ताकत को वे ज्यादा स्थायी मानते हैं क्योंकि उसका जनता के मन पर एक हद तक विचारधारात्मक प्रभाव पड़ता है। पाक की सैनिक तानाशाहियों और इंदिरा की तानाशाही के काल की तुलना हम यहाँ कर सकते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में विवेक की शक्ति का क्षय होता वे साफ देखते हैं।

भारत में विनोबा भावे जैसे संत राजनेताओं की दल विहीन राजनीति की संकल्पना के खतरों की ओर भी वे ध्यान दिलाते हैं। वे देखते हैं कि विनोबा की ऐसी बहसों से नेहरू आदि को एक आड़ मिलती है। जिसका उपयोग वे पार्टी के मतभेदों, आलोचना आदि को सीमित करने की चालें चलते हैं। यहाँ तक कि तत्कालीन राष्ट्रपति भी इसका लाभ ले वयस्क मताधिकार की उपयोगिता पर संदेह व्यक्त करते हैं। ऐसा करते हुए निरक्षरता और गरीबी का तर्क देते हैं।

दलविहीनता के खतरे की ओर इशारा करते लोहिया बतलाते हैं कि, ''पार्टियों के न रहने पर शिक्षित और शिष्ट व्यवहार वाले लोग ही चुने जाएँगे, दूसरे शब्दों में यथास्थिति के पोषक लोग, निरक्षर लोग, नाराज और शोर मचाने वाले लोग अधिकाधिक बाहर हो जाएँगे। किंतु यही तत्व रंगीन मानव-जातियों का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करते हैं। वयस्क मताधिकार ने इन लोशो को बीच में लाया है। दलविहीन राजनीति या परोक्ष चुनाव का उद्देश्य इन लोगों को बाहर रखना है।''

यूं पार्टी प्रणाली जैसे टाइप्ड होती जा रही है वह भी पूरी दुनिया में विफल होती जा रही है। गोरी जातियों के लिए उसने एक नए राजनैतिक कर्म के समान हो गई है जो अपने प्रति अतिरिक्त निष्ठा के आधार पर पहचान देती है। लोहिया इससे परेशान थे कि राजनैतिक पार्टियों का इस्तेमाल बेशर्मी से अपने व्यक्ति-उत्थान के लिए हो रहा है। ''ये व्यक्ति को सुविधा भी देती हैं और प्रतिष्ठा भी और अकसर उसी अनुपात में जितना वह कमीना होता है।'' हालांकि लोहिया आशा नहीं छोड़ते और ऐसे सच्चे संत नेता की प्रतीक्षा करने की सलाह देते हैं—''जो ऐसी पार्टी बनाएगा जो कभी भी सरकार में नहीं आएगी, लेकिन हमेशा अन्याय से लड़ेगी...।''

इस दूरारूढ कल्पना के बाद लोहिया फिर इस सवाल  पर आते हैं कि आखिर रंगीन समाज के लोग क्यों सेना या पार्टी की तानाशाही से आशा कर बैठते हैं। इसकी तह में जाते हुए वे पाते हैं कि गोरे समाजों के मुकाबले रंगीन समाज एक रुका हुआ समाज है जिसने अपनी आबादी बढ़ाई पर उसकी आय में कमी होती गई है। सैकड़ों सालों से वह गुलाम रहा और अब जबकि वह आजाद हो रहा है तो गोरे समाजों की बराबरी करना चाहता है। कमजोर साधनों के आधार पर गोरों की नकल कर आधुनिक बनने की उसकी चाह ही तानाशाही समाधानों में अपनी कामना की पूर्ति के स्वप्न देखती है।

यहाँ वे एक और बड़ी गड़बड़ी की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं। वह यह कि एकरूपता समानता नहीं होती। किसी के समान दीखने से ही वह उसके समान नहीं हो जाता। वे लिखते हैं, ''रंगीन आदमी में एकरूपता और समानता को एक ही समझने की कमजोरी है, क्योंकि उसने गोरी जाति की शक्ति और उसकी सुख-सुविधाओं को देखा है। वह सोचता है गोरों की नकल करने से उसमें भी वही ताकत आ जाएगी और उसे भी आधुनिक सुविधाएं मिल जाएँगी।''

इस गड़बड़ी को हम भारत की दलित और अगड़ी जातियों के संदर्भ में भी देखते हैं। कभी वे जनेऊ धारण करने का आंदोलन चलाते हैं कभी सिंह टाइटल को लगाकर खुद को अगड़ा बनाना चाहते हैं पर उनकी तरह दिखने से जरूरी है अपना आत्मविश्वास कायम करना और अपने मानदंड रचना जो नकल से नहीं होगा।

