Saturday, 4 April 2015

उदारीकरण के हीरो या बाबरी के विलेन? @रेहान फ़ज़ल

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव
राजीव गाँधी की हत्या के बाद जब शोक व्यक्त करने आए सभी विदेशी मेहमान चले गए तो सोनिया गाँधी ने इंदिरा गाँधी के पूर्व प्रधान सचिव पीएन हक्सर को 10, जनपथ तलब किया.
उन्होंने हक्सर से पूछा कि आपकी नज़र में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए कौन सबसे उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है.
हक्सर ने तत्कालीन उप राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा का नाम लिया. नटवर सिंह और अरुणा आसफ़ अली को ज़िम्मेदारी दी गई कि वो शंकरदयाल शर्मा का मन टटोलें.
शर्मा ने इन दोनों की बात सुनी और कहा कि वो सोनिया की इस पेशकश से अभिभूत और सम्मानित महसूस कर रहे हैं, लेकिन "भारत के प्रधानमंत्री का पद एक पूर्णकालिक ज़िम्मेदारी है. मेरी उम्र और स्वास्थ्य, मुझे देश के इस सबसे बढ़े पद के प्रति न्याय नहीं करने देगा."
इन दोनों ने वापस जाकर शंकरदयाल शर्मा का संदेश सोनिया गाँधी तक पहुंचाया.
एक बार फिर सोनिया ने हक्सर को तलब किया. इस बार हक्सर ने नरसिम्हा राव का नाम लिया. आगे की कहानी इतिहास है.

पढ़िए रेहान फ़ज़ल की विवेचना विस्तार से

वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर, बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ
वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर, बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ.
नरसिम्हा राव भारतीय राजनीति के ऊबड़-खाबड़ धरातल से ठोकरें खाते हुए सर्वोच्च पद पर पहुंचे थे. किसी पद को पाने के लिए उन्होंने किसी राजनीतिक पैराशूट का सहारा नहीं लिया था. जब वो प्रधानमंत्री बने तो उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं था.
उनसे पहले के प्रधानमंत्री आर्थिक सुधारों की बात तो करते थे, लेकिन उनमें न तो इसे लागू करने की हिम्मत थी और न ही चाह. राव का कांग्रेस और देश के लिए सबसे बड़ा योगदान था डॉक्टर मनमोहन सिंह की खोज.
जिस समय उन्होंने मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री बनाया, उस समय उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन वो देश के प्रधानमंत्री बनेंगे.
शिवराज पाटिल, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह.
लोकसभा के पूर्व स्पीकर शिवराज पाटिल और मनमोहन सिंह के साथ नरसिम्हा राव.
मशहूर पत्रकार और नरसिम्हा राव को नज़दीक से जानने वाली कल्याणी शंकर कहती हैं, "ये गलत धारणा है कि आर्थिक सुधारों के जनक मनमोहन सिंह हैं. नरसिम्हा राव मनमोहन सिंह को लाए थे. उन्होंने खुद पीछे रह कर सोचसमझ कर उन्हें आगे किया. पार्टी में उस समय उनका बहुत विरोध हुआ."
"1996 में चुनाव हारने के बाद बहुत लोगों ने कहा कि आर्थिक सुधारों के कारण हम हारे. जब वो प्रधानमंत्री बने तो भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बुरी हालत में थी. यशवंत सिन्हा आपको बताएंगे कि भारत के पास दो हफ़्ते चलाने लायक भी विदेशी मुद्रा भंडार नहीं था. उसके लिए उन्हें बाहर से पैसा लाना ही लाना था. उसके लिए वो एक विश्वसनीय चेहरा ढ़ूंढ रहे थे."
"उनकी पहली पसंद मशहूर अर्थशास्त्री आईजी पटेल थे, लेकिन उन्होंने दिल्ली आने से मना कर दिया. फिर उन्होंने मनमोहन सिंह को बुलाया, क्योंकि विश्व बैंक से पैसा लाने और उससे बातचीत के लिए वो ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे."

मनमोहन को राव का समर्थन

नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह
मॉरिशस के प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ और मनमोहन सिंह के साथ नरसिम्हा राव .
ये वही मनमोहन सिंह थे जिनके नेतृत्व वाले योजना आयोग को राजीव गाँधी ने एक बार ’बंच ऑफ़ जोकर्स’ कहा था और वो इससे इतने आहत हुए थे कि उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा देने का मन बना लिया था.
एक ज़माने में विश्वनाथ प्रताप सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके प्रेम शंकर झा कहते हैं, "राव अपने मंत्रियों से काम करवाते थे और पीछे से उनका सपोर्ट करते थे. उस समय भी कांग्रेस के अंदर एक जिंजर ग्रुप था जो नेहरुवियन सोशलिज़्म का नाम लेकर उन पर ग़द्दारी का आरोप लगाते थे."
वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा बीबीसी हिंदी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ
वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा बीबीसी हिंदी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ
"मनमोहन सिंह कहते थे कि मंत्रिमंडल में हर कोई उनके ख़िलाफ़ था, लेकिन उनके पास हमेशा एक शख़्स का समर्थन होता था... वो थे प्रधानमंत्री राव. जब उनको यूरो मनी ने वर्ष 1994 में सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री का पुरस्कार दिया तो उन्होंने पुरस्कार समारोह में कहा- इसका श्रेय नरसिम्हा राव को दिया जाना चाहिए."
लेकिन नरसिम्हा राव के बढ़ते राजनीतिक ग्राफ़ को बहुत बड़ा धक्का तब लगा जब 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया और वो कुछ नहीं कर पाए.
कुलदीप नैय्यर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "मुझे जानकारी है कि राव की बाबरी मस्जिद विध्वंस में भूमिका थी. जब कारसेवक मस्जिद को गिरा रहे थे, तब वो अपने निवास पर पूजा में बैठे हुए थे. वो वहाँ से तभी उठे जब मस्जिद का आख़िरी पत्थर हटा दिया गया."
अर्जुन सिंह
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह.
"लगभग उसी समय उनके मंत्रिमंडल के सदस्य अर्जुन सिंह ने पंजाब के मुक्तसर शहर से उन्हें फ़ोन किया. उन्हें बताया कि नरसिम्हा राव कोई फ़ोन नहीं ले रहे हैं. शाम छह बजे राव ने अपने निवास स्थान पर मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई."

