Saturday, 4 April 2015

जिसके लिए संगीत, सुर और नमाज़ एक थे @रेहान फ़ज़ल

शहनाई के उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ,
बिस्मिल्लाह ख़ाँ के लिए संगीत, सुर और नमाज़ एक ही चीज़ थे. वो मंदिरों में शहनाई बजाते थे, सरस्वती के उपासक थे और गंगा नदी से भी उन्हें बेपनाह लगाव था.
साथ ही साथ वो पांच वक़्त नमाज़ पढ़ते थे, ज़कात देते थे और हज करने भी जाया करते थे.
संगीत के प्रति उनका इतना गहरा लगाव था कि जब कभी वो इसमें डूबते थे तो अपनी नमाज़ भी भूल जाते थे.
उनका मानना था कि अगर संगीत बाअसर है तो वो किसी भी नमाज़ या प्रार्थना से बढ़कर है. उनके संगीत का यही आध्यात्मिक गुण श्रोताओं को उनसे बांधता था.

पढ़िए विवेचना विस्तार से

जूही शर्मा
उस्ताद बिस्मिल्लाह पर क़िताब लिखने वाली जूही सिन्हा बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ.
1947 में जब भारत आज़ाद होने को हुआ जो जवाहरलाल नेहरू का मन हुआ कि इस मौके पर बिस्मिल्लाह ख़ाँ शहनाई बजाएं.
स्वतंत्रता दिवस समारोह का इंतज़ाम देख रहे संयुक्त सचिव बदरुद्दीन तैयबजी को ये ज़िम्मेदारी दी गई कि वो खाँ साहब को ढ़ूढें और उन्हें दिल्ली आने के लिए आमंत्रित करें.
बिस्मिल्लाह खाँ उस समय मुंबई में थे. उन्हें हवाई जहाज़ से दिल्ली लाया गया और सुजान सिंह पार्क में राजकीय अतिथि के तौर पर ठहराया गया.
बिस्मिल्लाह ख़ाँ पर फ़िल्म बनाने वाली और उन पर किताब लिखने वाली जूही सिन्हा याद करती हैं कि बिस्मिल्लाह इस बड़े अवसर पर शहनाई बजाने का मौका मिलने पर उत्साहित ज़रूर थे, लेकिन उन्होंने पंडित नेहरू से कहा कि वो लाल किले पर चलते हुए शहनाई नहीं बजा पाएंगे.
नेहरू ने उनसे कहा, "आप लाल किले पर एक साधारण कलाकार की तरह नहीं चलेंगे. आप आगे चलेंगे. आपके पीछे मैं और पूरा देश चलेगा."
बिस्मिल्लाह खाँ और उनके साथियों ने राग काफ़ी बजा कर आज़ादी की उस सुबह का स्वागत किया.
1997 में जब आज़ादी की पचासवीं सालगिरह मनाई गई तो बिस्मिल्लाह ख़ाँ को लाल किले की प्राचीर से शहनाई बजाने के लिए फिर आमंत्रित किया गया.

बालाजी के दर्शन

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान और नैना देवी
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान और नैना देवी जुगलबंदी प्रस्तुत करते हुए.
बिस्मिल्लाह ख़ाँ बनारस के बालाजी मंदिर के बग़ल वाले कमरे में सुबह साढ़े तीन बजे से रियाज़ करना शुरू कर देते थे. गंगा से बालाजी मंदिर तक वो 508 सीढ़ियाँ चढ़ कर जाते थे.
युवावस्था में ही उन्हें अपने संगीत की गहराइयों का आभास हो चला था. संगीत साधना करते हुए उनके लिए बाहरी दुनिया का कोई वजूद नहीं रहा करता था.
उनके मामू इसे ’असर’ कहते थे, जब संगीत कला न रह कर ईश्वर से मिलन का एक माध्यम बन जाता था.
एक बार बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने बीबीसी को बताया था, "देखिए ये है बड़ी पवित्र चीज़, बड़ी पाक़ साफ़. जहाँ हम रियाज़ करते थे बालाजी मंदिर में, वहाँ मेरे मामू ने 18 साल तक रियाज़ किया. जब हमें रियाज़ करते हुए साल भर हो गया तो एक दिन मुझसे कहने लगे कि अगर कुछ देखना तो कुछ कहना मत. मेरी दस-बारह साल की उम्र थी. मुझे अंदाज़ा ही नहीं हुआ कि ये कहना क्या चाह रहे हैं. एक रोज़ हम बड़े मूड में बजा रहे थे....कि अचानक मेरी नाक में एक ख़ुशबू आई. हमने दरवाज़ा बंद किया हुआ था जहाँ हम रियाज़ कर रहे थे. हमें फिर बहुत ज़ोर की खुशबू आई. देखते क्या हैं कि हमारे सामने बाबा खड़े हुए हैं...हाथ में कमंडल लिए हुए. मुझसे कहने लगे बजा बेटा... मेरा तो हाथ कांपने लगा. मैं डर गया. मैं बजा ही नहीं सका. अचानक वो ज़ोर से हंसने लगे और बोले मज़ा करेगा, मज़ा करेगा...और वो ये कहते हुए ग़ायब हो गए."
बिस्मिल्लाह खाँ
ख़ाँ साहब ने बताया, "घर आकर जब मैंने मामू को ये बात बतानी चाही तो वो समझ गए कि इसका हो गया सामना.
उनकी पूरी कोशिश थी कि मैं उनको ये बात न बताऊँ... इसलिए वो मुझसे कहने लगे...तुम यहाँ चले जाओ...वहाँ चले जाओ. लेकिन जब इस पर भी मैंने उनका इशारा नहीं समझा तो उन्होंने मुझे ज़ोर से तमाचा मारा. वो बोले कि, "अब देखना तो कभी इसके बारे में बात नहीं करना."

