Saturday, 9 January 2016

..जब राजपथ पर ख़राब हो गई थी एनलाई की कार

चऊ एनलाई, माओ त्से तुंग के साथImage copyrightGetty
Image captionमाओ त्से तुंग के साथ चऊ एनलाई.
तिहत्तर साल के चीन के प्रधानमंत्री चऊ एनलाई बर्फ़ीली हवाओं के थपेड़ों के बीच बीजिंग हवाई अड्डे के टारमैक पर खड़े थे. उनके इर्द-गिर्द थे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ प्रतिनिधि और वरिष्ठ सरकारी और सैनिक अफ़सर.
अभी दोपहर नहीं हुई थी. दिन था 12, फ़रवरी, 1972. बार-बार उनकी निगाहें आते हुए हवाई जहाज़ को ढ़ूंढने के लिए आसमान में उठ जाती थीं. उस जहाज़ से आ रहे थे रिचर्ड निक्सन, चीन की यात्रा पर आने वाले पहले अमरीकी राष्ट्रपति.
उस दिन राष्ट्राध्यक्षों के आगमन जैसा कोई तामझाम नहीं था बीजिंग हवाई अड्डे पर. न कोई रेड कारपेट और न ही दोनों देशों की राष्ट्रधुन बजाने के लिए तत्पर कोई सैनिक बैंड. अमरीकी मेहमान के स्वागत के लिए परंपरागत 21 तोपों की सलामी देने के लिए कोई तोप भी नहीं थी.
अमरीका
Image captionअमरीका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन
हवाई अड्डे के टर्मिनल भवन पर धीमे-धीमे फहराते चीनी और अमरीकी झंडों से ही थोड़ा बहुत संकेत मिल रहा था कि किसी बड़े कूटनीतिक क्षण का सबको इंतज़ार है.
अचानक आसमान में राष्ट्रपति निक्सन का विमान दिखाई दिया. उस ज़माने में उसे एयरफ़ोर्स वन नहीं कहा जाता था. उसका नाम था, "स्पिरिट ऑफ़ 76". आनन-फानन में सीढ़ियां लगाई गईं. पूरी दुनिया की नज़रें विमान के दरवाज़े पर थीं.
ऊर्जा से ओतप्रोत निक्सन ने तेज़ी से सीढ़ियां उतरना शुरू किया. वो अपने मेज़बान से हाथ मिलाने के लिए इतने तत्पर थे कि उन्होंने दरवाज़े से बाहर निकलते ही अपने हाथ आगे बढ़ा दिए थे.
निक्सन, चऊ एनलाईImage copyrightAFP
नीचे खड़े चऊ एनलाई ने तब तक अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया जब तक निक्सन के पैरों ने चीन की धरती को नहीं छू लिया. और तब भी वो अपने हाथ को अपनी कोहनी की सीध तक ही ऊपर ले गए क्योंकि बरसों पहले एक लड़ाई में लगी चोट के कारण वह अपने हाथ को इससे ऊपर उठा ही नहीं सकते थे.
चऊ एनलाई बहुत प्रफुल्लित दिखाई नहीं दे रहे थे. उन्हें पता था कि उन्होंने "दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्यवादी" का स्वागत कर बहुत बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाया है.
चऊ ने ये सुनिश्चित किया था कि अगले दिन चीनी अख़बारों में उनके निजी फ़ोटोग्राफ़र की ली हुए तस्वीर ही छपें जिसमें साफ़ दिख रहा था कि निक्सन अपना हाथ बढ़ाते हुए नीचे उतर रहे हैं और नीचे खड़े चऊ मुस्कराते हुए बिना अपने हाथों को हिलाए उनका इंतज़ार कर रहे हैं.
उस रात भोज में भी जब उन्होंने राष्ट्रपति निक्सन को टोस्ट किया तो इस बात का ध्यान रखा कि उनके गिलास का किनारा निक्सन के गिलास के बिल्कुल बराबर हो.
हेनरी किसिंजर
आम लोगों को ये सब अनावश्यक विवरण लग सकते हैं. लेकिन इन्हीं विवरणों में चीनी कूटनीति की सूक्ष्म भाषा छिपी होती है. चऊ के जीवनीकार गाओ वेनकियान लिखते हैं कि चऊ ने अमरीकी राष्ट्रपति के आगमन से पहले इन सब भंगिमाओं का बाकायदा अभ्यास किया था.
उन्होंने पहले से ही तय कर रखा था कि वो अमरीकी राष्ट्रपति से न तो बहुत घुलेंगे मिलेंगे और न ही उनसे बहुत दूरी बनाएंगे. उनके मिलने में न तो बहुत गर्मजोशी होगी और न ही बहुत ठंडापन.
चऊ की सबसे बड़ी ख़ूबी थी पलक झपकते ही ये भांप लेना कि उनके नेता माओ क्या सोच रहे हैं या क्या सोचने वाले हैं. अमरीका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने अपनी आत्मकथा 'वाइट हाउज़ ईयर्स' में उनके बारे में लिखा था, "जब मैं चऊ से पहली बार 1971 में मिला था तब तक उन्हें चीनी कम्युनिस्ट आंदोलन का नेता बने क़रीब पचास साल हो चुके थे. चाहे दर्शन हो या ऐतिहासिक विश्लेषण, रणनीतिक परख, संस्मरण या हाज़िरजवाबी सब पर उनकी बराबर की पकड़ थी. उनकी ख़ास तौर से अमरीकी मामलों और मेरी ख़ुद की पृष्ठभूमि की जानकारी अद्भुत थी. वो अपना एक भी शब्द ज़ाया नहीं करते थे. ये ज़ाहिर करता था कि वो कितने सुलझे हुए इंसान थे."
चउ एन लाई वियतनाम के राष्ट्रपिता हो ची मिन्ह के साथ Image copyrightGetty
Image captionचउ एन लाई वियतनाम के राष्ट्रपिता हो ची मिन्ह के साथ
भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के मन में भी चऊ एनलाई के लिए बहुत इज़्ज़त है. उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "उनके बराबर दुनिया में बीसवीं सदी में कोई कूटनीतिज्ञ पैदा नहीं हुआ. करिश्मा तो ख़ैर था ही उनमें. लॉंग मार्च में रहे थे वो. जन संपर्क और कूटनीति में उनकी समझ जितनी थी दूसरे किसी में नहीं थी."
लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र में चऊ एनलाई का राजनैतिक करियर पूरी तरह से दागरहित नहीं था. उनके एक जीवनीकार गाओ वेन क्विन लिखते हैं, "चऊ दीवार में एक मामूली दरार ढ़ूढ़ने में निपुण थे जिससे वो लोगों को भरमा सकें कि वो अपने फ़ैसले लेने में तटस्थ हैं. असल में वो माओ के वफ़ादार कुत्ते की तरह हमेशा उनके पीछे चलते हैं और अपनी खाल बचाने के लिए अनर्गल प्रलाप का इस्तेमाल करने से नहीं हिचकते."
विदेश मंत्रालय में सचिव रहे लखन लाल मेहरोत्रा, बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ
Image captionविदेश मंत्रालय में सचिव रहे लखन लाल मेहरोत्रा, बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ
"उनका राजनीतिक अस्तित्व इसलिए भी बना रहा क्योंकि उन्होंने माओ की अधीनता को बिना किसा हील हुज्जत के स्वीकार किया. वो हमेशा माओ के अभिन्न सहायक रहे लेकिन उन्होंने उनका हमेशा तिरस्कार किया. उन्होंने कभी भी कोई राजनीतिक जोखिम नहीं उठाया. इसलिए वो हमेशा माओ के नंबर 2 बन कर रहे."
भारत के विदेश मंत्रालय में सचिव और सत्तर के दशक में चीन में भारत के शार्डी अफ़ेयर्स रहे लखनलाल मेहरोत्रा को 1955 में चऊ एनलाई से मिलने का मौका मिला था जब वो एक भारतीय छात्र प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में चीन गए थे.
मेहरोत्रा याद करते हैं, "मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र था. मुझे चीन जाने वाले छात्रों के सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल में चुना गया. जब हम चीन पहुंचे तो हमें सभी डेलीगेशनों के साथ पीकिंग होटल में ठहराया गया. पहले दिन जब हम लोग भोजन करने के लिए नीचे आए तो चऊ एनलाई हमारी मेज़ पर आ कर बैठ गए. उन्होंने हमसे पूछा कि आप लोगों में से कितने मांसाहारी नहीं हैं? फिर उन्होंने पूछा कि आप लोगों को खाना संतोषजनक मिल रहा है या नहीं? हममें से कई ने कहा कि यहां खाना हमारी पसंद का नहीं है. इसका नतीजा ये हुआ कि हम उसके बाद जहां-जहां गए वहाँ हमें बेहतरीन शाकाहारी खाना मिला. ये बताता है कि वह छोटी-छोटी चीज़ों का भी इतना ख़्याल रखते थे."