बाबरी मस्जिद

बाबरी मस्जिद
अर्जुन सिंह अपनी आत्मकथा 'ए ग्रेन ऑफ़ सैंड इन द आर ग्लास ऑफ़ टाइम' में लिखते हैं, "पूरी बैठक के दौरान नरसिम्हा राव इतने हैरान थे कि उनके मुंह से एक शब्द तक नहीं निकला. सबकी निगाहें जाफ़र शरीफ़ की तरफ मुड़ गईं मानों उनसे कह रही हों कि आप ही कुछ कहिए. जाफ़र शरीफ़ ने कहा इस घटना की देश, सरकार और कांग्रेस पार्टी को भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी."
"माखनलाल फ़ोतेदार ने उसी समय रोना शुरू कर दिया लेकिन राव बुत की तरह चुप बैठे रहे."
दि इनसाइडर
राजनीतिक विश्लेषक राम बहादुर राय कहते हैं, "जब वर्ष 1991 में ये लगने लगा कि बाबरी मस्जिद पर ख़तरा मंडरा रहा है, तब भी उन्होंने इसे कम करने की कोई कोशिश नहीं की. राव के प्रेस सलाहकार रहे पीवीआरके प्रसाद ने एक क़िताब लिखी है जिसमें वो बताते हैं कि कैसे राव ने मस्जिद गिरने दी. वो वहाँ पर मंदिर बनाने के लिए उत्सुक थे, इसलिए उन्होंने रामालय ट्रस्ट बनवाया."
"मस्जिद गिराए जाने के बाद तीन बड़े पत्रकार निखिल चक्रवर्ती, प्रभाष जोशी और आरके मिश्र नरसिम्हा राव से मिलने गए. मैं भी उनके साथ था. ये लोग जानना चाहते थे कि 6 दिसंबर को आपने ऐसा क्यों होने दिया. मुझे याद है कि सबको सुनने के बाद नरसिम्हा राव ने कहा- क्या आप लोग ऐसा समझते हैं कि मुझे राजनीति नहीं आती?"
राय कहते हैं, "मैं इसका अर्थ ये निकालता हूँ कि अपनी राजनीति के तहत और ये सोचकर कि अगर बाबरी मस्जिद ढहा दी जाएगी तो भारतीय जनता पार्टी की मंदिर की राजनीति हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी, उन्होंने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया."

राजनीतिक ग़लती

पीवी नरसिम्हा राव
"मेरा मानना है कि राव किसी ग़लतफ़हमी में नहीं, भारतीय जनता पार्टी से साठगाँठ के कारण नहीं बल्कि इस विचार से कि उनसे वो ये मुद्दा छीन सकते हैं, उन्होंने एक एक कदम इस तरह से उठाया कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस हो जाए."
लेकिन राव की नजदीकी कल्याणी शंकर का मानना है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में नरसिम्हा राव की भूमिका को ज़्यादा से ज़्यादा एक 'राजनीतिक मिसकैलकुलेशन' कहा जा सकता है.
वे कहती हैं, "आडवाणी और वाजपेयी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि कुछ होगा नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र को रिसीवरशिप लेने से मना कर दिया. ये राज्य का अधिकार है कि वो वहाँ पर सुरक्षा बलों को भेजे या नहीं. कल्याण सिंह ने वहाँ सुरक्षा बल भेजने ही नहीं दिया."
नरसिम्हा राव पर अपनी सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत देने के आरोप भी लगे. लेकिन उनकी सबसे ज़्यादा किरकिरी उस समय हुई जब शेयर दलाल हर्षद मेहता ने उन्हें एक सूटकेस में एक करोड़ रुपए देने की बात जगज़ाहिर की.

सूटकेस का राज़

हर्षद मेहता
वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी के साथ हर्षद मोहता.
लेकिन प्रेमशंकर झा इस मामले में नरसिम्हा राव को क्लीन चिट देते हैं, "केस ये था कि जब हर्षद मेहता ने राव को नोटों से भरा सूटकेस दिया तो उन्होंने उसे खोल कर देखा. राम जेठमलानी ने डिटेल्स दिए थे कि इस समय हम प्रधानमंत्री निवास के अंदर गए थे. जब मुझे टाइमिंग मिल गई तो मैंने जाँच की. पता लगा कि उसी दिन उसी समय आगा शाही के नेतृत्व में पाकिस्तान का एक प्रतिनिधि मंडल नरसिम्हा राव के सामने बैठा हुआ था."
"मेहता के आने और आगा शाही से मीटिंग के बीच जो समय रह गया था, उस दौरान ये सूटकेस राव तक नहीं पहुंचाया जा सकता था. मैं चूंकि पीएमओ में काम कर चुका हूँ इसलिए मुझे पता है कि इस तरह की प्रक्रिया में कितना समय लगता है. एक-एक सेकंड का हिसाब करने पर पता चला कि हर्षद 11 बजकर 10 मिनट से पहले किसी भी हालत में प्रधानमंत्री से नहीं मिल सकते थे और ठीक 11 बजे आगा शाही साहब प्रधानमंत्री से मिलने पहुंच गए थे."
राव पर ये भी आरोप लगे कि वो साधु संतों और तांत्रिकों के प्रभाव में थे, वो उनसे मनमर्ज़ी काम करवा सकते थे.