बेगम अख़्तर के फ़ैन

बेगम अख़्तर
बिस्मिल्लाह ख़ाँ की राष्ट्रीय पहचान तीस के दशक में कलकत्ता के एक संगीत सम्मेलन में मिली, जिसे बिहार के भूकंप पीड़ितों की सहायता के लिए आयोजित किया गया था.
बहुत कम लोगों के पता है कि बेगम अख़्तर ने भी उसी संगीत सम्मेलन से अपने करियर की शुरुआत की थी. बाद में बिस्मिल्लाह ख़ाँ और बेगम अख़्तर एक दूसरे के मुरीद बन गए.
कहानी है कि गर्मी की एक रात ख़ाँ साहब को नींद नहीं आ रही थी. दूर सड़क पर उन्हें एक स्वर लहरी सुनाई दी और वो उसे सुन कर बैठ गए.
कोई महिला कशिश भरी आवाज़ में गा रही थी...'दीवाना बनाना है, तो दीवाना बना दे...'
बिस्मिल्ला ख़ाँ ने किसी से पूछा तो पता चला कि ये बेगम अख़्तर की आवाज़ है.

'ऐब' जो भाता था बिस्मिल्लाह को

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ के साथ जूही सिन्हा.
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ के साथ जूही सिन्हा.
बेगम अख़्तर जब ऊँचे स्वर पर जाती थीं तो एक ख़ास जगह पर उनकी आवाज़ टूट जाती थी.
बिस्मिल्लाह कहते थे कि हालांकि संगीत की दुनिया में इसे ऐब समझा जाता है, लेकिन यही ऐब बेगम अख़्तर की आवाज़ को एक ख़ास गुण प्रदान करता था.
जूही सिन्हा बताती हैं कि बिस्मिल्ला कहा करते थे कि वो ख़ास तौर से उस लम्हे का इंतज़ार किया करते थे, जब बेगम अख़्तर की आवाज़ टूटने वाली हो.
जब ऐसा होता था तो उनके मुंह से निकलता था, ‘अहा !’ बेगम अख़्तर आश्चर्यचकित होकर उनकी तरफ़ देखती थीं और बिस्मिल्लाह ख़ाँ के मुंह से बेसाख़्ता निकलता था, "यही सुनने तो हम आए थे."

विलायत ख़ाँ से जुगलबंदी

उस्ताद विलायत ख़ाँ की बेटी ज़िला ख़ाँ एक संगीत प्रस्तुति के दौरान.
बिस्मिल्लाह ख़ाँ और महान सितारवादक उस्ताद विलायत ख़ाँ के बीच भी एक ख़ास रिश्ता था. जब बारीक जुगलबंदी की बात आती थी तो वो बिस्मिल्लाह ख़ाँ के साथ बजाना पसंद करते थे.
विलायत ख़ाँ की बेटी और जानी-मानी गायिका ज़िला ख़ाँ कहती हैं, "बिस्मिल्लाह ख़ाँ की शहनाई में एक ठुमरी अंदाज़ भरा हुआ था. अब्बा इस चीज़ को समझते थे और हमें बताते भी थे कि जुगलबंदी में एक दूसरे को सहारा और निवाला देने की ज़रूरत होती है, जिससे सामने वाले की रूह खुल सके."
एक बार विलायत ख़ाँ ने उनके बारे में कहा था, "हमारी और भय्या की रूह एक है."

विज्ञान भवन का वो कॉन्सर्ट

विलायत ख़ान, ज़िला ख़ान
मशहूर फ़ोटोग्राफ़र रघुराय ने भारत के संगीत सम्राटों पर किताब लिखी है. उन्हें विलायत ख़ाँ और बिस्मिल्लाह ख़ाँ दोनों को सुनने का सौभाग्य मिला है.
रघु राय कहते हैं, "दुनिया में तीन जोड़े ऐसे हैं जिन्होंने कमाल की जुगलबंदी की है...एक तो हैं विलायत ख़ाँ और बिस्मिल्लाह ख़ाँ, दूसरे रविशंकर और अली अकबर ख़ाँ और तीसरे, हरि प्रसाद चौरसिया और शिवकुमार शर्मा. लेकिन विलायत ख़ाँ और बिस्मिल्लाह ख़ाँ में जो संवाद था और जैसे वो एक दूसरे की संगीत की एक-एक बारीकियों पर कुर्बान होते थे, वो देखने लायक चीज़ हुआ करती थी."
राय ने आगे कहा, "1970 में विज्ञान भवन में विलायत ख़ाँ साहब का कॉन्सर्ट था. मैं तीसरी लाइन में बैठा हुआ था. मेरी अगली लाइन में बिस्मिल्ला ख़ाँ बैठे थे श्रोता के रूप में. जब विलायत ख़ाँ ने दरबारी कान्हड़ा में सितार वादन शुरू किया और जैसे जैसे गहनता बढ़ती जाती, बिस्मिल्लाह ख़ाँ अपनी जगह पर खड़े होते, अपनी टोपी उतारते...और उनके कमाल की दाद देते. एक लेजेंड का दूसरा लेजेंड को इस तरह सम्मान देते देखना बहुत ही भावुक अनुभव था."

गूंज उठी शहनाई

बिस्मिल्लाह ख़ाँ
बिस्मिल्लाह ख़ाँ को फ़िल्में देखने का बहुत शौक था. सुलोचना उनकी पसंदीदा अभिनेत्री थीं.
उन्होंने 1959 में एक फ़िल्म 'गूंज उठी शहनाई' का संगीत निर्देशन भी किया था. उसमें उन्होंने एक गीत को सुर दिया था..."दिल का खिलौना हाए टूट गया."
जूही सिन्हा कहती हैं कि इस गीत के पीछे भी एक कहानी है. अपनी जवानी के दिनों में ख़ाँ साहब एक महिला के काफ़ी क़रीब थे.
जूही बताती हैं, "उस महिला का नाम था बाला और वो उनके लिए कजरी गाया करती थीं, ’बरसे बदरिया सावन की’, गूंज उठी शहनाई का वो गाना उस कजरी की धुन पर आधारित था."