चऊ एनलाई माओ के साथImage copyrightGetty
Image captionचऊ एनलाई माओ के साथ
लखन मेहरोत्रा बताते हैं, "अगले दिन यानि एक अक्तूबर को जब परेड हुई तो हमें चीन के शीर्ष नेताओं के बॉक्स में ले जाया गया. करीब 110 देशों के डेलीगेशन चीन आए हुए थे. वह एक के बाद एक तियानमेन स्कवायर के सामने से गुज़र रहे थे. हम लोगों का डेलिगेशन जब वहां से गुज़रा तो परेड का नियंत्रण करने वाले लोगों ने हमसे कहा कि आप लोग अलग आ जाइए. हमें फ़ॉरबिडन सिटी के ऊपर ले जाया गया, जहाँ पूरी पोलित ब्यूरो परेड देख रही थी. वहां चऊ एनलाई ने खुद आगे बढ़कर माओत्से तुंग से हमें मिलवाया."
उनकी इन्हीं खूबियों की वजह से दुनिया भर के पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक उनके मुरीद थे. जाने-माने पत्रकार जैक एंडरसन ने अपनी किताब 'कनफ़ेशन ऑफ़ ए मकरेकर' में लिखा था, "मेरे ज़हन में चऊ एनलाई की जो याद बरकरार है वो है पैंतालिस साल की उम्र में भी उनका ख़ूबसूरत चेहरा और ग़ज़ब की बुद्धिमत्ता. वो दुबले-पतले ज़रूर थे लेकिन बेहद मेहनती भी थे."
नटवर लाल, रेहान फ़ज़ल
"उनका जीवन बहुत सादा था लेकिन वो बहुत ही सजीले इंसान थे. उनके उठने बैठने का ढ़ंग बहुत ख़ुशनुमा था. अंग्रेज़ी, फ़्रेंच और चीनी भाषाओं पर उनका समान अधिकार था. अमरीकी विदेश विभाग के सुदूर पूर्व विशेषज्ञ वॉल्टर रॉबर्टसन ने उनके बारे में एक बार कहा था कि उनके जैसा मनमोहक, अक्लमंद और आकर्षक इंसान किसी भी प्रजाति में मिलना बहुत मुश्किल था."
1960 में चऊ एनलाई भारत आए थे. ये 1962 का युद्ध टालने की उनकी तरफ़ से आख़िरी कोशिश थी. लेकिन नेहरू से उनकी बातचीत असफल रही. नेहरू ने कहा कि उनके मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य भारत का पक्ष रखने के लिए उनसे मुलाकात करेंगे. चऊ एनलाई ने कहा कि उन मंत्रियों से मिलने वो ख़ुद उनके पास जाएंगे. उस यात्रा में पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह, चऊ एनलाई के संपर्क अधिकारी थे.
नटवर सिंह याद करते हैं, "जब वो उप राष्ट्रपति राधाकृष्णन, पंडित पंत और मोरारजी देसाई से मिलने गए तो मैं उनके साथ था. चऊ एनलाई की मोरारजी भाई के साथ बैठक बहुत ख़राब हुई. उप राष्ट्रपति की बैठक भी सफल नहीं हो पाई. हां पंत जी से मुलाकात ठीकठाक रही. एक दिन अख़बार में कार्टून छपा जिसमें चऊ को एक कोबरा के रूप में दिखाया गया था."
भारत और चीन के झंडेImage copyrightGetty
"उन्होंने मुझसे पूछा कि ऐसा क्यों हो रहा है ? मैंने कहा कि यहां अख़बार वाले नेहरू को भी नहीं बख़्शते हैं. चऊ बोले कि क्या आपकी नज़र में ये काम करने का सही तरीका है. मैं चुप रह गया. उसके बाद चीज़ें बिगड़ती ही चली गईं. भारत-चीन संबंधों की पहल संसद के पास चली गई और नेहरू बैक फ़ुट पर आ गए."
उसी यात्रा के दौरान चीनी दूतावास से राष्ट्रपति भवन आते हुए राजपथ पर चऊ एनलाई की कार ख़राब हो गई. नटवर सिंह याद करते हैं, "चऊ एनलाई को सड़क पर उतरकर दूसरी कार का इंतज़ार करना पड़ा. उनके साथ चल रहे चीनी सुरक्षा अधिकारी बहुत परेशान हो गए. मैं उनकी बगल में बैठा हुआ था. उनके भारतीय सुरक्षा अधिकारी थे रामनाथ काव जो आगे चलकर ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख बने. वो आगे की सीट पर बैठे हुए थे."
"हम दोनों ये सोच कर बहुत शर्मिंदा हुए कि चऊ सोच रहे होंगे कि भारत कितना फटीचर देश है जो विदेशी मेहमान को एक ठीक-ठाक कार भी उपलब्ध नहीं करा सकता. लेकिन चऊ की भावभंगिमा से ये लगा नहीं कि उन्हें कोई फ़र्क पड़ा हो."
भुट्टोImage copyrightGetty
लेकिन 1973 आते-आते चऊ एनलाई का भारत के प्रति रुख़ या तो पूरी तरह से बदल चुका था, या फिर उसकी शुरुआत हो चुकी थी. उस समय चीन में भारत के शार्डी अफ़ेयर्स लखनलाल मेहरोत्रा एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं, "भुट्टो साहब बीजिंग आने वाले थे. चऊ एनलाई उन्हें लेने हवाई अड्डे पहुंचे हुए थे. हम लोग भी वहाँ मौजूद थे. हम सब लोगों से हाथ मिला कर चऊ एनलाई जहाज़ के नज़दीक पहुंच गए."
"वहां से वो अचानक लौट कर आए और उन्होंने मेरे कंधे और गर्दन को थपथपा कर मुझसे कहा मिस्टर शार्डी अफ़ेयर्स, प्लीज़ टेल इंदिरा एवरी थिंग विल बी फ़ाइन. (दूत महोदय आप इंदिरा से कह दें कि सब कुछ ठीक हो जाएगा.) दो चीज़ें महत्वपूर्ण थीं. उन्होंने इंदिरा शब्द का प्रयोग किया, यॉर प्राइम मिनिस्टर शब्द का नहीं. इस शब्द में बहुत अधिक स्नेह झलक रहा था. वो पुराने दिनों को याद कर रहे थे जब वो नेहरू से मिला करते थे और इंदिरा अक्सर उनके साथ हुआ करती थीं. और दूसरे वो मुझसे ख़ास तौर से ये बात कहने मेरे पास आए थे."
इंदिरा गांधीImage copyrightSHAMSHER BAHADUR DURGA. PANJAB DIGITAL LIBRARY
Image captionइंदिरा गांधी
लेकिन उसके बाद थोड़ी गड़बड़ हो गई. उस रात चऊ एनलाई भुट्टो को भोज देने वाले थे, लेकिन अचानक उनकी तबियत ख़राब हो गई.
मेहरोत्रा याद करते है, "मुझे भी उस भोज में बुलाया गया था. चऊ एनलाई की जगह आए तंग शियाओ पिंग ने भाषण दिया और उसमें उन्होंने कश्मीर के लोगों की स्वायत्ता का ज़िक्र कर दिया. मुझे उस भोज से विरोध स्वरूप वॉक आउट करना पड़ा."
"लेकिन अगले दिन मामला संभाल लिया गया. अगले दिन जब भुट्टो ने चऊ के सम्मान में भोज दिया तो कश्मीर का कोई ज़िक्र नहीं किया गया. बल्कि भुट्टो ख़ुद मेरे पास आ कर बोले कि आप लोग उठकर क्यों बाहर चले गए थे? मैं समझा कि आप दोनों टॉयलेट जा रहे हैं. मेरी पत्नी शीला ने तुरंत जवाब दिया, हमारे यहाँ मर्द और औरत कभी साथ साथ टॉयलेट नहीं जाते हैं." सुनते ही भुट्टो ने ज़ोर का ठहाका लगाया.
अपनी मौत से पहले चऊ एनलाई ने सुनिश्चित किया कि भारत और चीन के संबंधों को राजदूत स्तर पर फिर से ले आया जाए. उन्हीं का प्रयास था कि के आर नारायणन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, चीन में भारत के राजदूत बन कर गए.
चऊ एनलाई अपनी पत्नी के साथImage copyrightNew Century Press
Image captionचऊ एनलाई अपनी पत्नी के साथ
साल 1975 आते-आते चऊ एनलाई गंभीर रूप से बीमार हो गए. उन्हें पेट का कैंसर हो गया. आखिरी बार वो अस्पताल से अपने बाल कटवाने अपने नाई ज़ू दिन हुआ के पास गए. उन्होंने ज़ू से कहा, "चलो मेरे साथ तस्वीर खिंचवाओ." लेकिन वहाँ कोई फ़ोटोग्राफ़र मौजूद नहीं था.
तीन महीने बाद उनके नाई ज़ू ने उन्हें संदेश भिजवाया, "क्या मैं प्रधानमंत्री के बाल काटने आ सकता हूँ?" चऊ एनलाई ने जवाब दिया, "उसको यहां मत आने दो. मुझे इस हाल में देखकर उसका दिल टूट जाएगा."
आठ जनवरी, 1976 को सुबह 9 बज कर 25 मिनट पर चऊ एनलाई ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.