चंद्रास्वामी का असर

नरसिम्हा राव, चंद्रशेखर, आडवाणी
नरसिम्हा राव चंद्रशेखर, लालकृष्ण आडवाणी और एचडी देवगौड़ा के साथ.
राम बहादुर राय कहते हैं, "वो तांत्रिक चंद्रास्वामी के बहुत अधिक प्रभाव में थे. ये भी कहा जाता है कि वो जो चाहते थे उनसे करवा लेते थे. उन्होंने चंद्रास्वामी के कहने पर रामलखन यादव को मंत्री बनाया था. मुझे याद है कि जब रामलखन यादव को मंत्री पद की शपथ दिलाई गई तो चंद्रा स्वामी मुंबई में थे. वहाँ उन्होंने बाक़ायदा ऐलान किया- मैं दिल्ली जा रहा हूँ रामलखन यादव को मंत्री बनवाने."
हालांकि नरसिम्हा राव को कांग्रेस और देश का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी सोनिया गांधी ने ही दी थी, लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही दोनों के बीच ग़लतफ़हमियाँ पैदा हो गईं.
सोनिया गांधी पर किताब लिखने वाले राशिद क़िदवई कहते हैं, "राव राजनीतिक व्यक्ति थे. वो भी सोनिया गाँधी का इस्तेमाल करना चाहते थे. जब भी मंत्रिमंडल में फेरबदल करना चाहते थे, वो उनसे सलाह मशविरा करते थे. दोनों एक दूसरे का आदर भी करते थे."
सोनिया गाँधी
"जब राजीव गांधी फ़ाउंडेशन की बैठक की बात आई तो राव समझ गए कि सोनिया को बैठक के लिए 7 रेसकोर्स रोड आने में दिक्कत है. वहाँ से उनकी बहुत सी यादें जुड़ी हुई थीं. उन्होंने खुद पेशकश की थी वो इस बैठक के लिए सोनिया के निवास स्थान 10 जनपथ आएंगे."
"ये उनका बड़प्पन था लेकिन बीच के लोग जैसे अर्जुन सिंह, माखनलाल फ़ोतेदार और विंसेंट जॉर्ज उनके बीच ग़लतफ़हमियाँ पैदा करने की कोशिश करते थे. नरसिम्हा राव भी दूध के धुले नहीं थे. वो किसी की कठपुतली बनकर नहीं रहना चाहते थे. सोनिया गाँधी को उस समय राजनीति की इतनी समझ नहीं थी. इसलिए धीरे धीरे उनके बीच दूरियाँ बढ़ती चली गईं."
कुछ भी हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि नरसिम्हा राव ऊँचे दर्जे के बुद्धिजीवी थे. उन्हें 17 भाषाएं आती थीं और नई चीज़ों को सीखने का उनमें गज़ब का जज़्बा था.

विद्वान

नरसिम्हा राव
कल्याणी शंकर कहती हैं कि ऊँचे स्तर की स्पेनिश सीखने के लिए उन्होंने स्पेन में रहने का फ़ैसला किया था. वर्ष 1985-86 में राजीव गांधी का अक्सर मज़ाक उड़ाया जाता था कि वो कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं... बीसवीं सदी की बात कर रहे हैं.
नरसिम्हा राव ने 70 साल की उम्र में कंप्यूटर सीखा. वो हमेशा कंप्यूटर पर काम करते थे और जैसे ही कोई नया कंप्यूटर आता था, वो उसे ख़रीद लेते थे. संगीत के भी वो बहुत शौकीन थे. ख़ुद भी गाते थे. वो अक्सर हैदराबाद से कलाकारों को बुलाकर अपने घर पर कॉन्सर्ट किया करते थे.
लेकिन उनके जीवन की साँध्यबेला में स्वयं उनकी पार्टी ने उनसे किनारा कर लिया. वो बहुत एकाकी और अपमानित होकर इस दुनिया से विदा हुए.
नरसिम्हा राव
न सिर्फ़ उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया गया, उनके पार्थिव शरीर को भी कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड के अंदर नहीं आने दिया गया. उन पर डाक टिकट जारी करने की मांग नहीं हुई. न ही किसी ने उन्हें भारत रत्न देने की मांग की.
वर्षगाँठ और बरसी पर भी उनकी चर्चा करना ज़रूरी नहीं समझा गया. शायद कुछ समय बाद इतिहास उनका सही मूल्यांकन कर पाए.

Friday, 3 April 2015

ली कुआन की विरासत के सबक @एन के सिंह

ली कुआन यू की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए मैं पिछले दिनों सिंगापुर में था। सिंगापुर के संस्थापक पिता के रूप में वह हालिया इतिहास में सबसे लंबे समय तक (1959-1990) प्रधानमंत्री रहे। दो साल पहले तक, 89 साल की आयु में भी वह नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होकर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की महत्वपूर्ण सेवा की है। बल्कि रविवार को हमारे यहां भी राष्ट्रीय शोक घोषित था। हमारे इस व्यवहार ने सिंगापुर के नागरिकों के दिलो-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ा। सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज यू ने, जिनके साथ मैंने कुछ समय बिताया, मुझे बताया कि इस प्रतीकात्मक कदम ने उन सबके दिलों पर गहरा असर डाला है और वे इसके बड़े एहसानमंद हैं। मोदी का यह स्वनिर्णय उनके उच्च नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। नेता न सिर्फ अपने अनुभवों से उभरते हैं, बल्कि सही मौके की समझ भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। सही समय और सही अवसर को चुनना एक निर्णायक नेतृत्व की विशेषता है।

हर कोई जानता है कि इंदिरा गांधी और ली कुआन के कूटनीतिक संबंध गर्मजोशी से भरे नहीं थे। भारत के पास तिरस्कार का यह भाव था कि एक छोटे-से शहर जैसे देश के नेता को हम जैसे जटिल देश को आर्थिक उदारीकरण का पाठ नहीं पढ़ाना चाहिए। हम उनके परामर्श को संशय भरी निगाहों से देखते थे। खुद ली कुआन भी भारत को लेकर निराशा का भाव रखते थे, क्योंकि भारत उन अवसरों का फायदा नहीं उठा रहा था, जो उसकी तकदीर बदल सकते थे। 1990 के दशक में हमारे यहां उदारीकरण की नीति लागू होने के बाद ली कुआन के विचारों में कुछ-कुछ परिवर्तन आया। बीते 20 वर्षों में भारत-सिंगापुर की दोस्ती और साझेदारी सार्थक रूप से गहरी हुई है। भारत उनके लिए लोकतांत्रिक ढांचे के तहत एक बड़ी जनसांख्यिकी व विशाल मांग वाला देश था, जो प्रबंधकीय कौशल व प्रौद्योगिकी का एक बड़ा बाजार था।