लोहिया देखते हैं कि आधुनिकीकरण के पीछे पागल रंगीन समाज का आदमी जब सत्तासीन होता है तब ''उत्पादन और उपभोग का आधुनिकीकरण राज्य की नीति का मुख्य ध्रुवतारा बन जाता है।'' इस नीति से जो गंभीर तनाव व दबाव पैदा होता है वह उन्हें तानाशाही की ओर ले जाता है।

इस तनाव और तानाशाही की ओर रंगीन जातियों के झुकाव के काणों को तलाशते हुए लोहिया देखते हैं कि उत्पादन और उपभोग के आधुनिकीकरण के लिए जो पूँजी चाहिए वह रंगीन देशों की पहुँच के बाहर है, गोरे देश चाहें भी तो इसमें हमारी मदद नहीं कर सकते। यहाँ एक बड़ा संकट आबादी का बढऩा भी है। गोरों की आबादी भी उसी तेजी से बढ़ी है पर उसके उत्पादन साधनों का विकास भी उसी तेजी से हो रहा है जो रंगीन जातियों के यहाँ नहीं होता। ऐसे में रंगीन राष्ट्र एक रास्ता निकालते हैं। वह टुकड़ों में आधुनिकीकरण करना चाहते हैं, देश को कई क्षेत्रों में बांट वह उनका कई चरणों में विकास की कोशिश करता है। इससे काफी तनाव पैदा होता है। तब जिन क्षेत्रों का विकास हो जाता है या जो माडल बन जाते हैं वे बाकी पिछड़े तबकों के लिए तनाव का कारण बन जाता है फिर जो शीतयुद्ध आरंभ होता है वह रंगीन देशों को सेना या पार्टी की तानाशाही की ओर ले जाता है।

यहाँ फिर लोहिया को साम्यवादी सरकारें एक बेहतर उदाहरण के रूप में याद आती हैं जिन्होंने इस समस्या को 'बेहतर ढंग से समझा है...।' क्योंकि उन्होंने उत्पादन और उपभोग के आधुनिकीकरण को अलग-अलग रखा है। वे बताते हैं कि चीन के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री का खर्चा भारतीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से करीब बीस गुना कम होगा। वे लिखते हैं—''वे सारी जनता के लिए, मानक निर्धारित करते हैं। साम्यवादी नेताओं का स्तर सादगी का होता है, शायद त्याग का भी जबकि गैर-साम्यवादी नेताओं का स्तर गोरों की नकल के अनुसार होता है।'' यहाँ हम दिनकर की पंक्तियाँ याद कर सकते हैं—''बेलगाम अगर रहा भोग, निश्चय संहार मचेगा...।'' आज भी हम लोहिया और दिनकर के सवालों के आलोक में नेताओं के बेलगाम भोग और गरीब अन्नदाताओं की आत्महत्या के आंकड़ों को सामने रख झंझट के कारकों को पहचान सकते हैं, और यह सब गांधी के देश में होता है। हद यह है कि इसी टुकड़े विकास की तर्ज पर मॉडल कहला रहे गुजरात का मुख्यमंत्री अब गांधी की तस्वीरों का भी उपयोग अपनी छवि सुधारने में करते हुए जरा नहीं शर्माता।

बड़ी आबादी और साधनों की कमी के हिसाब से लोहिया आधुनिकीकरण के किसी अन्य प्रकार पर विचार करने को कहते हैं। प्रतियोगिता को मूल संभव तो वहां सोच-समझकर छोटी मशीनों और जहाँ जरूरी हों वहां भारी उद्योगों की नीति अपनानी चाहिए। इसे लोहिया रंगीन देशों के आधुनिकीकरण का एकमात्र, जरूरी रास्ता बतलाते हैं।

रंगीन आदमी क्रूर, तानाशाह नेतृत्व को क्यों स्वीकारता है, के जवाब वे कहते हैं कि—''इसलिए कि वह नेतृत्व उसे आधुनिक लगता है। वह उम्मीद करता है कि क्रूर नेतृत्व किसी समय उसे आधुनिक बना देगा।'' यहाँ उनका निष्कर्ष बहुत स्पष्ट है—''जब रंगीन जनता आधुनिकीकरण के सही आयामों को भलीभाँति ग्रहण करेगी तभी वह इस नेतृत्व को उखाड़ फेंकेगी जो बहुत धोखेबाज है और अपने को तथा अपने आसपास के लोगों को आधुनिक बनाता है। जनता को नहीं या जो मानव के रूप में भारी कीमत चुकाकर यूरोप की नकल करता है।''