अपने कपड़े खुद धोते थे

बिस्मिल्लाह खाँ
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ अपने नाती-पोतों के साथ.
शुरू में बिस्मिल्लाह ख़ाँ को हवाई जहाज़ से सफ़र करने में डर लगता था. लेकिन बाद में ये डर जाता रहा और उन्होंने दुनिया के हर कोने में अपने कॉन्सर्ट किए.
सफलता उनके कदम चूमती गई, लेकिन उनके रहन-सहन का ढ़ंग हमेशा एक सा रहा, सादगी से भरपूर.
जाड़े में वो अपने घर के आँगन में चारपाई पर बैठते, धूप का आनंद लेते और उनके पीछे तार पर उनके कपड़े सूख रहे होते.
जूही सिन्हा कहती हैं, "ताउम्र उन्होंने अपने कपड़े ख़ुद धोए और वो हमेशा बिना प्रेस किए हुए कपड़े पहनते थे. उनके कमरे में एक चारपाई और बिना गद्दे वाली कुर्सी के अलावा कुछ नहीं था. उन्होंने कभी कार नहीं ख़रीदी और हमेशा रिक्शे से चले. उन्होंने कभी शराब नहीं पी. हाँ कभी-कभी वो विल्स की एकाध सिगरेट ज़रूर पी लिया करते थे."
जूही बताती हैं, "एक बार उनके एक प्रशंसक ने उनके कमरे में एक कूलर लगवाने की पेशकश की थी, जिसे बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने ये कह कर अस्वीकार कर दिया कि यही पैसे ग़रीब विधवाओं को दे दिए जाएं."

अमन के लिए शहनाई

बिस्मिल्लाह खाँ
बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने शहनाई को नौबतख़ानों और शादी की दहलीज़ से उठा कर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया.
उन्होंने सिर्फ़ अपने बूते पर शहनाई को एक आम साज़ से उठा कर एक सुसंस्कृत साज़ की श्रेणी में ला खड़ा किया. एक इंसान के रूप में वो धर्मनिरपेक्ष भारत के सबसे बड़े प्रतिरूप बने.
जब 2006 में बनारस के संकटमोचन मंदिर पर हमला हुआ तो बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने गंगा के किनारे पर जा कर शाँति और अमन के लिए शहनाई बजाई.
उन्हें अपने शहर के लोगों से कोई अपील नहीं करनी पड़ी. उनकी शहनाई से सिर्फ़ एक सुर निकला... महात्मा गांधी का प्रिय भजन... रघुपति राघव राजा राम....

'जब इंदिरा ने कहा मैं कूड़ा-करकट नहीं पढ़ती' @रेहान फ़ज़ल

शुक्रवार, 8 अगस्त, 1980. सुबह साढ़े आठ बजे. एक पुरानी काली-पीली डीएलवाई टैक्सी प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के निवास 1 सफ़दरजंग रोड की तरफ़ बढ़ रही थी. उसमें सवार एकमात्र शख़्स अपनी आधी अंग्रेज़ी और आधी बंबइया हिंदी में सरदार टैक्सी ड्राइवर को और तेज़ चलाने के लिए कह रहा था. उस शख़्स का नाम था डॉम मोरेस, संडे स्टैन्डर्ड अख़बार के संपादक.
उनके हाथ में अपनी ताज़ा किताब मिसेज़ गांधी की गिफ़्ट रैप्ड प्रति थी. डॉम ये किताब इंदिरा गांधी को भेंट करने जा रहे थे. मन ही मन वो सोच रहे थे कि 1 सफ़दरजंग रोड पर प्रेस का जमावड़ा होगा...अगले दिन के अख़बारों में उनकी इस किताब की चर्चा होगी...उनकी इंदिरा गाँधी के साथ तस्वीरें छपेंगीं...लेकिन हुआ ठीक इसका उल्टा....
विस्तार से पढ़े रेहान फ़ज़ल की विवेचना
इंदिरा गांधी
जब डॉम मोरेस हांपते-कांपते 1 सफ़दरजंग रोड पहुंचे तो वहाँ न तो कोई प्रेस थी और न कोई फ़ोटोग्राफ़र. उन्हें एक कोने में इंतज़ार करने के कह दिया गया. प्रधानमंत्री से उनकी मुलाक़ात का वक्त कब का निकल चुका था. अचानक प्रधानमंत्री के सचिव ने उन्हें सलाह दी कि प्रधानमंत्री अपने दफ़्तर की तरफ़ निकलने वाली हैं. बेहतर होगा कि जब वो अपनी कार में बैठ रही हों, तब आप उनसे मिल लें.
जैसे ही डॉम ने इंदिरा गाँधी को अपनी सफ़ेद एम्बेसडर कार की तरफ़ बढ़ते हुए देखा, वो उनकी तरफ़ बढ़े और उनका अभिवादन किया. इंदिरा गाँधी ने अत्यंत रूखेपन से कहा, 'कहिए.'

'मैं कूड़ा-करकट नहीं पढ़ती'

डॉम बोले, 'मैडम मैं ये किताब आप को भेंट करने आया हूँ.' 'किताब? कैसी किताब? मैं कूड़ा-करकट नहीं पढ़ती. इसको वापस ले जाइए.' ये कहकर इंदिरा गाँधी अपनी कार में बैठ गईं. सब कुछ सेकेंडों में ख़त्म हो गया.
डॉम मोरेस के लिए वो बहुत बड़ा धक्का था. वो वहाँ से सीधे बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग पर इंडियन एक्सप्रेस के संपादक अरुण शौरी के दफ़्तर पहुंचे और वहाँ जाने-माने प्रकाशक अशोक चोपड़ा के सामने, उन्हें ये पूरा किस्सा सुनाया.
अरुण ने कहा कि अब जब इंदिरा गाँधी ने ये किताब लेने से इंकार कर दिया है, आप इसे मुझे क्यों नहीं भेंट कर देते? डॉम ने वही किया. जब अरुण ने वो किताब खोली तो उसके पहले पन्ने पर लिखा था-'फॉर द सबजेक्ट ऑफ़ दीज़ वर्ड्स', डॉम.