यह कोई रहस्य नहीं है कि साल 1965 में मलयेशिया से सिंगापुर के बंटवारे के बाद यह तेजी से तीसरी दुनिया के देशों से विकसित अर्थव्यवस्था की कतार में आ गया। इसकी प्रति व्यक्ति आय, जो साल 1965 में 540 अमेरिकी डॉलर थी, वह साल 2014 में 54,040 डॉलर पर पहुंच गई। वह कारोबार के लिहाज से सबसे सुभीते वाले देशों की सूची में लगातार शीर्ष पर रहा है, साथ ही सफल सार्वजनिक-निजी भागीदारी का भी एक उदाहरण है। इसके बावजूद, कई लोग सिंगापुर को परिवार संचालित तंत्र मानते हैं। समयबद्ध चुनाव और सक्रिय पार्लियामेंट के बावजूद इसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को दबाया, मीडिया को अनुशासन में रहने को बाध्य किया। देश का युवा तबका इन नियंत्रणों के प्रति लगातार विरोध जताता रहा है। एक ऐसे देश में, जिसका कुल भौगोलिक दायरा 700 वर्ग किलोमीटर से अधिक नहीं है और जिसकी 50 लाख की जनसंख्या बूढ़ी हो रही है, निरंतर प्रवास ने सामाजिक बेचैनी को बढ़ाया है।

बेबाकी के साथ कहें, तो सिंगापुर की सफलता की कहानी में भारत के लिए चार सबक हैं। पहला,  सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को यदि भरपूर स्वायत्तता दी जाए, उन्हें उनसे संबंधित ज्ञान और उम्दा तकनीकी मुहैया कराया जाए, तो उत्पादकता को बढ़ाना और विकास करना संभव है। सिंगापुर एयरलाइंस, चांगी एयरपोर्ट और महत्वपूर्ण आधारभूत परियोजनाओं को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी टेमासेक संचालित करती है। सार्वजनिक क्षेत्र को सुचारु रूप में और सक्षम तरीके से चलाना तथा उसकी दक्षता बढ़ाते सिद्धांत व उत्पादकता सचमुच दोहराने के लायक हैं। दूसरा, सिंगापुर शहरी योजना और जल-प्रबंधन तंत्र के मामले में एक शानदार उदाहरण है। वहां एक बूंद पानी भी बरबाद नहीं होता। पानी की जितनी मात्र उपयोग में आती है, उसका रिसाइकिल किया जाता है और साथ ही, वर्षा-जल का प्रभावी परिशोधन होता है। जल संरक्षण तंत्र और शहरी योजना, दोनों हमारे लिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि हम पानी की कमी और अनियोजित शहरीकरण की समस्याओं से लगातार जूझ रहे हैं।

सिंगापुर सबसे स्मार्ट सिटी है। इस वास्तविकता को आंध्र पद्रेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तुरंत भांपा और राज्य की नई राजधानी अमरावती के निर्माण में सिंगापुर से मदद मांगी है। हम शहरों के लिए ऐसा कर सकते हैं और स्मार्ट शहरों को अधिक ठोस सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं। तीसरा,  नियंत्रित पूंजीवाद के लिए अक्सर चीन का उदाहरण पेश किया जाता है। इनोवेटिव संस्कृति में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन, प्रौद्योगिकी के उत्थान, बड़े प्रबंधकीय कौशल और सार्वजनिक संसाधनों से उनको जोड़ने की कला, ये सब मिलकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी का मॉडल तैयार करते हैं, जिसकी हमें जरूरत है। जोखिम-निर्धारण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के दुर्गंध को दूर करने व तमाम हितधारकों को पर्याप्त लाभ सुनिश्चित करने के संदर्भ में भारत अपने पीपीपी मॉडल को व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा है।

चौथा, श्रम कानूनों को बनाने में सिंगापुर का पारदर्शी प्रशासकीय तंत्र भारत के लिए सीख है। यहां पर अब श्रम-कानूनों में सुधार के मुद्दे ने नीति-नियंताओं का ध्यान आकृष्ट किया है। इसके अलावा, जहां भारत में मजदूर संगठनों की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति निवेश घटाती है, वहीं सिंगापुर इस शक्ति का इस्तेमाल शिक्षा और अन्य सामाजिक सेवाओं को सुधारने के लिए करता है। आखिर में,  सिंगापुर और उसके महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर जोर, मानव संसाधन विकास में निवेश, कौशल-शिक्षा प्रदान करना व भ्रष्टाचार निवारण के लिए नौकरशाहों को ऊंची तनख्वाहें देना, ये हमारे लिए महत्वपूर्ण सीख हैं। यह सच है कि सिंगापुर एक शहरीकृत देश है। इससे भी बड़ा सच यह है कि इसके पास न तो जनसंख्या संबंधी लाभ हैं और न ही वहां भाषा, जाति और धर्म के जटिल संघर्ष है, हमारे जैसे तंत्र में ये हैं। हां, छोटा हमेशा सुंदर नहीं होता, लेकिन सिंगापुर जैसे छोटे शहरीकृत देश के पास हमारे लिए कई सारी सीखें हैं।

ली कुआन की विरासत भारत को उसके चूके अवसरों की याद दिलाती रहेगी, और इस बात की भी कि हमारे नेताओं के अहंकार व उनकी अक्षमता ने हमारे आर्थिक और सामाजिक सुधारों को तब तक टाले रखा, जब तक कि हमारी आर्थिक बदहाली ने उसके लिए हमें मजबूर नहीं कर दिया। वैसे सीखने के लिए कोई देरी नहीं होती। आखिरकार हमने भी सफलतापूर्वक सुधार की राह पकड़ी। सिंगापुर के साथ गहरी साझेदारी को बढ़ावा देकर हम उसके संस्थापक पिता की विरासत से सही सीखों को अपना रहे हैं। 