Wednesday, 6 January 2016

यदि राष्ट्रनिर्माता चाहते तो अखंड भारत 1946 में ही बन गया होता @शोएब दानियाल

उस समय कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन योजना नकारते हुए संयुक्त भारत के प्रस्ताव को खारिज कर बंटवारे का अंतिम विकल्प चुना था
भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव ने 26 तारीख को अल जजीरा टीवी चैनल पर एक इंटरव्यू दिया था. वैसे तो इससे जुड़ी कई बातों पर विवाद हुए लेकिन सबसे कम संभावना इस बात पर विवाद की थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की धारणा के अनुसार भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान को मिलकर एक महादेश – अखंड भारत बनाना चाहिए. संघ यह बात सालों से कहता आ रहा है. इस इंटरव्यू में राम माधव ने कहा था, ‘आरएसएस अब भी मानता है कि एक दिन ये हिस्से, जो किसी ऐतिहासिक वजह से 60 साल पहले अलग हो गए, आपसी सद्भावना के तहत फिर आपस में एकजुट हो जाएंगे और इनसे अखंड भारत बनाया जाएगा.’
ब्रिटेन भारत विभाजन के सख्त खिलाफ था. वह भारत को एक रखना और राष्ट्रमंडल देशों में देखना चाहता था कि ताकि औपचारिक रूप से शासन खत्म होने के बाद भी यहां उसका प्रभाव बना रहे
भारतीय प्रायद्वीप को एक राजनीतिक इकाई बनाना लंबे अरसे से हिंदूवादी आंदोलन का एक अहम लक्ष्य रहा है. यहां तक कि विनायक सावरकर जो ‘टू नेशन थ्योरी’ के खुले समर्थक थे, उन्होंने कभी जिन्ना की तरह बंटवारे की बात नहीं की (हालांकि उनकी कल्पना के भारत में भी मुसलमान थे लेकिन सावरकर उनकी तुलना जर्मनी के यहूदियों से करते हुए एक जगह कहते हैं कि भारतीय मुसलमान अपने पड़ोस में रहने वाले हिंदू के बजाय खुद को भारत से बाहर रहने वाले मुसलमान से जोड़कर देखते हैं).
लेकिन इसके बाद भी भारतीय प्रायद्वीप को एक इकाई बनाने की सभी व्यवहारिक कल्पनाओं को उसके समर्थकों द्वारा नकारा जाता रहा. यहां तक कि 1946 की गर्मियों में, आजादी के ठीक एक साल पहले ब्रिटिश राज ने प्रायद्वीप के एकीकरण के लिए एक संवैधानिक खाका पेश किया था, इसपर राजनेताओं ने भारी बहस भी की लेकिन राष्ट्र निर्माताओं ने आखिरकार इस योजना को खारिज कर दिया था.
कैबिनेट मिशन योजना
इतिहास में इस संवैधानिक योजना को कैबिनेट मिशन योजना के नाम से भी जाना जाता है. ब्रिटेन सरकार की कैबिनेट के तीन सदस्यों ने इसे तैयार किया था इसलिए इसे यह नाम मिला था.
दो शताब्दियों तक भारत पर शासन करने वाला ब्रिटेन दूसरे विश्व युद्ध के बाद काफी कमजोर हो गया था. वो जल्दी से जल्दी भारत से विदाई चाहता था. इसी मकसद के लिए तीन सदस्यों वाले कैबिनेट मिशन को भारतीयों के हाथ में शासन की बागडोर सौंपने की जिम्मेदारी दी गई. कैबिनेट मिशन मार्च, 1946 में भारत पहुंचा था और उसने तुरंत इस मसले पर हर वर्ग के नेताओं से बातचीत शुरू कर दी. एक महीने तक व्यापक विचार-विमर्श के बाद अब मिशन कुछ सिफारिशें की करने की स्थिति में आ गया.
बंटवारे की मांग खारिज होने के बाद कैबिनेट मिशन के पास अब सिर्फ एक विकल्प बचा था – संयुक्त भारत. 16 मई, 1946 को उसने अपनी यह योजना पेश की
कैबिनेट मिशन ने यहां जो हालात देखे, उनके अनुसार सत्ता हस्तांतरण के सिर्फ दो विकल्प थे. पहला था ब्रितानी भारत का दो संप्रभु देशों – भारत और पाकिस्तान  में विभाजन (कैबिनेट मिशन योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था जो आखिर में हकीकत बना). यह भी दिलचस्प बात है कि खुद ब्रिटेन विभाजन के सख्त खिलाफ था. वह भारत को एक रखना और राष्ट्रमंडल देशों में देखना चाहता था कि ताकि औपचारिक रूप से शासन खत्म होने के बाद भी यहां उसका प्रभाव बना रहे. यह प्रस्ताव कांग्रेस को भी नापसंद था क्योंकि वह तब तक ब्रितानी-भारत के बंटवारे के विरोध में थी. सबसे दिलचस्प और हैरतभरी बात ये है कि पाकिस्तान की मांग करने वाले जिन्ना ने भी विभाजन की योजना को खारिज कर दिया था. फिर यह हुआ कि आखिरकार कैबिनेट मिशन ने विभाजन की योजना का विकल्प छोड़ दिया.
दूसरा विकल्प – तीन स्तरीय शासन व्यवस्था वाला संयुक्त भारत
कैबिनेट मिशन के पास अब सिर्फ एक विकल्प बचा था – संयुक्त भारत. 16 मई, 1946 को कैबिनेट मिशन ने अपनी आखिरी योजना पेश की. उसने पूरी सावधानी के साथ यह बात साफ कर दी कि वह संप्रभु पाकिस्तान के विचार को खारिज कर रहा है.
मिशन की योजना एक तीन स्तरीय संघ के निर्माण की थी. आज के हिसाब से देखें तो इसमें ब्रितानी भारत के प्रांतों को तीन समूहों – भारत, पाकिस्तान (पश्चिमी समूह) और बंगाल व असम (पूर्वी समूह) में पुनर्गठित किए जाने का प्रस्ताव था. बातचीत के दौरान कांग्रेस कैबिनेट मिशन से जो प्रस्ताव चाहती थी यह उसी के आसपास था. उसने केंद्र में हिंदू और मुस्लिम प्रांतों के मुस्लिम लीग के ‘समान’ प्रतिनिधित्व की मांग को खारिज कर दिया था. कांग्रेस ने इस मांग का जोरदार विरोध किया था. वहीं गांधी के हिसाब से यह ‘पाकिस्तान की मांग’ से भी बदतर मांग थी. कैबिनेट मिशन इसके लिए तैयार हो चुका था कि केंद्रीय विधायिका में सीटों का बंटवारा जनसंख्या के अनुपात में हो.
मिशन की योजना एक तीन स्तरीय संघ के निर्माण की थी. आज के हिसाब से देखें तो इसमें ब्रितानी भारत के प्रांतों को तीन समूहों – भारत, पाकिस्तान (पश्चिमी समूह) और बंगाल व असम (पूर्वी समूह) में पुनर्गठित किए जाने का प्रस्ताव था
कैबिनेट मिशन योजना के मुताबिक प्रांतों को समूह में बांटना एक ऐसा बिंदु था जो कांग्रेस की मांग के खिलाफ था. यह एक तरह से जिन्ना के लिए रियायत दी गई थी क्योंकि पूर्वी और पश्चिमी समूहों में मुस्लिम लीग का दबदबा हो सकता था और इस तरह वो केंद्र में कांग्रेस के दबदबे को चुनौती दे सकती थी.
समूह आपस में मिलकर अपना अलग संविधान बना सकते थे. योजना के मुताबिक एक दशक बाद इनकी समीक्षा होती और संविधान बनने के बाद यदि किसी प्रांत को लगता कि वह समूह में शामिल नहीं रहना चाहता तो वह उसे छोड़ भी सकता था. असम के संबंध में यह प्रावधान बड़ा महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां कांग्रेस की सरकार थी जिसे डर था कि पूर्वी समूह में उसे मुस्लिम लीग द्वारा शासित बंगाल के दबदबे का सामना करना पड़ेगा. इस प्रावधान का मतलब था कि असम समूह से अलग हो सकता था. प्रांतों को समूह से अलग होने का अधिकार तो था लेकिन वे संघ से अलग नहीं हो सकते थे और इससे केंद्र को ताकत मिलती.
खींचतान कैसे शुरू हुई
शुरू में कांग्रेस ने यह योजना स्वीकार कर ली. मुस्लिम लीग भी इसपर सहमत थी. हालांकि औपचारिक स्वीकारोक्ति के बाद भी कांग्रेस इस बात से नाखुश थी कि केंद्र को बहुत कम शक्तियां दी गई हैं. योजना के मुताबिक केंद्र के पास रक्षा, विदेश मामले और संचार से जुड़े विषयों पर ही अधिकार थे. लेकिन प्रांतों के समूह बनने से केंद्र की ये शक्तियां और भी सीमित हो रही थीं.