लता मंगेशकर की नाराज़गी

आशो भोंसले, लता मंगेशकर
इस तरह के न जाने कितने किस्से अशोक चोपड़ा ने अपने संस्मरणों की किताब 'स्क्रैपबुक ऑफ़ मेमोरीज़' में बयान किए हैं. अपने चालीस साल के करियर में अशोक चोपड़ा को भारत के चोटी के लेखकों जैसे खुशवंत सिंह, शोभा डे, लापिएरे और कोलिंस और डॉम मोरेस जैसे लोगों को प्रकाशित करने का मौका मिला है.
अशोक बताते हैं कि डॉम से इंदिरा गाँधी की नाराज़गी की वजह शायद ये थी कि किसी ने इंदिरा गाँधी के कान भर दिए थे कि डॉम की इस किताब में उनके लिए अनाप-शनाप लिखा गया है.
जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं था क्योंकि विकास पब्लिशिंग हाउज़ इस किताब के भारत में एजेंट थे और अशोक उस समय विकास के लिए काम कर रहे थे. उन्होंने इस किताब के एक-एक अक्षर को बारीकी से पढ़ा था. इंदिरा गाँधी ने बाकायदा अपॉयंटमेंट देकर डॉम को बेइज़्ज़त करने के लिए अपने घर बुलाया था.
अशोक बताते हैं कि इसी तरह की घटना उनके एक और लेखक राजू भारतन के साथ हुई थी जब उन्होंने लता मंगेशकर पर एक किताब लिखी थी. अशोक ने जब प्रकाशक के तौर पर लता पर लिखी जीवनी की एक प्रति उन्हें फूलों के गुलदस्ते और मिठाई के डिब्बे के साथ भिजवाई तो उन्होंने उसे लेने से साफ़ इंकार कर दिया.
अनुराधा पौडवाल
बाद में लता को नज़दीक से जानने वाले राज सिंह डूंगरपुर ने अशोक चोपड़ा का बताया कि लता इस 'अनऑथोराइज़्ड' जीवनी से इतनी नाराज़ थीं कि वो उसके खिलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई करना चाहती थीं.
लता शायद इस बात से ख़फ़ा थी कि इस किताब में उनकी बहन आशा भोसले की काफ़ी तारीफ़ की गई थी और उनकी प्रतिद्वंद्वी अनुराधा पौडवाल को उनके ख़िलाफ़ बोलने के लिए ख़ासा मंच प्रदान किया गया था.

एमएफ़ हुसैन की ज़िद

एमएफ़ हुसैन
अशोक चोपड़ा एमएफ़ हुसैन को बाबा कहा करते थे. एक बार वो अपने खादी कुर्ते और नेहरू जैकेट में नंगे पैर अशोक के ओखला स्थित दफ़्तर पहुंचे. उस समय अशोक इंडिया टुडे के लिए काम कर रहे थे.
हुसैन ने कहा कि आपको केरल के ऊपर दस दिनों के अंदर एक कॉफ़ी टेबल बुक छापनी है जिसकी 400 प्रतियां मैं अपने साथ बेल्जियम ले जाना चाहता हूं जहां 'फ़ेस्टिवल ऑफ़ इंडिया' के दौरान उनका विमोचन होगा.
अशोक ने कहा, "बाबा दस दिनों के अंदर कॉफ़ी टेबल बुक को डिज़ाइन करना, छापना और बाउंड करना असंभव है."
हुसैन बोले, 'मैं ये सब कुछ नहीं जानता. मैं इतना जानता हूँ कि तुम इसे कर सकते हो.' अशोक ने हुसैन की वो मुराद पूरी की. उन्होंने हुसैन से कहा कि इस किताब को छापने के एवज़ में क्या आप मेरे लिए कुछ लाइनें लिख सकते हैं?
हुसैन ने कहा कि लिख तो नहीं पाऊंगा. हां तुम्हारे लिए एक चित्र ज़रूर बना सकता हूं. मुझे एक कागज़ और कुछ रंग दो.
एक प्रकाशक के दफ़्तर में कागज़ की तो कोई कमी नहीं थी लेकिन कोई रंग उपलब्ध नहीं थे. हुसैन ने अपनी वेस्टकोट की जेब से एक काला मार्कर पेन निकाला और पूछा, 'क्या बनाऊं तुम्हारे लिए?'
चोपड़ा ने जवाब दिया, 'किताब पढ़ती हुई एक खूबसूरत सी औरत.' हुसैन ने वो चित्र बनाया. उस पर अपने दस्तख़त किए. वो चित्र आज भी अशोक चोपड़ा की बैठक की शोभा बढ़ा रहा है.