इस तरह रंगीन देशों की क्रांति के अवरोधों की सही पहचान करते हैं लोहिया—''जब क्रांति वास्तव में हुई हो या होने को हो तो बुद्धिजीवी अपव्यय को तथा शासक वर्गों की विलासिता को देखने लगते हैं जो तब तक उन्हें आधुनिकीकरण लगता रहा। च्याँग का चीन सारे रंगीन विश्व में दिखाई देगा।''

कुमार मुकुल की प्रभात प्रकाशन से आयी पुस्‍तक 'डॉ.लोहिया और उनका जीवन दर्शन ' से 

रोने की राजनीति और राजनीति का रोना @रेहान फ़ज़ल

'घड़ियाली आँसू' मुहावरा पता नहीं कैसे और कब बना लेकिन ये तय है कि इसका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल नेताओं के लिए होता है.
ये एक धारणा बन गई है कि किसी सूरत-ए-हाल पर नेता अगर आँसू बहाएगा तो वह दिखावे के लिए ही होगा, यानी उसका दिल दुखता ही नहीं.

जयपुर में कांग्रेस चिंतन शिविर में राहुल गाँधी ने यह कह कर सबको भावुक कर दिया कि जिस दिन उन्हें कांग्रेस का उपाध्यक्ष चुना गया, उनकी माता सोनिया गाँधी सुबह तड़के उनके कमरे में आंई और उनसे गले लग कर रोईं.क्या सार्वजनिक तौर पर बहाए गए आंसू किसी नेता की कमज़ोरी को दर्शाते हैं या उनके मानवीय पहलू को उजागर करते हैं?
इस क़िस्से को सुनकर कई कांग्रेसी नेता रोते देखे गए.

इंदिरा गाँधी

इंदिरा गांधी
इंदिरा गांधी पक्के इरादों वाली महिला के रूप में जानी जाती थीं
वक्त वक्त की बात है.
इन्हीं राहुल गाँधी की दादी इंदिरा गाँधी को कम से कम सार्वजनिक तौर पर रोने से काफी परहेज़ था.
उनके छोटे पुत्र संजय गाँधी की मौत पर जब उनके साथी संवेदना व्यक्त करने गए तो वह यह देख कर हतप्रभ रह गए कि इतने बड़े सदमे के बाद भी उनकी आँखों में आँसू नहीं थे.
भारत के लोगों को वह दृश्य भूला नहीं है जब अपने बेटे की शव यात्रा के दौरान उन्होंने एक धूप का चश्मा लगा रखा था कि अगर उनकी आँखे नम भी हो रही हों तो देश के लोग यह न देख पाएं कि मानवीय भावनाएं उन्हें भी प्रभावित कर सकती हैं.

आडवाणी के आंसू

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी हैं जो बात बात पर इतने भावुक हो जाते हैं कि उनके आंसू थमने का नाम नहीं लेते.
अभी हाल ही में जब उनकी पार्टी की ही उमा भारती ने उनकी तारीफ करनी शुरू की तो आडवाणी के जारों कतार आँसू बह निकले और उन्होंने उसे छुपाने की कोशिश भी नहीं की.
लालकृष्ण आडवाणी
राजनेताओं में आडवाणी सबसे अधिक रोते हुए देखे गए हैं
पिछले दिनों जब सुषमा स्वराज ने लोकपाल के मुद्दे पर लोकसभा में भाषण दिया तब भी आडवाणी अपने आप को रोक नहीं पाए और उनकी आँखें नम हो आईं.
इसके ठीक विपरीत जवाहरलाल नेहरू को सरेआम रोने से नफ़रत थी.
सिर्फ एक बार उनकी आँखों में आँसू देखे गए थे, जब भारत चीन युद्ध के बाद लता मंगेशकर ने ज़रा आँख में भर लो पानी गीत गाया था.