संयुक्त भारत दो ध्रुवों के बीच संतुलन साधने के लिहाज से बेहतरीन विचार था लेकिन इसने कांग्रेस और लीग के बीच एक लड़ाई छेड़ दी
उस समय जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के नए अध्यक्ष बने थे. उन्होंने 10 जुलाई, 1946 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कांग्रेस की ये चिंताएं सार्वजनिक कर दीं. एक धमाका करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस को नहीं लगता कि वह योजना की शर्तों से बंधी है. इसके साथ ही नेहरू ने प्रांतों के समूह बनाने के विचार के खिलाफ भी अपनी राय दी. इसकी प्रतिक्रिया में लीग भी योजना से पीछे हट गई.
अधर में संयुक्त भारत
अब संयुक्त भारत की कोई भी परिकल्पना आखिरी सांसे गिन रही थी. संयुक्त भारत दो ध्रुवों के बीच संतुलन साधने के लिहाज से बेहतरीन विचार था लेकिन, इसने कांग्रेस और लीग के बीच एक लड़ाई छेड़ दी और अब संयुक्त भारत की संभावना तकरीबन खत्म हो गई.
अगले छह महीने तक संयुक्त भारत के इस खारिज हो चुके विचार पर कानूनी लड़ाई चलती रही. कांग्रेस का कहना था कि प्रांतों का समूह बनाना कैबिनेट मिशन योजना के प्रस्ताव का अनिवार्य हिस्सा नहीं है. मुस्लिम लीग ने इससे सीधी असहमति जताई. उसका दावा था कि प्रांतों का समूह बनाना बहुत जरूरी है. जिन्ना के मुताबिक यह कैबिनेट मिशन योजना का ‘मुख्य भाग’ था. आखिरकार छह दिसंबर, 1946 में अंग्रेजों ने लीग का पक्ष लिया और घोषणा की कि प्रांतों का समूह बनाना कैबिनेट मिशन योजना का बुनियादी हिस्सा था.
अब कांग्रेस के पास एक विकल्प चुनने का रास्ता बचा था. प्रांतों के समूह और एक कमजोर केंद्र के पक्ष में सहमति जताकर पार्टी संयुक्त भारत का चुनाव कर सकती थी या फिर विभाजन का
विभाजन कांग्रेस का चुनाव था
आखिरी चेतावनी मिल चुकी थी और अब कांग्रेस को एक विकल्प चुनना था. प्रांतों के समूह और एक कमजोर केंद्र के पक्ष में सहमति जताकर पार्टी संयुक्त भारत का चुनाव कर सकती थी या फिर विभाजन का. कुछ महीने तक वह आगे-पीछे होती रही, इस दौरान चारों तरफ अराजकता बढ़ने लगी और फिर कांग्रेस ने विभाजन पर सहमति जता दी.
आठ मार्च, 1947 को कांग्रेस ने पहली बार औपचारिक रूप से सांप्रदायिक आधार पर पंजाब के विभाजन की बात कह दी. कांग्रेस ने बंगाल विभाजन की हिंदू महासभा की मांग का भी समर्थन कर दिया.
कांग्रेस ने एक लंबे अरसे तक संयुक्त भारत के लिए लड़ाई लड़ी थी इसलिए उसके इस रुख का विरोध भी हुआ. बंगाल में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता शरत चंद्र बोस (सुभाषचंद्र बोस के बड़े भाई) ने बंगाल विभाजन का विरोध किया. 27 मई, 1947 को सरदार वल्लभ भाई पटेल को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, ‘मुझे डर है कि आनेवाली पीढ़ियां बंगाल, पंजाब और भारत के विभाजन के खिलाफ घुटने टेकने के लिए हमें कटघरे में खड़ा करेंगी.’ बोस कांग्रेस की इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते थे कि जनता विभाजन चाहती है. उन्होंने आगे लिखा, ‘यह सही नहीं है कि बंगाली हिंदू एकमत से विभाजन चाहते हैं. विभाजन की मांग मध्यमवर्ग तक ही सीमित है.’
बोस भले ही इसबात से असहमत थे लेकिन अबतक कांग्रेस नेतृत्व मान चुका था कि विभाजन ही एकमात्र समाधान है. विभाजन की रूपरेखा वल्लभ भाई पटेल के करीबी एक मलयाली नौकरशाह, वीपी मेनन ने बनाई थी. ब्रितानी शासन ने इसे मान लिया. अब ब्रिटेन को इसबात की परवाह नहीं थी कि भारत का क्या होता है. उसे किसी भी तरह जल्दी से जल्दी इस जिम्मेदारी से मुक्त होना था. जिन्ना विभाजन की इस योजना के खिलाफ थे. उनका कानूनी तर्क था कि चूंकि कैबिनेट मिशन योजना खत्म हो चुकी है इसलिए तकनीकी रूप से 1942 की संवैधानिक योजना यानी क्रिप्स मिशन को अब लागू किया जाए (जिसमें सभी शक्तियां प्रांतों को दी गई थीं और केंद्र के पास कोई शक्ति नहीं थी). हालांकि वायसराय लुईस माऊंटबेटन ने जिन्ना की इस आपत्ति को खारिज कर दिया और तीन जून को विभाजन योजना की घोषणा कर दी.
यदि आज के हिसाब से हम देखें तो अखंड भारत पृथ्वी का सबसे बड़ा देश होता और जिसकी आबादी चीन की आबादी से 20 प्रतिशत ज्यादा होती
क्या यह सही फैसला था?
क्या कांग्रेस ने सही कदम उठाया था? क्या उसे कैबिनेट मिशन योजना को खारिज करके संयुक्त भारत के सपने को खत्म करना चाहिए था? कुछ इतिहासकारों के हिसाब से यह गलती थी. प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ एचएम सीरवाई कहते हैं कि कैबिनेट मिशन योजना को खारिज करने के पीछे कांग्रेस के इरादे सही नहीं ठहराए जा सकते.
इसपर बहस काफी उलझी हुई हो सकती है फिर भी यह देखा जाना जरूरी है आखिर कांग्रेस ने यह फैसला क्यों किया. एक वजह तो साफ है : कांग्रेस सत्ता हासिल करना चाहती थी. यह उसकी एक बड़ी गलती कही जाती है लेकिन किसी भी राजनैतिक पार्टी का मकसद यही होता है.
इस पहलू पर भी विचार करना जरूरी है कि कैबिनेट मिशन का तीन स्तरीय संघीय शासन का प्रस्ताव व्यवहारिक था या फिर अंग्रेजों के जाने के बाद यह इस क्षेत्र में लगातार चलने वाले एक संघर्ष की वजह बन जाता.
यदि आज के हिसाब से हम देखें तो राम माधव के सपनों का अखंड भारत आबादी के लिहाज से सबसे बड़ा देश होता जिसकी आबादी चीन की आबादी से 20 प्रतिशत ज्यादा होती. लेकिन क्या इतनी बड़ी आबादी को संभालना आसान होता? इनके जो शुरुआती मुद्दे होते उन्हें ही सुलझाने देश की कितनी ऊर्जा बर्बाद होती और फिर इस महादेश के पास अपना विकास करने के लिए कितना समय बचता?
अखंड भारत एक अव्यहारिक कल्पना है
इस समय भारत अपनी पूरी आबादी को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए ही संघर्ष कर रहा है. देश में शिशु मृत्युदर कीनिया और बोत्सवाना से भी बदतर है. हमारे यहां 2008 में पांच साल से कम उम्र के 43 प्रतिशत बच्चे सामान्य से कम वजन के थे जबकि सोमालिया (32 प्रतिशत) और रवांडा (11  प्रतिशत) इस मामले में बेहतर थे.
यदि 1946 में राष्ट्र निर्माताओं को एहसास था कि प्रांतों का समूह बनाना अव्यवस्था पैदा करने वाला विचार है तो आज के हिसाब से तीन संप्रभु राष्ट्रों को मिलाकर बना ‘अखंड भारत’ कितना अराजक हो सकता है? भारत जिसे अभी अपनी जनसंख्या के बड़े हिस्से की बुनियादी जरूरतें पूरी करनी हैं, क्या इस तरह की सनकभरी कल्पनाएं करने का भी जोखिम उठा सकता है? अखंड भारत का विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी इमारतों में भगवा रंग से बने नक्शों तक तो ठीक है लेकिन असलियत में इसकी कल्पना भी व्यवहारिक नहीं है