आईएस जोहर की आत्मकथा

आईएस जोहर
एक बार मशहूर कॉमेडियन आईएस जोहर चोपड़ा के पास अपनी आत्मकथा लेकर आए. चोपड़ा कहते हैं कि 40 साल बाद भी उसके मसालेदार अंश उन्हें याद हैं. जोहर आम ज़िंदगी जीने के आदी नहीं थे.
उनकी आत्मकथा एक तरह से कागज़ पर ब्लू फ़िल्म थी. पहले वो उसे लेकर खुशवंत सिंह के पास गए और चाहते थे कि वो उसके कुछ अंश इलिस्ट्रेटेड वीकली में छापें.
लेकिन वो आत्मकथा खुशवंत सिंह जैसे बेबाक संपादक के स्तर से भी कहीं ज़्यादा बोल्ड थी और उसमें जोहर ने उन तमाम महिलाओं के नाम ले रखे थे जिनके उनके साथ कभी संबंध रहे थे.
खुशवंत ने उसे छापने से इंकार कर दिया और कहा कि आप अशोक चोपड़ा के पास जाकर अपना भाग्य आज़मा सकते हैं. अशोक कहते हैं कि दिलचस्प बात ये थी कि जोहर उसमें से एक शब्द भी हटाने के लिए तैयार नहीं थे.
जब उन्होंने भी उसे छापने में अपनी असमर्थता दिखाई तो जोहर ने झटके से पांडुलिपि उनके हाथ से छीनी और बोले, 'ऐसी चीज़ें छापने के लिए आदमी मे दम होना चाहिए. आप में वो नहीं है.'
अशोक कहते हैं कि मुझे पता नहीं कि उस आत्मकथा का क्या हुआ. लेकिन अगर आज वो मुझे मिले तो मैं शायद उसे छापने के बारे में सोचूं.

अमृता प्रीतम से लेकर साहिर का साथ

अशोक चोपड़ा, रेहान फ़ज़ल
बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ अशोक चोपड़ा.
उसी तरह के एक और दिलचस्प इंसान थे बलवंत गार्गी जिनको नज़दीक से जानने का मौका अशोक चोपड़ा को मिला था. गार्गी का आदर्श वाक्य था, "कहीं कोई कुछ छुपाने की कोशिश कर रहा है. वही ख़बर है. बाक़ी सब जनसंपर्क है."
गार्गी को हसीन लड़कियों का साथ बहुत पसंद था. कर्ज़न रोड पर उनका एक कमरे का फ़्लैट हुआ करता था. वहां वो धारीदार लुंगी-कुर्ता पहनकर पालथी मारकर गद्दे पर बैठा करते थे. उनके पीछे पिकासो की वर्ष 1902 की ब्लू न्यूड का फ़्रेम्ड प्रिंट लगा करता था.
वहां पर दिल्ली और मुंबई के नाट्य और साहित्य जगत की बड़ी-बड़ी हस्तियां हर शाम जमा होती थीं...अमृता प्रीतम से लेकर करतार सिंह दुग्गल, अलकाज़ी, मनोहर सिंह, अली सरदार जाफ़री और साहिर लुधियानवी तक.

अजीबोगरीब शर्त

अमृता प्रीतम, इमरोज़
चोपड़ा सतीश गुजराल के घर हुई एक पार्टी का ज़िक्र करते हैं जहां दिल्ली के साहित्य जगत की दस बड़ी हस्तियां मौजूद थीं. शराब और सिगरेट के दौर चल रहे थे.
एक महिला ने सतीश का हाथ पकड़ कर कहा, "तुम मुझे अपनी वो पेंटिंग क्यों नहीं भेंट में दे देते?" सतीश गुजराल ने बिना पलक झपकाए कहा, "मैं अपनी पेंटिंग किसी को भेंट नहीं करता. ये वेश्यावृत्ति से भी गई-गुज़री चीज़ है."
उस महिला ने कहा कि तुम्हारी पेंटिंगों का मक़सद क्या है अगर वो आम लोगों के पास नहीं पहुंच पातीं. उसने फिर इसरार किया कि सतीश वो पेंटिंग तुम मुझे दे दो. सतीश ने कहा, "ठीक है, लेकिन एक शर्त पर. तुम स्टूल पर खड़ी हो, अपने सारे कपड़े उतारो और उस पेंटिंग के पास जाकर उसे उठा लो."
वो महिला स्टूल के ऊपर चढ़ी. मौजूद सारे लोगों के ऊपर उसने नज़र दौड़ाई और एक-एक करके उसने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए....पहले साड़ी...पेटीकोट और फिर ब्लाउज़. उसके शरीर पर सिर्फ़ पैंटी और ब्रा रह गए.
तमाशबीनों में मौजूद महिलाओं ने चिल्लाकर कहा, "बस करो इतना काफ़ी है." सतीश ने तुरंत चिल्लाकर कहा, "नहीं अभी शर्त पूरी नहीं हुई."
वो महिला ये सुन कर हंसी, मॉडल की तरह घूमी और एक झटके में उसने अपने बाक़ी कपड़े भी उतार दिए. उस महिला ने अपने कपड़े उठाए. दूसरे कमरे में जाकर उन्हें पहना और उस पेंटिंग को उठाने बढ़ गई.
सतीश गुजराल को इसकी उम्मीद नहीं थी कि वो महिला इस हद तक चली जाएगी. उनका मुंह शर्म से लाल हो गया जैसे उन्हें ही सबके सामने नंगा कर दिया गया हो. उन्होंने पेंटिंग देने का अपना वादा निभाया लेकिन वो बहुत शर्मिंदा हुए.

दिलीप कुमार का चॉकलेट शौक़

सायरा बानो, दिलीप कुमार
अशोक चोपड़ा की किताब में दिलीप कुमार का बहुत मार्मिक चित्रण किया गया है. चोपड़ा के अनुसार भारतीय फ़िल्म जगत में सिर्फ़ दिलीप कुमार और लता मंगेशकर को ही लीजेंड कहा जा सकता है. जब चोपड़ा ने उनकी आत्मकथा 'द सब्सटेंस एंड द शैडो' को छापा तो वो उसकी पहली प्रति लेकर दिलीप कुमार के पास गए. दिलीप ने उनका हाथ ज़ोर से जकड़ लिया.
साएरा बानो की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा कि फ़ौरन मिठाई लाओ. लेकिन दिलीप ने कहा कि अशोक को चॉकलेट खिलाओ मेरे कमरे से मंगा कर. वो चॉकलेट के बहुत शौकीन थे. उन्हें ये भी याद रहता था कि पिछली मुलाकात में उन्होंने कौन सी चॉकलेट खिलाई थी.