लिंकन और एडमंड मस्की

अब्राहम लिंकन ने बहुत निपुणता से अपने भाषणों में आँसुओं का इस्तेमाल किया था. बाहर से काफी मज़बूत समझे जाने वाले विंस्टन चर्चिल भी संसद में आँसू बहाने से अछूते नहीं थे.
'आयरन लेडी' कही जाने वाली मारग्रेट थैचर की भी कई तस्वीरें हैं जब अपनी सरकारी लिमोज़ीन में बैठे हुए किसी बात को सोच कर उनके होंठ काँप उठे थे.
महिलाओं के साथ तो दोहरी मुसीबत हैं. अगर वह रोएं तब भी बुरा और न रोएं तब भी बुरा!
2008 में बराक औबामा से इयोवा प्रायमरी हारने के बाद जब हिलेरी क्लिंटन रोईं तो उनके सहायकों को लगा कि इसका उन्हें राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ेगा लेकिन वास्तव में इसका उन्हें फ़ायदा हुआ और महिलाओं के कई वोट उन्हें मिले.
लेकिन 1972 में एडमंड मसकी की अमरीका के राष्ट्रपति बनने की अभिलाषा सिर्फ इस लिए पूरी नहीं हो सकी क्योंकि अखबारों द्वारा उनकी पत्नी की आलोचना किए जाने पर वह सरेआम रोने लगे.
अभी हाल में कनक्टीकट में हुए गोलीकांड में 20 बच्चों की मौत के बाद राष्ट्रपति ओबामा की आँखों से भी आँसू बह निकले.
अभी भी कई देश ऐसे हैं जहाँ सार्वजनिक तौर पर रोना कमजोरी की निशानी माना जाता है. आँसुओं को बहने से रोकने की सफल कोशिश बहादुरी और पुरुषत्व की पहचान मानी जाती है.
मानवीय भावनाओं को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना या न करना किसी राजनीतिज्ञ का अपना फ़ैसला हो सकता है लेकिन अगर इन्हें वोट बटोरने का मात्र एक तरीका मान लिया जाए तो इस पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं.

राजीव से राहुल तक

काँग्रेस की स्थापना के सौ साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 28 दिसंबर 1985 को मुंबई (तब का बंबई) में सत्ता के शीर्ष पर बैठकर ही सत्ता पर सवालिया निशान लगाए थे.

पूरे सत्ताईस साल बाद 20 जनवरी 2013 को जयपुर में उनके बेटे राहुल गाँधी ने भी लगभग उसी सुर में, लगभग उसी ग़ुस्से और हताशा में लगभग वैसे ही सवाल खड़े किए हैं.

दोनों भाषणों पर नज़र डाली जाए तो ये नतीजा निकाला जा सकता है कि पिछले 27 बरसों में हिंदुस्तान की सत्ता-मशीनरी में बहुत कुछ नहीं बदला है. लीजिए प्रस्तुत हैं दोनों भाषणों से कुछ उदाहरण:

राजीव गाँधी – देश भर में लाखों काँग्रेसी कार्यकर्ता काँग्रेस की नीतियों और कार्यक्रमों के प्रति उत्साहित हैं. पर वो मजबूर हैं क्योंकि उनकी पीठ पर सत्ता के दलाल सवार हैं, जो एक जनांदोलन को एक सामंती जकड़बंदी में बदल रहे हैं.... इन लोगों ने काँग्रेस संगठन में से सेवा और बलिदान की भावना निकाल कर उसे खोखला कर दिया है.... हमारी प्रशासनिक व्यवस्था पेचीदा, पुरानी और लोगों की ज़रूरतों और आकांक्षाओं से दूर है. इसने बदलाव की कोशिशों को बेकार कर दिया है. इसे लोगों की सेवा करना सीखना चाहिए.

राहुल गाँधी – एक अरब भारतीयों की आवाज़ आज हमें बता रही हैं कि वो सरकार, राजनीति और प्रशासन में भागीदारी चाहते हैं. वो कह रहे हैं कि उनके जीवन की दिशा बंद दरवाज़ों के पीछे बैठे कुछ मुट्ठीभर लोग तय नहीं कर सकते, जो उनके प्रति जवाबदेह नहीं हैं. वो हमें बता रहे हैं कि भारत की सरकारी व्यवस्था भूतकाल में फँसी है. ये वो व्यवस्था है जो लोगों से उनकी आवाज़ छीन लेती है – ऐसी व्यवस्था जो शक्तिशाली बनाने की बजाए शक्तिहीन बनाती है.

राजीव गाँधी – इस देश को ग़रीबों की सेवा करने वाली राजनीति की ज़रूरत है. देश को विचारधारा और कार्यक्रम पर आधारित राजनीति चाहिए. ऐसा करने के लिए हमें राजनीतिक पार्टियों और स्वार्थी तत्वों के बीच का गठजोड़ तोड़ना होगा.