कैसे साल का पहला दिन लाखों भारतीयों के लिए अंग्रेजों की जीत और मराठों की हार के उत्सव का दिन बन गया

दो सौ साल पहले 500 महार सैनिकों ने अंग्रेजों की तरफ से लड़ते हुए पेशवाओं की 25,000 की सेना को हराकर मराठा साम्राज्य को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी.
भारतीय सेना के दो सेवानिवृत्त जवानों, पीएस धोबले और दादासाहेब भोसले के लिए पिछले शुक्रवार की रात शुरू हुई नए साल की यह पहली यात्रा प्रतीकात्मकरूप से काफी महत्वपूर्ण थी. नया साल शुरू होने के एक घंटे बाद वे दादर स्थित भीमराव अंबेडकर के समाधि स्थल से एक बस में सवार हुए थे. उनके जैसे ही 300 और वर्दीधारी महिला-पुरुष भी इस यात्रा में उनके साथ थे.
पांच घंटे बाद सुबह-सुबह ये सारे लोग अपनी मंजिल – पुणे के पास स्थित भीमा कोरेगांव पहुंच गए. भीमा नदी के किनारे यही वो जगह है जहां 1818 में कमजोर सी लगने वाली 500 महार लड़ाकों की एक टुकड़ी ने कंपनी झंडे के तले लड़ते हुए अपने से कहीं ताकतवर पेशवा सेना को शिकस्त दी थी. आज 200 साल बाद भी इस लड़ाई की निशानियां यहां मिलती रहती हैं. ग्रामीण बताते हैं कि नदी के तल में उन्हें उस दौर की तलवारें मिलती हैं.
‘कोरेगांव की लड़ाई इतिहास के पन्नों से गायब हो चुकी थी. लेकिन जब 1927 में अंबेडकर यहां आए तो इस स्थान को तीर्थ का दर्जा मिल गया’
भोसले गर्व के साथ इस कहानी को हमसे साझा करते हुए बताते हैं कि कैसे 500 महार लड़ाकों ने पूरे जोशो-खरोश के साथ पेशवाओं की 25000 की मजबूत सेना पर हमला किया था, जिसके पास तब बंदूकें हुआ करती थीं. भोसले कहते हैं, ‘हमने पेशवाओं का शासन खत्मकर अंग्रेजों को भारत सौंप दिया.’
भोसले भारतीय सेना के साथ 1965 का युद्ध लड़ चुके हैं. श्रीलंका, अंडमान और निकोबार, और जम्मू-कश्मीर में तैनात रहे इस पूर्व सैनिक, जिसकी वर्दी पर कई मेडल दिख रहे हों, के मुंह से इस तरह की बात आप को कुछ असामान्य लग सकती है. लेकिन कोरेगांव की लड़ाई महारों और भारत के दूसरे दलितों के लिए बहुत महत्व रखती है. इसलिए वे हर बार एक जनवरी को पेशवाओं के अमानवीय शासन के खिलाफ अपनी जीत का उत्सव और जाति आधारित उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत का दिन मनाने के लिए यहां इकट्ठे होते हैं.
मानवीय अस्मिता की लड़ाई
कहा जाता है कि 1818 में साल के पहले दिन ईस्ट इंडिया कंपनी के 500 सैनिकों ने भीमा नदी को पार करके भीमा कोरेगांव में अपने से कहीं ताकतवर और सुसज्जित पेशवा की 25,000 सैनिकों की टुकड़ी को धूल चटा दी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के ये सैनिक अंग्रेज कर्नल एफएफ स्टॉन्टन की अगुवाई में लड़े थे.
पेशवाओं के शासनकाल में जब कोई महार नगर में प्रवेश करता था तो उसे अपने पीछे झाड़ू बांधकर चलनी पड़ती पड़ती थी ताकि उसके कदम जहां पड़े हैं वह धूल साफ होती जाए
हो सकता है यह कुछ बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात हो लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों से मिलान करें तो इसे कम करके नहीं आंका जा सकता. अंग्रेजों के तत्कालीन दस्तावेजों के हिसाब से 500 की जगह लड़ाई में 900 महार सैनिक शामिल हुए थे और दूसरी तरफ पेशवा के 25,000 नहीं बल्कि 20,000 हजार सैनिक थे. एक बात यह भी है कि उस समय तक पेशवा रक्षात्मक मुद्रा में थे. ईस्ट इंडिया कंपनी पेशवा से राजधानी पुणे छीन चुकी थी और शनिवारवाडा महल पर भी उसका झंडा लहरा चुका था.
ऐतिहासिक तथ्य जो भी हों लेकिन अंग्रेजों के लिए यह लड़ाई तीसरे मराठा-अंग्रेज युद्ध का आखिरी मोर्चा था जिसने पेशवाओं के साम्राज्य का अंत कर दिया. इस लड़ाई ने पश्चिमी भारत में अंग्रेजों के शासन की बुनियाद रखी थी.
पहले मराठा शासक शिवाजी महारों को अपनी सेना में पूरी उदारता के साथ भरती करते थे लेकिन, दो दशक बाद पेशवाओं के शासनकाल में यह स्थिति पूरी तरह पलट गई. पेशवा ब्राह्मण थे और उनमें रूढ़िवादिता कूट-कूटकर भरी हुई थी. कहा तो ये भी जाता है कि उनके शासनकाल में जब कोई महार नगर में प्रवेश करता था तो उसे अपने पीछे झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था ताकि उसके कदम जहां पड़े हों वह धूल साफ होती जाए. उन्हें मुंह के नीचे गर्दन से एक कटोरी बांधकर बाहर निकलना पड़ता था ताकि उनका थूक जमीन पर न गिरे. उस दौर में जाति छिपाना सजायोग्य अपराध था.
दलित वर्ग इस लड़ाई से जुड़े अपने दस्तावेजों में इसबात पर जोर देता है कि जब अंग्रेज उनसे संपर्क साध रहे थे तब उन्होंने पेशवा बाजीराव द्वितीय को अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव रखा था. बाजीराव ने जब प्रस्ताव ठुकरा दिया तब वे अंग्रेजों के साथ हो गए.
1851 में भीमा कोरेगांव में एक स्मृति स्तंभ (जिसे ग्रामीण रणस्तंभ कहते हैं) बनवाया था. इस लड़ाई में शहीद होने वाले तमाम सैनिकों, जिनमें ज्यादातर महार समुदाय के हैं, के नाम इसपर दर्ज हैं.
पहले मराठा शासक शिवाजी महारों को अपनी सेना में पूरी उदारता के साथ भरती करते थे लेकिन दो दशक बाद पेशवाओं के शासनकाल में यह स्थिति पूरी तरह पलट गई
महारों के लिए अंग्रेजों का शासन भी उतार-चढ़ाव भरा रहा
महारों का सैन्य इतिहास काफी पुराना है लेकिन, 1893 में अंग्रेजों ने सेना में उनकी भरती बंद कर दी. यह 1857 के विद्रोह का नतीजा था. अंग्रेजों ने इसके बाद अपनी रणनीति बदलते हुए तय किया कि सेना में सिर्फ ‘लड़ाका जातीय’ वर्ग के लोगों को ही रखा जाएगा. ‘दक्षिण के स्त्रैण लोगों’ और ‘बॉम्बे के कथित महराट्टा’ को भी सेना से बाहर रखा गया.
जिन वर्गों को सेना से बाहर किया गया उनके लिए यह झटके से कम नहीं था. लेकिन उनमें भी महारों पर इस फैसले की सबसे ज्यादा मार पड़ी. वे हिंदू समाज में सबसे निचले तबके – ‘अछूत वर्ग’ में शामिल थे. सेना में काम करने का मौका खोने का मतलब था कि अच्छी शिक्षा और कम से कम कागजों पर ही सही बाकी समुदायों के साथ बराबरी से उठने-बैठने का मौका खोना.