जब बेगम अख़्तर ने पकड़े पैर

बेगम अख़्तर
अशोक चोपड़ा ने एक पार्टी का बहुत मार्मिक चित्रण किया है जो मशहूर लेखिका उमा वासुदेव के घर हुई थी. सब लोग खा-पी रहे थे कि अचानक वहां बेगम अख़्तर पहुंच गईं थीं. पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. वहां पर उन्होंने अपनी कुछ ग़ज़ले सुनाई. उस समय उमा की अपने पति एलके मल्होत्रा ने बन नहीं रही थी और वो एक-दूसरे से तलाक लेने के बारे में सोच रहे थे.
जब पार्टी ख़त्म हो गई तो उमा और अशोक, बेगम अख़्तर को छोड़ने उनकी कार तक आए. तभी बेगम अचानक झुकी और उन्होंने उमा वासुदेव के पांव पकड़ लिए और बोलीं, 'उमा मैं तुम्हारे पांव पड़ती हूं...ये शादी मत टूटने दो...बेटा ख़ुदा के वास्ते मत तोड़ो.'
उमा की आंखों से आंसू बह निकले. उन्होंने बेगम को ज़ोर से भींच लिया. अशोक बेगम अख़्तर को कार तक लेकर आए. डबडबाई आखों के साथ वो कार में बैठीं और आगे बढ़ गईं.
ये अशोक चोपड़ा और बेग़म अख़्तर की आख़िरी मुलाकात थी.

उदारीकरण के हीरो या बाबरी के विलेन? @रेहान फ़ज़ल

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव
राजीव गाँधी की हत्या के बाद जब शोक व्यक्त करने आए सभी विदेशी मेहमान चले गए तो सोनिया गाँधी ने इंदिरा गाँधी के पूर्व प्रधान सचिव पीएन हक्सर को 10, जनपथ तलब किया.
उन्होंने हक्सर से पूछा कि आपकी नज़र में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए कौन सबसे उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है.
हक्सर ने तत्कालीन उप राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा का नाम लिया. नटवर सिंह और अरुणा आसफ़ अली को ज़िम्मेदारी दी गई कि वो शंकरदयाल शर्मा का मन टटोलें.
शर्मा ने इन दोनों की बात सुनी और कहा कि वो सोनिया की इस पेशकश से अभिभूत और सम्मानित महसूस कर रहे हैं, लेकिन "भारत के प्रधानमंत्री का पद एक पूर्णकालिक ज़िम्मेदारी है. मेरी उम्र और स्वास्थ्य, मुझे देश के इस सबसे बढ़े पद के प्रति न्याय नहीं करने देगा."
इन दोनों ने वापस जाकर शंकरदयाल शर्मा का संदेश सोनिया गाँधी तक पहुंचाया.
एक बार फिर सोनिया ने हक्सर को तलब किया. इस बार हक्सर ने नरसिम्हा राव का नाम लिया. आगे की कहानी इतिहास है.

पढ़िए रेहान फ़ज़ल की विवेचना विस्तार से

वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर, बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ
वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर, बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ.
नरसिम्हा राव भारतीय राजनीति के ऊबड़-खाबड़ धरातल से ठोकरें खाते हुए सर्वोच्च पद पर पहुंचे थे. किसी पद को पाने के लिए उन्होंने किसी राजनीतिक पैराशूट का सहारा नहीं लिया था. जब वो प्रधानमंत्री बने तो उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं था.
उनसे पहले के प्रधानमंत्री आर्थिक सुधारों की बात तो करते थे, लेकिन उनमें न तो इसे लागू करने की हिम्मत थी और न ही चाह. राव का कांग्रेस और देश के लिए सबसे बड़ा योगदान था डॉक्टर मनमोहन सिंह की खोज.
जिस समय उन्होंने मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री बनाया, उस समय उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन वो देश के प्रधानमंत्री बनेंगे.
शिवराज पाटिल, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह.
लोकसभा के पूर्व स्पीकर शिवराज पाटिल और मनमोहन सिंह के साथ नरसिम्हा राव.
मशहूर पत्रकार और नरसिम्हा राव को नज़दीक से जानने वाली कल्याणी शंकर कहती हैं, "ये गलत धारणा है कि आर्थिक सुधारों के जनक मनमोहन सिंह हैं. नरसिम्हा राव मनमोहन सिंह को लाए थे. उन्होंने खुद पीछे रह कर सोचसमझ कर उन्हें आगे किया. पार्टी में उस समय उनका बहुत विरोध हुआ."
"1996 में चुनाव हारने के बाद बहुत लोगों ने कहा कि आर्थिक सुधारों के कारण हम हारे. जब वो प्रधानमंत्री बने तो भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बुरी हालत में थी. यशवंत सिन्हा आपको बताएंगे कि भारत के पास दो हफ़्ते चलाने लायक भी विदेशी मुद्रा भंडार नहीं था. उसके लिए उन्हें बाहर से पैसा लाना ही लाना था. उसके लिए वो एक विश्वसनीय चेहरा ढ़ूंढ रहे थे."
"उनकी पहली पसंद मशहूर अर्थशास्त्री आईजी पटेल थे, लेकिन उन्होंने दिल्ली आने से मना कर दिया. फिर उन्होंने मनमोहन सिंह को बुलाया, क्योंकि विश्व बैंक से पैसा लाने और उससे बातचीत के लिए वो ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे."