राहुल गाँधी ने जयपुर की चिंतन बैठक में सत्ता के केंद्रीकरण पर सवाल उठाए.

राहुल गाँधी – आप जिस भी राज्य को देखें, चाहे जिस राजनीतिक पार्टी को देखें, पूरे राजनीतिक पटल पर कुछ मुट्ठीभर लोग ही क्यों क़ाबिज़ हैं? हमारे देश में सत्ता गंभीर रूप से केंद्रीयकृत है, हम सिर्फ़ उन्हीं को शक्ति देते हैं जो सत्ता के शीर्ष पर हैं. हम नीचे तक के लोगों के सशक्तीकरण पर यक़ीन नहीं करते.

राजीव गाँधी – भ्रष्टाचार के खिलाफ़ युद्ध बिना रुके जारी रहेगा. इस देश को स्वच्छ सामाजिक और राजनीतिक माहौल की ज़रूरत है और काँग्रेस पार्टी इसे उपलब्ध कराने के लिए कटिबद्ध है.

राहुल गाँधी – रोज़ाना हम व्यवस्था के दोगलेपन से दोचार होते हैं. भ्रष्ट लोग खड़े होते हैं और भ्रष्टाचार मिटाने की बातें करते हैं. और जो लोग महिलाओं की बेइज़्ज़ती करते हैं वो महिला अधिकारों की बातें करते हैं.

काँग्रेस पार्टी की स्थापना के सौ साल पूरे होने पर 27 बरस पहले बंबई में पार्टी कार्यकर्ताओं को राजीव गाँधी ने सलाह दी कि उन्हें “सच के आइने में” अपनी तस्वीर देखनी चाहिए.

उन्होंने इस आइने में एक काँग्रेसी नेता की जो तस्वीर दिखाई वो एक भ्रष्ट, सत्ता के दलाल, लालची, अपराधी, जुगाड़ू, षडयंत्रकारी, दाँव-पेंच में माहिर, कपटी और क्षुद्र आदमी की तस्वीर थी.

व्यवस्था के केंद्र से व्यवस्था विरोधी आवाज़ उठाकर राहुल गाँधी ने भी अपने पिता की तरह आम लोगों के ग़ुस्से को काँग्रेस के पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश की है.

मैसूर राजघराने पर पड़े 400 साल पुराने श्राप का राज क्या है?