हालांकि प्रथम विश्व युद्ध के समय जब अंग्रेजों को और सैनिकों की जरूरत महसूस हुई तो महार समुदाय के लोग एकबार फिर सेना में भरती किए जाने लगे. सेना में उनके नाम पर एक रेजीमेंट भी बनी लेकिन युद्ध खत्म होते ही इसे खत्म कर दिया गया. 1945 में इसे फिर गठित किया गया. फिलहाल मध्य प्रदेश के सागर में इसका मुख्यालय है. धोबले और भोसले इसी रेजीमेंट में सैनिक रहे हैं. हर साल महार रेजीमेंट के सैनिक, वर्दियों और बिना वर्दियों के भी यहां आकर स्मृति स्तंभ पर श्रद्धासुमन चढ़ाते हैं.
धोबले और भोसले 15 साल पहले सेवानिवृत्त हुए हैं. तब से वे समता सैनिक दल के प्रशिक्षक हैं. यह अर्धसैन्य संगठन बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया से संबंद्ध है और अंबेडकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा हिंदुओं के बीच सैन्यवाद को बढ़ावा देने की कोशिश के आंशिक विरोध में 1926 के दौरान इस संगठन की स्थापना की थी. ‘इस स्मारक से जुड़ी कई यादें हैं’ पुणे विश्वविद्यालय की इतिहासविद् श्रद्धा कुंभोजकर बताती हैं, ‘कोरेगांव की लड़ाई इतिहास के पन्नों से गायब हो चुकी थी. लेकिन जब 1927 में अंबेडकर यहां आए तो इस स्थान को तीर्थ का दर्जा मिल गया. उनकी मृत्यु के बाद इस आयोजन को हिंदू संस्कृति की मुख्यधारा के विकल्प के तौर पर विकसित करने की कोशिश होने लगी.’
महारों का सैन्य इतिहास काफी पुराना है लेकिन 1893 में अंग्रेजों ने सेना में उनकी भरती बंद कर दी और इससे यह समुदाय बुरी तरह प्रभावित हुआ
क्या यह सिर्फ एक लड़ाई को याद करने का आयोजन है?
अंबेडकर की स्मृति से जुड़े जितने कार्यक्रम होते हैं भीमा कोरेगांव का आयोजन भी तकरीबन वैसा ही है. इसबार मैदान के बीच में तीन बड़े-बड़े टेंट लगाए गए थे. एक में राजनीतिक पार्टियों के भाषण चालू थे, दूसरे में भीमा कोरेगांव की लड़ाई को याद करने वाले गानों का कार्यक्रम चल रहा था और तीसरा तपती धूप से परेशान आम लोगों के सुस्ताने के लिए लगाया गया था.
बाकी मैदान में एक लाइन से अंबेडकर और गौतम बुद्ध की मूर्तियों व पोस्टरों की दुकानें थी. साथ में कुछ लोग जाति व्यवस्था पर लिखी गई किताबें और सीडियों की दुकान भी लगाए थे.
दोपहर के समय मैदान के ऊपर से अचानक एक हेलिकॉप्टर गुजरा और इसके जरिए स्मारक पर फूल बरसाए गए. जनता इसे देखकर काफी उत्साहित थी. यह क्रम चार बार चला. यह हेलिकॉप्टर महाराष्ट्र में दलित मुद्दों पर जल्दी ही सक्रिय होने वाली राजनीतिक पार्टी, लश्कर-ए-भीम के प्रचार का तरीका था.
किसी राजनीतिक दल के लिए अपने संभावित मतदाताओं के बीच इस तरह का प्रचार असामान्य नहीं है क्योंकि एक अनुमान के मुताबिक इसबार आयोजन में कम से कम एक लाख लोग इकट्ठा हुए थे. भीमा कोरेगांव के भाऊसाहेब भालेराव बताते हैं कि एक दशक पहले तक यह स्थिति नहीं थी, इस लड़ाई को याद करने का आयोजन तो होता था लेकिन खास भीड़ नहीं होती थी. लेकिन बीते सालों में भीमा कोरेगांव रणस्तंभ सेवा समिति के प्रयासों के चलते यह कार्यक्रम बड़े स्तर पर होने लगा और दूर-दूर से लोग इसमें जुटने लगे. गांव के 11 लोग इस समिति के सदस्य हैं और पूरे महाराष्ट्र में 500 स्वयंसेवी फैले हैं. ज्यादातर स्वयंसेवी इन सदस्यों के ही रिश्तेदार हैं. ये सब मिलकर आयोजन की पूरी व्यवस्था संभालते हैं.
‘हमारे लिए इन महार लड़ाकों की बहादुरी गर्व का विषय है. ये सैनिक हम महिलाओं को भी प्रेरित करते हैं कि हम अपनी जिंदगी की लगाम अपने हाथ में लें’
नांदेड़ से रातभर की यात्रा कर यहां पहुंची 80 वर्षीय दुरपताबाई घोरगे इसबार की व्यवस्थाओं के काफी संतुष्ट नजर आती हैं, वे बताती हैं, ‘पिछली बार के बजाय इसबार आयोजन अच्छे ढंग से हुआ.’ पिछली बार वे दस साल पहले यहां आई थीं और उनके मुताबिक तब बहुत कम लोग आयोजन में शामिल हुआ करते थे.
गायत्री कोकरे ने घोरगे और उनके जैसी 107 महिलाओं को नांदेड़ से यहां लाने की व्यवस्था की थी. 61 वर्षीय कोकरे यहां उपस्थित अलग-अलग दलित पार्टियों से बिलकुल भी प्रभावित नहीं दिखतीं. ‘हम किसी भी लालची पार्टी से जुड़ना नहीं चाहते’ कोकरे कहती हैं, ‘हम दलित समुदाय की प्रगति देखकर खुश हैं लेकिन पार्टियों से हमें नाराजगी है और इसलिए हम उनकी सदस्यता छोड़ देंगे. हमारे लिए इन महार लड़ाकों की बहादुरी गर्व का विषय है. ये सैनिक हम महिलाओं को भी प्रेरित करते हैं कि हम अपनी जिंदगी की लगाम अपने हाथ में लें.’ कोकरे बताती हैं कि किस तरह वे रातभर ट्रेन में साथी महिलाओं के साथ गाने गाते हुए आई हैं. वे हमें अपने टिकट दिखाते हुए कहती हैं, ‘हम सरकारी साधनों में फ्री की यात्रा नहीं करते. कोई भी हमारे बारे में यह बात नहीं कह सकता.’ कोकरे यह भलीभांति जानती हैं कि जब भी इस तरह के बड़े-बड़े आयोजन होते हैं तो किस तरह दूसरे वर्ग के लोग उनकी ईमानदारी पर शक करते हैं.
अन्य जाति के लोग इस आयोजन को किस तरह देखते हैं इसपर पुणे विश्वविद्यालय की इतिहासविद् श्रद्धा कुंभोजकर एक शोधपत्र में जानकारी देती हैं कि पुणे भीमा कोरेगांव से 50 किमी दूर है. यहां हिंदू आज के दिन कोशिश करते हैं कि इस रोड से होकर न गुजरें. वे लिखती हैं, ‘शहरी मध्यवर्ग जो राजमार्ग से आताजाता है एक दूसरे को याद दिलाता है कि स्मारक के पास वाले हिस्से पर रास्ते में भारी भीड़भाड़ मिलेगी.’ जाहिर है कि इन लोगों के लिए इस आयोजन का कोई महत्व नहीं है लेकिन इससे जाति के खिलाफ संघर्ष की यह लड़ाई कमजोर नहीं होती. यहां लोग उम्मीद जताते हैं कि आने वाले सालों में देश के कोने-कोने से और लोग आएंगे और दो शताब्दियों पुराना यह संघर्ष आज के जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ उन्हें भी एकजुट करेगा.
(यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है