मनमोहन को राव का समर्थन

नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह
मॉरिशस के प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ और मनमोहन सिंह के साथ नरसिम्हा राव .
ये वही मनमोहन सिंह थे जिनके नेतृत्व वाले योजना आयोग को राजीव गाँधी ने एक बार ’बंच ऑफ़ जोकर्स’ कहा था और वो इससे इतने आहत हुए थे कि उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा देने का मन बना लिया था.
एक ज़माने में विश्वनाथ प्रताप सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके प्रेम शंकर झा कहते हैं, "राव अपने मंत्रियों से काम करवाते थे और पीछे से उनका सपोर्ट करते थे. उस समय भी कांग्रेस के अंदर एक जिंजर ग्रुप था जो नेहरुवियन सोशलिज़्म का नाम लेकर उन पर ग़द्दारी का आरोप लगाते थे."
वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा बीबीसी हिंदी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ
वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा बीबीसी हिंदी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ
"मनमोहन सिंह कहते थे कि मंत्रिमंडल में हर कोई उनके ख़िलाफ़ था, लेकिन उनके पास हमेशा एक शख़्स का समर्थन होता था... वो थे प्रधानमंत्री राव. जब उनको यूरो मनी ने वर्ष 1994 में सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री का पुरस्कार दिया तो उन्होंने पुरस्कार समारोह में कहा- इसका श्रेय नरसिम्हा राव को दिया जाना चाहिए."
लेकिन नरसिम्हा राव के बढ़ते राजनीतिक ग्राफ़ को बहुत बड़ा धक्का तब लगा जब 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया और वो कुछ नहीं कर पाए.
कुलदीप नैय्यर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "मुझे जानकारी है कि राव की बाबरी मस्जिद विध्वंस में भूमिका थी. जब कारसेवक मस्जिद को गिरा रहे थे, तब वो अपने निवास पर पूजा में बैठे हुए थे. वो वहाँ से तभी उठे जब मस्जिद का आख़िरी पत्थर हटा दिया गया."
अर्जुन सिंह
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह.
"लगभग उसी समय उनके मंत्रिमंडल के सदस्य अर्जुन सिंह ने पंजाब के मुक्तसर शहर से उन्हें फ़ोन किया. उन्हें बताया कि नरसिम्हा राव कोई फ़ोन नहीं ले रहे हैं. शाम छह बजे राव ने अपने निवास स्थान पर मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई."

बाबरी मस्जिद

बाबरी मस्जिद
अर्जुन सिंह अपनी आत्मकथा 'ए ग्रेन ऑफ़ सैंड इन द आर ग्लास ऑफ़ टाइम' में लिखते हैं, "पूरी बैठक के दौरान नरसिम्हा राव इतने हैरान थे कि उनके मुंह से एक शब्द तक नहीं निकला. सबकी निगाहें जाफ़र शरीफ़ की तरफ मुड़ गईं मानों उनसे कह रही हों कि आप ही कुछ कहिए. जाफ़र शरीफ़ ने कहा इस घटना की देश, सरकार और कांग्रेस पार्टी को भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी."
"माखनलाल फ़ोतेदार ने उसी समय रोना शुरू कर दिया लेकिन राव बुत की तरह चुप बैठे रहे."
दि इनसाइडर
राजनीतिक विश्लेषक राम बहादुर राय कहते हैं, "जब वर्ष 1991 में ये लगने लगा कि बाबरी मस्जिद पर ख़तरा मंडरा रहा है, तब भी उन्होंने इसे कम करने की कोई कोशिश नहीं की. राव के प्रेस सलाहकार रहे पीवीआरके प्रसाद ने एक क़िताब लिखी है जिसमें वो बताते हैं कि कैसे राव ने मस्जिद गिरने दी. वो वहाँ पर मंदिर बनाने के लिए उत्सुक थे, इसलिए उन्होंने रामालय ट्रस्ट बनवाया."
"मस्जिद गिराए जाने के बाद तीन बड़े पत्रकार निखिल चक्रवर्ती, प्रभाष जोशी और आरके मिश्र नरसिम्हा राव से मिलने गए. मैं भी उनके साथ था. ये लोग जानना चाहते थे कि 6 दिसंबर को आपने ऐसा क्यों होने दिया. मुझे याद है कि सबको सुनने के बाद नरसिम्हा राव ने कहा- क्या आप लोग ऐसा समझते हैं कि मुझे राजनीति नहीं आती?"
राय कहते हैं, "मैं इसका अर्थ ये निकालता हूँ कि अपनी राजनीति के तहत और ये सोचकर कि अगर बाबरी मस्जिद ढहा दी जाएगी तो भारतीय जनता पार्टी की मंदिर की राजनीति हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी, उन्होंने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया."

राजनीतिक ग़लती

पीवी नरसिम्हा राव
"मेरा मानना है कि राव किसी ग़लतफ़हमी में नहीं, भारतीय जनता पार्टी से साठगाँठ के कारण नहीं बल्कि इस विचार से कि उनसे वो ये मुद्दा छीन सकते हैं, उन्होंने एक एक कदम इस तरह से उठाया कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस हो जाए."
लेकिन राव की नजदीकी कल्याणी शंकर का मानना है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में नरसिम्हा राव की भूमिका को ज़्यादा से ज़्यादा एक 'राजनीतिक मिसकैलकुलेशन' कहा जा सकता है.
वे कहती हैं, "आडवाणी और वाजपेयी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि कुछ होगा नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र को रिसीवरशिप लेने से मना कर दिया. ये राज्य का अधिकार है कि वो वहाँ पर सुरक्षा बलों को भेजे या नहीं. कल्याण सिंह ने वहाँ सुरक्षा बल भेजने ही नहीं दिया."
नरसिम्हा राव पर अपनी सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत देने के आरोप भी लगे. लेकिन उनकी सबसे ज़्यादा किरकिरी उस समय हुई जब शेयर दलाल हर्षद मेहता ने उन्हें एक सूटकेस में एक करोड़ रुपए देने की बात जगज़ाहिर की.