ली कुआन की विरासत के सबक @एन के सिंह

ली कुआन यू की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए मैं पिछले दिनों सिंगापुर में था। सिंगापुर के संस्थापक पिता के रूप में वह हालिया इतिहास में सबसे लंबे समय तक (1959-1990) प्रधानमंत्री रहे। दो साल पहले तक, 89 साल की आयु में भी वह नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होकर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की महत्वपूर्ण सेवा की है। बल्कि रविवार को हमारे यहां भी राष्ट्रीय शोक घोषित था। हमारे इस व्यवहार ने सिंगापुर के नागरिकों के दिलो-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ा। सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज यू ने, जिनके साथ मैंने कुछ समय बिताया, मुझे बताया कि इस प्रतीकात्मक कदम ने उन सबके दिलों पर गहरा असर डाला है और वे इसके बड़े एहसानमंद हैं। मोदी का यह स्वनिर्णय उनके उच्च नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। नेता न सिर्फ अपने अनुभवों से उभरते हैं, बल्कि सही मौके की समझ भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। सही समय और सही अवसर को चुनना एक निर्णायक नेतृत्व की विशेषता है।

हर कोई जानता है कि इंदिरा गांधी और ली कुआन के कूटनीतिक संबंध गर्मजोशी से भरे नहीं थे। भारत के पास तिरस्कार का यह भाव था कि एक छोटे-से शहर जैसे देश के नेता को हम जैसे जटिल देश को आर्थिक उदारीकरण का पाठ नहीं पढ़ाना चाहिए। हम उनके परामर्श को संशय भरी निगाहों से देखते थे। खुद ली कुआन भी भारत को लेकर निराशा का भाव रखते थे, क्योंकि भारत उन अवसरों का फायदा नहीं उठा रहा था, जो उसकी तकदीर बदल सकते थे। 1990 के दशक में हमारे यहां उदारीकरण की नीति लागू होने के बाद ली कुआन के विचारों में कुछ-कुछ परिवर्तन आया। बीते 20 वर्षों में भारत-सिंगापुर की दोस्ती और साझेदारी सार्थक रूप से गहरी हुई है। भारत उनके लिए लोकतांत्रिक ढांचे के तहत एक बड़ी जनसांख्यिकी व विशाल मांग वाला देश था, जो प्रबंधकीय कौशल व प्रौद्योगिकी का एक बड़ा बाजार था।

यह कोई रहस्य नहीं है कि साल 1965 में मलयेशिया से सिंगापुर के बंटवारे के बाद यह तेजी से तीसरी दुनिया के देशों से विकसित अर्थव्यवस्था की कतार में आ गया। इसकी प्रति व्यक्ति आय, जो साल 1965 में 540 अमेरिकी डॉलर थी, वह साल 2014 में 54,040 डॉलर पर पहुंच गई। वह कारोबार के लिहाज से सबसे सुभीते वाले देशों की सूची में लगातार शीर्ष पर रहा है, साथ ही सफल सार्वजनिक-निजी भागीदारी का भी एक उदाहरण है। इसके बावजूद, कई लोग सिंगापुर को परिवार संचालित तंत्र मानते हैं। समयबद्ध चुनाव और सक्रिय पार्लियामेंट के बावजूद इसने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को दबाया, मीडिया को अनुशासन में रहने को बाध्य किया। देश का युवा तबका इन नियंत्रणों के प्रति लगातार विरोध जताता रहा है। एक ऐसे देश में, जिसका कुल भौगोलिक दायरा 700 वर्ग किलोमीटर से अधिक नहीं है और जिसकी 50 लाख की जनसंख्या बूढ़ी हो रही है, निरंतर प्रवास ने सामाजिक बेचैनी को बढ़ाया है।

बेबाकी के साथ कहें, तो सिंगापुर की सफलता की कहानी में भारत के लिए चार सबक हैं। पहला,  सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को यदि भरपूर स्वायत्तता दी जाए, उन्हें उनसे संबंधित ज्ञान और उम्दा तकनीकी मुहैया कराया जाए, तो उत्पादकता को बढ़ाना और विकास करना संभव है। सिंगापुर एयरलाइंस, चांगी एयरपोर्ट और महत्वपूर्ण आधारभूत परियोजनाओं को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी टेमासेक संचालित करती है। सार्वजनिक क्षेत्र को सुचारु रूप में और सक्षम तरीके से चलाना तथा उसकी दक्षता बढ़ाते सिद्धांत व उत्पादकता सचमुच दोहराने के लायक हैं। दूसरा, सिंगापुर शहरी योजना और जल-प्रबंधन तंत्र के मामले में एक शानदार उदाहरण है। वहां एक बूंद पानी भी बरबाद नहीं होता। पानी की जितनी मात्र उपयोग में आती है, उसका रिसाइकिल किया जाता है और साथ ही, वर्षा-जल का प्रभावी परिशोधन होता है। जल संरक्षण तंत्र और शहरी योजना, दोनों हमारे लिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि हम पानी की कमी और अनियोजित शहरीकरण की समस्याओं से लगातार जूझ रहे हैं।

सिंगापुर सबसे स्मार्ट सिटी है। इस वास्तविकता को आंध्र पद्रेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तुरंत भांपा और राज्य की नई राजधानी अमरावती के निर्माण में सिंगापुर से मदद मांगी है। हम शहरों के लिए ऐसा कर सकते हैं और स्मार्ट शहरों को अधिक ठोस सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं। तीसरा,  नियंत्रित पूंजीवाद के लिए अक्सर चीन का उदाहरण पेश किया जाता है। इनोवेटिव संस्कृति में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन, प्रौद्योगिकी के उत्थान, बड़े प्रबंधकीय कौशल और सार्वजनिक संसाधनों से उनको जोड़ने की कला, ये सब मिलकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी का मॉडल तैयार करते हैं, जिसकी हमें जरूरत है। जोखिम-निर्धारण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के दुर्गंध को दूर करने व तमाम हितधारकों को पर्याप्त लाभ सुनिश्चित करने के संदर्भ में भारत अपने पीपीपी मॉडल को व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा है।