प्रधानमंत्री के ट्वीट पर हंगामा क्यों? @शेखर गुप्ता

पठानकोट में जब संघर्ष जारी था उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योग के एक आयोजन में बोलने और उस पर ट्वीट करने की खूब आलोचना हो रही है, खिल्ली उड़ाई जा रही है। जब हमारे सैनिक खूनी संघर्ष में लगे हों तो वे जिंदगी को हमेशा की तरह कैसे जारी रख सकते हैं?

इस दलील पर निकट से और निष्पक्षता से गौर करने की जरूरत है। इसके जवाब का असर किसी भी माहौल में सरकार, सेना, कॉर्पोरेट या अन्य किसी भी क्षेत्र में नेतृत्व की मूल अवधारणा और उसके प्रति रवैये पर पड़ सकता है। किसी बड़े नेता को संकट में कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए? क्या उसे हमेशा सारी चीजों पर नियंत्रण रखकर, अग्रिम मोर्चे से नेतृत्व देते हुए और जनता के साथ अपनी भावनाएं, चिंताएं और प्रतिबद्धता साझा करनी चाहिए? या उसे अपनी टीम पर भरोसा रखकर उन बातों पर निगरानी का काम जारी रखनी चाहिए, जो उसे करने की जरूरत है और ऐसे दिखाना चाहिए कि जैसे सब कुछ सामान्य है?