सूटकेस का राज़

हर्षद मेहता
वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी के साथ हर्षद मोहता.
लेकिन प्रेमशंकर झा इस मामले में नरसिम्हा राव को क्लीन चिट देते हैं, "केस ये था कि जब हर्षद मेहता ने राव को नोटों से भरा सूटकेस दिया तो उन्होंने उसे खोल कर देखा. राम जेठमलानी ने डिटेल्स दिए थे कि इस समय हम प्रधानमंत्री निवास के अंदर गए थे. जब मुझे टाइमिंग मिल गई तो मैंने जाँच की. पता लगा कि उसी दिन उसी समय आगा शाही के नेतृत्व में पाकिस्तान का एक प्रतिनिधि मंडल नरसिम्हा राव के सामने बैठा हुआ था."
"मेहता के आने और आगा शाही से मीटिंग के बीच जो समय रह गया था, उस दौरान ये सूटकेस राव तक नहीं पहुंचाया जा सकता था. मैं चूंकि पीएमओ में काम कर चुका हूँ इसलिए मुझे पता है कि इस तरह की प्रक्रिया में कितना समय लगता है. एक-एक सेकंड का हिसाब करने पर पता चला कि हर्षद 11 बजकर 10 मिनट से पहले किसी भी हालत में प्रधानमंत्री से नहीं मिल सकते थे और ठीक 11 बजे आगा शाही साहब प्रधानमंत्री से मिलने पहुंच गए थे."
राव पर ये भी आरोप लगे कि वो साधु संतों और तांत्रिकों के प्रभाव में थे, वो उनसे मनमर्ज़ी काम करवा सकते थे.

चंद्रास्वामी का असर

नरसिम्हा राव, चंद्रशेखर, आडवाणी
नरसिम्हा राव चंद्रशेखर, लालकृष्ण आडवाणी और एचडी देवगौड़ा के साथ.
राम बहादुर राय कहते हैं, "वो तांत्रिक चंद्रास्वामी के बहुत अधिक प्रभाव में थे. ये भी कहा जाता है कि वो जो चाहते थे उनसे करवा लेते थे. उन्होंने चंद्रास्वामी के कहने पर रामलखन यादव को मंत्री बनाया था. मुझे याद है कि जब रामलखन यादव को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई तो चंद्रा स्वामी मुंबई में थे. वहाँ उन्होंने बाक़ायदा ऐलान किया- मैं दिल्ली जा रहा हूँ रामलखन यादव को मंत्री बनवाने."
हालांकि नरसिम्हा राव को कांग्रेस और देश का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी सोनिया गांधी ने ही दी थी, लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही दोनों के बीच ग़लतफ़हमियाँ पैदा हो गईं.
सोनिया गांधी पर किताब लिखने वाले राशिद क़िदवई कहते हैं, "राव राजनीतिक व्यक्ति थे. वो भी सोनिया गाँधी का इस्तेमाल करना चाहते थे. जब भी मंत्रिमंडल में फेरबदल करना चाहते थे, वो उनसे सलाह मशविरा करते थे. दोनों एक दूसरे का आदर भी करते थे."
सोनिया गाँधी
"जब राजीव गांधी फ़ाउंडेशन की बैठक की बात आई तो राव समझ गए कि सोनिया को बैठक के लिए 7 रेसकोर्स रोड आने में दिक्कत है. वहाँ से उनकी बहुत सी यादें जुड़ी हुई थीं. उन्होंने खुद पेशकश की थी वो इस बैठक के लिए सोनिया के निवास स्थान 10 जनपथ आएंगे."
"ये उनका बड़प्पन था लेकिन बीच के लोग जैसे अर्जुन सिंह, माखनलाल फ़ोतेदार और विंसेंट जॉर्ज उनके बीच ग़लतफ़हमियाँ पैदा करने की कोशिश करते थे. नरसिम्हा राव भी दूध के धुले नहीं थे. वो किसी की कठपुतली बनकर नहीं रहना चाहते थे. सोनिया गाँधी को उस समय राजनीति की इतनी समझ नहीं थी. इसलिए धीरे धीरे उनके बीच दूरियाँ बढ़ती चली गईं."
कुछ भी हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि नरसिम्हा राव ऊँचे दर्जे के बुद्धिजीवी थे. उन्हें 17 भाषाएं आती थीं और नई चीज़ों को सीखने का उनमें गज़ब का जज़्बा था.

विद्वान

नरसिम्हा राव
कल्याणी शंकर कहती हैं कि ऊँचे स्तर की स्पेनिश सीखने के लिए उन्होंने स्पेन में रहने का फ़ैसला किया था. वर्ष 1985-86 में राजीव गांधी का अक्सर मज़ाक उड़ाया जाता था कि वो कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं... बीसवीं सदी की बात कर रहे हैं.
नरसिम्हा राव ने 70 साल की उम्र में कंप्यूटर सीखा. वो हमेशा कंप्यूटर पर काम करते थे और जैसे ही कोई नया कंप्यूटर आता था, वो उसे ख़रीद लेते थे. संगीत के भी वो बहुत शौकीन थे. ख़ुद भी गाते थे. वो अक्सर हैदराबाद से कलाकारों को बुलाकर अपने घर पर कॉन्सर्ट किया करते थे.
लेकिन उनके जीवन की साँध्यबेला में स्वयं उनकी पार्टी ने उनसे किनारा कर लिया. वो बहुत एकाकी और अपमानित होकर इस दुनिया से विदा हुए.
नरसिम्हा राव
न सिर्फ़ उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया गया, उनके पार्थिव शरीर को भी कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड के अंदर नहीं आने दिया गया. उन पर डाक टिकट जारी करने की मांग नहीं हुई. न ही किसी ने उन्हें भारत रत्न देने की मांग की.
वर्षगाँठ और बरसी पर भी उनकी चर्चा करना ज़रूरी नहीं समझा गया. शायद कुछ समय बाद इतिहास उनका सही मूल्यांकन कर पाए.