चौथा, श्रम कानूनों को बनाने में सिंगापुर का पारदर्शी प्रशासकीय तंत्र भारत के लिए सीख है। यहां पर अब श्रम-कानूनों में सुधार के मुद्दे ने नीति-नियंताओं का ध्यान आकृष्ट किया है। इसके अलावा, जहां भारत में मजदूर संगठनों की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति निवेश घटाती है, वहीं सिंगापुर इस शक्ति का इस्तेमाल शिक्षा और अन्य सामाजिक सेवाओं को सुधारने के लिए करता है। आखिर में,  सिंगापुर और उसके महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर जोर, मानव संसाधन विकास में निवेश, कौशल-शिक्षा प्रदान करना व भ्रष्टाचार निवारण के लिए नौकरशाहों को ऊंची तनख्वाहें देना, ये हमारे लिए महत्वपूर्ण सीख हैं। यह सच है कि सिंगापुर एक शहरीकृत देश है। इससे भी बड़ा सच यह है कि इसके पास न तो जनसंख्या संबंधी लाभ हैं और न ही वहां भाषा, जाति और धर्म के जटिल संघर्ष है, हमारे जैसे तंत्र में ये हैं। हां, छोटा हमेशा सुंदर नहीं होता, लेकिन सिंगापुर जैसे छोटे शहरीकृत देश के पास हमारे लिए कई सारी सीखें हैं।

ली कुआन की विरासत भारत को उसके चूके अवसरों की याद दिलाती रहेगी, और इस बात की भी कि हमारे नेताओं के अहंकार व उनकी अक्षमता ने हमारे आर्थिक और सामाजिक सुधारों को तब तक टाले रखा, जब तक कि हमारी आर्थिक बदहाली ने उसके लिए हमें मजबूर नहीं कर दिया। वैसे सीखने के लिए कोई देरी नहीं होती। आखिरकार हमने भी सफलतापूर्वक सुधार की राह पकड़ी। सिंगापुर के साथ गहरी साझेदारी को बढ़ावा देकर हम उसके संस्थापक पिता की विरासत से सही सीखों को अपना रहे हैं। 

Wednesday, 1 April 2015

'मैंने देखा...लोग घास और सांप खा रहे थे'

बंगाल अकाल
वर्ष 1943 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर था, तब बंगाल में भारी अकाल पड़ा था जिसमें लाखों लोग मारे गए थे.
प्रोफ़ेसर रफ़ीकुल इस्लाम तब 10 साल के थे और ढाका में रहते थे. वह कहते हैं, "जब भी मैं उन दिनों के बारे में सोचता हूं, मैं खो जाता हूं. वर्ष 1943 में बंगालियों को जिस आपदा का सामना करना पड़ा, वह विश्व के इतिहास की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक है."
बीबीसी के कार्यक्रम विटनेस के लिए फ़रहाना हैदर ने मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बंगाल में पड़े भीषण अकाल के बारे में प्रोफ़ेसर रफ़ीकुल इस्लाम से बात की.

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बंगाल अकाल
प्रोफ़ेसर इस्लाम को अब भी याद है कि परेशान लोग खाने की तलाश में मारे-मारे फिरते थे.
वे बताते हैं, "लोग भूखे मर रहे थे क्योंकि ग्रामीण भारत में खाने-पीने की चीज़ें उपलब्ध नहीं थीं. इसलिए लोग कोलकाता, ढाका जैसे बड़े शहरों में खाने और आश्रय की तलाश में पहुंचने लगे. लेकिन वहां न खाना था, न रहने की जगह. उन्हें रहने की जगह सिर्फ़ कूड़ेदानों के पास ही मिल रही थी, जहां उन्हें कुत्ते-बिल्लियों से संघर्ष करना पड़ता था ताकि कुछ खाने को मिल जाए."
वो कहते हैं, "कोलकाता, ढाका की सड़कें कंकालों से भर गई थीं. इंसानी ढांचे जो कई दिन से भूखे थे और सिर्फ़ मरने के लिए ही बंगाल के कस्बों और शहरों में पहुंचे थे."
बंगाल का अकाल जापान के बर्मा पर कब्ज़ा कर लेने के बाद ही आया था. भारत पर काबिज़ अंग्रेज़ सरकार ने देश के अन्य क्षेत्रों से सूखा प्रभावित हिस्से तक अनाज पहुंचने पर रोक लगा दी थी.
इसका उद्देश्य एक तो इसे विरोधियों के हाथों में पड़ने से रोकना था और दूसरा यह कि स्थानीय लोगों को ठीक से खाना मिले.
बंगाल अकाल
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "यह प्राकृतिक आपदा नहीं थी, यह मानवनिर्मित आपदा थी. ग्रामीण इलाकों में खाद्य पदार्थ सिर्फ़ इसलिए नहीं थे क्योंकि फ़सल बर्बाद हो गई थी बल्कि इसलिए भी क्योंकि अनाज को एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाने दिया जा रहा था. उन्हें डर था कि यह जापानियों के हाथों में न पड़ जाएं."
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि यह फ़ैसला मित्र राष्ट्रों के नेतृत्व का था. कोलकाता में सेना के लिए खाद्य पदार्थों का अतिरिक्त स्टॉक था. लेकिन ग्रामीण इलाकों में खाने को कुछ भी नहीं था. और किसी को इसकी परवाह भी नहीं थी."