मेरा वोट, जैसा कि आपने अब तक अनुमान लगा ही लिया होगा, दूसरे विकल्प के लिए है। महान नेता अपनी टीम पर विश्वास करते हैं, एकदम जमीनी स्तर पर प्रबंधन में दखल नहीं देते, वे शांत नज़र आने और शांति फैलाने का प्रयास करते हैं। संकट से निपट रही उसकी टीम कभी नहीं चाहेगी कि उनका बॉस ऊपर-नीचे होता हुआ चीखे, ‘यह सब हो क्या रहा है।’ यह बात सबसे ज्यादा सैन्य स्थितियों पर लागू होती है, जहां जिंदगियां जोखिम में होती हैं और शांति खोजना सबसे कठिन होता है। यदि आप मुझे पढ़ते रहे हों, तो आप पुरानी पत्रकारिता के तीन उदाहरणों के नियम के प्रति मेरी कमजोरी को भी जानते होंगे। इसलिए यहां पर मेरी बात के संबंध में तीन वाकये पेश हैं। शुरुआत उस वाकये से करूंगा, जिसका मैं प्रत्यक्षदर्शी था, जिस पर मैंने पहले भी अटल बिहारी वाजपेयी की सहमति से लिखा है।

जून 1999 की शुरुआत में मुझे उनसे मिलने के लिए कहा गया था, करगिल युद्ध तब भी गंभीर दौर में था। उनके कार्यालय ने मुझे दोपहर बाद 3 बजे का समय दिया। मैं समय पर पहुंच गया और मुझे 7 रेसकोर्स रोड के प्रतीक्षा कक्ष में ले जाया गया। मैं इंतजार करता रहा…करता रहा, लेकिन मैंने शिकायत नहीं की, क्योंकि मुझे अहसास था कि किसी पत्रकार की बजाय प्रधानमंत्री का अपने समय पर ज्यादा हक होता है और उस वक्त तो युद्ध चल रहा था। मुझे 4:30 बजे एक सहायक बुलाने आया। वाजपेयी कमरे में टहल रहे थे और मैंने नमस्ते करते हुए अपने हाथ जोड़े, उन्होंने भी उसी प्रकार जवाब दिया।
फिर बनावटी खौफ दिखाते हुए कहा, ‘अरे, देखिए भाई, अनर्थ हो गया, शेखरजी को प्रतीक्षा करवा दी, नाराज हो जाएंगे।’ मैंने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘नहीं, नहीं यह कैसे हो सकता है।’ और फिर उनसे पूछा कि क्या सब कुछ ठीक है या कोई नया संकट आ गया है, जिसमें वे व्यस्त हो गए हैं। यदि ऐसा है तो मैं फिर किसी दिन आ जाऊंगा। उन्होंने कहा, ‘नहीं..नहीं कोई संकट नहीं आया है। हम आधे घंटे के लिए सो गए थे और सोए ही रह गए, अनर्थ हो गया शेखरजी।’

अब बनावटी खौफ दिखाने की मेरी बारी थी। मैंने कहा, ‘कारगिल में युद्ध और अटलजी दो घंटे सोए दोपहर में?’ आप उनके साथ लिबर्टी भी ले सकते थे। उन्होंने कहा, ‘ठीक कहते हैं शेखरजी, मेरी राइफल कहां है, अटलजी अब करगिल की चोटी पर लड़ने जाएंगे, देश में जवानों की कमी हो गई है न।’ उन्हें तो अब तक राइफल नहीं मिली, लेकिन मैं पूरी तरह लाजवाब हो गया था। उसके बाद बहुत ही संक्षिप्त-सा व्याख्यान हुआ। शायद तीन वाक्य होंगे- बीच-बीच में उनके हमेशा के लंबे पॉज के साथ कि कैसे लीडर के लिए शांत रहना और दिखाई देना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, ‘झंझावात आपके भीतर चलता ही है, उसे दबा के रखिए।’
दूसरा उदाहरण हाल के दर्ज किए इतिहास से है कि कैसे जॉर्ज बुश (जूनियर) 9/11 के हमले की सूचना मिलने के बाद भी अविचलित बने रहे और एक स्कूल में व्याख्यान देने का वादा निभाया। तब उनकी बहुत आलोचना हुई थी, लेकिन वे बड़े नेता की भूमिका निभा रहे थे। तीसरा वाकया मैंने एक बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति, शीर्ष नौकरशाह रहे व दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल विजय कपूर से सुना। 1971 के युद्ध के समय वे सहायक थे और बताते हैं कि इंदिरा गांधी ने आदेश दिया था कि संसदीय समितियों की बैठकों सहित सारे रूटीन सरकारी कार्यक्रम हमेशा की तरह चलने चाहिए, जबकि उधर युद्ध भड़क गया था। ऐसी ही किसी बैठक में उन्हें गोपनीय लिफाफा सौंपा गया। उन्होंने इसे गंभीरता से पढ़ा, शांति से बंद किया और अपने हैंड बैग में रखकर उसे बंद कर दिया। लिफाफे में भेजे नोट में यह गंभीर समाचार था कि छंब सेक्टर में लड़ाई ठीक दिशा में नहीं जा रही है और ताजा टुकड़ियां भेजने के बाद भी यह मोर्चा मजबूत नहीं हुआ था। वे अविचलित शेष कमेटियों की बैठक में इस प्रकार शिरकत करती रहीं जैसे कुछ हुआ ही न हो।

दूसरी अति का उदाहरण राजीव गांधी के कार्यकाल का। श्रीलंका में भारतीय शांति रक्षक सेना (आईपीकेएफ) के संकट के दौरान देखा। वे काफी वक्त ऑपरेशन रूम्स में बिताते थे, लगातार अपने जनरलों से प्रश्न पूछते रहते थे, जो बदले में यह तनाव फील्ड कमांडरों में फैलाते थे, जिनके लिए चीजें वैसे भी ठीक नहीं थीं। बाद में जब वहां ओवर ऑल फील्ड कमांडर भेजा गया अौर जिसे सारे अधिकार दिए गए, तो वहां शांति और व्यवस्था कायम हो सकी। यदि आप इस बारे में और जानना चाहते हैं, कृपया आईपीकेएफ कमांडर रहे लेफ्टिनेंट जनरल एएस कालकट से बात कीजिए।

सबक : महान नेता अविचलित और दिलासा देने वाली मुद्रा में होते हैं, कई बार तो उदासीन तक दिखाई देते हैं। ऐसा करके वे अपनी टीमों पर भरोसा दिखा रहे होते हैं। मोदी के लिए ये शुरुआती दिन है, कृपया मामूली से योगा ट्वीट पर उन्हें सलीब पर मत लटकाइए।

आखिरी बात : मैं दिसंबर 1987 में जाफना युद्ध कवर करने गया था। शाम के समय मुझे 4/5 गोरखा राइफल्स के दस्ते ने रोका, जिसका नेतृत्व एक दृढ़ युवा मेजर कर रहे थे। उन्होंने मुझे रात के समय लैगून पार न करने की सलाह दी, क्योंकि वहां बारूदी सुरंग हो सकती थी, घात लगाकर हमला हो सकता था। मैंने बताया कि और कहीं जाने का ठिकाना नहीं है। वे मुझे अपने कैंप में ले गए और मैंने फील्ड पर बहुत अच्छी मेहमाननवाजी, बातचीत और रैनबसेरे का लुत्फ उठाया। वे युवा मेजर थे दलबीर सिंह। वे आज भी वैसे ही दृढ़ता रखते हैं और एकदम सुपर-फिट हैं। सिर्फ उनकी रैंक बढ़ गई है। अब वे हमारे सेनाध्यक्ष हैं।