करीब छह सदी पुराने मैसूर राजघराने में 400 साल से चली आ रही एक समस्या कइयों को एक श्राप का नतीजा लगती है तो कुछ इसकी वजह आनुवंशिक मानते हैं.
मैसूर का वडियार राजवंश बीती चार सदियों से एक श्राप से जूझ रहा है, ऐसा मानने वालों के पास अपने कारण हो सकते हैं और न मानने वालों के पास अपने. खुद वडियार राजघराना मानता है कि एक श्राप 400 साल से उसका पीछा कर रहा है. उसके पास ऐसा मानने की वजहें हैं.
बीती 27 मई को यदुवीर कृष्णदत्त वडियार राजघराने के 27वें राजा बने. यदुवीर ने श्रीकांतदत्त नरसिंहराज वडियार की जगह ली. श्रीकांतदत्त के कोई संतान नहीं थी. दिसंबर 2013 में उनकी मौत के बाद से ही उत्तराधिकारी को लेकर बहस चल रही थी जो 23 साल के यदुवीर की ताजपोशी के साथ खत्म हुई. श्रीकांतदत्त की पत्नी प्रमोदा देवी वडियार ने हाल ही में यदुवीर को गोद लिया था.
कहते हैं कि आभूषण जबरन लेने के लिए राजा ने अपने सैनिक भेजे तो अमामेलम्मा ने कावेरी में छलांग लगा दी. इससे पहले उसने श्राप दिया कि मैसूर राजवंश संतानविहीन हो जाए.
यह पहली बार नहीं हुआ था कि वडियार राजपरिवार ने कोई उत्तराधिकारी गोद लिया हो. दरअसल बीती चार सदियों के दौरान मैसूर के इस राजघराने को उत्तराधिकारी अक्सर गोद लेना पड़ा है. यही वजह है कि कई लोग वडियार राजवंश पर लगे एक श्राप पर यकीन करते हैं.
श्राप कथा
कहते हैं कि 1612 में मैसूर के राजा वडियार ने पड़ोसी राज्य श्रीरंगपट्टनम पर हमला किया और वहां के शासक तिरुमालाराजा को हरा दिया. पराजित राजा अपनी पत्नी अलामेलम्मा के साथ तलक्कड़ नामक जगह पर जाकर रहने लगा. कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई. अलामेलम्मा ने अपने आभूषणों का खजाना श्रीरंगपट्टनम राजपरिवार की कुलदेवी श्रीरंगनायकी को दान कर दिया. एक विशेष दिन श्रीरंगनायकी का श्रंगार होता और फिर ये आभूषण अलामेलम्मा के संरक्षण में आ जाते. मंदिर प्रशासन ने राजा से गुहार लगाई कि ये आभूषण उसके पास होने चाहिए. अलामेलम्मा इसके लिए तैयार नहीं थी. राजा ने अपने सैनिक भेजे. अमामेलम्मा ने कावेरी में छलांग लगा दी. लेकिन इससे पहले उसने श्राप दिया कि मैसूर राजवंश संतानविहीन हो जाए.
कहते हैं कि राजा को जब इसकी खबर मिली तो वह बड़ा चिंतित हुआ. फिर किसी ने उसे सलाह दी कि श्राप से मुक्ति पाने के लिए वह अलामेलम्मा की मूर्ति राजमहल में प्रतिष्ठित करवाए. आज भी महल में इस मूर्ति की देवी के रूप में पूजा होती है. लेकिन इससे कोई खास फर्क पड़ा हो, ऐसा नहीं लगता. राजा वडियार के इकलौते बेटे की मौत हो गई थी. तब से हर एक पीढ़ी बाद मैसूर के राजपरिवार को उत्तराधिकारी के रूप में किसी को गोद लेना पड़ता है.
लेकिन श्राप में यकीन न रखने वालों के पास अपने तर्क हैं. उनका मानना है कि इस संतानहीनता के आनुवंशिक कारण हो सकते हैं. राजपरिवार उत्तराधिकारी के रूप में जिसे गोद लेता है वह हमेशा परिवार का ही कोई व्यक्ति होता है इसलिए उसके संतानहीन होने की संभावना सामान्य से थोड़ी ज्यादा ही होती है. हालांकि मैसूर राजघराने में यह थोड़ी नहीं बल्कि कहीं ज्यादा दिखती है.
किसी ने राजा को सलाह दी कि श्राप से मुक्ति पाने के लिए वह अलामेलम्मा की मूर्ति राजमहल में प्रतिष्ठित करवाए. आज भी महल में इस मूर्ति की देवी के रूप में पूजा होती है.
मैसूर राजपरिवार करीब 80 हजार करोड़ रु की संपत्ति का मालिक है. हालांकि राजपरिवार के सदस्य खुद को सामान्य लोग मानते हैं. एक साक्षात्कार में प्रमोदा देवी कहती हैं, ‘मैं खुद को महारानी नहीं मानती…दशहरे के समारोह के दौरान ही हमें स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक राजपरिवार के रूप में कुछ परंपराएं निभानी होती हैं और राजसी कपड़े पहनने पड़ते हैं. इसके अलावा बाकी मौकों पर हम सामान्य लोगों की तरह ही रहते हैं.’
दूसरी कई रियासतों की तरह वडियार राजघराना भी अपनी कई संपत्तियों को लेकर सरकार से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है. प्रमोदा देवी का आरोप है कि 1950 में उनका सरकार से जो समझौता हुआ था उसके तहत इस पर सहमति बनी थी कि मैसूर राजपरिवार की संपत्तियां इसके सदस्यों के पास रहेंगी, लेकिन बाद में सरकार ने इनमें से कई को अपने कब्जे में ले लिया. बीते करीब चार दशक से यह मामला अदालत में है.
विवाद और भी हैं. इस साल जब यदुवीर को मैसूर की राजगद्दी का उत्तराधिकारी घोषित किया गया तो राजपरिवार के एक और सदस्य और श्रीकांतदत्त के भतीजे कांतराज उर्स ने इसका विरोध किया. कांतराज ने इसके बाद परिवार की संपत्ति के बंटवारे की मांग करते हुए एक मुकदमा किया है.
साफ है कि अमेरिका से पढ़ाई कर चुके मैसूर के नए महाराजा को उत्तराधिकार में ताज और संपत्ति ही नहीं, बल्कि कई मुश्किलें भी मिली हैं