हड्डियों के ढांचे

बंगाल अकाल
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "मैं राहत कर्मियों के एक छोटे से दल के साथियों के साथ हल्दी नदी पर स्थित टेरेपेकिया बाज़ार पहुंचा. वहां मैंने निर्वस्त्र, करीब-करीब कंकाल बन चुके करीब 500 महिला-पुरुषों को देखा."
वो कहते हैं, "उनमें से कुछ आने-जाने वालों से भीख मांग रहे थे तो कुछ कोने में पड़े थे, अपनी मौत का इंतज़ार करते. उनमें सांस लेने की शक्ति भी नहीं बची थी और दुर्भाग्य से मैंने आठ लोगों को अंतिम सांसे लेते देखा. इससे मैं अंदर तक हिल गया."
जंग की वजह से कीमतें आसमान छू रही थीं और जापानी आक्रमण को लेकर अनिश्चितता की वजह से शहरी इलाकों में जमाखोरी हो रही थी.
इसके फलस्वरूप देहात में चीज़ें बेहद महंगी हो गईं और जब लोग मरने लगे तो भारी संख्या में शहरों की ओर इस उम्मीद में पलायन होने लगा कि वहां राहत दी जा रही होगी.
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "त्रासदी यह है कि कस्बों, शहरों में रहने वाले लोगों की उन बदकिस्मत लोगों से ज़रा भी सहानुभूति नहीं थी. इनमें से ज़्यादातर लोग उन्हीं सड़कों, शहरों में रह गए, वह कभी वापस गांव नहीं लौटे. गांव का ढांचा ही बर्बाद हो गया और बंगाल कभी भी उससे उबर नहीं पाया."
प्रोफ़ेसर इस्लाम के अनुसार उन्हें एक अकाल पीड़ित ने बताया, "मैं अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ा था और जिंदा रहने के लिए दिहाड़ी मज़दूरी किया करता था. मैंने अपने पिता को गांव में छोड़ा और भाई-बहनों को कोलकाता ले आया. उनके पास बस आटा था. हम हर उस जगह जाते जहां खाना बंट रहा होता."
बंगाल अकाल
अकाल पीडि़त ने बताया, "उस दौरान मैंने बहुत-कुछ देखा. लोग घास और सांप तक खा रहे थे. मेरी दो बहनों उस दौरान मारी गईं."

'सबसे ख़ुश इंसान'

बर्मा पर जापानी कब्ज़े से भारत में भारी दहशत फैल गई. बड़ी संख्या में नागरिक और सैनिक सीमापार कर भारत आ गए.
प्रोफ़ेसर इस्लाम बताते हैं, "मेरे पिता रेलवे में डॉक्टर थे और ढाका आने से पहले हम लालमुनि हाट में रहते थे जो बड़ा रेलवे जंक्शन था और जिसे गेटवे ऑफ़ असम कहा जाता था. वहां हमने बड़ी संख्या में शरणार्थियों को देखा. सैकड़ों-हज़ारों शरणार्थी उस रास्ते बर्मा से भारत आ रहे थे. मैंने उस दौरान एंबुलेंस, ट्रेन, सैन्य अस्पतालों में युद्ध के नुक़सान को भी देखा."
बंगाल तब खाद्य पदार्थ आयात किया करता था जिसमें बर्मा के चावल शामिल थे लेकिन जापान के कब्ज़ा करने के बाद वह रुक गया.
बंगाल अकाल
उसी समय ब्रितानी शासकों ने भी बंगाल के तट को अलग-थलग करने की नीति पर अमल शुरू कर दिया ताकि जापान की बढ़त को रोका जा सके.
इसी समय, 1943 के पूरे साल भारत से ब्रिटेन और ब्रितानी फौजों को खाद्य सामग्री भेजा जाना जारी रहा. आमतौर पर इस बात पर सहमति है कि 1943 का बंगाल अकाल गलत नीतियों और लापरवाही का नतीजा था.
ब्रितानी इतिहासकारों के अनुमानों के अनुसार इसमें 15 लाख लोग मारे गए थे जबकि भारतीय इतिहासकार यह संख्या 60 लाख तक बताते हैं.
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं कि जो बच गए उनका हिसाब रखा जाना भी ज़रूरी है. वो कहते हैं, "एक किस्सा मुझे अब भी याद है जब हमने एक परिवार की मदद करने की कोशिश की थी. पति-पत्नी और दो बच्चे रोज़ शाम हमारे दरवाज़े पर आ जाया करते और मेरी मां थोड़ा भात और दाल उनके लिए बचा लिया करती. हमने उस परिवार को ज़िंदा रखा."

bengal famine picture people lined up for food
वो बताते हैं, "फिर एक दिन वह हमसे विदा लेने आए. वह गांव वापस लौट रहे थे. उस दिन मेरी मां दुनिया की सबसे ख़ुश महिला थी क्योंकि वह कम से कम एक परिवार को ज़िंदा रखने में कामयाब रही थी."

'लिखूं कैसे?'

यह एक ऐसी भयावह मानवीय त्रासदी है जिससे कम ही याद किया जाता है. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बंगाल के अकाल में ब्रितानी राज में सबसे ज़्यादा लोग मारे गए थे.
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "साल 1943 के अकाल के दौरान मैंने जो कुछ देखा वह मेरी यादों में इतना साफ़-साफ़ दर्ज है कि मैं उसे कभी भूल ही नहीं सकता."
वो कहते हैं, "कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि आप अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखते. सच कहूं तो मैं कैसे उस तकलीफ़, मानवीय त्रासदी को बयां कर पाऊंगा जो मैंने उस कमउम्र में देखी थी? मैं उसे लिख कैसे पाऊंगा?"
बंगाल अकाल
बंगाल के अकाल के दौरान हुए अनुभवों का प्रोफ़ेसर इस्लाम पर क्या असर पड़ा?
वो कहते हैं, "इंसान को बगैर किसी वजह या अपराध के इस तकलीफ़ का सामना क्यों करना पड़ा? और इंसान इतना क्रूर कैसे हो गया कि उनकी मदद नहीं की. इंसान को भगवान की सबसे शानदार रचना कहा जाता है लेकिन मेरे हिसाब से अकाल या युद्ध के दौरान यह भगवान की सबसे बुरी रचना बन गया था."
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, "उस दौरान हम जानवर बन गए थे.

मोहम्मद यूनुस थे पहले 'प्रधानमंत्री'! @मनीष शांडिल्य

मोहम्मद यूनुस
मोहम्मद यूनुस अपने रिश्तेदार मुज़्ज़फ़र इमाम के साथ लंदन में.
भारत की आज़ादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू बने, लेकिन आज़ादी से पहले भी देश में कई प्रधानमंत्री हुए.
उनमें से पहले प्रधानमंत्री थे मोहम्मद यूनुस. ये बिहार के प्रधानमंत्री थे. अब आप सोच रहे होंगे कि बिहार में प्रधानमंत्री का पद कैसे?
1935 में ब्रिटिश पार्लियामेंट ने ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट’ पारित किया था.
इतिहासकार और खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर डॉक्टर इम्तियाज़ अहमद बताते हैं, "एक्ट में प्रधानमंत्री का पदनाम प्रांतीय सरकार के प्रधान के लिए था, लेकिन व्यवहार में वो पद वही था जो आज मुख्यमंत्री का है."

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मोहम्मद यूनुस
इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, "इस एक्ट के तहत 1937 में भारत में प्रांत स्तर पर चुनाव हुए. इस चुनाव में बिहार सहित सभी प्रांतों में कांग्रेस की भारी बहुमत से जीत हुई."
तब प्रांतीय सरकार में गवर्नर के हस्तक्षेप के सवाल पर कांग्रेस ने सभी जगह सरकार बनाने से इनकार कर दिया था.
अहमद बताते हैं कि कांग्रेस के इनकार के बाद बिहार में मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी के मोहम्मद यूनुस ने सरकार बनाई.
यूनुस से साथ और तीन लोग भी सरकार का हिस्सा बने थे जिसमें दो ग़ैर-मुस्लिम थे.
एक अप्रैल, 1937 को वे बिहार ही नहीं सभी प्रातों में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले पहले शख्स बने. यूनुस 19 जुलाई 1937 तक अपने पद पर रहे.

कांग्रेस से अलग

मोहम्मद यूनुस
मोहम्मद यूनुस (बाएं से तीसरे)
यूनुस का जन्म 4 मई 1884 को बिहार में पटना के करीब पनहरा गांव में हुआ था. उनके पिता मौलवी अली हसन मुख्तार मशहूर वकील थे और उन्होंने लंदन से वकालत पढ़ी थी.
यूनुस ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी, लेकिन बाद में वे महात्मा गांधी की असहयोग नीति और दूसरे राजनीतिक कारणों से कांग्रेस से अलग हो गए.
फिर उन्होंने 1937 के चुनाव के समय मौलाना सज्जाद के साथ मिलकर मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी बनाई.
आज़ादी के बाद बने किसान मजदूर प्रजा पार्टी के गठन में भी मोहम्मद यूनुस ने अहम भूमिका निभाई थी.
1952 में 13 मई को मोहम्मद यूनुस का इंतकाल हुआ.

चार माह का कार्यकाल

मोहम्मद यूनुस
सामाजिक-राजनीतिक योगदान के आधार पर भूतपूर्व सांसद और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ शिवानंद तिवारी मोहम्मद यूनुस को एक स्टेट्समैन करार देते हैं.
शिवानंद कहते हैं, "अपने चार महीने के कार्यकाल में यूनुस ने आश्चर्यजनक कार्य किए. उन्होंने ज़मीन और किसानों की समस्याएं सुलझाने और क़ौमी एकता बनाने रखने में विशेष पहल की. साथ ही उन्होंने बिहार विधानमंडल और पटना हाईकोर्ट जैसी इमारतों की नींव भी रखी."
एक वकील और राजनेता के साथ-साथ यूनुस एक सफल उद्यमी, बैंकर और प्रकाशक भी थे. उनके द्वारा पटना में बनाया गया ग्रैंड होटल तब के बिहार का पहला आधुनिक होटल था.
इसी होटल के एक हिस्से में मोहम्मद यूनुस रहा करते थे. साथ ही तब यह होटल उस दौर का महत्त्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र हुआ करता था.
यूनुस के परपोते और बैरिस्टर मोहम्मद यूनुस मेमोरियल कमेटी के अध्यक्ष क़ासिफ़ यूनुस बताते हैं, "ग्रैड होटल में ठहरने वालों में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, मौलाना आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे बड़े नेता शामिल थे."

उपेक्षा

बिहार विधानसभा की वेबसाइट
युनूस के परिजनों और शिवानंद तिवारी जैसे राजनेताओं का मानना है कि आज़ाद भारत में, ख़ासकर सरकार के स्तर पर मोहम्मद यूनुस को वैसा सम्मान और पहचान नहीं मिली, जिसके वो हक़दार थे.
जैसा कि क़ासिफ़ यूनुस कहते हैं, "आज़ादी के पहले के रिकार्ड्स में तो उनके नाम हैं, लेकिन बाद में सरकारी अभिलेखागारों से भी उनका नाम हटा दिया गया."
क़ासिफ़ के मुताबिक़ यह एक ‘अपराध’ है. ऐसा इस कारण भी हुआ क्योंकि आज़ादी के बाद लंबे समय तक बिहार में ऐसी सरकारें रहीं, जिनकी विचारधारा यूनुस की राजनीतिक विचारधारा से अलग थीं.
हालाँकि हाल के वर्षों में यूनुस के योगदान को सरकारी स्तर पर स्वीकार करने की शुरुआत हुई है.

सम्मान

नीतीश कुमार
2013 से यूनुस की जयंती राजकीय सम्मान के साथ आयोजित की जाती है. इसकी घोषणा 2012 में बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की थी.
लेकिन अब भी यूनुस कई जगहों पर उपेक्षित दिखाई देते हैं, जैसे कि बिहार विधानसभा की वेबसाइट.
वेबसाइट पर मौजूद बिहार के प्रीमियर और मुख्यमंत्रियों की सूची मोहम्मद यूनुस नहीं, बल्कि उनके ठीक बाद बिहार के प्रधानमंत्री बनने बाले श्रीकृष्ण सिंह से शुरू होती है.
इस ओर ध्यान दिलाने पर बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदयनारयण चौधरी कहते हैं, "यूनुस के बारे में जानकारी एकत्र कर जल्द ही इस सूची को ठीक करने की दिशा में पहल की जाएगी.